Wednesday, February 1, 2023

चीफ जस्टिस ने कहा- अगर हम नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकते तो फिर हम क्या करने के लिए बैठे हैं?

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केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट का टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। गुरुवार को कानून मंत्री ने संसद में सुप्रीम कोर्ट को नसीहत दी तो शुक्रवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने सरकार को करारा जवाब दिया। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के लिए कोई मामला बहुत छोटा नहीं है।अगर हम नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकते तो फिर हम क्या करने के लिए बैठे हैं? चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट लोगों के मौलिक अधिकारों का संरक्षक है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक अहम मौलिक अधिकार है। शीतावकाश में कोर्ट के चलने के सवाल पर उनका कहना था कि इस दौरान कोई पीठ नहीं बैठने जा रही है।

दरअसल, कानून मंत्री ने राज्य सभा में लंबित केसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट पर तीखा वार किया था। उनका कहना था कि सरकार कोर्ट के कामों में दखल नहीं देना चाहती लेकिन पांच करोड़ केस देश की विभिन्न अदालतों में पेंडिंग हैं। सरकार की चिंता उनको लेकर है। कानून मंत्री यहां तक बोले कि सुप्रीम कोर्ट के साथ दूसरे हाईकोर्ट्स में जो वैकेंसीज हैं वो चिंता में डालने वाली हैं। सरकार के पास अच्छे जजों की सिफारिशें नहीं आतीं।

उनका कहना था कि संविधान ने सरकार को अधिकार दिया था कि वो अदालतों में रिक्त पदों को भरे। लेकिन 1993 के बाद स्थिति बदल गई। कानून मंत्री ने अदालतों में होनी वाली लंबी छुट्टियों पर भी तीखा तंज कसा था। उनका कहना था कि इतने पेंडेंसी के बावजूद जज लंबी छुट्टी पर जाते हैं। कानून मंत्री का ये भी कहना था कि सुप्रीम कोर्ट को संवैधानिक मामलों की सुनवाई करनी चाहिए। छोटे-मोटे केसों में नहीं पड़ना चाहिए।

चीफ जस्टिस ने कानून मंत्री के दोनों तंजों पर पलटवार किया। उनका कहना था कि सर्दी की छुट्टियों में कोई भी पीठ काम नहीं करेगी। ध्यान रहे कि इसके पहले ग्रीष्म अवकाश के दौरान सुप्रीम कोर्ट वैकेशन बेंच का गठन करता है जो गंभीर मामलों की सुनवाई के लिए उपलब्ध होती है। लेकिन चीफ जस्टिस ने साफ कर दिया कि 2 जनवरी 2023 तक कोई भी पीठ काम नहीं करेगी।

पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में प्रदत्त एक विशेष और अपरिहार्य अधिकार है। पीठ ने कहा कि अगर हम व्यक्ति स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में कार्रवाई नहीं करते हैं तो हम अनुच्छेद-136 (राहत देने के लिए संविधान में प्रदत्त विशेष शक्तियां) का उल्लंघन करेंगे।

चीफ जस्टिस की टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें व्यक्ति को बिजली की चोरी के लिए कुल 18 साल की लगातार सजा काटने का आदेश दिया गया। आरोपी ने प्ली बार्गेनिंग स्वीकार कर ली और उसे नौ मामलों में से प्रत्येक में दो साल की सजा सुनाई गई। अधिकारियों ने माना कि सजाएं समवर्ती के बजाय लगातार चलती हैं, जिसके परिणामस्वरूप कुल 18 साल की सजा होती है।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने जैसे ही मामला लिया, कहा, “बिल्कुल चौंकाने वाला मामला।” पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता पहले ही 7 साल की सजा काट चुका है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा यह आदेश देने से इनकार करने के बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि उसकी सजा समवर्ती रूप से चलनी चाहिए।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना है तो हम यहां किस लिए हैं? अगर हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं और हम इस व्यक्ति की रिहाई का आदेश नहीं देते हैं तो हम यहां किस लिए हैं। तब हम संविधान के अनुच्छेद 136 का उल्लंघन कर रहे हैं।

पीठ ने सीनियर एडवोकेट और मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एस नागामुथु की सहायता मांगी, जो संयोग से अन्य मामले के लिए अदालत में थे, जिसे उन्होंने “असाधारण स्थिति” कहा था। नागमुथु ने हाईकोर्ट के आदेश को गलत बताते हुए कहा कि यह आजीवन कारावास बन जाता है। चीफ जस्टिस का तुरंत जवाब आया, “इसलिए सुप्रीम कोर्ट की जरूरत है।”

चीफ जस्टिस ने कहा कि जब आप यहां बैठते हैं तो सुप्रीम कोर्ट के लिए कोई भी मामला छोटा नहीं होता और कोई मामला बहुत बड़ा नहीं होता। क्योंकि हम यहां अंतरात्मा की पुकार और नागरिकों की स्वतंत्रता की पुकार का जवाब देने के लिए हैं। यही यहां कारण है। यह बंद मामला नहीं है।जब आप यहां बैठते हैं और आधी रात को रोशनी जलाते हैं तो आपको एहसास होता है कि हर रोज कोई न कोई मामला ऐसा ही होता है।”

अपीलकर्ता को राहत देते हुए पारित आदेश में पीठ ने कहा कि यह प्रतीत होता है कि छोटे नियमित मामलों में न्यायशास्त्रीय और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से पल-पल के मुद्दे सामने आते हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार अहस्तांतरणीय अधिकार है। ऐसी शिकायतों पर ध्यान देने के लिए सुप्रीम कोर्ट अपना कर्तव्य निभाता है, न अधिक और न ही कम।

पीठ ने आदेश में कहा कि वर्तमान मामले के तथ्य एक और उदाहरण प्रदान करते हैं कि इस न्यायालय के लिए इस औचित्य का संकेत देता है कि वह जीवन के मौलिक अधिकार और प्रत्येक नागरिक में निहित व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रक्षक के रूप में अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करे। यदि अदालत ऐसा नहीं करती है तो वर्तमान मामले में सामने आई प्रकृति के न्याय के गंभीर गर्भपात को जारी रहने दिया जाएगा और जिस नागरिक की स्वतंत्रता को निरस्त कर दिया गया है, उसकी आवाज पर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा।

पीठ ने आदेश में कहा कि इस अदालत का इतिहास इंगित करता है कि यह नागरिकों की शिकायतों से जुड़े प्रतीत होने वाले छोटे और नियमित मामलों में है, जो न्यायशास्त्रीय और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से पल-पल के मुद्दे सामने आते हैं। नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इस अदालत द्वारा संविधान के अनुच्छेद 136 में सन्निहित ध्वनि संवैधानिक सिद्धांतों पर हस्तक्षेप इसलिए स्थापित किया गया।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त अनमोल और अविच्छेद्य अधिकार है। ऐसी शिकायतों पर ध्यान देने में सुप्रीम कोर्ट सदा संवैधानिक कर्तव्य, दायित्व और कार्य करता है; इससे अधिक और कुछ नहीं, कम नहीं है। पीठ ने यह आदेश देकर अपील स्वीकार कर ली कि अपीलकर्ता के खिलाफ नौ मामलों में सजा साथ-साथ चलनी चाहिए।

सीजेआई चंद्रचूड़ ने आदेश लिखने के बाद टिप्पणी की कि सभी ने कहा और किया, आप बिजली की चोरी के अपराध को हत्या के अपराध की सजा तक नहीं बढ़ा सकते, जबकि हाईकोर्ट को मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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