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सीबीआई जाँच के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा भ्रष्टाचार की सीबीआई जाँच के आदेश के बाद जाँच होगी या नहीं इसका फैसला उच्चतम न्यायालय करेगा। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक पत्रकार की याचिका में लगाये गये आरोपों का स्वत: संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ सीबीआई जाँच का आदेश दिया है।

निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि जिस तरह एक खाते से दूसरे खाते में पैसे ट्रान्सफर किये गये हैं वैसा किसी गैर भाजपाई नेता या मुख्यमंत्री, मंत्री के मामले में आरोप लगता तो तो अब तक प्रवर्तन निदेशालय उनके ठिकानों पर दर्जनों छापे मार चुका होता।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच के आदेश के बाद 24 घंटे के भीतर उत्तराखंड सरकार उच्चतम न्यायालय की देहरी पर पहुंच गयी है। राज्य सरकार ने बुधवार देर शाम उच्चतम न्यायालय में एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) दायर की है। पार्टी विद डिफ़रेंस का दावा करने वाली भाजपा ने पूरे मामले को लेकर आरोपों को सिरे से नकार दिया है। भाजपा ने मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप को बेबुनियाद बताया है।

हाईकोर्ट ने मंगलवार को पत्रकार उमेश जे कुमार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों को निरस्त करने का आदेश दिया था। साथ ही उमेश की याचिका में लगाए आरोपों के आधार पर सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने का आदेश भी दिया था। कोर्ट ने कहा, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ लगे आरोपों को देखते हुए यह सही होगा कि सच सामने आए। यह राज्य हित में होगा कि संदेहों का निवारण हो।

जस्टिस रवीन्द्र मैथानी की एकल पीठ ने फैसले में इस बात को गंभीरता से लिया कि सरकार ने उमेश शर्मा के खिलाफ देशद्रोह का आरोप भी लगाया था।एकल पीठ ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि केदारनाथ मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुसार कोई गतिविधि उस समय तक देशद्रोह नहीं होगी जब तक इसका मकसद सार्वजनिक शांति भंग करने, अव्यवस्था पैदा करने या हिंसा करना नहीं हो।

एकल पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठे आरोप लगाना कभी भी देशद्रोह नहीं हो सकता जब तक यह केदार नाथ सिंह मामले में प्रतिपादित कसौटी पर खरा नहीं उतरे। अगर प्रतिनिधियों के खिलाफ आरोप लगाये गये हैं तो यह अपने आप में ही देशद्रोह नहीं हो सकता।’

एकल पीठ ने कहा कि सरकार की आलोचना कभी भी देशद्रोह नहीं हो सकती। जन सेवकों की आलोचना के बगैर लोकतंत्र सुदृढ़ नहीं हो सकता है। लोकतंत्र में असहमति का सदैव सम्मान होता है और विचार किया जाता है, अगर इसे देशद्रोह के कानून के तहत दबाया गया तो यह लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास होगा।

एकल पीठ ने कहा कि इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए जोड़ना दर्शाता है कि यह सरकार का आलोचना और असहमति की आवाज दबाने का प्रयास है। इसकी कभी अनुमति नहीं दी जा सकती। कानूनी इसकी अनुमति नहीं देता है। इस मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ जो भी आरोप हैं उनका धारा 124-ए से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए के तहत पहली नजर में मामला नहीं बनता है। यह समझ से परे है कि यह धारा इसमें क्यों जोड़ी गयी। सरकार की ओर से इस बारे में जो कुछ भी कहा गया है उसमे कोई मेरिट नहीं है।

जस्टिस मैथानी ने अपने फैसले में कहा है कि इस न्यायालय का मानना है कि राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के खिलाफ लगाये गये आरोपों की गंभीरता को देखते हुये सच्चाई का पता लगाना उचित होगा। यह राज्य के हित में होगा कि इन संदेहों का समाधान हो। इसलिए याचिका स्वीकार करते हुये यह न्यायालय इसकी जांच भी कराना चाहता है।

जस्टिस मैथानी ने कहा कि जनता को इस धारणा में नहीं जीना चाहिए कि उनके प्रतिनिधि पवित्र नहीं है। अगर कोई झूठे आरोप लगाता है, जो कानून में कार्रवाई योग्य हैं, कानून को अपना काम करना चाहिए। अगर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे व्यक्तियों को बगैर किसी जांच के ही समाज में उच्च पदों पर रहने दिया जाये तो यह न तो समाज के विकास में मददगार होगा और न ही राज्य के प्रभावी तरीके से काम करने में। भ्रष्टाचार कोई नयी बात नहीं है। भ्रष्टाचार ऐसी समस्या है जिसने जिंदगी के हर क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली है। ऐसा लगता है कि समाज ने इसे सामान्य बना लिया है।

इस मामले मे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और श्याम दीवान ने शर्मा की ओर से बहस की जबकि राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवालिया, उपमहाधिवक्ता रूचिरा गुप्ता और जेएस विर्क उपस्थित हुये। डॉ. एचएस रावत की ओर से अधिवक्ता रामजी श्रीवास्तव और नवनीत कौशिक उपस्थित हुये।

हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर बुधवार को मैदान में उतरी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री का इस्तीफा न होने तक कांग्रेस अपना विरोध अभियान जारी रखेगी। कांग्रेस भवन में प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव, पूर्व सीएम हरीश रावत, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस कर प्रदेश सरकार पर हमला बोला। प्रदेश प्रभारी ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद सीएम को अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। कांग्रेस इस मामले को लेकर तब तक आंदोलन करेगी, जब तक सीएम अपना पद नहीं छोड़ देते या उनसे इस्तीफा नहीं लिया जाता।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने कहा कि भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकार पौने चार साल के कार्यकाल में लोकायुक्त नहीं ला पाई। सत्ता पक्ष के विधायक ही सदन में अपनी सरकार के खिलाफ कार्य स्थगन का प्रस्ताव लेकर आए। अब तो हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। नैतिकता और जांच को प्रभावित न होने देने के आधार पर सीएम को अपना पद छोड़ देना चाहिए।

पूर्व सीएम हरीश रावत ने कहा कि हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश कर यह साफ कर दिया है कि उसे प्रदेश की जांच एजेंसी पर भरोसा नहीं है। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने भी कहा कांग्रेस इस मामले को ठंडा नहीं होने देगी। सदन के अंदर और बाहर लड़ाई लड़ी जाएगी। प्रेस वार्ता में प्रकाश जोशी, विधायक काजी निजामुद्दीन सहित अन्य कांग्रेस नेता भी शामिल रहे।

प्रदेश सरकार पर चौतरफा दबाव बनाने के लिए कांग्रेस ने सीबीआई जांच के हाईकोर्ट के आदेश को आधार बनाते हुए राज्यपाल से मिलने का फैसला किया है।कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के मुताबिक पूर्व सीएम हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस का विधायक दल राज्यपाल से सीएम के इस्तीफे की मांग को लेकर मिलेगा। इसके लिए राजभवन से समय मांगा गया है। नेता प्रतिपक्ष सहित कांग्रेस के सभी 11 विधायकों का प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिलेगा। कांग्रेस का मानना है कि हाईकोर्ट की ओर से एफआईआर दर्ज करने और सीबीआई जांच का आदेश होने के बाद सरकार को सत्ता में बने रहने का हक नहीं है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 28, 2020 11:31 pm

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