Friday, January 21, 2022

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हिमाचल उपचुनावों में कांग्रेस का क्लीन स्वीप, लेकिन नोटा ने भी दिखाया रंग

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हिमाचल प्रदेश में शनिवार को एक संसदीय सीट और तीन विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में 66.91 फीसदी मतदान हुआ। उपचुनाव में कुल 18 उम्मीदवार मैदान में थे जिनमें से तीन विधानसभा क्षेत्रों के लिए 12 उम्मीदवार और मंडी लोकसभा सीट के लिए छह उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। प्रदेश की मंडी संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी व पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह करीब 8766 वोटों से चुनाव जीत गई हैं। उन्होंने करीब 365650 वोट हासिल किए। जबकि भाजपा प्रत्याशी कुशाल सिंह ठाकुर को 356884 वोट मिले। उपचुनाव में कुल 742771 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इनमें से 12626 ने नोटा को चुना है।

जुब्बल-कोटखाई विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के रोहित ठाकुर ने 6103 मतों से जीत दर्ज की है। फतेहपुर सीट से भी कांग्रेस उमीदवार भवानी सिंह पठानिया 5789 वोटों से चुनाव जीत गए हैं। 24 चरणों की मतगणना में भाजपा प्रत्याशी बलदेव ठाकुर को 18660, भवानी सिंह पठानिया को 24449, जनक्रांति पार्टी के पंकज दर्शी 375, अशोक सोमल(निर्दलीय) को 295 और निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. राजन सुशांत को 12927 वोट मिले। वहीं उपचुनाव में 389 ने नोटा दबाया।

मतदान का बहिष्कार।

जुब्बल-कोटखाई को छोड़कर सभी सीटों पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होने की उम्मीद पहले से ही थी, भाजपा सांसद राम स्वरूप के निधन के बाद खाली हुई मंडी लोकसभा सीट के लिए लड़ाई को उत्सुकता से देखा जा रहा था क्योंकि मंडी मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर का गृह क्षेत्र है और भाजपा के पास इस सीट को बरकरार रखने की कड़ी चुनौती सामने थी जिसमें भाजपा पूरी तरह से विफल हुई है।

कांग्रेस ने मंडी से पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी और पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह को मैदान में उतारा और वीरभद्र सिंह के नाम पर सहानुभूति वोटों का कैंपेन चलाते हुए भाजाप पर भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, विकास की कमी के तंज कसे। भाजपा ने “युद्ध सेवा” पदक प्राप्त करने वाले ब्रिगेडियर कुशाल ठाकुर (सेवानिवृत्त) को अपना उम्मीदवार रख सेना के नाम पे वोट मांगने में कोई भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई।

इसके साथ साथ राष्ट्रीय लोकनीति पार्टी की अंबिका श्याम, हिमाचल जनक्रांति पार्टी के मुंशी राम ठाकुर और निर्दलीय उम्मीदवार अनिल कुमार और सुभाष मोहन स्नेही भी उपचुनाव के मैदान में रहे।

अर्की सीट से भाजपा ने रत्ना सिंह पाल और कांग्रेस ने संजय को मैदान में उतारा । फतेहपुर सीट से बलदेव ठाकुर (भाजपा), भवानी सिंह पठानिया (कांग्रेस), हजपा के पंकज कुमार दर्शी और निर्दलीय उम्मीदवार अशोक कुमार सोमल और राजन सुशांत मैदान में आमने-समाने नज़र आये। जुब्बल-कोटखाई सीट से चार उम्मीदवार नीलम सरायक (भाजपा), रोहित ठाकुर (कांग्रेस), निर्दलीय चेतन सिंह ब्रगटा और सुमन कदम के बीच टक्कर रही। सभी सीटों पर जहाँ कांग्रेस पार्टी ने जीत हासिल की है उसने भाजपा की आंखें खोलने का काम किया है।

प्रचार का दौर

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे पे तंज कसने और कीचड़ उछालने से ज़्यादा कुछ और करती नज़र नहीं आईं। भारतीय जनता पार्टी ने घोषणा पत्र के बजाय पहली बार स्वर्णिम हिमाचल दृष्टि पत्र जारी किया जिसमें हर बार की तरह मुद्दों को कागज़ पर उतार पूरा करने की गुहार लगाई। डॉक्यूमेंट में भाजपा का फोकस प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी के बजाय प्रदेश में बढ़ते माफियाराज पर रहा।

वहीं कांग्रेस ने भाजपा राज में विकास गुल, प्रचार फुल है का नारा दिया । भाजपा का चुनाव चिन्ह ‘लोटस’, है लेकिन अब ‘लूट अस’पार्टी नाम रखने की नौबत आ गई है कहते हुए कांग्रेस के नेताओं ने एक और नारा दिया, जय राम सरकार की सौगात,जनता पर महंगाई की बरसात। हालांकि प्रचार अभियान में कांग्रेस भी जनता के मुद्दों से दूर रही और दिवंगत वीरभद्र सिंह जिनका नाम कांग्रेस ने वोट मांगने के लिए एक बड़े तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल किया जिससे वोट को दिवंगत आत्मा की श्रद्धांजलि के रूप में पेश किया गया ।

चुनाव से गायब जनता के मुद्दे

मंडी लोक सभा के उप चुनाव से पहले जहाँ किन्नौर के नौजवान अपने पर्यावरण, जल-जंगल-जमीन को बचाने और किन्नौर के अस्तित्व को बचाने के लिए नोटा बटन दबाओ अभियान चलाकर ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत’है का नारा लगा रहे थे वहीं किन्नौर में रैली को संबोधित करते हुए जय राम ठाकुर ने कहा, “ब्रिगेडियर कुशल ठाकुर की जीत का मतलब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत और भारत की सुरक्षा है।”

हिमाचल प्रदेश के उपचुनाव में कुछ शब्द काफी चर्चा में रहे हैं। इनमें श्रद्धाजंलि, कारगिल युद्ध सबसे ज़्यादा सुनने में आया । आम जनता के मुद्दों से ज्यादा इन्हीं बातों पर ज्यादा चर्चाएं होती हुई दिखीं। हिमाचल प्रदेश के दूरदराज के जनजातीय बहुल जिले किन्नौर के नौजवान कई महीनों से जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ ‘नो मीन्स नो’ अभियान चला रहे थे। जल विद्युत परियोजनाओं ने किन्नौर के पर्यावरण और आर्थिक जन जीवन को बुरी तरह से बर्बाद कर दिया है। इस सब के खिलाफ वहां के नौजवानों में सालों से जमा हुआ आक्रोश नोटा को वोट करने के रूप में निकल कर सामने आया और किन्नौर की जनता ने कई बूथों पर मतदान का बहिष्कार किया ।इसी के चलते किन्नौर में केवल 54.61 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले जबकि मतदाताओं की संख्या 57 हजार से ज्यादा है।

बल्ह घाटी के निवासी, जिनकी कृषि भूमि, आवासीय और व्यावसायिक संपत्तियों का अधिग्रहण अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट योजना के लिए किया जाना है, इसका विरोध कर रहे हैं। वे अपनी “उपजाऊ” भूमि को खोना नहीं चाहते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का पहले से ही कहना था कि सरकार इस मुद्दे पे अपना मुँह फेर रही है ।

भरमौर में जगत पंचायत के बूथ नंबर- 87 के मतदाता और दुर्गेठी पंचायत के वार्ड नंबर-1 फोटा के तहत गांव फोटा, वसा और चनपट के मतदाताओं का कहना है कि गांवों को सड़क से जोड़ने के लिए प्रदेश के दोनों राजनीतिक दलों की ओर से कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। उपचुनाव के लिए शनिवार को प्रदेश के 14 जगहों पर मतदान का बहिष्कार हुआ। कहीं बिजली प्रोजेक्ट तो कहीं राशन की दुकान, मोबाइल नेटवर्क और रोड कनेक्टिविटी के मुद्दे पर सरकारी उदासीनता के चलते लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया। यह सब जनता का आक्रोश साफ जाहिर करता है ।

हिमाचल के चुनावों में लंबे समय से एक प्रवृत्ति देखी गई है कि पांच साल भाजपा राज करती है और फिर अगले पांच साल कांग्रेस पार्टी। इन दोनों पार्टियों ने हिमाचल को अपनी जागीर के रूप में हमेशा से देखा है। लेकिन चुनाव में जीत के बावजूद एक बात स्पष्ट है कि जनता अपने मुद्दों को न सुने जाने से बेहद नाराज़ है और जगह-जगह पे सरकार को चुनौती देती नज़र आ रही है।

नोटा और मतदान बहिष्कार

हालांकि कांग्रेस पार्टी अपनी जीत का जश्न मना रही है लेकिन पूरे चुनाव में मतदान का प्रतिशत और नोटा का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हुआ है । भारतीय लोकतंत्र में चुनाव की धूम धाम की अपनी चमक रहती है। हिमाचल में भी मतदान महादान , मतदान नहीं श्रद्धाजंलि, सेना के नाम जैसे जुमले पूरी तरह इस्तेमाल हुए लेकिन इन्हीं के बीच मतदान के बायकॉट जैसी विलक्षणताएं भी घटित हुई हैं।
बायकॉट पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता क्योंकि सरकारें तो जैसे तैसे बन ही जाती हैं। भारतीय लोकतंत्र में वोट की राजनीति का ऐसा जादू हो गया है कि 10 में से तीन लोग वोट दें तो उन्हीं तीन के आधार पर जीत और हार या सरकार का निर्णय संभव है। हिमाचल प्रदेश में एक संसदीय सीट और तीन विधानसभा सीटों के लिए आठ जिलों के 20 विधानसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में 66.91 फीसदी मतदान हुआ। हिमाचल में बनने वाली सरकार के अगर मतदान का प्रतिशत देखा जाए तो चुनाव आयोग के आंकड़े भाजपा को 28.05%,कांग्रेस को 48.90% नोटा को 1.26% और अन्य को 21.79% बताते हैं।

संवैधानिक प्रावधानों में वोट का ये गणित यूं तो जनतंत्र की मजबूती के लिए ही था लेकिन सत्ता की राजनीति और वर्चस्व की लड़ाइयों ने इस गणित को अपने पक्ष में ऐसा झुका दिया कि अब जनतांत्रिक अधिकार इस चुनावी राजनीति में अंट नहीं रहे हैं। वोट की राजनीति सरकारें तो बना देती है, लेकिन वो लोगों में भरोसा नहीं बना पाती। यही वजह है कि लोग अपना आक्रोश व्यक्त करते हैं। उन्हें सरकार की और वोट की मशीनरी पर संदेह होता है, उन्हें घोषणापत्रों और कसमों वादों पर यकीन नहीं होता है। अपनी इस भावना को वे मतदान के बहिष्कार से अभिव्यक्त करते हैं। और हिमाचल की जनता ने भी जगह-जगह पर यह बहिष्कार कर अपना विरोध दर्ज किया है।

(हिमाचल प्रदेश से एचपीयू की शोध छात्रा रितिका ठाकुर की रिपोर्ट।)

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