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व्यवस्था के पक्ष में ही जगती थी रिटायर्ड जस्टिस मिश्रा की ‘अंतरात्मा’

जस्टिस अरुण मिश्रा ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अपने अंतिम कार्य दिवस पर अपने विदाई भाषण में कहा कि उन्होंने हर मामले को अपनी अंतरात्मा से निपटाया है। क्या वे यह नहीं कह सकते थे कि उन्होंने सभी मामले कानून के शासन और संविधान की अवधारणा के अनुरूप निपटाया है? इसका जवाब यदि विधिक और न्यायिक क्षेत्रों में खोजा जाए तो ‘नहीं’ ही मिलेगा। उच्चतम न्यायालय संविधानिक न्यायालय है और संविधान की रक्षक मानी जाता है। उच्चतम न्यायालय अंतरात्मा की आवाज का न्यायालय नहीं है।

आखिर क्या कारण है कि जब भी कोई अपील या याचिका जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होती थी और केंद्र सरकार उसमें वादी या प्रतिवादी होती थी तभी से यह भविष्यवाणी की जाने लगती थी कि फैसला केंद्र सरकार के पक्ष में ही आएगा। क्या ऐसा फैसला अंतरात्मा की आवाज से आता रहा या फिर संविधानिक प्रावधानों और तत्सम्बन्धी क़ानूनी प्रावधानों के आधार पर दिया जाता था? यह शोध का विषय है।

क्या किसी न्यायाधीश के बारे में यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि उसने किसी केस के नतीजे के बारे में पहले ही अपना मन बना लिया है, और अंततः वही नतीजा  फैसले में सामने आता है? जिस मामले में जस्टिस अरुण मिश्रा पीठ में होते थे उसके नतीजों के बारे में पहले से ही वकील भविष्यवाणी करने लगते थे।

यह अकारण नहीं है कि जस्टिस अरुण मिश्रा को भूमि अधिग्रहण के मामले या प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना मामले से हटने का आग्रह वरिष्ठ वकीलों द्वारा किया गया था, जिसे स्वयं जस्टिस अरुण मिश्रा ने नकार दिया था। वकीलों को मालूम था कि चाहे जो न्याय दृष्टांत वे जस्टिस मिश्रा के सामने प्रस्तुत करेंगे जस्टिस अरुण मिश्रा का फैसला वही होगा जो उनकी ‘अंतरात्मा’ कहेगी अर्थात् सरकार के पक्ष में फैसला रहेगा।

जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ ने अंतरात्मा की आवाज पर टेलीकॉम सेक्टर के 15 साल पुराने मुकदमे में अगले दस साल में टेलीकॉम कंपनियां एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू देंगी, का फैसला सुनाकर प्रकारांतर से वोडाफोन आइडिया के क्लोजर की भूमिका लिख दी है और यदि ये बंद होती हैं तो सबसे ज्यादा फायदा मुकेश अम्बानी की कम्पनी जियो को होगा। वैसे एयरटेल भी है जो अपने को बाजार में बनाये रखने के लिए जूझ रही है।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस के एडिटर इन चीफ सुनील जैन ने क्विंट से बातचीत में फैसले में समस्याओं को गिनाते हुए कहा है कि इसमें 2-3 समस्याएं हैं। ये साफ दिख रहा है कि वोडाफोन आइडिया का जिंदा रहना मुश्किल हो गया है, क्योंकि उनके पास पैसे नहीं हैं। उन्होंने बोर्ड मीटिंग बुलाई है, बोर्ड मीटिंग में वो सोच रहे हैं कि किस तरीके से 20-25 हजार करोड़ रुपये कहीं से उठा पाएं। मगर मुश्किल ये है कि कौन उसमें निवेश करेगा। उनको 20-22 हजार करोड़ रुपये सालाना सरकार को देना है। पुराने स्पेक्ट्रम के पैसे, एजीआर का बकाया, उनके पास पैसे हैं नहीं, तो जो भी नया इंसान आएगा उसे सरकार को 20 हजार करोड़ रुपये देने पड़ेंगे। 1-1.5 लाख करोड़ की लायबिलिटी हो जाएगी।

उन्होंने फैसले  की 4 गलतियों को गिनाया जिसमें कंपनियों को ब्याज देने के लिए कहना ठीक नहीं है, टेलीकॉम कंपनियों ने भारत सरकार को कहा कि कैलकुलेशन गलत है। अब फैसले में कहा गया है आप कैलकुलेशन को भी नहीं देख सकते। उच्चतम न्यायालय का दस साल का फैसला नीतिगत रूप से गलत है। उच्चतम न्यायालय का हमेशा से यह स्टैंड रहा है कि पॉलिसी के फैसले में हम नहीं आएंगे। अगर कैबिनेट ने फैसला ले लिया कि 20 साल का वक्त देंगे तो उच्चतम न्यायालय को इसके बीच नहीं आना चाहिए तथा स्पेक्ट्रम नीलामी के बाद लाइसेंस फी और यूजेज चार्ज लेना गलत है। अगर 52 बिलियन डॉलर पैसे डालने के बाद एक कंपनी बंद हो जाए या बंद होने के कगार पर आ जाए तो ये भारत के लिए सही नहीं होगा।

अवकाश ग्रहण करने के पहले जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने भारत के दूसरे सबसे अमीर उद्योगपति गौतम अडानी के स्वामित्व वाले अडानी पावर राजस्थान लिमिटेड (एपीआरएल) के पक्ष में फैसला सुनाकर कंपनी को 5,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का फ़ायदा करा दिया, क्या यह भी जस्टिस अरुण मिश्रा की अंतरात्मा की आवाज पर सुनाया गया फैसला है। जस्टिस अरुण मिश्रा, विनीत सरन और एमआर शाह की पीठ ने यह फ़ैसला अडानी समूह की कंपनी के पक्ष में सुनाया है, जिससे अडानी समूह की कंपनी को 5,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का फ़ायदा मिल सकता है।

इसके पहले पिछले छह फ़ैसले भारत के दूसरे सबसे अमीर शख़्स, गौतम अडानी के स्वामित्व वाले कॉर्पोरेट समूह के पक्ष में गये हैं। ऐसा न्यूज़ क्लिक डिजिटल वेबसाइट पर प्रकाशित एक खबर में दावा किया गया है।न्यूज़ क्लिक इस बारे में पहले ही लिख चुका है कि जनवरी 2019 के बाद अडानी समूह से जुड़ा यह सातवां ऐसा मामला होगा, जिसमें न्यायमूर्ति मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ फ़ैसला सुनायेगी। पिछले छह फ़ैसले भारत के दूसरे सबसे अमीर शख़्स, गौतम अडानी के स्वामित्व वाले कॉर्पोरेट समूह के पक्ष में गये हैं।

अगस्त 2019 में, वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने भारत के चीफ जस्टिस को एक पत्र लिखा था जिसमें जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष अडानी समूह के चार मामलों को सूचीबद्ध करने में अनियमितता का आरोप लगाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि इनमें से कुछ मामलों की आउट ऑफ़ टर्न सुनवाई की गयी  और उन्हें रोस्टर का उल्लंघन करते हुए सौंपा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह मामलों में निर्णयों की मेरिट पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन केवल जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ में प्रक्रियागत अनियमितताओं की ओर इशारा कर रहे हैं।

भले ही लाखों निर्धनतम लोग प्रताड़ित हों जस्टिस अरुण मिश्रा की अंतरात्मा व्यवस्था के पक्ष में ही जागृत होती रही है जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने 31 अगस्त को दिए एक आदेश में तीन महीने के भीतर नई दिल्ली में 140 किलोमीटर लंबी रेल पटरियों के आसपास की लगभग 48,000 झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने का आदेश दिया है और निर्देश दिया है कि कोई हस्तक्षेप, राजनीतिक या अन्यथा, नहीं होना चाहिए और कोई भी अदालत विचाराधीन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के संबंध में कोई स्टे नहीं देगा।आदेश में इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के पुनर्वास पर चुप्पी साध ली गयी है।

तो क्या यह माना जाए कि जस्टिस अरुण मिश्रा की अंतरात्मा कानून के शासन और संविधान की अवधारणा के लिए नहीं जगती थी बल्कि सरकार और कार्पोरेट्स के पक्ष में जगती थी ?

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on September 3, 2020 5:41 pm

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