ग़ुलामी के दिनों के अवमानना के प्रावधान को शौरी, एन राम और प्रशांत भूषण ने दी चुनौती

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पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण शौरी, हिंदू अखबार के संपादक एन राम और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने उच्चतम न्यायालय में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट की धारा 2(सी) (आई) को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अधिनियम असंवैधानिक है और संविधान की मूल संरचना के खिलाफ है। उनके अनुसार ये संविधान द्वारा प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। याचिका में उच्चतम न्यायालय से न्यायालय अवमान अधिनियम 1971 के कुछ प्रावधानों को रद्द करने की मांग की गयी है।याचिका में तर्क दिया गया है कि लागू उप-धारा असंवैधानिक है क्योंकि यह संविधान के प्रस्तावना मूल्यों और बुनियादी विशेषताओं के साथ असंगत है।

यह अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन करता है, असंवैधानिक और अस्पष्ट है, और मनमाना है। उच्चतम न्यायालय को न्यायालय अवमान अधिनियम की धारा 2 (सी) (i)  को संविधान के अनुच्छेद 19 और 14 का उल्लंघन करने वाली घोषित करना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि लागू उप-धारा असंवैधानिक है, क्योंकि यह संविधान के प्रस्तावना मूल्यों और बुनियादी विशेषताओं के साथ असंगत है।

धारा 2 (सी) (i) में कहा गया है कि आपराधिक अवमान” से किसी भी ऐसी बात का (चाहे बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य रूपणों द्वारा या अन्यथा) प्रकाशन अथवा किसी भी अन्य ऐसे कार्य का करना अभिप्रेत है-(i) जो किसी न्यायालय को कलंकित करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे कलंकित करने की है अथवा जो उसके प्राधिकार को अवनत करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे अवनत करने की है।

याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान “औपनिवेशिक धारणा और उसके उद्देश्यों में निहित है”, जिसका लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। यह प्रावधान अत्यधिक व्यक्तिपरक है, बहुत अलग लक्षित कार्रवाई आमंत्रित करता है। इस प्रकार, अपराध की अस्पष्टता अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है जो समान व्यवहार और गैर-मनमानी की मांग करती है।
याचिका में कहा गया है कि उदाहरण के लिए पीएन दुआ बनाम पी शिव शंकर मामले में, एक सार्वजनिक समारोह में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को “असामाजिक तत्व यानी फेरा उल्लंघन कर्ता, दुल्हन बर्नर और प्रतिक्रियावादियों की एक पूरी भीड़” के रूप में संदर्भित करने के बावजूद, प्रतिवादी को अदालत में अवमानना का दोषी नहीं ठहराया गया था क्योंकि पी शिव शंकर तत्कालीन कानून मंत्री थे। हालांकि डी सी सक्सेना बनाम चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया में प्रतिवादी को यह आरोप लगाने के लिए कि एक मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया गया था, और कहा गया था कि आईपीसी के तहत उसके विरुद्ध एक एफआईआर पंजीकृत होना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय ने वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की है। इस मामले को 4 अगस्त को सुना जाएगा। कई पूर्व जजों ने शीर्ष अदालत के कदम का विरोध किया है और वे चाहते हैं कि अदालत भूषण के खिलाफ अवमानना कार्यवाही छोड़ दे। 

उच्चतम न्यायालय ने प्रशांत भूषण के दो ट्वीट को लेकर कार्रवाई शुरू करके 22 जुलाई को उन्हें अवमानना का नोटिस जारी किया था। एक ट्वीट में वे लिखते हैं कि चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को आम आदमी के लिए बंद कर दिया है। ट्वीट में लिखा गया है कि चीफ जस्टिस बिना हेलमेट या मास्क के भाजपा नेता की बाइक चला रहे हैं। दूसरे ट्वीट में वो चार पूर्व चीफ जस्टिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 24 जुलाई को प्रशांत भूषण के खिलाफ 2009 के कोर्ट की अवमानना मामले की सुनवाई 4 अगस्त तक के लिए टाल दी थी। प्रशांत भूषण के खिलाफ 2009 में भी कोर्ट की अवमानना का केस शुरू किया गया था। प्रशांत भूषण पर पूर्व चीफ जस्टिस एच एस कपाड़िया और केजी बालाकृष्णन के खिलाफ आरोप लगाने का मामला है।

इस बीच, कुल 139 शख्सियतों ने जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश शामिल हैं, उच्चतम न्यायालय से अदालत की अवमानना की कार्यवाही पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया है। इनमें उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर और स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव शामिल हैं।

दिल्ली के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह, पटना हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश अंजना प्रकाश, इतिहासकार रामचंद्र गुहा, लेखिका अरुंधति रॉय, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और वकील इंदिरा जयसिंग सहित कई अन्य लोग भी इसमें शामिल हैं। हस्तियों ने कहा है कि न्याय, निष्पक्षता के साथ अदालत की गरिमा को बरकरार रखने के लिए हम उच्चतम न्यायालय से गुजारिश करते हैं कि वह प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के अपने फैसले पर पुनर्व‍िचार करे।

 ( इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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