Wednesday, October 27, 2021

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मोदी की प्राथमिकता में आख़िरी नंबर पर है कोरोना

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लॉकडाउन 2.0 के आख़िरी दिन चलिए फूल-मालाओं की बारिश भी हो गयी। यह मोदी जी का तीसरा इवेंट था जिसे उन्होंने ख़ुद न कर सेना के ज़रिये संपादित करवाया। मोदी जी चाहते हैं कि घंटी-घड़ियालों और जहाज़ों के शोर में जनता और चिकित्साकर्मियों की आवाज़ें दब जाएं। लेकिन ये समस्याएँ इतनी बड़ी हैं कि दबाने की लाख कोशिशों के बाद भी सामने आकर खड़ी हो जा रही हैं। यह सब कुछ देखकर लगता है कि तुग़लक़ बेवजह बदनाम था। उसने तो महज़ एक राजधानी बदलने का फ़ैसला किया था।

और उस समय उसके राज में कोई महामारी और विपत्ति भी नहीं आयी थी। यहाँ तो लोग जब कोरोना से मर रहे हैं तब राजधानी के भीतर राजधानी बनायी जा रही है। सेंट्रल विस्टा प्रोग्राम उसी का हिस्सा है। भूख ने जब ग़रीबों का पेट छलनी कर दिया है तब मोदी जी को अपने मिसाइल रोधी एयरक्राफ़्ट की चिंता है। और चिकित्सकों के ज़रूरी पीपीई और दूसरे सुरक्षा किट मुहैया कराने की जगह वह अपने कारपोरेट और उच्च वर्गीय मित्रों के लिए बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को पूरा करने की अपनी ज़िद पर अड़े हैं। 

क्रूरता के लिए मध्ययुग मुफ़्त में बदनाम है। लोगों को जब दो रोटी मयस्सर नहीं है और भूख से तड़प-तड़प कर कमरों और खुली सड़कों पर वो जान दे रहे हैं। जेब में फूटी-कौड़ी भी नहीं है तब केंद्र सरकार ट्रेनों और बसों में उनसे किराया वसूली कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि इस किराये में पीएम केयर्स फंड में जाने वाला अतिरिक्त पैसा भी शामिल है जिसे विपत्ति के मारे इन लोगों की सहायता के लिए बनाया गया था। यहाँ यह तथ्य रखना गैरवाजिब नहीं होगा कि हाल में सरकार ने भगोड़े मोदियों और माल्यों समेत 50 कारपोरेट के 68 हज़ार करोड़ रुपये बैंकों के बट्टे खाते में डाल दिए हैं। दरअसल इसके ज़रिये मोदी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि उनके खून में व्यापार है और वह लाशों से भी पैसे वसूलना जानते हैं। 

आख़िर आपके बग़ैर सोचे समझे किए गए लॉकडाउन के फैसले का क्या नतीजा निकला? कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में जहां से देश ने शुरुआत की थी आज फिर वहीं आकर या फिर कहिए उससे भी पीछे जाकर खड़ा हो गया है। जो गाँव अब तक इस महामारी से अछूते थे आपने पूरे देश में उसे फैलाने की व्यवस्था कर दी। युद्ध न तो ऐसे लड़े जाते हैं और न ही उसे ऐसे जीता जा सकता है। उसके लिए रणनीति बनानी पड़ती है। तैयारी करनी होती है। हर तरह के ज़रूरी हथियार और संसाधन जुटाने पड़ते हैं। केवल ‘मन की बात’ कर या फिर ‘जान है जहान है’ का नारा दे देने से कोई युद्ध नहीं जीता जा सकता है। कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई के नाम पर मोदी जी के पास केवल इवेंट हैं जिन्हें बीच-बीच में वह लाँच कर देते हैं।  

या तो मोदी जी सिर्फ़ लॉकडाउन का नाम सुने थे या फिर इसके बेजा इस्तेमाल के पीछे उनकी कोई दूसरी छिपी मंशा थी। नहीं तो पूछने पर सरकार में बैठा कोई अदना क्लर्क भी बता सकता था कि लॉक डाउन में जाने से पहले किन-किन तैयारियों की ज़रूरत पड़ सकती है। लेकिन मोदी जी तो मोदी जी हैं। सलाह-मशविरा उनकी डिक्शनरी में शामिल ही नहीं है। लिहाज़ा उन्हें एकाएक लॉकडाउन का ख़्याल आया और उन्होंने 24 मार्च को रात आठ बजे राष्ट्र को संबोधित कर चार घंटे बाद लागू कर दिया। एक बार भी नहीं सोचा कि लोगों के घरों में अनाज है भी या नहीं। सुबह कमा कर शाम को खाने वालों का अगले कुछ महीनों तक पेट कैसे चलेगा? और अब जब यह फ़ैसला आपका था तो फिर ज़रूरतमंद लोगों को खिलाने की जिम्मेदारी भी आपकी की थी।

ऐसा भी नहीं कि आपके पास संसाधन नहीं हैं या फिर भंडार गृहों में अनाज ख़त्म हो गया है। लेकिन आपने भंडारों से अनाज निकाले ही नहीं। गेंहू और चावल गोदामों में पड़ा सड़ रहा है। अगर कुछ निकला भी तो उसको हासिल करने के लिए जरूरतमंद लोगों को राशन कार्ड और तमाम सर्टिफिकेट दिखानी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि देश भर में फँसे प्रवासी मजूदरों के पेट में लगी आग सड़कों पर फूटने लगी। भूख से हाहाकार मच गया। और जगह-जगह लॉकडाउन तोड़कर प्रदर्शन होने लगे। एनजीओ, ट्रेड यूनियनें, गुरुद्वारे, और दूसरे समाजसेवी संगठन न होते तो अब तक शहरों में लाशें बिछ गयीं होतीं और म्यूनिसिपलिटी के लिए उनका दाह संस्कार करना मुश्किल हो गया होता। और अब जब लगा कि पानी सिर के पार चला गया है और ज़्यादा रोकने का मतलब होगा पीड़ित जनता को हिंसक कर देना। तब फिर उनके घरों की वापसी का सरकार ने रास्ता खोला है।

शायद कोई मूर्ख ही होगा जो प्रवासी मज़दूरों को उनके घर भेजे जाने के फ़ैसले का विरोध करेगा। वैसे भी जब सरकार उन्हें खाना नहीं दे पा रही है तो फिर उनको रोके रखने का भी उसका अधिकार खत्म हो जाता है। लेकिन इससे कोरोना के पूरे देश में फैलने की आशंका पैदा हो गयी है। और अगर ऐसा होता है तो इसके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ पीएम मोदी और अब तक लिए गए उनके फैसले ज़िम्मेदार होंगे। पहले लॉकडाउन की घोषणा के मौक़े पर देश में कुल 600 कोरोना पॉजिटिव थे। अब यह संख्या जब बढ़कर तक़रीबन 40 हज़ार हो गयी है। यह बात किसी ले मैन के लिए भी समझना मुश्किल नहीं है कि पहले लोगों को घरों में भेजने पर क्या होता और अब क्या होने की आशंका है।

लेकिन लगता है कि मोदी जी को देश ने अभी समझा ही नहीं। उनकी प्राथमिकता में जनता आख़िरी नंबर पर आती है। हाँ इस बात में कोई शक नहीं कि उसे मैनेज करने का तरीक़ा उन्हें आता है। इस दौर में भी कोरोना उनकी प्राथमिकता में नहीं है। अगर ऐसा होता तो उसकी ज़रूरी शर्तों को वह पूरा कर रहे होते और उसके हिसाब से आगे बढ़ रहे होते। उनके लिए एक दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का स्वागत प्राथमिक था लिहाज़ा उसको उन्होंने संपादित किया। उसका नतीजा यह है कि अहमदाबाद, आगरा और दिल्ली ट्रम्प के दौरे वाले तीनों केंद्र कोरोना के हॉटस्पाट बने हुए हैं। उनको मध्य प्रदेश में सत्ता हासिल करनी थी लिहाज़ा उसको पूरा करने के बाद ही उन्होंने देश में लॉक डाउन की घोषणा की। भले ही उसका नतीजा मध्य प्रदेश को कोरोना ग्रसित तीसरे बड़े सूबे में शामिल होकर भुगतना पड़ रहा है।

नोटबंदी में जिस तरह से पाँच दिनों तक कोऑपरेटिव बैंकों को छूट देकर सत्तारूढ़ दल और उससे जुड़े लोगों को कमायी करवायी गयी थी और देश के छह सौ ज़िलों में खड़े पार्टी के आलीशान दफ़्तर उसकी खुली बयानी कर रहे हैं। उसी तरह से इस मौक़े को भी मोदी जी ने पीएम रिलीफ़ फंड के रहते पीएम केयर्स बना कर इस्तेमाल करने की कोशिश की है। जिस पर सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं का हक़ है। हजारों-हजार करोड़ रुपये के आने की सूचना तो ज़रूर मिली है लेकिन उसके खर्च होने की कोई ख़बर नहीं है। अब यह फंड किसके लिए बना है अगर अभी भी कोई समझ नहीं पा रहा है तो उसकी बुद्धि की बलिहारी ही है। भूखे और नंगे प्रवासी मज़दूरों को घर वापसी के लिए अगर टिकट लेना पड़ रहा है तो इससे बड़ा क्रूर चेहरा और क्या हो सकता है सरकार का? 

एक ऐसे समय में जब दुनिया के विकसित देश तक अपने हर नागरिक को एक निश्चित रक़म मुहैया कराए हैं यहाँ इस मौक़े पर भी सरकार अपनी जनता से वसूली से बाज नहीं आ रही है। जापान ने अपने हर नागरिक को 900 डालर के क़रीब देने का फ़ैसला किया है। अमेरिका ने बेरोज़गार लोगों को अगले छह महीनों तक हर हफ़्ते उनकी कमाई के बराबर पैसा उनके खातों में डालने का ऐलान किया है। शायद ही कोई देश ऐसा हो जिसने कोरोना संकट से निपटने के लिए अपनी जीडीपी का 6-7 फ़ीसदी बजट न आवंटित किया हो। लेकिन मोदी जी एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ तय किए जो न केवल जीडीपी का महज 0.8 फ़ीसदी है बल्कि आम बजट में घोषित तमाम योजनाओं के तक़रीबन 70 हज़ार करोड़ रुपयों को भी उसमें शामिल कर लिया गया है। इस तरह से असली रक़म घटकर महज़ एक लाख करोड़ रह जाती है।

दरअसल सरकार की प्राथमिकता में कोरोना है ही नहीं। वरना उसके लिए ज़रूरी पीपीई किट से लेकर डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्देशित टेस्ट-टेस्ट और टेस्ट के उसके मंत्र को लागू किया जाता। लेकिन यहाँ पीपीई किट का लॉकडाउन की घोषणा तक निर्यात किया गया। और तीसरे चरण में जब रैपिड टेस्ट की योजना बनी तो उस पहल पर भी चीन से आए दोयम दर्जे के किटों ने पानी फेर दिया। लेकिन उस घटिया किट और उसमें हुए घोटाले के लिए न तो किसी नौकरशाह को ज़िम्मेदार ठहराया गया और न ही उसमें शामिल कंपनियों के कर्ताधर्ताओं से कोई जवाबतलबी की गयी। और पूरे मामले को चीन के नकली उत्पादक चरित्र पर थोप दिया गया। लेकिन शायद ‘मूर्खों के स्वर्ग’ में रहने के हम आदी हो गए हैं। और हुक्मरान भी चाहते हैं कि हम वहीं बने रहें। वरना चीन के पास दोयम दर्जे से लेकर ब्रांडेड कंपनियों तक के माल हैं। अब यह ग्राहक पर निर्भर करता है कि वह किसकी ख़रीद करता है। हमारी कंपनियों को कम दाम में ज़्यादा मुनाफ़ा और घोटाले में ज्यादा पैसे की संभावना दिखी लिहाज़ा उन्होंने उसी तरह के उत्पाद चुने।

और अब जबकि रैपिड टेस्ट रोक दिया गया है। तो सब कुछ राम भरोसे चल रहा है। ऊपर से अब गुजरात, यूपी और पश्चिमी बंगाल में भी इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि टेस्ट कम से कम हो जिससे आँकड़ों को न्यूनतम बनाए रखा जा सके। जो अपनी पीठ थपथपाने में मददगार साबित होगा। लेकिन उसका नतीजा आने वाले दिनों में बेहद उल्टा साबित हो सकता है। यह न तो सरकारें सोच रही हैं और न ही उनके अपने समर्थक।

दरअसल कोरोना भी मोदी के लिए एक मौक़ा हो गया है। जिसका वह भरपूर इस्तेमाल कर लेना चाहते हैं। किसी भी मामले में मोदी इसी सोच से संचालित होते हैं। पिछले छह सालों के शासन के बाद यह बात आईने की तरह साफ़ हो चुकी है कि देश में सांप्रदायिकता फैलाने का कोई भी मौक़ा मोदी नहीं छोड़ते और किसी न किसी बहाने में हर मामले में वह सांप्रदायिक एंगल निकाल ही लेते हैं। फिर भला कोरोना कैसे इससे अछूता रह सकता था। उन्होंने इसमें भी तबलीगी जमात को ढूँढ लिया। इस बात में कोई शक नहीं कि उनके आयोजक उस कार्यक्रम के लिए ज़िम्मेदार हैं।

बावजूद इसके सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकती जिसके गृहमंत्रालय को इसकी पूरी जानकारी थी और जिसके विदेश मंत्रालय ने बाहर से आने वाले सभी लोगों को वीज़ा दे रखा था। लेकिन मोदी तो मोदी हैं देश के लोगों की आँख में धूल झोंकने का हुनर जो उन्होंने सीख लिया है। और भक्त तो पहले से ही इस तरह की किसी चूसने वाली हड्डी को लपकने के लिए तैयार रहते हैं। दरअसल तबलीगी मामला और कुछ नहीं कोरोना के मोर्चे पर अपनी नाकामियों को छिपाने तथा अपने सांप्रदायिक एजेंडे को दूसरे चरण में ले जाने का महज एक मौक़ा था। वरना एनएसए साहब को देश को यह ज़रूर बताना चाहिए कि रात को दो बजे उन्होंने तबलीगी जमात के हेड साद के साथ बैठक में क्या डील की थी?

और इस बीच जब मानवता के सामने संकट है। पूरी दुनिया, सारे देश और पूरा समाज मिलकर इस महामारी को मात देने की कोशिश कर रहे हैं। तब भारत अकेला देश होगा जिसकी सरकार अपने विरोधियों को निपटाने में लगी है। जिस पुलिस को लोगों की सेवा के काम में लगा होना चाहिए था उसे सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल एक्टिविस्टों की गिरफ़्तारी के काम में लगा दिया गया है। और जगह-जगह पत्रकारों तक को प्रताड़ित किया जा रहा है। कश्मीर में एक महिला समेत तीन पत्रकारों पर यूएपीए लगाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि  ज़्यादातर गिरफ़्तारियाँ महिलाओं की हो रही हैं और वह भी आतंकी धाराओं के तहत। यह शायद देश में पहली बार हो रहा है जब महिलाओं को आतंकी धाराओं में पकड़ा जा रहा है। राज्य की क्रूरता और संवेदनहीनता की इससे बड़ी नज़ीर कोई दूसरी नहीं मिल सकती कि गर्भवती महिलाओं तक को नहीं बख्शा जा रहा है। आपको बता दें कि दिल्ली में गिरफ्तार सफूरा इस समय गर्भवती हैं।

इस बीच कोरोना के भविष्य में किसी भयंकर फैलाव के दौर में भी उससे राजनीतिक लाभ हासिल करने की तैयारियां शुरू कर दी गयी हैं। अभी आपने देखा होगा कि इस समय जनसंख्या नियंत्रण और ऐसे समय में जबकि संसद का कहीं दूर-दूर तक कोई सत्र चलने की संभावना नहीं है तब उस पर विधेयक लाने की बहस खड़ी कर दी गयी है। यह सब कुछ बेहद सोची- समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है। इसके ज़रिये जहां एक तरफ़ लोगों को इस बात के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जा रहा है कि अगर लाख-दो लाख मौतें हो भी जाती हैं तो कोई बात नहीं क्योंकि यहाँ जनसंख्या बहुत ज़्यादा है लिहाज़ा कोरोना के बहाने ही सही देश का कुछ भार कम हुआ। दूसरी तरफ़ उसे सांप्रदायिक रंग देकर उसे मुसलमानों के ख़िलाफ़ मोड़ देने की कोशिश की जा रही है। और इसके ज़रिये अगर किसी क़ानून को पारित कराने में सरकार सफल हो गयी तो अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का उसके पास नया हथियार होगा।

यही वजह है कि पीएम मोदी को कोरोना से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। और इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि मौक़ा आने पर उसे भी वह अपने लाभ की दिशा में मोड़ लेंगे।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)    

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