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राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में नहीं आती है सरकार की आलोचना: जस्टिस दीपक गुप्ता

संविधान और कानून के शासन का कस्टोडियन होने के बावजूद उच्चतम न्यायालय फिलवक्त राष्ट्रवादी मोड में है। देश में न तो आपातकाल लगा है न ही नागरिकों के मूल अधिकार स्थगित किये गए हैं, न ही किसी शत्रु देश से युद्ध हो रहा है लेकिन इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर की जो स्थिति है उस पर उच्चतम न्यायालय लगातार टालमटोल की नीति पर चल रहा है जिसे देखते हुए यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि संविधान और कानून के शासन की अनदेखी की जा रही है। ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश का यह कहना कि संवैधानिक अधिकार होने के नाते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की राजद्रोह के क़ानून से ज़्यादा अहमियत होनी चाहिए आज के परिवेश में बहुत महत्वपूर्ण है।

अहमदाबाद में प्रेलेन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में ‘लॉ ऑफ़ सेडिशन इन इंडिया एंड फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ विषय पर वकीलों को संबोधित करते हुए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले हुए हैं, जहां राजद्रोह या सौहार्द्र बिगाड़ने के क़ानून का पुलिस ने जमकर दुरुपयोग किया है और उन लोगों को गिरफ़्तार करने और अपमानित करने के लिए इनका इस्तेमाल किया है जिन्होंने राजद्रोह के तहत कोई अपराध नहीं किया है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकार होने के नाते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की राजद्रोह के क़ानून से ज़्यादा अहमियत होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना करने से कोई भी व्यक्ति कम देशभक्त नहीं हो जाता, जबकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, देशविरोधी नारे लगाना राजद्रोह नहीं है।

जस्टिस गुप्ता ने भी वही बात कही जिसे सत्ता के ख़िलाफ़ बोलने वाला देश का हर नागरिक महसूस करता है। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि दुर्भाग्य से यह आम बात है कि अगर आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो या तो आप मेरे दुश्मन हैं और या इससे भी बद्तर आप देश के दुश्मन हैं, देशद्रोही हैं। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि असहमति का अधिकार हमारे संविधान के द्वारा हमें दिया गया सबसे अहम अधिकार है। जब तक कोई व्यक्ति क़ानून नहीं तोड़ता है या किसी संघर्ष को बढ़ावा नहीं देता है या नहीं उकसाता है तब तक उसे हर दूसरे नागरिक से अपनी राय अलग रखने का अधिकार है।

जस्टिस  गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र का सबसे अहम पहलू यह है कि लोगों को सरकार का कोई डर नहीं होना चाहिए। उन्हें ऐसे विचार रखने में कोई डर नहीं होना चाहिए जो सत्ता में बैठे लोगों को पसंद नहीं हों। दुनिया रहने के लिए बहुत ख़ूबसूरत होगी अगर लोग बिना डर के अपनी बात रख सकेंगे और उन्हें इस बात का डर नहीं होगा कि उन पर मुक़दमा चलाया जायेगा या उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जायेगा। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि मेरे लिए यह बहुत ही चौंकाने वाली बात है कि आज़ाद भारत में हमें राजद्रोह के संबंध में बने प्रावधानों को और भी सख़्त करना चाहिए और लोगों की आवाज पर अंकुश लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजद्रोह का क़ानून भारत में ब्रिटिश शासन में लाया गया था और इसका मक़सद यह था कि बाग़ियों की आवाज़ को चुप करा दिया जाए।

यह कानून प्रकट रूप से वैध असंतोष या स्वतंत्रता की किसी भी मांग को रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया था। वास्तव में क्वीन इम्प्रेसेस बनाम बालगंगाधर तिलक, आईएलआर  (1898) 22 बॉम्बे 112 के मामले में ‘राजद्रोह’ शब्द को बहुत व्यापक अर्थ में समझाया गया था। इन लेखों के कारण कोई गड़बड़ी या प्रकोप हुआ या नहीं, यह पूरी तरह से सारहीन है। यदि अभियुक्त का इरादा लेख द्वारा विद्रोह या अशांति फैलाना था तो उसका कृत्य निस्संदेह धारा 124 ए के अंतर्गत अपराध होगा। इस दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हुए जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हिंसा के लिए उकसावे के बिना आलोचना करना राजद्रोह की श्रेणी में नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में प्रत्येक विश्वास को धार्मिक होना जरूरी नहीं है। यहां तक कि नास्तिक भी हमारे संविधान के तहत समान अधिकारों का आनंद लेते हैं। चाहे वह एक आस्तिक हो, एक अज्ञेयवादी या नास्तिक हो, कोई भी हमारे संविधान के तहत विश्वास और विवेक की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है। संविधान द्वारा अनुमत लोगों को छोड़कर उपरोक्त अधिकारों पर कोई बाधा नहीं है। उन्होंने एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला, (1976) 2 एससीसी 521 में जस्टिस एचआर खन्ना के असहमतिपूर्ण फैसले का हवाला दिया, जो अंततः बहुमत की राय से बहुत अधिक मूल्यवान निकला।  यह एक निडर न्यायाधीश द्वारा दिया गया निर्णय है। न्यायाधीशों को जो शपथ दिलाई जाती है, उसमें वे बिना किसी डर या पक्षपात, स्नेह या दूषित इच्छा के अपनी क्षमता के अनुसार कर्तव्यों को पूरा करने की शपथ लेते हैं। कर्तव्य का पहला और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बिना किसी डर के कर्तव्य निभाना है।

उन्होंने कहा कि संविधान के संस्थापकों ने संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्र भाषण के अधिकार के अपवाद के रूप में राजद्रोह को शामिल नहीं किया, क्योंकि वे कहते थे कि राजद्रोह केवल तभी अपराध हो सकता है जब वह सार्वजनिक अव्यवस्था या हिंसा के लिए प्रेरित करे या भड़काए। उन्होंने कहा कि केवल हिंसा या विद्रोह के लिए उकसावे पर रोक लगाई जानी चाहिए और इसलिए, अनुच्छेद 19 के अपवादों में ‘राजद्रोह’ शब्द शामिल नहीं है, लेकिन राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक अव्यवस्था या अपराध के लिए उकसाना शामिल है। केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य, 1962 सुप्रीम कोर्ट 2 एससीआर 769 में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि केवल सरकार या उसकी नीतियों की आलोचना करने के लिए देशद्रोह के आरोप नहीं लगाए जा सकते।

वर्ष 2011 में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी की बात करते हुए उन्होंने कहाकि मुझे लगता है कि हमारा देश, हमारा संविधान और हमारे राष्ट्रीय प्रतीक राजद्रोह के कानून की सहायता के बिना अपने कंधों पर खड़े होने के लिए पर्याप्त मजबूत हैं। सम्मान, स्नेह और प्यार अर्जित किया जाता है और इसके लिए कभी मजबूर नहीं किया जा सकता। आप किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान के समय खड़े होने पर मजबूर कर सकते हैं, लेकिन आप उसके दिल में उसके लिए सम्मान होने के लिए उसे मजबूर नहीं कर सकते। आप कैसे इस बात का निर्णय करेंगे कि किसी व्यक्ति के मन में क्या है?

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह राजद्रोह से संबंधित धारा 124 ए को समाप्त कर देगी, तब बीजेपी ने इसे देश के लिए बेहद ‘ख़तरनाक’ बताया था। अब सवाल यही उठता है कि क्या इस बात पर विचार नहीं करना चाहिए कि राजद्रोह को फिर से परिभाषित किया जाए। उच्चतम न्यायालय को इस पर भी विचार करना  चाहिए कि धारा 124ए का दुरुपयोग न हो, इसके लिए क्या गाइडलाइंस हो  सकते हैं? आज के माहौल में जब सरकार से सवाल पूछने पर, कोई संवैधानिक सवाल उठाने पर राष्ट्रद्रोही की संज्ञा से नवाजा जाने लगता है तो देश के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की कही ये बातें बेहद अहम हो जाती हैं।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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