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Wednesday, September 29, 2021

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सीपी कमेंट्री: अलीगढ़ में डिफेंस कोरिडोर पीएम मोदी का एक और जुमला तो नहीं?

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘फेंकने‘ का दुनिया भर में कोई सानी नहीं है। यह बात उत्तर प्रदेश विधान सभा के आगामी चुनाव के लिए उनकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जमीनी तैयारी में अलीगढ़ में उनके भाषण से साबित हो गई। उन्होंने इस भाषण का मौका राजा महेंद्र प्रताप विश्वविद्यालय और रक्षा कॉरिडोर की ‘सौगात‘ दी। हड़बड़-गड़बड़ गोदी मीडिया ने इसे मोदी जी के ‘मिशन यूपी‘ का आगाज कह खूब वाह वाह की। मोदी जी की इन घोषणाओं के मौके पर सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित थे। उन्होंने दावा किया कि योगी की सरकार ईमानदारी से और सही काम कर रही है।

रक्षा कॉरिडोर का उल्लेख कर मोदी जी ने कहा कि आज भारत में ग्रेनेड से लेकर युद्धपोत आदि आधुनिक हथियार बनाए जा रहे हैं। उनके शब्द थे “अभी तक लोग अलीगढ़ के ताले के भरोसे रहते थे। अब अलीगढ़ के हथियार देश की सीमाओं की रक्षा करेंगे”।

मोदी की बचपन का किस्सा

हर बात को अपने बचपन से जोड़ने की पुरानी आदत के कारण मोदी ने एक किस्सा भी सुनाया। उन्होंने बयां किया ‘अलीगढ़ से ताले के मुस्लिम सेल्समैन हर तीन महीने में हमारे गांव आते थे। वो काली जैकेट पहनकर आते थे। हर तीन महीने में वो आते थे। उनकी मेरे पिताजी से दोस्ती थी। वो अपने पैसों को मेरे पिता के पास छोड़ देते थे और बाद में अपने पैसे ले जाते थे। बचपन में हमने अलीगढ़ के तालों के बारे में सुना था। अलीगढ़ के ताले पहले घरों की रक्षा करते थे। अब अलीगढ़ में बने हथियार भारत की सीमाओं की रक्षा करेंगे”।

मोदी जी ने डिफेंस कॉरिडोर के अलीगढ़ केंद्र की घोषणा 2018 में कर कहा था कि इसमें विभिन्न कंपनियां करीब 1300 करोड़ रुपये का निवेश करेंगी जिसकी बदौलत हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा।

इण्डिया टुडे ‘ पत्रिका के 20 मार्च, 2019 के अंक में उत्तर प्रदेश सरकार के विज्ञापन परिशिष्ट से मिली जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस राज्य को रक्षा उत्पादन गतिविधियों का केंद्र बनाने के लिए 20 हज़ार करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की थी। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में रक्षा औद्योगिक गलियारा बनाने का लक्ष्य रखा गया जो अलीगढ़, आगरा, झांसी, चित्रकूट, कानपुर और लखनऊ के छह जिलों में फैला होगा। राज्य सरकार ने इसके लिए बुंदेलखंड में 3 हज़ार हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की है। इस गलियारा में देश-विदेश के रक्षा उत्पाद निर्माताओं द्वारा 40 हज़ार करोड़ रूपये से अधिक के निवेश की संभावना व्यक्त की गई ।

मोदी जी अलीगढ़ से पहले 2019 में ही झाँसी में इस गलियारा की आधारशिला रख चुके हैं। राज्य सरकार ने कानपुर, आगरा और झांसी में  1-1 डिफेंस पार्क और लखनऊ, कानपुर, और आगरा में ‘एयरोस्पेस’ पार्क विकसित करने की घोषणा की थी।

हकीकत

तथ्य यह है कि भारत में मोदी सरकार ने 2021-22 में कुल रक्षा बजट 4.78 लाख करोड़ रुपये ही आवंटित है। यह 2020-21 के 4.71 लाख करोड़ (1.35 लाख करोड़ के पूंजीगत खर्चों समेत) के रक्षा बजट की तुलना में 7.34 फ़ीसदी ही ज़्यादा है। रक्षा बजट में सैनिकों के वेतन-भत्ते और पेंशन का खर्च भी शामिल होता है। इस बरस रक्षा क्षेत्र में पेंशन मद में आवंटन 15000 करोड़ रुपये घटा कर 1.15 लाख करोड़ कर दिया गया। इससे सेना के सेवानिवृत्त ही नहीं मौजूदा अधिकारियों के भी मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

प्रतिष्ठित वैश्विक न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग की मार्च 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक मौजूद समय में भारत के मुकाबले चीन का रक्षा बजट चार गुना ज्यादा है।

मौजूद रक्षा बजट

भाजपा समर्थक ‘राष्ट्रवादी‘ लोगों को मोदी सरकार से ये उम्मीद थी कि 1 फरवरी 2021 को संसद में पेश किये जाने वाले केन्द्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रक्षा मद के खर्च में बढ़ोत्तरी करेंगी। हकीकत ये है कि रक्षा बजट आवंटन कम ही नहीं हुआ बल्कि भारतीय सेना की बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी करने में मुश्किल हो रही है। ये उम्मीद भारतीय सेना के समक्ष चीन के सीमावर्ती लद्दाख क्षेत्र में सामरिक तनाव तथा कश्मीर की सीमा पर नए सैन्य हालात के मद्देनजर थी। रक्षा विशेषज्ञों ने माना कि हिंद महासागर में भी नौसैनिक जरूरतें बढ़ी हैं। लेकिन नौसेना को मोदी सरकार में पिछले सात बरस में फंड की कमी पड़ रही है। नौसेना की कई योजनाओं को रद्द कर दिया गया है।

हालात ऐसे बन गए हैं कि धन जुटाने के लिए भारतीय सेना की भूमि बेचने की जुगत भिड़ाई जा रही है।

वित्तीय वर्ष 2019 -20 के लिए कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने अंतरिम बजट में रक्षा मद का परिमाण पहली बार 3,00, 000 करोड़( तीन ख़रब) रूपये के पार पहुँच गया। जाहिर है मीडिया ने इसे प्रमुखता से छापा। लेकिन विश्लेषकों ने रेखांकित किया कि अगर पिछले वर्ष की तुलना में मुद्रास्फीति की दर और विदेशी मुद्रा के डेप्रिसिएशन के वास्तविक सन्दर्भों को ध्यान में रखा जाए तो रक्षा मद में यह प्रावधान तुलनात्मक रूप से कम ही है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट

गौरतलब है कि 2017 में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत अब उन पांच शीर्ष देशों में शामिल है, जो रक्षा मद में सबसे अधिक खर्च करते हैं। लेकिन एशिया में सर्वाधिक सैन्य खर्च चीन करता है। वैश्विक सैन्य खर्च में 2008 में चीन का हिस्सा सिर्फ 5.8 प्रतिशत था, जो 2017 में बढ़कर 13% हो गया। चीन की सेना के बारे में अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट के अनुसार चीन की सरकार ने अपना रक्षा खर्च 2007 से 2016 के बीच सालाना औसतन 8.5 की दर से बढ़ाया है और वह अपनी अर्थव्यवस्था में कुछ मंदी आने के बावजूद सैन्य खर्च बढ़ाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ है ।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की ही 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार तब पूरी दुनिया का सैन्य खर्च 1.8 ट्रिलियन डॉलर था। लेकिन भारत में सैन्य खर्च में वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि आधुनिक सैन्य उपकरणों पर उसका खर्च बढ़ा है। 

नई दिल्ली के रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान के शोधार्थी लक्ष्मण कुमार बेहरा के मुताबिक़ भारत के सैन्य खर्च में बढ़ोत्तरी एक बड़ा हिस्सा करीब 14 लाख सेवारत सैन्य कर्मियों के वेतन, भत्ते और करीब 20 लाख सेवा निवृत्त कर्मियों के पेंशन पर खर्च होता है। उनके मुताबिक़ इतनी अधिक धनराशि मानव बल खर्च करने के बाद भारत के पास सैन्य उपकरणों की खरीद के लिए पर्याप्त नहीं बचता है।

लेफ्टिनेंट जनरल शरद चंद्र

कुछ समय पहले तत्कालीन थल सेना उपाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल शरद चंद्र ने रक्षा मामलों की संसदीय समिति को बताया था कि भारत के रक्षा बजट का सिर्फ 14 प्रतिशत आधुनिक उपकरणों की खरीद पर खर्च होता है। इस रक्षा बजट का 63 प्रतिशत वेतन, भत्तों और पेंशन पर और शेष ब्याज आदि पर खर्च होता है।

रक्षा मद में बजटीय प्रावधान रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना के तीनों अंगों, रक्षा शोध एवं विकास संगठन, आयुध फैक्ट्रियों आदि के लिए पूंजीगत आवंटन तथा वेतन, भत्तों एवं पेंशन के लिए होता है। इसलिए रक्षा बलों के लिए रक्षा बजट का वास्तविक आवंटन 3.01 प्रतिशत ही है जिसका 1.03 ट्रिलियन रूपये के तुल्य एक तिहाई हिस्सा ही सेना के आधुनिकीकरण के पूंजीगत खर्च के आवंटन में जाता है।

बजटीय प्रावधान के एक त्वरित अवलोकन से पता चलता है कि 363.7 अरब रूपये का सर्वाधिक प्रावधान वायु सेना के लिए है। थल सेना और नौ सेना के लिए बजटीय प्रावधान 220 अरब रुपये है। 1992-1993 में रक्षा खर्च (पेंशन को छोड़ कर) सकल घरेलू उत्पाद का  2.27 प्रतिशत था जो 2019 -20 में सकल घरेलू उत्पाद का 1.5 प्रतिशत रह गया। वर्ष  2011-12 से 2018-19 के बीच कुल रक्षा बजट में सैन्य कर्मियों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन का हिस्सा, 44% से बढ़कर 56% हो गया यह वृद्धि मुख्यतः पूंजीगत खरीददारी की कीमत पर हुई जो कुल रक्षा खर्च के 26 प्रतिशत से घट कर 18% रह गई बताई जाती है।

एसआईपीआरआई के अनुसार भारत, सबसे अधिक हथियार आयात करने वाले देशों में है क्योंकि उसका घरेलू हथियार उद्योग लालफीताशाही आदि के चंगुल में है।

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने मेड इन इंडिया‘ कार्यक्रम के तहत देशी रक्षा उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया। लेकिन संसद में एक प्रश्न के रक्षा मंत्रालय द्वारा दिए गए उत्तर के अनुसार 2014 में मोदी सरकार के गठन के बाद से भारतीय वेंडरों से रक्षा खरीद में कमी आई है। लेकिन विदेशी वेंडरों से रक्षा खरीद थोड़ी बढ़ी है।

वायु सेना के एक पूर्व उपाध्यक्ष एयर मार्शल निर्दोष त्यागी के अनुसार रक्षा बजट में पिछले रक्षा बजट की तुलना में 7.7 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई जो मुद्रास्फीति और भारतीय मुद्रा के डेप्रीसिएशन के मद्देनज़र वास्तविक अर्थ में कोई वृद्धि नहीं है। 

कई टीकाकारों ने इंगित किया है कि 1962 में भारत–चीन युद्ध के बाद से रक्षा मद के लिए बजटीय प्रावधान आम तौर पर कम ही रहा है। एसआईपीआरआई के आंकड़ों के आधार पर विश्व बैंक की रिपोर्टों के अनुसार भारत का रक्षा खर्च 1962 में उसके सकल घरेलू उत्पाद का 1.5 प्रतिशत था। भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के फलस्वरूप रक्षा बजट में कुछ तेजी आई जो 1980 के दशक में सकल घरेलू उत्पाद के 4 प्रतिशत तक के उच्चतम  सीमा तक पहुंची। उसके बाद से और खास कर मोदी राज में रक्षा मामलों पर शोर ज्यादा खर्च कम है।

(सीपी झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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