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वाम दलों ने भी दिखाई किसानों के साथ एकजुटता, जंतर-मंतर से लेकर बिहार की सड़कों पर हुए प्रदर्शन

मोदी सरकार के किसान विरोधी कानून और उसे राज्यसभा में अनैतिक तरीके से पास कराने के खिलाफ बुलाए गए भारत बंद का पूरे देश में असर रहा। दिल्ली के जंतर मंतर पर वामदलों ने विशाल प्रदर्शन किया। इसके अलावा बिहार, झारखंड, यूपी, पंजाब, कर्नाटक समेत कई अन्य राज्यों में वाम दलों ने प्रदर्शन किया। किसानों के साथ ही वामदलों ने भी कृषि विरोधी तीनों कानून वापस लेने की मांग दोहराई है। साथ ही एमएसपी के लिए नया कानून लाने की भी मांग की है।

पटना में भाकपा माले महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य और अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव और पूर्व विधायक राजाराम सिंह समेत सैंकड़ों की संख्या में माले और किसान महासभा के कार्यकर्ता सड़क पर उतरे और प्रतिवाद दर्ज किया।

माले महासचिव ने संबोधन में कहा कि आज किसान विरोधी काले बिलों की वापसी की मांग पर पूरे देश में प्रतिवाद हो रहा है। कहीं बंद है, तो कहीं सड़क जाम है। ये बिल किसानों के लिए बेहद खतरनाक हैं। राज्यसभा में जिस प्रकार से बहुमत नहीं रहने के बावजूद जबरदस्ती बिल पारित करवाया गया, वह लोकतंत्र की हत्या है। इसे देश कभी मंजूर नहीं करेगा।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार द्वारा खेती की नीलामी और कॉरपोरटों की दलाली हमें मंजूर नहीं है। आज देश के किसानों के समर्थन में मजदूर, छात्र-नौजवान और आम नागरिक सड़क पर उतर आए हैं। किसान विरोधी सरकार इस देश में राज नहीं कर सकती है। हमें कंपनीराज मंजूर नहीं है। पहले देश में अंग्रेजों का कंपनीराज चलता था, अब ये सोचते हैं कि अंबानी-अडानी का कंपनी राज चलेगा, ऐसा नहीं हो सकता है। जब तक ये बिल वापस नहीं होते, लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव में भी यह मुद्दा बनेगा और चुनाव में किसानों के आक्रोश की अभिव्यक्ति होगी।

अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव राजाराम सिंह ने कहा कि आज देश के सभी किसान संगठन सड़क पर हैं। मजदूर संगठनों के साथी हमारे साथ हैं। हम मोदी सरकार द्वारा लाए गए किसान विरोधी कानूनों को देश में नहीं चलने देंगे। आज एक-एक कर मोदी सरकार कंपनियों के हाथों देश को बेच रही है। यह हमें मंजूर नहीं है। इस सरकार ने एमएसपी पर कानून नहीं बनाया, लेकिन किसानों की खेती छीन लेने पर आमदा है। यह चलने वाला नहीं है।

इसके पहले राजधानी पटना में किसान कार्यकर्ताओं ने बुद्धा स्मृति पार्क से डाकबंगला चैराहा तक मार्च किया और फिर चैराहे को जाम कर सभा आयोजित की गई। कार्यक्रम में मुख्य रूप से उक्त नेताओं के अलावा माले के राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो के सदस्य धीरेंद्र झा, मीना तिवारी, किसान नेता उमेश सिंह, राजेंद्र पटेल, शंभूनाथ मेहता, अभ्युदय आदि शामिल थे।

पटना जिले के पालीगंज में कृषि बिल के विरोध में आयोजित प्रर्दशन का नेतृत्व आइसा के महासचिव संदीप सौरभ, माले की राज्य कमेटी के सदस्य अनवर हुसैन और अन्य नेताओं ने किया। मसौढ़ी में गोपाल रविदास के नेतृत्व में मुख्य चैराहा को माले और किसान महासभा के कार्यकर्ताओं ने घंटों जाम कर दिया।

आरा में किसान महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और माले की केंद्रीय कमेटी के सदस्य राजू यादव और तरारी में माले विधायक सुदामा प्रसाद के नेतृत्व में किसानों ने प्रदर्शन किया। अगिआंव में माले की केंद्रीय कमेटी के सदस्य मनोज मंजिल के नेतृत्व में विशाल मार्च हुआ। सीवान में किसान नेता अमरनाथ यादव ने कार्यक्रम का नेतृत्व किया। जहानाबाद में रामबलि सिंह यादव आदि नेताओं ने मार्च किया। अरवल में माले के जिला सचिव महानंद ने कार्यक्रम का नेतृत्व किया। पूर्णिया के रूपौली में किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ चक्का जाम किया गया।

दरभंगा में लहेरियासराय टावर पर कृषि बिल के खिलाफ प्रतिवाद हुआ, जिसमें किसान महासभा के जिलाध्यक्ष शिवन यादव और अन्य माले नेताओं ने भगा लिया। प्रधानमंत्री मोदी का पुतला दहन किया गया और मिर्जापुर चैक को जाम किया गया। मधुबनी में जिला समाहरणालय के समक्ष सड़क जाम किया गया। दरभंगा में एनएच 57 को जाम कर प्रतिवाद दर्ज किया गया। समस्तीपुर और बेगुसराय में भी एनएच 57 को कई स्थानों पर जाम किया गया।

गया के टेकारी में किसान विरोधी बिल के खिलाफ मोदी का पुतला दहन किया गया। गया में गांधी मैदान से टावर चौक तक मार्च निकाला गया। मुजफ्फरपुर के गायघाट में किसान नेता जितेंद्र यादव ने प्रतिवाद मार्च का नेतृत्व किया। लगभग सभी जिलों में माले और किसान महासभा के कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम में हजारों की तादाद में हिस्सा लिया और मोदी सरकार को तीनों किसान विरोधी कानून वापस लेने की चेतावनी दी है। सुपौल, खगड़िया, नालंदा, रोहतास, गोपालगंज, वैशाली, नवादा, अरवल, औरंगाबाद, कैमूर, बक्सर, चंपारण, भागलपुर आदि जिलों में भी किसान सड़कों पर उतरे। वैशाली में किसान महासभा के राज्य अध्यक्ष विशेश्वर यादव ने मार्च का नेतृत्व किया।

उधर, छत्तीसगढ़ में कई स्थानों पर किसानों और आदिवासियों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कृषि विरोधी कानूनों की प्रतियां और मोदी सरकार के पुतले जलाए। उन्होंने कॉर्पोरेटपरस्त कानूनों को वापस लेने, न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था, खाद्यान्न आत्मनिर्भरता को बचाने, ग्रामीण जनता की आजीविका सुनिश्चित करने और देश के संविधान, संप्रभुता और लोकतंत्र की रक्षा करने की मांग की।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आह्वान पर मोदी सरकार द्वारा पारित किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदेश में इस मुद्दे पर 25 से ज्यादा संगठन एकजुट हुए। उन्होंने 20 से ज्यादा जिलों में अनेकों स्थानों पर सैकड़ों की संख्या में भागीदारी की। छत्तीसगढ़ में इन तमाम संगठनों की साझा कार्रवाइयों से जुड़े छग किसान सभा के नेता संजय पराते ने आरोप लगाया कि इन कॉर्पोरेटपरस्त और कृषि विरोधी कानूनों का असली मकसद न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था से छुटकारा पाना है।

इन कानूनों का हम इसलिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे खेती की लागत महंगी हो जाएगी। फसल के दाम गिर जाएंगे। कालाबाजारी और मुनाफाखोरी बढ़ जाएगी। कॉरपोरेटों का हमारी कृषि व्यवस्था पर कब्जा हो जाने से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता भी खत्म जो जाएगी। यह किसानों और ग्रामीण गरीबों और आम जनता की बर्बादी का कानून है।

इन संगठनों से जुड़े किसान नेताओं ने कई स्थानों पर प्रशासन के अधिकारियों को ज्ञापन भी सौंपे हैं और कुछ स्थानों पर पुलिस के साथ झड़प होने की भी खबरें हैं। स्थानीय स्तर पर आंदोलनकारी समुदायों को इन किसान नेताओं ने संबोधित भी किया है। अपने संबोधन में इन किसान नेताओं ने ‘वन नेशन, वन एमएसपी’ की मांग करते हुए कहा कि ये कानून कॉरपोरेटों के मुनाफों को सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं। इन कानूनों के कारण किसानों की फसल सस्ते में लूटी जाएगी और महंगी-से-महंगी बेची जाएगी।

उत्पादन के क्षेत्र में ठेका कृषि लाने से किसान अपनी ही जमीन पर गुलाम हो जाएगा और देश की आवश्यकता के अनुसार और अपनी मर्जी से फसल लगाने के अधिकार से वंचित हो जाएगा। इसी प्रकार कृषि व्यापार के क्षेत्र में मंडी कानून के निष्प्रभावी होने और निजी मंडियों के खुलने से वह समर्थन मूल्य से वंचित हो जाएगा। कुल नतीजा यह होगा कि किसान बर्बाद हो जाएंगे और उनके हाथों से जमीन निकल जाएगी।

छत्तीसगढ़ बंद की सफलता के लिए आम जनता का आभार व्यक्त करते हुए एक संयुक्त बयान में इन किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा है कि जिस अलोकतांत्रिक तरीके से संसदीय जनतंत्र को कुचलते हुए इन कानूनों को पारित किया गया है, उससे स्पष्ट है कि यह सरकार आम जनता की नहीं, अपने कॉर्पोरेट मालिकों की चाकरी कर रही है। ये कानून किसानों की फसल को मंडियों से बाहर समर्थन मूल्य से कम कीमत पर कृषि-व्यापार कंपनियों को खरीदने की छूट देते हैं। किसी भी विवाद में किसान के कोर्ट में जाने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाते हैं। खाद्यान्न की असीमित जमाखोरी को बढ़ावा देते हैं और इन कंपनियों को हर साल 50 से 100% कीमत बढ़ाने का कानूनी अधिकार देते है।

इन काले कानूनों में इस बात का भी  प्रावधान किया गया है कि कॉरपोरेट कंपनियां जिस मूल्य को देने का किसान को वादा कर रही हैं, बाजार में भाव गिरने पर वह उस मूल्य को देने या किसान की फसल खरीदने को बाध्य नहीं होंगी, जबकि बाजार में भाव चढ़ने पर भी कम कीमत पर किसान इन्हीं कंपनियों को अपनी फसल बेचने के लिए बाध्य हैं, यानी जोखिम किसान का और मुनाफा कॉरपोरेटों का। इससे भारतीय किसान देशी-विदेशी कॉरपोरेटों के गुलाम बनकर रह जाएंगे। इससे किसान आत्महत्याओं में और ज्यादा वृद्धि होगी। उन्होंने कहा कि इन कानूनों को बनाने से मोदी सरकार की स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और किसानों की आय दुगुनी करने की लफ्फाजी की भी कलई खुल गई है।

छत्तीसगढ़ के इन किसान नेताओं ने इन काले कानूनों के खिलाफ साझा संघर्ष को और तेज करने और इस पर जमीनी स्तर पर अमल न होने देने का भी फैसला किया है। छत्तीसगढ़ बंद की सफलता का दावा करते हुए इन संगठनों ने किसानों के आंदोलन को समर्थन देने के लिए आम जनता, ट्रेड यूनियनों, जन संगठनों और राजनीतिक दलों का आभार व्यक्त किया है। उल्लेखनीय है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समेत प्रदेश के पांचों वामपंथी पार्टियों, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति ने ‘छत्तीसगढ़ बंद-भारत बंद’ का खुला समर्थन किया था। ट्रेड यूनियनों ने आज प्रदेश में किसानों के साथ एकजुटता दिखाते हुए उनकी मांगों के समर्थन में अपने कार्यस्थलों पर प्रदर्शन किए।

इन संगठनों में छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, राजनांदगांव जिला किसान संघ, छग प्रगतिशील किसान संगठन, दलित-आदिवासी मंच, क्रांतिकारी किसान सभा, छग प्रदेश किसान सभा, जनजाति अधिकार मंच, छग किसान महासभा, छमुमो (मजदूर कार्यकर्ता समिति), परलकोट किसान कल्याण संघ, अखिल भारतीय किसान-खेत मजदूर संगठन, नई राजधानी प्रभावित किसान कल्याण समिति, वनाधिकार संघर्ष समिति, धमतरी व आंचलिक किसान सभा, सरिया आदि संगठन प्रमुख हैं।

किसान संगठनों के साझा मोर्चे में विजय भाई, संजय पराते, ऋषि गुप्ता, बाल सिंह, आलोक शुक्ल, सुदेश टीकम, राजिम केतवास, तेजराम विद्रोही, मनीष कुंजाम, रामा सोढ़ी, पारसनाथ साहू, अनिल शर्मा, केशव शोरी, नरोत्तम शर्मा, रमाकांत बंजारे, आत्माराम साहू, नंदकिशोर बिस्वाल, मोहन पटेल, रूपन चंद्राकर, संतोष यादव, सुखरंजन नंदी, राकेश चौहान, विशाल वाकरे, कृष्णा कुमार लकड़ा, बिफन यादव, वनमाली प्रधान, लंबोदर साव, सुरेन्द्रलाल सिंह, पवित्र घोष, मेवालाल जोगी, मदन पटेल, रामा सोढ़ी, मनीष कुंजाम आदि शामिल रहे।

दिल्ली में जंतर मंतर पर भी विशाल प्रदर्शन किया गया। 250 किसान संगठनों के भारत बंद के आह्वान पर यहां बड़ी सख्या में किसान, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और तमाम संगठन के लोग जुटे थे।

प्रदर्शन को संबोधित करते हुए सीपीआई के सांसद विनोय विस्वम ने कहा कि तीनों कृषि बिल किसान विरोधी हैं। ये बिल कृषि को कॉर्पोरेट के हाथों में सौंप देंगे और गरीब किसान, पूंजीपतियों के मनमर्जी के दास बन जाएंगे। मोदी सरकार ने राज्यसभा में बिना मतों के विभाजन कराए गैर जनतान्त्रिक तरीके से जबरदस्ती बिल पास करा लिया है। विनोय विस्वम ने ये भी कहा कि किसानों को दिल्ली बॉर्डर से पहले ही रोक दिया गया कि वो दिल्ली न पहुंच सकें। इसके वाबजूद ये किसानों का भारत बंद आंदोलन आज पूरे देश में बहुत ही सफल रहा।

उन्होंने कहा कि जब तक सरकार इन बिलों को वापस नहीं लेती, हम सड़कों पर आंदोलन करते रहेंगे। उन्होंने भारत के राष्ट्रपति से अपील की कि वो इन बिलों पर अपने अनुमति के हस्ताक्षर न करें। प्रदर्शन को संबोधित करने वालों में सीटू महासचिव तपन सेन, एआइकेएस के महासचिव हन्नान मुल्ला, किसान नेता विरजू कृष्णन शामिल थे।

प्रदर्शन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव प्रोफेसर दिनेश वार्ष्णेय, केहर सिंह, शंकर लाल, विवेक श्रीवास्तव (तीनों ही सीपीआई के जिला सचिव), राजकुमार, संजीव कुमार राणा, जिला सहायक सचिव, सीपीआई, अजय मलिक, सीपीआई की दिल्ली राज्य कार्यकारिणी मेंबर अलका श्रीवास्तव, दिल्ली महिला फेडरेशन की महासचिव शशि कुमार आदि शामिल थे।

इस प्रदर्शन को विभिन्न जन संगठनों ने आयोजित किया था। इनमें आल इंडिया किसान सभा, आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन, आल इंडिया यूथ फेडरेशन, दिल्ली महिला फेडरेशन, एटक, सीटू, ऐडवा, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया, डीवाएफआई और कई अन्य नागरिक संगठन शामिल हैं। उधर, कर्नाटक के तमाम इलाकों में प्रदर्शन हुआ है। बैंग्लोर में इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में युवा शामिल रहे।

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This post was last modified on September 25, 2020 6:41 pm

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