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पाटलिपुत्र की जंग: बिहार के नौजवानों का अपमानजनक पलायन और भूमि सुधार का प्रश्न?

बिहार में चुनावी माहौल गरम होता जा रहा है, एक से बढ़कर एक वादे किए जार रहे हैं, आरोपों-प्रत्यारोपों की बौछार हो रही है, विविध रूप-रंग के गठबंधन दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं, जाति-धर्म के आधार पर वोटों की मांग हो रही है। किसका क्या विचार है, किसका क्या एजेंडा, कौन किसके साथ है और भविष्य में कौन किसके साथ होगा, इसके बारे में कोई दावे के साथ कुछ कह नहीं सकता है, अवसरवाद और येन-केन प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना ही एक मात्र लक्ष्य दिख रहा है। बिहार की आर्थिक बदहाली और नौजवानों के पलायन की त्रासदी चुनावी मुद्दा भी बनता नहीं दिख रही है, जिस पलायन के भयावह दृश्यों को सारी दुनिया ने लॉक-डाउन के दौरान देखा।

फिर भी ऐसे समय में बिहार की सभी राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं से यह प्रश्न पूछना जरूरी है, आखिर क्यों बिहार के 50 प्रतिशत परिवारों का कोई न कोई सदस्य बिहार छोड़कर किसी दूसरे प्रदेश में रोजी-रोटी की तलाश में जाने को मजबूर  है? क्यों इन पचास प्रतिशत घरों में तब तक चूल्हा नहीं जल सकता, जब तक कि उनके घर कोई सदस्य किसी दूसरे प्रदेश या देश जाकर हाड़तोड़ श्रम न करे। इंस्टीट्यूट ऑफ पापुलेशन साइंसेज ( आईआईपीएस) के हाल के आंकड़े ( फरवरी 2020) बताते हैं कि बिहार के आधे से अधिक परिवारों का कोई न कोई सदस्य रोजी-रोटी की तलाश में बिहार छोड़कर देश के अन्य राज्यों या विदेशों-  खाड़ी के देशों में जाता है। बिहार के ये आधे से अधिक परिवार इन लोगों द्वारा घर भेजे गए पैसे से अपने जीवन-यापन का एक बड़ा हिस्सा जुटाते हैं।

यह रिपोर्ट आईआईपीएस के निदेशक और बिहार के शिक्षा मंत्री कृष्ण नंदन प्रसाद वर्मा ने संयुक्त रूप से जारी किया था। सबसे अधिक, पलायन के परंपरागत क्षेत्र पश्चिमी बिहार के जिलों से हुए। सामाजिक समूहों में सबसे अधिक पलायन ओबीसी, एससी-एसटी समुदाय से हुआ। इस रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक पलायन भूमिहीन वर्गों में देखा गया। 85 प्रतिशत लोगों ने उन परिवारों से पलायन किया, जो या तो भूमिहीन थे या जिनके पास एक एकड़ से कम जमीन थी। शैक्षिक तौर पर देखा गया कि 85 प्रतिशत ऐसे लोगों ने पलायन किया, जो दसवीं या दसवीं से कम तक शिक्षा प्राप्त किए हुए थे। पलायन करने वालों का 90 प्रतिशत हिस्सा अस्थायी किस्म के कामों में लगा हुआ था।

जो लोग बिहार के मेहनतकश गरीब परिवारों की जमीनी हालात से परिचित नहीं होंगे, शायद उन्हें यह तथ्य जानकर आश्चर्य हो कि औसत तौर पर पलायन करने वाला एक बिहारी मजदूर अपने घर साल भर में 26,020 रुपया ही भेज पाता है यानि औसत तौर पर प्रति महीने करीब 21,00 रुपया। इसी कमाई से परिवार का पेट भरने के अलावा बहुत सारे जीवन-मरण के अन्य काम भी करने होते हैं। इसी कमाई से बच्चों की थोड़ी बेहतर पढ़ाई और परिवार का बीमारी के दौरान इलाज भी होता है।

आखिर बिहार से मजदूरों के पलायन का जो सिलसिला उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, यानि दो सौ वर्ष पूर्व शुरू हुआ था, वह आज तक जारी क्यों है? और बढ़ता क्यों चला जा रहा है। 1991 से 2001 के बीच में बिहार के बाहर बिहार के लोगों के पलायन में 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आखिर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में रोजगार की तलाश में पलायन करने वालों में करीब 40 प्रतिशत बिहार के नौजवान ही क्यों हैं?

मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, अहमदाबाद, चेन्नई जहां कहीं मजदूरों से पूछिए आप कहां कहां से आएं हैं, तो एक बड़े हिस्से का एक ही उत्तर होता है, बिहार से। कभी करीब-करीब गुलाम गिरमिटिया मजदूर के रूप में विदेश जाने या भेजे जाने वाले बिहारी मजदूर, आज “भइया” कहकर, या “अबे ओ बिहारी” या “बिहारी” कहकर बुलाए जाते हैं। ये देश-देश के कोने-कोने में हर वो काम करते क्यों पाए जाते हैं, जिन्हें देश का कोई अन्य नागरिक करना नहीं चाहता।

पूरे भारत में मजदूरों के पलायन का सबसे बड़ा केंद्र बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के 64 जिले हैं। इस क्षेत्र को मध्य गंगा का मैदान कहा जाता है। यह विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला क्षेत्र है। यहां की मिट्टी बहुत उपजाऊ है।  सांस्कृतिक तौर पर यह बुद्ध, जैन और गोरखनाथ की भूमि रही है, जीवन का अंतिम समय कबीर ने भी यहीं व्यतीत किया था। यह 16 में से 8 महाजनपदों की भूमि रही है। यहीं बुद्ध एवं कबीर की परिनिर्वाण स्थली है। इस क्षेत्र की प्रभावी बोली भोजपुरी रही है। यहां मिट्टी के उपजाऊ होने और जंगलों को काटना आसान होने के चलते प्राचीन काल में यह बसने के लिए सबसे उपयुक्त स्थल था। यहां सघन मानव बस्तियां बसीं।

खुद की और अपनों की पेट की आग बुझाने के लिए दर-दर की ठोकर खाना, हाड़तोड़ परिश्रम वाले वे सारे काम करना जो कोई नहीं करना चाहता और सबसे अमानवीय हालातों में रहना तथा हर तरह का अपमान बर्दाश्त करके भी जीना बिहार के लोगों की सदियों से नियति बन गई है। आज के दौर में “भइया” और “बिहारी” जैसे शब्द गालियों की तरह इनके लिए, उन जगहों पर इस्तेमाल किए जाते हैं, जहां ये रोजी-रोटी की तलाश में जाते हैं। इस सब की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के शुरू में ही हो गई थी।

पहले लोग कोलकाता और बर्मा जाना शुरू किए। फिर घर-बार, गांव-जवार क्या देश छोड़कर करीब-करीब गुलाम के रूप में मारीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो आदि बिराने-अनजाने देशों में जाने या ले जाने का जो सिलसिला गिरमिटिया मजदूर के रूप में आज से करीब 185 वर्ष पहले शुरू हुआ, तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। पहली बार 1838 में 25,000 भोजपुरिया लोगों को गिरमिटिया के तहत मारीशस भेजा गया। गिरमिटिया मजदूर उन मजदूरों को कहा जाता, जिन्हें ब्रिटिश सरकार एक एग्रीमेंट के तहत ब्रिटिश उपनिवेशों या अन्य यूरोपीय देशों के उपनिवेशों में भेजती थी।

देश को आजाद हुए 73 वर्ष बीतने वाले हैं। एक के बाद एक करीब हर रूप-रंग और विचारधारा की सरकारें आईं, गईं,  लेकिन बिहार एवं वहां लोगों की हालात जस की तस। पहले कोलकाता, असम और रंगून जाते थे, फिर गिरमिटिया के रूप में दुनिया के दर्जनभर देशों में भेजे गए। आज़ादी के बाद अपने ही देश के अलग-अलग कोनों में जाने लगे, कभी मुंबई, कभी दिल्ली, कभी सूरत, कभी अहमदाबाद, कभी हैदराबाद, कभी बंगलुरू, कभी तमिलनाडु, कभी केरल और कभी कहीं। अब खेत काटने के लिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाने का सिलसिला शुरू हो गया।

सारे आंकड़े और जमीनी तहकीकात यह बताते हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश ( पूर्वी उत्तर प्रदेश) पलायन के सबसे बड़े गढ़ हैं। उसके बाद मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है।

बिहार से पलायन करके जाने वाले मजदूरों में अधिकांश कृषि मजदूर, ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले मजदूर, निर्माण क्षेत्र, सेवा क्षेत्र ( घरेलू नौकर-नौकरानी, गार्ड, ड्राइवर), फैक्टरियों में काम करने वाले अकुशल मजदूर, सड़क किनारे या फुटपाथों पर चाय, ढाबा, खाने का ठेला लगाने वाले, होटलों में काम करने वाले आदि शामिल हैं। पलायन करने वाले मजदूरों का सबसे बड़ा हिस्सा निर्माण क्षेत्र में काम करता है, इसके अलावा ईंट-भट्ठों एवं कृषि में सीजनल मजदूर के रूप में भी ये बिहारी मजदूर काम करते हैं।

मध्य गंगा के मैदान के भोजपुरी क्षेत्र की पलायन की त्रासदी की कहानी की शुरुआत आज से करीब 200 वर्ष से अधिक समय पहले शुरू होती है। प्रश्न यह उठता है कि इसकी शुरुआत क्यों हुई और यह निरंतर जारी क्यों रहा?

ब्रिटिश शासन की अधिकतम माल गुजारी वसूलने की चाहत और भारतीय जमींदारों, सूदखोरों, बिचौलियों एवं गांवों में प्रभुत्वशाली उच्च जातियों के गठजोड़ की लूट ने बिहार अर्थव्यवस्था को इस कदर खोखला कर दिया कि गांवों को छोड़कर पलायन करने के अलावा एक बड़े हिस्से के पास कोई चारा नहीं बचा। वे इस कदर कंगाली, तबाही एवं बर्बादी के कगार पर पहुंच गए कि गुलाम बनकर गिरमिटिया मजदूर के रूप में धरती के दूसरे कोनों पर जाने को विवश हो गए। मान लिया कि ब्रिटिश शासन तो विदेशी शासन था, उसने भारतीय किसानों-खेतिहर मजदूरों को तबाह कर पलायन के लिए मजबूर किया, प्रश्न यह है कि आज़ादी के बाद यह क्यों न केवल जारी रहा, बल्कि बिहार से विवश पलायन बढ़ता ही गया।

हम सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि कृषि भूमि या खेती की आय ही ब्रिटिश साम्राज्य और पुराने एवं अंग्रेजों के आने के बाद पैदा हुए भारतीय शोषकों की आय का मुख्य स्रोत थी। किसान और खेतिहर श्रमिक जो कुछ पैदा करते, उसका बहुलांश हिस्सा इन शोषकों की जेब में चला जाता और किसान एवं खेतिहर मजदूरों के हिस्से कंगाली आती और उन्हें घर-गांव छोड़कर पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता। इसका सीधा मतलब था कि गांवों की बहुलांश आबादी को कंगाली से बचाने और उन्हें विवश पलायन से रोकने के लिए एक ही सबसे बुनियादी उपाय भूमि सुधार था, जिसका आज़ादी के बाद एक ही अर्थ, वह यह कि जमीन जोतने वाले काश्तकारों के हाथ में जाए और जमीन के लगान पर जीने वाले जमींदारों एवं भूस्वामियों के हाथ से जमीन का हस्तानांतरण किसानों के हाथों में हो और आजादी के आंदोलन के दौरान इसका बढ़-चढ़कर वादा भी किया गया, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।

हालिया आंकड़े बताते हैं कि बिहार के 60.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवार भूमिहीन हैं, यदि इसमें एक एकड़ से कम जमीन वाले परिवारों को शामिल कर दिया जाए, तो यह आंकड़ा 92.2 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। तो यह जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं कि बिहार से मजदूर के रूप में पलायन करने वाले लोगों का 85 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों से हैं। 36.61 प्रतिशत ग्रामीण परिवार प्राइवेट सूदखोरों के गहरे कर्ज में डूबे हुए हैं। औसत तौर पर प्रति परिवार 34,336 रुपए का कर्ज है, जिस पर वे 60 से 120 प्रतिशत तक वार्षिक ब्याज चुकाते हैं।

बिहार में भूमिहीन परिवारों या करीब-करीब भूमिहीन परिवारों के आंकड़ों में निरंतर वृद्धि होती रही है और उसी अनुपात में पलायन भी बढ़ता रहा है। 1993-1994 में 67 प्रतिशत लोग भूमिहीन या करीब-करीब भूमिहीनता की स्थिति में थे। यह अनुपात 2000 आते-आते 75 प्रतिशत तक पहुंच गया।

प्रश्न यह है कि आखिर बिहार में एक ऐसा भूमि सुधार क्यों नहीं हो पाया जो सही अर्थों में ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन कर सके और कृषि की उत्पादकता में वृद्धि करता। हम जानते हैं किसी भी समाज में कृषि की उत्पादकता में वृद्धि औद्योगीकरण का आधार बनता है। जब किसान के पास कृषि से अतिरिक्त आय होती है, तो वह पुन: उसे कृषि में निवेश करता है, जिससे कृषि उपकरणों के साथ नए बीज, कीटनाशक और कृषि जरूरतों की मांग बढ़ती है। अतिरिक्त आय का एक हिस्सा वह अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए खर्च करता है, इससे उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ती है।

इसके साथ ही कृषि में कार्य करने वाले मजदूरों की मज़दूरी में भी वृद्धि होती है, उनका भी उपभोग का स्तर बढ़ता है। ये सभी चीजें मिलकर औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त करती हैं। निसंदेह इसमें बहुत सारे अन्य तत्व भी शामिल होते हैं। कहने का कुल निहितार्थ यह है कि बिहार को भूख, ग़रीबी, बेरोजागारी और इससे पैदा हुए पलायन के दलदल से निकालने के लिए भूमि संबंधों में आमूल-चूल परिवर्तन लाने वाले भूमि सुधार और उसके साथ बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण की जरूरत थी, लेकिन यह आज तक बिहार में हो नहीं पाया।

बिहार पहला राज्य था जिसने सबसे पहले 1947 में ज़मींदारी उन्मूलन बिल पास किया। 1948 में इसमें सुधार करके पुन: इसे जमींदारी उन्मूलन एक्ट के रूप में पास किया गया। 1950 में भूमि सुधार कानून पास किया गया। एक एक्ट के माध्यम से जमीन, जंगल, नदी-नाले, पोखरों, खनिज संपदा आदि पर जमींदारों का कानूनी अधिकार समाप्त कर दिया गया। कानून तो पास हो गया, लेकिन इसके व्यवहारिक रूप लेते-लेते 1959-60 तक का समय बीत गया। इस कानून के लूप होल का फायदा उठाकर जमींदारों ने विभिन्न रूपों में जमीन का बड़ा हिस्सा अपने पास बचा लिया।

जमींदारों ने जमींदारी उन्मूलन को रोकने के लिए बड़ी संख्या में मुकदमे दायर किए। इतना ही नहीं जमींदारों ने जमींदारी उन्मूलन की क्षतिपूर्ति के रूप में करीब 38 करोड़ 40 लाख रूपया लिया। हथुआ, दरभंगा, डुमराव और रामगढ़ आदि जगहों के जमींदारों के पास आज भी हजारों एकड़ जमीन विभिन्न रूपों में पड़ी हुई है। विविध रूपों में आमूल-चूल परिवर्तन लाने वाला भूमि सुधार बिहार की समृद्धि एवं विकास के लिए एजेंडा बना रहा।

पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सबसे मुख्य वादा भूमि सुधार लागू करना था, जिससे बिहार का पिछड़ापन दूर किया जा सके और बिहार को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया जा सके। उन्होंने पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार के वास्तुकार डी. बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में लैंड रिफार्म कमीशन गठित किया। 2005 में गठित इस कमीशन ने 2008 में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत किया। आज तक बिहार सरकार ने उस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का न्यूनतम कदम भी नहीं उठाया।

इतने विराट पैमाने पर इस इलाके के मजदूरों की पलायन वापसी के इस भीषण त्रासदी की जड़ें काफी गहरी हैं। ये नासूर बन चुकी हैं और क्रांतिकारी सर्जरी की मांग कर रही हैं। मरहम-पट्टी और कॉस्मेटिक लीपा-पोती से इसका इलाज संभव नहीं है, बल्कि इससे यह नासूर और ज्यादा फैलता जाएगा। इतनी सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका शिकार हो रहे लोग ही सक्षम नेतृत्व के तहत इसका इलाज करने में भी सक्षम हैं। लेकिन पक्ष-विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों का तो ऐसा कुछ एजेंडा ही नहीं रहा है, न इस चुनाव में दिख रहा।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on October 15, 2020 11:44 am

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