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योगी और केजरीवाल की दिवाली: आस्था या राजनीति?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देश के सबसे लोकप्रिय त्योहार दीपावली को एक राजनीतिक रूप दे दिया है। दीप की मालाएं अब गांव तथा मोहल्लों से निकल कर सत्ता के गलियारों में पहुंच गई हैं। एक सादगी भरा पर्व जो मिट्टी के दीये, मेहनत के तेल तथा आस्था की बाती से आम लोगोें के दिलों को रौशन करता है, उनके हाथ से छूट कर सत्ताधीशों के हाथ में चला गया है। अब इसमें जनता के पैसे से खरीदे गए तेल में राजनीति की बाती जलेगी। गांव तथा कस्बोें की ज़िंदगी में छोटे-छोटे दीयों से आने वाली निश्छल रोशनी अब नफरत के धुंए फेंकेगी।  यह नया दौर है जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई ही नहीं लूटी जा रही है, बल्कि सदियों पुरानी उसकी परंपरा उससे छीनी जा रही है जिसे उसने प्रकृति तथा जीवन से जुड़ कर हजारों साल में बनाई है।

संस्कृति की इस लूट के कई आयाम हैं और यह फरेब ऐसे रंगीन कागज में लपेटा गया है कि आप इसके काले रंग को पहचान ही नहीं सकते। यह आस्था के कारोबार का एक नया फंडा है जिसका आस्था से  कोई लेना-देना नहीं है। यह फरेब लोक-आस्था को न केवल सत्ता की सीढ़ी बना लेता है, बल्कि संविधान के मूल ढांचे में भी छेद करता है।

अयोध्या के पंचलखा दीपोत्सव में योगी आदित्यनाथ के भाषण पर गौर करिए और देखिए राम का नाम उन्होंने कितनी बार लिया है और प्रधानमंत्री मोदी का कितनी बार। मंच पर राम, सीता तथा लक्ष्मण की की पोशाक में रामलीला के कलाकार विराजमान हैं और नीचे आगे की पांत में मठों के पुजारी। उनकी उपस्थिति में राम की महिमा का बखान करने के बदले योगी धाराप्रवाह मोदी का गुणगान करते हैं। वह प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्जवला योजना से लेकर तमाम योजनाओें का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि इस रामराज्य की प्रतीक्षा आज़ादी के बाद से ही की जा रही थी। दीपावली एक लोकोत्सव से ‘भाजपा जिताओ’ के कार्यक्रम में बदल जाता है।

हिंदुओं की आस्था के नाम पर इस गरीब राज्य का करोड़ों रुपया अयोध्या की नौटंकी में लुटा दिया जाता है। यह नौटंकी गांव-जवार में चलने वाली रामलीला का न तो समर्पण में और न ही कलात्मकता में मुकाबला कर सकती है। लोककला की हत्या लोगों के पैसे से की जा रही है। न्यूज़ चैनलों के नाम पर चल रहे राजभक्ति के चैनलों में से कोई भी नहीं बताता है कि इस दीपोत्सव पर कितना पैसा खर्च हुआ और किस मद का पैसा। देश के नंबर एक यूनिवर्सिटी की हैसियत रखने वाले जेएनयू के गरीब किंतु मेधावी छात्रों पर होने वाले खर्च के खिलाफ यह कह कर मोर्चा खोलने वाले चैनल के टैक्स-पेयर नागरिकों का पैसा बर्बाद हो रहा है, इस सवाल को आसानी से गोल कर जाते हैं। मामला सीधा है कि इस खेल में विज्ञापन के जरिए उन्हें उनका हिस्सा भी मिलता है।

अब हम दिल्ली चलें। यह दिल्ली वह नहीं है जहां चलने का नारा नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दिया था। ऐसी दिल्ली की कल्पना उन्होंने नींद में भी नहीं की होगी जिसका मुख्यमंत्री मुहूर्त निकाल कर मंदिर में दीपावली मनाने बैठा होगा। दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर की कहानी भी अलग है। इसका निर्माण यमुना नदी के ताल में पर्यावरण तथा निर्माण के सारे नियमों को ताक पर रख कर हुआ है। दिल्ली का आस्थावान मुख्यमंत्री सिर्फ सरकारी कोष से इस पूजन का विज्ञापन ही नहीं देता है बल्कि इसका प्रसारण भी सरकारी खर्च से कराता है। उसके साथ सारे मंत्री तथा अधिकारी बैठे हैं। इस लकदक आयोजन में लड़कियां फिल्मी अंदाज में प्रार्थना के भाव में हाथ जोड़े खड़ी हैं और अनूप जलोटा भजन गाता है। यह अलग बात है कि उनका गायन किसी लोकप्रिय भजन की नकल है।

आईआईटी से पास होकर आए केजरीवाल ने अपनी वैज्ञानिक बुद्धि का परिचय देते हुए पहले ही घोषित कर रखा है कि इस पूजन में वर्चुअल रूप से दिल्ली की दो करोड़ जनता शामिल हो ताकि वह ‘‘द़ृश्य तथा अदृश्य शक्तियों’’ का आर्शीवाद पा सके। वह यह भी बता चुके हैं कि मंत्रोच्चार से तरंगें पैदा होंगी। दिल्ली में कोरोना महामारी का विस्फोट हो चुका है। अस्पतालों तथा आईसीयू में बेड नहीं हैं। प्रदूषण तथा ठंड के कारण इसके और भी विकराल होने का डर है। ऐसे में, यहां का मुख्यमंत्री उसी तरह तरंग पैदा करना चाहता है जैसा प्रधानमंत्री ने थाली पीट कर पैदा किया था। वह अस्पताल, एंबुलेंस और दवाई का इंतजाम करने के बदले दिल्ली का मंत्रिमंडल पूजा पर बैठा है!

लेकिन आप कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि इस देश में अब कोई जवाहरलाल नेहरू नहीं है जो राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को मना करे कि वह संवैधानिक पद पर बैठे हैं, इसलिए सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में न जाएं। नेहरू ने मंदिर के स्थापना-समारोह में सौराष्ट्र सरकार की ओर से किए जा रहे खर्च पर आपत्ति उठाई थी और कहा था कि देश के कई हिस्सों में अकाल की स्थिति में ऐसा करना अनुचित है। कोरोना-काल में राज्य सरकारोें की ओर से किए जा रहे ये कार्यक्रम आस्था हैं या संवैधानिक अपराध? अब कोई डॉ. राम मनोहर लोहिया नहीं है जो बनारस में 200 संस्कृत पंडितों का पैर धोकर चरणामृत पीने के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के काम को अश्लील बताए और संविधान को नीचा दिखाने वाला बताए।

ये सवाल कौन पूछे कि सरकारी खर्च से पूजा करना संवैधानिक है, वह भी धर्म-विशेष का? सोमनाथ मंदिर के निर्माण के समय गांधी जी ने यही सवाल सरदार पटेल से किया था। पटेल ने कहा- हर्गिज नहीं। उन्होंने कहा कि हिंदू पैसा देंगे तो मंदिर बनेगा। अगर नहीं देंगे तो मंदिर नहीं बनेगा। आखिर पटेल किसी मंदिर आंदोलन से तो सत्ता में आए नहीं थे। उन्होंने बैरिस्टरी छोड़ी थी और वर्षों जेल में रहे थे।

संविधान का नाम आने पर कई सवाल मन में उठते हैं। योगी आदित्यनाथ एक साथ कितनी भूमिकाएं निभा रहे हैं। वह अभी भी गोरखपुर मंदिर के गोरक्षापीठाधीश्वर हैं। एक सेकुलर देश में कोई मुख्यमंत्री किसी मठ का महंत कैसे बना रह सकता है? मामला यहीं नहीं रूकता है। आदित्यनाथ दिवाली के दिन वनटांगिया आदिवासियों के बीच पुस्तक तथा मिठाई बांटने गए हैं  और मुख्यमंत्री कार्यालय उस समुदाय की महिला के बयान को ट्वीट करता है। वह कह रही है, ‘‘ हमने भगवान को नहीं देखा है। लेकिन भगवान होंगे तो योेगी आदित्यनाथ ही जैसे होंगे।’’ योगी के रूप में भगवान होने का दावा कोई बाबा नहीं कर रहा है, राज्य के मुख्यमंत्री का कार्यालय अपने ट्विटर हैंडल से कर रहा है। क्या यह संवैधानिक है? क्या यह अंधविश्वास फैलाने का अपराध नहीं है।

दीपावली को अपने कब्जे में करने की सांस्कृतिक लूट को थोड़ा गहराई से समझने की जरूरत है। दीपावली एक ऐसा त्योहार है जिसे हिंदू, सिख, जैन तथा नेवारी बौद्ध अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार मनाते हैं। हिंदू धर्म में भी अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। ज्यादातर जगहों में लक्ष्मी पूजन इसका मुख्य हिस्सा है। इसे कहीं कृष्ण के नरकासुर वध से तो कहीं दूसरी कथाओं से जोड़ा जाता है। इसमें काली, शिव-पार्वती, यम, कुबेर से  लेकर विश्वकर्मा तक की पूजा की जाती है। राम के अयोध्या लौटने की कथा से जोड़ कर इसे उत्तर भारत के कुछ इलाकों में ही मनाया जाता है।

ऐसे में इसे सिर्फ राम के साथ जोड़ कर दीपावली के साथ जुड़ी अनेक मान्यताओं का तिरस्कार और हिंदू धर्म की विविधता को नष्ट किया जा रहा है। आरएसएस तथा भाजपा के कार्यालय में तैयार आक्रामक हिंदुत्व की नैरेटिव में सिर्फ गोरखपुर के गीता प्रेस वाले राम हैं क्योंकि इसी नैरेटिव से रामजन्म भूमि आंदोलन पैदा हुआ है और बाबरी ध्वंस के जरिए एक मुस्लिम विरोधी माहौल तैयार हुआ है। लेकिन अब हिंदू धर्म को भाजपाइयों से बचाने की जरूरत आ गई है क्योंकि वे असंख्य हिंदुओं की असंख्य मान्यताओं को नष्ट करने पर आमादा हैं। हमें हेलिकाॅप्टर में घूमने और भूखे-नंगे भारत का पेट काट कर निकले पैसे से लाखों दीप से खुश होने वाला राम नहीं चाहिए। हमें तो हमारी मिट्टी के दीये से खुश होने वाला राम चाहिए। हिंदुओं को अपनी संस्कृति तथा परंपरा को लूट तथा राजनीतिक इस्तेमाल से बचाने का संघर्ष करना पड़ेगा।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 15, 2020 1:33 pm

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