Saturday, October 16, 2021

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रावण के तौर पर पीएम मोदी के जले पुतलों का दूरगामी है संदेश

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पीएम मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हो गए हैं जिनका रावण के तौर पर इतना पुतला फूंका गया है। पंजाब से लेकर हरियाणा तक परसों आयी रावण दहन की तस्वीरों में जगह-जगह किसानों ने मोदी को रावण और उनके मंत्रियों एवं सिपहसालारों को बाकी नौ शीशों के तौर पर पेश किया। और इन सारे कार्यक्रमों में बड़े स्तर पर किसानों की भागीदारी दिखी। आम तौर पर दूसरी जगहों पर कोविड-19 के चलते दशहरा उस परंपरागत तरीके से नहीं मनाया जा सका जिसमें जगह-जगह हजारों हजार की संख्या में लोग उमड़ा करते थे लेकिन पंजाब में यह परसों विरोध का पर्व बन गया। क्योंकि किसान अपने आंदोलन के एक कार्यक्रम के तौर पर उसे मान लिए थे लिहाजा जगह-जगह इन कार्यक्रमों में लोगों ने बढ़-चढ़ कर शिरकत की।

किसानों संबंधी कानून को लेकर पीएम मोदी के खिलाफ आक्रोश कितना ज्यादा है उसकी बानगी कुछ जगहों पर उनके गले में जूतों की माला पहना कर लोगों द्वारा उन्हें पीटे जाने में दिखी। हालांकि देश के प्रधानमंत्री के साथ ऐसा हो यह न केवल उस पद की गौरव और गरिमा के खिलाफ है बल्कि एक नागरिक के तौर पर उसे देखना भी पीड़ादायक है। लेकिन शायद इसके लिए किसी और से ज्यादा खुद वही जिम्मेदार हैं। सोशल मीडिया पर दिन भर तरह-तरह से पीएम मोदी को रावण के तौर पर पेश किया जाता रहा। और वैसे भी यह परंपरा किसी और ने नहीं बल्कि खुद संघ और उसकी जमात से जुड़े दूसरे संगठनों ने ही शुरू की थी। आज़ादी के बाद का बना हुआ एक कार्टून सामने आता है जिसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू को रावण और उनके बाकी दस शीशों को मौलाना आजाद से लेकर सरदार पटेल तक के चेहरों के तौर पर दिखाया गया था और यह कार्टून किसी पेपर या फिर स्वतंत्र मीडिया हाउस की तरफ से नहीं बल्कि हिंदू जमात के राजनीतिक संगठनों की ओर से जारी किया गया था। 

दरअसल, इसमें जनता का कोई दोष नहीं है। यह भारतीय इतिहास, संस्कृति और उसकी परंपरा का ही हिस्सा रहा है। और जनता भी अपने भगवानों, देव पुरुषों और खलनायकों की छवि उसी के अनुरूप गढ़ लेती है जिसकी उसे जरूरत होती है। पौराणिक कथाओं में मिलने वाले तमाम देवी-देवता और कथित राक्षसों की छवियां अलग-अलग दौरों में जनता के सामने पेश आ रही परिस्थितियों की उपज रही हैं। और उन्हीं जरूरतों के अनुरूप वह अपने देवी-देवताओं और खलनायकों को भी गढ़ती रही है। इतिहासकारों का एक हिस्सा मानता है कि तमाम पौराणिक कथाएं और उनके देवी-देवता आर्यों और द्रविड़ों या फिर आदिवासियों के बीच प्राचीन काल में हुए संघर्षों की कहानियां हैं। और उन लड़ाइयों में जिन्होंने नायक की भूमिका निभायी वो देवी-देवता हो गए और जो खलनायक रहे जनता ने उन्हें राक्षस के तौर पर पेश कर दिया। और किसी भी दौर में इसी तरह से चीजें घटित हुई हैं। स्वाभाविक है कि इसमें अपनी-अपनी जनता के अपने नायक और खलनायक हुए। आर्यों के नायक द्रविड़ों की निगाह में खलनायक हुए और द्रविड़ों के नायक आर्यों की दृष्टि में खलनायक। 

इस बीच, पश्चिम बंगाल समेत जगह-जगह होने वाली दुर्गा पूजा और उनके पंडालों में  हाल के कोविड संकट काल का बोलबाला रहा। ये पंडाल और उनमें लगी मूर्तियां प्रवासी मजदूरों की जहालतों और परेशानियों की प्रमुख तस्वीर बन गयीं। और दुर्गा पूजा में पंडालों की प्रमुख थीम के तौर पर उभरीं। दरअसल इंसान अपनी परेशानियों को इन्हीं जैसी अभिव्यक्तियों के जरिये सामने लाने की कोशिश करता है। और कई बार ऐसा होता है कि जो काम आप खुद नहीं कर पाते उनको अपने इस तरह के आयोजनों के जरिये पूरा होते देखना चाहते हैं। 

दरअसल अभी तक बीजेपी अपनी राजनीति को साधने के लिए इन छवियों का इस्तेमाल करती रही है। राम मंदिर बनवाने की कड़ी में उसने जो आंदोलन खड़ा किया उसमें राम की तस्वीर को संहारक के तौर पर पेश किया गया। जो अब तक मर्यादा पुरुषोत्तम के तौर पर सामने आती रही राम की छवि के बिल्कुल उलट थी। संघ और बीजेपी द्वारा उनको ऐसा पेश करने के पीछे अल्पसंख्यक मुसलमानों के खिलाफ घृणा और नफरत पैदा करने के साथ ही उनके खिलाफ हिंसक माहौल बनाना था।

अब उसी माध्यम को जनता ने अपने हाथ में ले लिया है और उसने अपनी पीड़ा को जाहिर करने के लिए इन प्रतीकों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। और पंजाब से लेकर हरियाणा और पश्चिम बंगाल से लेकर सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के खिलाफ दिखा लोगों का गुस्सा उसी का नतीजा था।

हालांकि बीजेपी और खासकर मोदी जनता की भावनाओं के इस्तेमाल के सबसे बड़े खिलाड़ी रहे हैं। अभी जबकि सारी चीजें मोदी के हाथ से निकलती दिख रही हैं और उनकी लोकप्रियता में आयी गिरावट के किस्से आम हैं। सोशल मीडिया से लेकर बिहार की चुनावी रैलियों में भीड़ और उसमें दिखने वाले उत्साह की कमी के तौर पर जगह-जगह उन्हें देखा जा सकता है। लेकिन इस बीच वह अपनी दाढ़ी बढ़ाकर देश के सामने अपनी किसी दूसरी ही छवि को पेश करने की जुगत में हैं। जिसमें यह कयास लगाया जा रहा है कि वह अब ऋषि के तौर पर दिखना चाहते हैं। एक ऐसा ऋषि जो तमाम छोटी-छोटी चीजों से ऊपर होता है। उसके लिए कोई नेता क्या पूरी राजनीति ही टुटपुजिया होती है। 

इस लिहाज से वह खुद को एक प्रक्रिया में सभी नेताओं से ऊपर दिखाना चाहते हैं। लेकिन मोदी को यह समझ लेना चाहिए कि कोई दाढ़ी बढ़ा लेने से न तो रविंद्र नाथ टैगोर हो जाता है और न ही उसे ऋषि का दर्जा मिल जाता है। दरअसल वह छवि हासिल करने के लिए उसे उसी तरह का काम करना होता है। और अगर आपने ऐसे काम नहीं किए हैं तो आपकी छवि भी उसके उलट ही बनेगी। जिसमें आप ऋषि से ज्यादा ढोंगी दिखेंगे। संत कम आसाराम ज्यादा दिखेंगे। इसलिए इस तरह के पाखंड से पीएम मोदी को जितनी जल्दी हो बाहर निकल जाना चाहिए।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।) 

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