Monday, October 18, 2021

Add News

तबलीग घटना के दो दिन पहले रातोंरात भेजे गए हरिद्वार में फँसे 1800 गुजराती, ट्रांसपोर्ट मंत्री तक को नहीं हुई ख़बर

Janchowkhttps://janchowk.com/
Janchowk Official Journalists in Delhi

ज़रूर पढ़े

नई दिल्ली। बात 28 मार्च की है। अहमदाबाद में रहने वाले मुकेश कुमार के मोबाइल पर एक मैसेज आया। यह मैसेज उनके ही एक दोस्त ने भेजा था। इसमें लिखा था कि ‘आज रात उत्तराखंड परिवहन की कई बसें अहमदाबाद पहुंच रही हैं। ये बसें कल सुबह वापस उत्तराखंड लौटेंगी, तुम भी इनमें वापस अपने घर लौट सकते हो।’

मुकेश मूल रूप से उत्तराखंड के ही रहने वाले हैं। बीते कुछ सालों से वे अहमदाबाद के एक होटल में नौकरी कर रहे थे। लॉकडाउन के चलते होटल बंद हुआ तो उनके रोजगार पर भी अल्पविराम लग गया। देश भर के तमाम प्रवासी कामगारों की तरह मुकेश का भी मन हुआ कि वे अपने गांव लौट जाएं। लेकिन सभी सार्वजनिक यातायात बंद हो जाने के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए। फिर 28 मार्च को जब अचानक दोस्त का मैसेज आया कि उत्तराखंड परिवहन की गाड़ियां अहमदाबाद आ रही हैं तो पहले-पहल उन्हें इस पर विश्वास ही नहीं हुआ।

मुकेश को लगा कि उनके दोस्त ने शायद मैसेज भेजकर मजाक किया है। जब पूरे देश में यातायात ठप पड़ा है और सभी प्रदेशों की सीमाएं सील की जा चुकी हैं तो फिर उत्तराखंड परिवहन की बसें 1200 किलोमीटर दूर अहमदाबाद कैसे आ सकती हैं। दूसरी तरफ उनके मन का एक हिस्सा इस मैसेज पर विश्वास भी करना चाहता था और लगातार यही सोच रहा था कि शायद उत्तराखंड सरकार ने उन लोगों की मदद के लिए सच में कुछ बसें अहमदाबाद भेजी हों।

इसी रात मुकेश कुमार ने देखा कि उनके होटल के सामने की मुख्य सड़क पर सच में उत्तराखंड परिवहन की कई सुपर लग्जरी बसें कतारबद्ध बढ़ी आ रही हैं। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने तुरंत ही उत्तराखंड के अपने अन्य प्रवासी साथियों से संपर्क किया और वापस अपने गांव लौटने की तैयारी करने लगे। मुकेश और उनके साथियों ने मिलकर इन बसों के ड्राइवर से वापस लौटने का समय भी मालूम कर लिया।

मुकेश कुमार बताते हैं- ‘अगली सुबह यानी 29 मार्च को करीब 10 बजे हम सब लोग इन बसों के पास पहुंच गए। हम 13 साथी एक बस थे। हमारी बस के ड्राइवर ने फिर हमसे कहा कि तुम्हें ऋषिकेश तक का कुल 18 हजार रुपए किराया चुकाना होगा। ये हमें अजीब तो लगा लेकिन हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं था। मजबूरी थी इसलिए हम तैयार हो गए और हम 13 लोगों ने मिलकर तुरंत ही 18 हजार रुपए ड्राइवर को थमा दिए। हमें लगा था कि चलो इस मुश्किल वक्त में हम कम से कम किसी भी तरह अपने घर तो पहुंच जाएंगे। लेकिन वो भी नहीं हुआ।’

गुजरात से लौट रहे उत्तराखंड के लोगों को आधे रास्ते में ही छोड़ दिया गया।

मुकेश और उनके साथियों को उत्तराखंड परिवहन की इन बसों ने अहमदाबाद से बैठा तो लिया लेकिन उत्तराखंड पहुंचने से पहले ही रात के अंधेरे में किसी को राजस्थान तो किसी को हरियाणा में ही उतार दिया। असल में ये तमाम बसें गुजरात में फंसे मुकेश जैसे उत्तराखंड के नागरिकों को लेने नहीं बल्कि हरिद्वार में फंसे गुजरात के नागरिकों को छोड़ने अहमदाबाद गई थी।

गुजरात के मुख्यमंत्री के सचिव अश्वनी कुमार ने एक न्यूज एजेंसी को बताया- ‘गुजरात के अलग-अलग जिलों के करीब 1800 लोग हरिद्वार में फंसे हुए थे। केंद्रीय मंत्री मनसुखभाई मांडविया, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के विशेष प्रयासों से इन लोगों को वहां से निकालकर इनके घर पहुंचाने की व्यवस्था की गई।’ इसी व्यवस्था के चलते उत्तराखंड परिवहन की कई गाड़ियां हरिद्वार से अहमदाबाद पहुंची थी। दिलचस्प है कि ये काम इतनी गोपनीयता से किया गया कि उत्तराखंड के परिवहन मंत्री तक को ये खबर नहीं लगी कि उनके विभाग की कई गाड़ियां लॉकडाउन के दौरान कई राज्यों की सीमाओं को पार करते हुए 1200 किलोमीटर के सफर पर निकल चुकी हैं।

27 मार्च को जारी एक आदेश से मालूम पड़ता है कि उत्तराखंड परिवहन की ये गाड़ियां सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देशों के तहत गुजरात भेजी गई थीं। इनका उद्देश्य हरिद्वार में फंसे गुजरात के लोगों को उनके घर पहुंचाना था। वापस लौटते हुए यही गाड़ियां वहां फंसे उत्तराखंड के लोगों को लेकर आ सकती थी, लेकिन ऐसा कोई भी आदेश उत्तराखंड सरकार की ओर से जारी नहीं हुआ।

वह आदेश जिसके तहत बसों को हरिद्वार से अहमदाबाद भेजा गया।

जब ये बसें हरिद्वार से रवाना होने लगी और यह खबर सार्वजनिक हुई तो यह मामला विवादों से घिरने लगा। सवाल उठने लगे कि जब लॉकडाउन के चलते पूरे देश में ही लोग अलग-अलग जगहों पर फंसे हैं और उत्तराखंड में भी कई अलग-अलग राज्यों के लोग फंसे हैं तो सिर्फ गुजरात के लोगों के लिए ही विशेष बसें क्यों चलाई जा रही हैं? इसके साथ ही यह भी सवाल उठे कि तमाम जगहों से उत्तराखंड के जो प्रवासी पैदल ही लौटने पर मजबूर हैं उनके लिए कोई बस अब तक क्यों नहीं चलाई गई? साथ ही यह सवाल भी उठने लगे कि जब अहमदाबाद के लिए बसें निकल ही चुकी हैं तो फिर ये बसें खाली वापस क्यों लौटें, वहां फंसे उत्तराखंड के लोगों को ही वापस लेती आएं।

यही वो समय था जब सोशल मीडिया पर ये बातें तेजी से फैलने लगीं। लिहाजा इन बसों के अहमदाबाद पहुंचने से पहले इनकी खबर वहां रहने वाले मुकेश कुमार जैसे तमाम लोगों तक एक उम्मीद बनकर पहुंच गई। अब उत्तराखंड सरकार पर भी दबाव बढ़ने लगा। राज्य के परिवहन मंत्री से इस संबंध में सवाल पूछे गए तो सामने आया कि उन्हें भी इन बसों के निकलने की कोई जानकारी नहीं थी।

दबाव बढ़ने पर उत्तराखंड सरकार ने यह एलान तो कर दिया कि वापस लौटती बसें गुजरात में रह रहे प्रवासियों को लेकर लौटेंगी, लेकिन इस दिशा में कोई पुख्ता कदम नहीं उठाए गए। नतीजा ये हुआ कि वहां से लौट रहे मुकेश कुमार जैसे दर्जनों उत्तराखंड के प्रवासी न तो घर के रहे न घाट के। ये तमाम लोग राजस्थान से लेकर हरियाणा के अलग-अलग इलाकों में अब तक भी फंसे हुए हैं।

रात करीब तीन बजेबस ड्राइवरों ने कई लोगों को हरियाणा बॉर्डर पर ही उतार दिया।

मुकेश और उनके साथी अब किस स्थित में और उन पर क्या-क्या बीती है, इस पर चर्चा करने से पहले इस मामले से जुड़े कुछ अन्य अहम सवालों पर चर्चा करना जरूरी है। ये सवाल उन लोगों से जुड़ते हैं जिनके चलते इस पूरे प्रकरण की शुरुआत हुई। यानी हरिद्वार में फंसे वे लोग जिन्हें वापस गुजरात छोड़ने के लिए बसें चलवाई गई।

बताया जा रहा है कि गुजरात के ये तमाम लोग किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने हरिद्वार पहुंचे थे। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के अपने प्रदेश से आए इन लोगों को उनका करीबी भी बताया जा रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री के सचिव अश्वनी कुमार के आधिकारिक बयान से भी इतना तो साफ होता ही है कि जहां देशभर में लाखों लोग यहां-वहां फंसे हुए हैं, वहीं हरिद्वार में फंसे इन लोगों को सीधा गृह मंत्री के निजी हस्तक्षेप के बाद विशेष व्यवस्था करके निकाला गया है।

दूसरी तरफ मुकेश कुमार जैसे लोग है, जिन्होंने अपने प्रदेश की गाड़ियों को आता देख अपने घर लौट पाने की उम्मीद पाली थी, लेकिन वो अब तक भी अधर में लटके हुए हैं। मुकेश बताते हैं- ‘हम लोग रात करीब तीन बजे हरियाणा बॉर्डर के पास पहुंचे थे। हमारे ड्राइवर ने यहां पहुंच कर हमसे कहा कि आगे पुलिस का नाका लगा है और वो सवारी से भरी गाड़ियों को बॉर्डर पार नहीं करने दे रहे। ड्राइवर ने कहा कि तुम लोग उतरकर पैदल बॉर्डर के दूसरी ओर जाओ तो मैं तुम्हें फिर से बैठा लूंगा। हम उसकी बात मानकर उतार गए, लेकिन वो उसके बाद रुका ही नहीं। हमने सारी रात सड़क पर काटी। फिर कई किलोमीटर पैदल चलकर यहां बवाल (हरियाणा) पहुंचे और उस दिन से ही एक स्कूल में ठहरे हुए हैं। कोई गाड़ी हमें लेने नहीं आई जबकि हमने न जाने कितने अधिकारियों को फोन किए।’

गुजरात से लौटे उत्तराखंड के दर्जनों लोग बवाल (हरियाणा) के एक स्कूल में ठहराए गए हैं।

ऐसी ही स्थिति रुद्रप्रयाग के रहने वाले हिमालय और उनके साथियों की भी हैं। हिमालय गांधीनगर (गुजरात) के कृष्णा होटल में काम किया करते थे। बीती 29 मार्च को वे भी उत्तराखंड परिवहन की ऐसी ही बस से लौट रहे थे, लेकिन उन्हें उनके लगभग 40 अन्य साथियों के साथ राजस्थान के अलवर जिले में ही उतार दिया गया। ये सभी लोग अब भी वहीं फंसे हुए हैं और एक होस्टल में रह रहे हैं।

इनसे भी ज्यादा लोग राजस्थान के उदयपुर में फंस गए हैं। पुनीत कंडारी इन्हीं में से एक हैं जो अहमदाबाद रिंग रोड पर स्थित ऑर्किड नाम के एक होटल में काम किया करते थे। पुनीत बताते हैं- ‘हम कुल 49 लोग हैं। उस रात से ही यहां फंसे हुए हैं। बस वाले ने हमें आगे ले जाने से माना कर दिया और रात के अंधेरे में यहां बीच सड़क में उतार दिया था। पुलिस हमें यहां से भगा रही थी। हमें समझ नहीं आ रहा था क्या करें। फिर हमें अपने यहां के विधायक मनोज रावत जी को फोन किया। उन्होंने ही किसी से बोलकर हमारे रहने-खाने की व्यवस्था करवाई।’

केदारनाथ से कांग्रेस के विधायक मनोज रावत बताते हैं, ‘मुझे जब इन लड़कों का फोन आया तो मुझे पहले तो इनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। मुझे लगा कि जब सारा देश बंद है तो उत्तराखंड परिवहन की गाड़ियां गुजरात कैसे जा सकती हैं। फिर मैंने परिवहन मंत्री यशपाल आर्य जी को फोन किया लेकिन उन्होंने भी फोन नहीं उठाया। कई अन्य जगहों से जब पूरा मामला पता चला तो मैंने कोरोना के लिए नियुक्त हुए नोडल अधिकारी और प्रभारी मंत्री को पत्र लिखा कि इन सभी लोगों की तत्काल मदद की जाए। इसके बाद भी जब इन लोगों की वापसी की कोई राह नहीं बनी तो अंततः मैंने राजस्थान में रह रहे कुछ परिचितों से संपर्क किया फिर उन्होंने ही इन लोगों की व्यवस्था की।’

राजस्थान और हरियाणा के अलग-अलग शहरों में फंस चुके उत्तराखंड के ये प्रवासी कहते हैं- ‘गाड़ियां नहीं चल रही थी तो हम लोग गुजरात में ही रुके हुए थे। भले ही काम बंद था और पगार नहीं मिल रही थी, लेकिन हमारे रहने-खाने की व्यवस्था सेठ ने की हुई थी। हम लोगों ने तो जब ये देखा कि हमारे अपने प्रदेश की गाड़ियां गुजरात आई हुई हैं, तब हमने वापस लौटने की सोची।’ पुनीत कंडारी कहते हैं, ‘हम 14 दिन तक सब लोगों से अलग रहने को तैयार हैं, लेकिन हमें बस उत्तराखंड पहुंचा दिया जाए। यहां ऐसे अनजान इलाके में क्यों छोड़ दिया गया है? हमारे साथ जो हुआ है और हमें जिस स्थिति में छोड़ दिया गया है उसके बाद क्या हमारे मुख्यमंत्री कभी हमसे आंखें मिलाकर कह सकेंगे- आवा आपुण घौर।’

पलायन की समस्या से निपटने के लिए हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रदेश के बाहर नौकरी कर रहे तमाम युवाओं से अपील की थी – ‘आवा आपुण घौर’, जिसका मतलब है- ‘आओ अपने घर।’

(दैनिक भास्कर से साभार।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

किसानों का कल देशव्यापी रेल जाम

संयुक्त किसान मोर्चा ने 3 अक्टूबर, 2021 को लखीमपुर खीरी किसान नरसंहार मामले में न्याय सुनिश्चित करने के लिए...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.