Monday, December 5, 2022

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव आयोग का यूटर्न, अब 10 नवंबर को नहीं जारी होगी अधिसूचना

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आजम खान पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव आयोग ने यू टर्न ले लिया है। चीफ इलेक्शन कमिश्नर यूपी की तरफ से कहा गया है कि अब अधिसूचना 10 नवंबर को नहीं आएगी। दरअसल पहले चुनाव आयोग ने रामपुर की सीट पर उप चुनाव कराने की घोषणा की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आजम खान को राहत दी तो चुनाव आयोग को अपने कदम वापस खींचने पड़ गए।

उधर देर शाम आजम खान ने रामपुर में सेशन कोर्ट में हेट स्पीच पर अपने खिलाफ आए फैसले पर पुनर्विचार के लिए अपील दाखिल कर दी है। आजम को सीएम योगी के खिलाफ टिप्पणी के मामले में सजा सुनाई गई थी। उसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई थी। चुनाव आयोग ने रामपुर सीट पर चुनाव कराने का फैसला लिया था। आजम का तर्क था कि इतनी जल्दी क्या है। वो सुप्रीम कोर्ट गए तो शीर्ष अदालत से उन्हें तुरंत राहत मिल गई।

इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को बुधवार को निर्देश दिया कि वह हेट स्पीच मामले में दोषी पाये गये विधायक आजम खान की अयोग्यता के मद्देनजर रामपुर सदर विधानसभा सीट पर उपचुनाव को लेकर फिलहाल 10 नवंबर तक अधिसूचना जारी न करे।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारत के चुनाव आयोग से रामपुर विधानसभा के लिए उपचुनाव की अधिसूचना स्थगित करने को कहा ताकि समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान गुरुवार को अपीलीय अदालत के समक्ष 2019 के अभद्र भाषा मामले में अपनी सजा पर रोक लगाने की मांग कर सकें। आपराधिक मामले में 27 अक्टूबर को खान की दोषसिद्धि के बाद उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया और रामपुर विधानसभा क्षेत्र, जिसका वे प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उसे खाली घोषित कर दिया गया। उसके बाद चुनाव आयोग ने 6 नवंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रामपुर के लिए उपचुनाव के कार्यक्रम की घोषणा की। कार्यक्रम के अनुसार उपचुनावों की आधिकारिक गजट अधिसूचना गुरुवार (10 नवंबर) को अधिसूचित कीजानी थी ।

खान ने रामपुर सीट के उपचुनाव को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उनकी सजा के खिलाफ अपील लंबित है। अदालत ने अतिरिक्त सत्र न्यायालय रामपुर को दोषसिद्धि पर रोक लगाने के लिए खान की अर्जी पर गुरुवार (10 नवंबर) को ही फैसला करने का निर्देश देते हुए उनके आवेदन का निपटारा कर दिया।

खान की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट चिदंबरम ने पीठ को बताया कि 27 अक्टूबर को नफरत भरे भाषण के मामले में दोषी ठहराए जाने के अगले ही दिन यूपी विधानसभा ने रामपुर सीट को खाली घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की त्वरित कार्रवाई “अभूतपूर्व” है। यह कदम राजनीति से प्रेरित था। चिदंबरम ने कहा कि हालांकि खतौली निर्वाचन क्षेत्र के एक भाजपा विधायक को 11 अक्टूबर को पारित एक आदेश द्वारा दो साल के लिए दोषी ठहराया गया था, लेकिन ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।

चिदंबरम ने पीठ को सूचित किया कि खान ने दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दायर की है जिसमें उन्हें अंतरिम जमानत दी गई है और सत्र न्यायालय ने 15 नवंबर को सुनवाई के लिए दोषसिद्धि पर रोक लगाने के लिए आवेदन पोस्ट किया है।

गुजरात पुलिस द्वारा की गईं 22 कथित ‘फर्जी मुठभेड़ों’ पर जस्टिस बेदी की रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 2002 और 2007 के बीच गुजरात पुलिस द्वारा की गईं 22 कथित ‘फर्जी मुठभेड़ों’ की निगरानी के लिए मामले को जनवरी, 2023 में नियमित बोर्ड में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस ए एस ओक की पीठ को भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि मुठभेड़ों में स्पेशल टास्क फोर्स की जांच की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त निगरानी समिति की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस एचएस बेदी ने अपनी रिपोर्ट दाखिल की है। मेहता का मत था कि इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं बचा है।

जस्टिस कौल ने कहा कि निगरानी समिति द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट के अवलोकन पर न्यायालय को अब केवल एक चीज की जांच करनी है कि क्या उसके द्वारा कोई निर्देश पारित करने की आवश्यकता है। केवल एक चीज यह है कि क्या रिपोर्ट के संबंध में किसी निर्देश को पारित करने की आवश्यकता है। हम यह देखने के लिए मामलों को सूचीबद्ध करेंगे कि रिपोर्ट के संबंध में कोई और निर्देश जारी किया जाना है या नहीं।

पीठ ने कहा कि रिपोर्ट की प्रतियां पक्षों को उपलब्ध करा दी गई हैं। इसने पक्षकारों को रजिस्ट्री से एक प्रति प्राप्त करने की स्वतंत्रता दी, यदि प्राप्त नहीं हुई है।

सॉलिसिटर जनरल ने संकेत दिया कि वर्तमान रिट याचिका में, याचिकाकर्ता ने एक विशेष राज्य और झूठी मुठभेड़ों के लिए लक्षित किया है, जो कथित तौर पर एक विशेष अवधि के दौरान हुए थे, जब गुजरात राज्य में एक ‘ राजनीतिक दल’ (भाजपा) शीर्ष पर था।  केवल एक राज्य की मुठभेड़ क्यों चुनी गई और इस विशेष अवधि के लिए।

याचिकाएं वरिष्ठ पत्रकार, बी जी वर्गीज और कवि और गीतकार जावेद अख्तर ने दाखिल की हैं। वर्गीज का 2014 में निधन हो गया था।

जनवरी 2019 में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में 2002 से 2007 के बीच हुई मुठभेड़ हत्याओं के 17 मामलों में से तीन में गड़बड़ी का प्रथम दृष्ट्या सबूत है। जस्टिस बेदी ने मामलों में शामिल नौ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की। 2 मार्च 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बेदी को गुजरात सरकार द्वारा गठित स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) द्वारा की गई जांच की निगरानी के लिए निगरानी समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया।

हिरासत में हुई मौतें रिपोर्ट केवल उन 17 मामलों के बारे में है जिन्हें विशेष रूप से एसटीएफ को भेजा गया था। जस्टिस बेदी ने रिपोर्ट में पुलिस के इस बयान को पूरी तरह से खारिज कर दिया कि मुठभेड़ पीड़ितों में से एक आतंकवादी था जो तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के लिए गुजरात पहुंचा था।

सुप्रीम कोर्ट ने गौतम नवलखा की याचिका पर एनआईए से पूछा

सुप्रीम कोर्ट भीमा कोरेगांव मामले के आरोपी गौतम नवलखा द्वारा अपनी मेडिकल स्थिति के कारण हाउस अरेस्ट करने की मांग करने वाली याचिका पर फैसला सुना सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक घंटे की लंबी सुनवाई के बाद कहा, “इस अदालत ने हाउस अरेस्ट को हिरासत का रूप माना है…..सभी तरह के प्रतिबंध हैं। हम कोशिश करेंगे। उनकी तबीयत ठीक नहीं है”।

पीठ ने मुकदमे में देरी पर भी खेद व्यक्त किया, जो अभी शुरू होना बाकी है, जब अक्टूबर 2020 में उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया। पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि यह थोड़ा परेशान करने वाला है। यदि आपके पास इतनी सामग्री है तो क्यों?…..वह 70 वर्षीय व्यक्ति है। वह अपरिहार्य के रास्ते पर है…..अगर वह कुछ करते हैं तो वह अपनी स्वतंत्रता खो देंगे।

73 वर्षीय मानवाधिकार कार्यकर्ता को अगस्त, 2018 में गिरफ्तार किया गया और तब से वह हिरासत में हैं। कहा जाता है कि वह त्वचा की एलर्जी और दंत समस्याओं सहित गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे और उन्होंने संदिग्ध कैंसर की जांच कराने के लिए कोलोनोस्कोपी कराने की आवश्यकता का हवाला दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा उनकी बहन के घर स्थानांतरित करने की उनकी प्रार्थना को खारिज करने के बाद उन्होंने सुप्रीम मकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

आडवाणी और अन्य को बरी करने के आदेश के खिलाफ अपील खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ में विशेष सीबीआई अदालत के आदेश के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील को खारिज कर दिया, जिसमें सभी 32 व्यक्तियों (प्रमुख भाजपा नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, आदि सहित) को 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के पीछे की साजिश के आरोपों में बरी कर दिया था। जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस सरोज यादव की पीठ ने 31 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखने के बाद अपील खारिज कर दी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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