Tuesday, October 19, 2021

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‘एक तूफ़ान सा मेरी ज़िन्दगी से आ टकराया है’

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नई दिल्ली/श्रीनगर। तनवीर शेख़ के घर में पुलिस अधिकारियों के प्रवेश से पहले सिर्फ एक दस्तक हुई। सशस्त्र लोग खिड़की में से चढ़कर अन्दर आए और तनवीर के बारे में पूछते हुए कमरों की तलाशी लेने लगे।

मरयम बताती हैं, “हमारे घर में जवान लड़कियां हैं और वह नींद से जाग गईं थीं। मैंने पुलिस वालों से कहा कि वह ऐसे कैसे घर में घुस सकते हैं। हम नग्न अवस्था में भी तो हो सकते थे।”

कश्मीर के श्रीनगर में इस परिवार के अनुसार 16 या 17 वर्षीय तनवीर उस समय घर में नहीं था, इसलिए अधिकारी उसके चाचा नसीर को ले गए। पुलिस ने बताया नहीं कि वह तनवीर को क्यों हिरासत में लेना चाहते थे।

 मरयम के अनुसार, “उन्होंने कहा, आप तनवीर को हमारे हवाले कर दो, हम नसीर को जाने देंगे।”
नसीर का बेटा अपने पिता के बारे में पूछता रहता है, जो अब 11 दिन से हिरासत में है। मरयम बताती हैं, “वह केवल दो साल का है। हम उसे क्या बताएं? कैसे बताएं? वह तो समझ भी नहीं पायेगा कि क्या हुआ है?”

नसीर उन हज़ारों लोगों में से हैं जिन्हें तीन सप्ताह पहले भारत सरकार द्वारा राज्य का विशेष दर्जा वापस लेने के बाद पुलिस के व्यापक अभियान में गिरफ्तार किया गया। पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत प्रमुख राजनेता, व्यापारी, वकील उन लोगों में शामिल हैं जो हिरासत में हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कुछ कैदियों को कश्मीर से बाहर ले जाकर लखनऊ, बरेली और आगरा की जेलों में भेजा गया है। संभव है कि लोगों को पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत रखा जा रहा है, जो एक विवादास्पद क़ानून है और किसी को दो साल तक कोई आरोप लगाये बिना या मुक़दमे के बिना भी जेल में रखे जाने की अनुमति देता है।

सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने पिछले सप्ताह कहा था कि इन हालात से वह “बेहद चिंतित” हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे समूहों ने भी चिंता जताई है।

संचार-बंदी, जो तीन सप्ताह से ज़्यादा समय से चल रही है, ने संभावित मानवाधिकार हनन के मामलों को दर्ज करने के कार्यकर्ताओं के काम को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। फ़ोन और इन्टरनेट सेवाओं के निलंबन से रिश्तेदार एक दूसरे को कॉल नहीं कर पा रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने से उसकी स्वायत्तता छिन गयी है, उसका संविधान और वह नियम हटा दिए गए हैं जो बाहरी लोगों को वहां ज़मीन खरीदने की अनुमति नहीं देते थे। कई कश्मीरियों को लगता है कि इस परिवर्तन से भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य की जनसांख्यिकी और परंपराएं बदल जाएंगी।

पिछले दो सप्ताहों में भारी सुरक्षा के बावजूद छिटपुट विरोध प्रदर्शन जारी हैं। एक प्रतिबंधित राजनीतिक समूह से सहानुभूति रखने वाले शख्स ने, अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर गार्जियन को पिछले सप्ताह बताया कि क्षेत्र एक “धधकता ज्वालामुखी” है जो कभी भी “फट” सकता है। 

दिल्ली की गतिविधियों ने पाकिस्तान, जो कश्मीर पर दावा करता है, तनाव बढ़ा दिया है। उसने आशंका जताई है कि भारत नस्लीय-संहार कर सकता है।

अपनी बच्ची के साथ श्रीनगर के पुलिस थाने के बाहर इंतेज़ार करती एक महिला, उल्फत, जिनके पति को 20 अगस्त को घर से उठा लिया गया था (तस्वीर- दर यासीन/ ए.पी फोटो)

श्रीनगर के केंद्रीय कारागृह के बाहर कश्मीर भर से परिवार अपने लोगों से मिलने के लिए कतारों में लगे हैं। आमिना ने बताया कि उनके 22 वर्षीय बेटे जुनैद नबी वाणी को दो सप्ताह पहले जुम्मे की नमाज़ के बाद गिरफ्तार किया गया था।

आमिना ने बताया, “वह पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ सड़क पर था जब पुलिस आई और उसका पहचान पत्र मांगा। एक पुलिस अधिकारी ने इसके बाद वाणी के कंधे पर हाथ रखा और उसे साथ चलने को कहा। एक बख्तरबंद गाड़ी इंतज़ार कर रही थी, उसे गाड़ी में ठूंसा गया और ले जाया गया। उन्होंने कहा, यह नहीं पता कि उसे क्यों हिरासत में लिया गया।

आमिना के अनुसार: “उस समय उसका चचेरा भाई साथ था, जो भागते हुए हमारे पास आया। हम बाहर भागे और हमने प्रतिरोध की कोशिश की पर पुलिस वालों ने बंदूक निकाल ली और हमारी ओर तान दी।” उन्हें जेल स्टाफ ने 56 नंबर दिया और जेल में अंदर जाने का नंबर आने तक प्रतीक्षा करने को कहा। वह अपने बेटे के लिए छोटा लंच बॉक्स लाई थीं। 

सरवर उत्तरी कश्मीर के हथलोंग गांव से सुबह अपने बेटे अकीब से मिलने की उम्मीद में निकलीं थी। उन्होंने बताया कि उसे आठ दिन पहले आधी रात को हिरासत में लिया गया था। उन्होंने बताया कि गिरफ्तारी का कोई कारण नहीं बताया गया।

उन्होंने कहा, “ख़ुदा का कहर बरसे उन पर! मेरा बेटा निर्दोष है, मेरा विश्वास करो उसने कुछ नहीं किया।” उनकी पड़ोसन फरीदा भी अपने बेटे बिलाल से मिलने आई थीं। बिलाल अकीब के साथ ही गिरफ्तार हुआ था।

परिजनों को अपने लोगों से मिलने के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ा। फरीदा ने बाद में रोते हुए बताया, “उसने कुछ नहीं कहा। बस रोता रहा”। उनके हाथ पर एक मुहर लगी थी, “शुतुरमुर्ग” और “मगरमच्छ” लिखा था। यह कोड था जो जेल में प्रवेश की अनुमति देता था और रोज़ बदला जाता था।

एसोसिएटेड प्रेस और फ्रांस प्रेस की ओर से अलग अलग जमा किए अनुमानों के अनुसार 2300 से 2400 लोग हिरासत में लिए गए हैं। अधिकारियों ने हाल में कहा कि कोई गड़बड़ी न हो इसके लिए “कुछ” गिरफ्तारियां की गईं हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत सरकार पर “क्षेत्र के लोगों की आवाज़ को जबरन दबाने” का आरोप लगाया।

नसीर के परिवार के अनुसार उसे तब तक हिरासत में रखा जायेगा, जब तक भतीजे को पुलिस के हवाले नहीं किया जाता। परिवारों के अनुसार पुराने श्रीनगर, जो कि भारत विरोधी प्रदर्शनों का पारम्पारिक केंद्र बिंदु है, में ऐसी गिरफ्तारियां आम बात हैं।

गोजवारा में एक परिवार ने बताया कि पुलिस ने उनके घर पर 8 अगस्त को आधी रात को छापा मारा और उनके 25 वर्षीय बेटे के बारे में पूछा। परिजनों ने बताया, “वह घर पर नहीं था इसलिए वह उसके पिता को ले गए। वह 70 साल के हैं।” उन्होंने अपनी पहचान गुप्त रखने का अनुरोध किया क्योंकि उन्होने अपनी बेटियों को यह बात बताई नहीं है।

एक परिजन ने बताया, “जब वह (बेटियां) आती हैं तो हम उन्हें कहते हैं कि उनके पिता बाहर टहलने गए हैं और थोड़ी देर के बाद उन्हें चले जाने को कहते हैं। पुलिस हमें कहती है कि बेटे को लेकर आओ और पिता को लेकर जाओ।” 

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने पहले ऐसे मामलों को दर्ज किया है जिनमें पिताओं को कहा गया था कि एक बेटे को छुड़ाने के लिए उन्हें दूसरे बेटे को लाना होगा। समूह की नीति सलाहकार मृणाल शर्मा कहती हैं, “यह गिरफ्तारियां ना सिर्फ गैरकानूनी हैं बल्कि परिवारों की प्रताड़ना और डराने धमकाने का जरिया भी बनती हैं।” 

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली कहती हैं कि कैदियों को कानूनी मशविरे की पहुंच मुहैया करानी चाहिए और रिश्तेदारों को बताया जाना चाहिए कि कैदियों को कहां रखा जा रहा है। वह कहती हैं, “अंतरराष्ट्रीय कानून अनिश्चितकालीन हिरासत को प्रतिबंधित करता है और हिरासत में लिए गए सभी लोगों को या तो तुरंत रिहा किया जाए या चार्जेज लगाए जाएं।”

आमिना ने बताया कि उन्हें घर में डर लगता है और जबसे उनके बेटे को गिरफ्तार किया गया है, उनकी आंखों में नींद नहीं है। वह कहती हैं, “मैं वादा करती हूं कि यदि उसे रिहा किया गया तो मैं यह जगह छोड़ दूंगी। मैं भीख मांग लूंगी पर कहीं ऐसी जगह जाकर रहूंगी जहां हमें कोई नहीं जानता।”

उनके शौहर की पिछ्ले साल मौत हो गई और उनका दूसरा बेटा दो साल से जेल में है। वह कहती हैं, “मैं बिल्कुल अकेली हूं अब। एक तूफ़ान-सा जैसे मेरी ज़िन्दगी से आ टकराया है।” 

(27 अगस्त 2019 को ‘द गार्डियन’ में छपी अज़हर फ़ारूक़ और रेबेका रैटक्लिफ की रिपोर्ट का यह अनुवाद ‘कश्मीर ख़बर’ द्वारा किया गया है।) 

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