Saturday, November 27, 2021

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खास रिपोर्ट: योगी सरकार की ‘जमीन हड़पो नीति’ के खिलाफ किसानों ने कसी कमर

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ग्रेटर नोएडा/लखनऊ। नया कृषि कानून लागू होने से पहले ही यूपी सरकार ने किसानों की जमीन हड़पने का मॉडल तैयार कर लिया था। इस काम में योगी सरकार ने नौकरशाहों की पूरी एक जमात को लगा दिया गया था। और उसी के तहत योगी सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 को बदलने का फैसला किया है। इसके तहत अभी सरकार ने ग्रेटर नोएडा को केंद्रित किया है। बताया जा रहा है कि एक्सप्रेस वे के दोनों तरफ की एक-एक किमी जमीन अधिग्रहीत की जाएगी। साथ ही जेवर इन्टरनेशनल एयरपोर्ट के पास एक बड़ी इलेक्ट्रानिक्स सिटी विकसित करने के लिए भूमि जल्द उपलब्ध कराने का फैसला किया गया है। यह सब कुछ उद्योग को बढ़ावा देने के नाम पर किया जा रहा है। इतना ही नहीं तय हुआ है कि लैंड बैंक बढ़ाया जाएगा और इसके लिए राजस्व संहिता में संशोधन होगा।

इस सिलसिले में सरकार ने औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना को खास जिम्मेदारी दी है। और जिम्मेदारी मिलते ही वह सक्रिय हो गए। बताया जा रहा है कि उनकी मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी के साथ अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त समेत 18 विभागों के प्रमुख अधिकारियों को लेकर बैठक हो चुकी है। और इस सिलसिले में सभी विभागों से उनकी सहमति भी हासिल कर ली गयी है।

सरकार बनाएगी लैंड बैंक

इस सिलसिले में सरकार ने कई अनोखे रास्ते निकाले हैं। जिसमें बंद पड़े सरकारी उपक्रमों की जमीन हासिल करना प्रमुख है। सरकार ने तय किया है कि ये जमीनें नीलाम की जाएंगी। हालांकि उससे पहले सरकार इसकी कानूनी स्थितियों को लेकर स्पष्ट हो जाना चाहती है। इतना ही नहीं सरकार की निगाह गांवों की सार्वजनिक जमीनों पर है। लिहाजा गांवों की जमीनों को हड़पने के लिए उसने सबसे पहले उन जमीनों को लैंड बैंक का हिस्सा बनाने की रणनीति तैयार की है। जो किन्हीं न किन्ही रूपों में सरकारी हैं। इसके लिए राजस्व ग्रामों के औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में सम्मिलित होने पर इन ग्राम सभाओं की सार्वजनिक भूमि को संबंधित विकास प्राधिकरणों में समाहित करने के लिए प्रस्ताव तैयार करने का शासन को निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही औद्योगिक विकास क्षेत्र अधिनियम में एक निर्धारित समय सीमा के बाद भी इकाई स्थापित न किए जाने पर संबंधित भूखण्डों के आवंटन को निरस्त करने पर भी प्रस्ताव बनाने की बात कही गयी है। इन सारी योजनाओं के तहत सरकार की 5 हजार एकड़ का लैंड बैंक बनाने की योजना है। इसी कड़ी में उसने डिफेंस कोरिडोर के लिए 25 हजार एकड़ के एक लैंड बैंक की भी योजना बनायी है।  

किसानों की जमीनें ली जाएंगी लीज पर

किसान जिस कानून के खिलाफ मौजूदा दौर में विरोध कर रहे हैं और उनके सामने अपनी जमीन जाने का खतरा मड़रा रहा है। वह काम योगी सरकार पहले ही शुरू कर चुकी है। इसके तहत राजस्व संहिता में परिवर्तन कर औद्योगिक इकाइयों और औद्योगिक पार्कों के लिए कृषि की जमीन को लीज पर देने का प्रस्ताव तैयार करवाया जा रहा है। इस लिहाज से भूमि उपयोग के परिवर्तन के लिए लगने वाले शुल्क को भी 15 से 20 फीसदी रखने का सुझाव दिया गया है।

बड़े-बड़े औद्योगिक टाउनशिप स्थापित करने की योजना

दिलचस्प बात यह है कि यह लैंड बैंक ऐसा होगा जिसको किसी भी तरह से इस्तेमाल किया जा सके। लिहाजा इसके स्वरूप को मिश्रित रखा गया है। और इनका ढांचा बहुत बड़ा होगा जिसे इंटीग्रेटेड औद्योगिक टाउनशिप नाम दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक जमीन के अधिग्रहण और खरीद-फरोख्त के लिए औद्योगिक इकाइयों से जो प्रस्ताव मिले हैं उन्हें प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की योजना बनायी गयी है। और इसके लिए संबंधित अधिकारी को विशेष जिम्मेदारी दी गयी है। आम तौर पर सरकारी पदों के खाली होने पर कोई ध्यान न देने वाली सरकार ने औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में प्रतिनियुक्तियों के पदों को जल्द से जल्द भरने का निर्देश दिया है। दिलचस्प बात यह है कि इसमें विशेषज्ञों और प्रोफेशनलों की मदद लेने की भी बात कही गयी है।

इस काम के लिए सरकार ने अलग-अलग क्षेत्रों की परियोजनाओं को केंद्रित किया है। इसमें यूपीसीडा द्वारा विकसित किये जा रहे ट्रांस गंगा परियोजना, सरस्वती हाईटेक सिटी परियोजना, बरेली में मेगा फूड पार्क परियोजना, ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में लाजिस्टिक तथा ट्रांसपोर्ट हब परियोजनाएं व वाराणसी में मल्टी मॉडल टर्मिनल परियोजना जैसी औद्योगिक विकास विभाग की तमाम परियाजनाएं शामिल हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसौल के पास रहने वाले किसान नानक ताऊ ने बिल्कुल नई कहानी बतायी। जिसमें जमीन अधिग्रहण के बाद किसानों के मुआवजे को कैसे कम किया जाए सरकार ने उसका भी रास्ता निकाल लिया है। नानक ताऊ ने बताया कि “जेवर के पास बनने वाले एयरपोर्ट के लिए जमीन अधिग्रहण की कड़ी में गौतमबुद्ध नगर के डीएम ने एक कलम से 18 गांवों की जमीन को अथारिटी के अधीन कर दिया। इसका मतलब यह हुआ कि गांवों की इन जमीनों को सर्किल के हिसाब से जो चार गुना रेट मिलने वाला था वह कम होकर आधा हो गया।” और इसके साथ ही दूसरी बात यह हुई कि किसी भी गांव की जमीन अधिग्रहीत करने के लिए उसके 70 फीसदी बाशिंदों की सहमति जरूरी थी और ऐसा नहीं होने पर जमीन का अधिग्रहण नहीं हो सकता था। लेकिन प्रशासन की इस नई चालबाजी से गांववासियों की सहमति की शर्त का मामला भी खत्म हो गया।

नानक ताऊ का कहना है कि दरअसल सरकार अब जमीन हड़पो अभियान में लग गयी है। पहले उसने रेल बेचा, फिर एयरपोर्ट बेचा, बैंक बेचे, एलआईसी समेत तमाम मुनाफा देने वाली कंपनियों को बिक्री की कतार में खड़ी कर दिया। अब बारी किसानों के जमीनों की है। लिहाजा सरकार के संरक्षण में लुटेरे कारपोरेट का कारवां गांवों की ओर बढ़ गया है। लेकिन उनका कहना था कि गांव के लोग अपनी जमीन को बचाने के लिए अंतिम दम तक लड़ेंगे। और किसी भी तरह से उसे कॉरपोरेट के हाथ में नहीं जाने देंगे।

मेरठ में चिंदौली के रहने वाले ओमवीर सिंह सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण की कोशिशों की बात सुनकर ही आग बबूला हो जाते हैं। उन्होंने पूरे तेवर भरे अंदाज में कहा कि कारपोरेट की जमीन हथियाने के मंसूबों को किसान कभी कामयाब नहीं होने देंगे। मुट्ठी बांधकर अपने हाथों को हवा में लहराते हुए उन्होंने कहा कि ये मील का पत्थर है और अपनी जगह से डिगने नहीं जा रहा है।

ओमवीर, किसान

दरअसल किसान नये कृषि कानून को भी जमीन हड़पने की साजिश के एक हिस्से के तौर पर ही देख रहे हैं। लिहाजा योगी सरकार द्वारा पहले से ही चलायी जा रही कोशिशों के बाद केंद्र का यह कानून उसको और बल देता दिख रहा है। इसीलिए किसानों ने शायद सरकारों के इन मंसूबों को पहचान लिया है और उन्हें लग रहा है कि अगर उन्होंने किसी भी तरह की चूक की तो वो अपनी जमीनों से हाथ धो बैठेंगे। लिहाजा कहा जा सकता है कि कृषि कानूनों के मामले में अगर सरकार डाल-डाल है तो किसान पात-पात पर नजर रखने की कोशिश कर रहे हैं।

(जनचौक के संपादक महेंद्र मिश्र की रिपोर्ट।)

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