किसान आंदोलनः सिर्फ समर्थन मूल्य या लोकतंत्र की रक्षा भी?

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किसानों के आंदोलन के साथ मोदी सरकार वही कर रही है जो उसने प्रतिरोध की आवाज को दबाने के लिए पिछले साढ़े छह सालों में किया है। वह इसे देश और समाज के खिलाफ काम करने वाले तत्वों के समर्थन से चलने वाला आंदोलन या उनकी ओर से प्रायोजित बता रही है। सरकार यहां ही नहीं रूकती है। वह विपक्ष पर राजनीति करने और किसानों को भ्रमित करने का आरोप लगाती है। दोनों ही आरोप हमें एक ही नतीजे की ओर ले जाते हैं कि विरोध और राजनीति का अधिकार सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार को है। वे हैदराबाद, महाराष्ट्र, बंगाल, कश्मीर, केरल कहीं भी आंदोलन तथा राजनीति कर सकते हैं।

वे राम मंदिर से लेकर लव जिहाद तक की राजनीति कर सकते हैं, लेकिन देश की विपक्षी पार्टियों या अन्य संगठनों को विरोध और राजनीति का कोई हक नहीं है? क्या यह तानाशाही का ही एक रूप नहीं है। यह सिर्फ हमारे मुल्क के लिए एक गलत बात नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गलत उदाहरण है। हमें यह नहीं भूलना नही चाहिए कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ही नहीं है, बल्कि अपनी आज़ादी की लड़ाई के समय से ही लोकतंत्र के उच्चतर मूल्यों के पक्ष में अपने को खड़ा रखा है। इन्हीं मूल्यों को आधार बना कर बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान की रचना की।  

हमेशा की तरह कारपोरेट मीडिया सरकार के साथ खड़ा है और किसान आंदोलन को एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन में तब्दील होने से रोक रहा है। वह इसे कभी सिख आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश करता है तो कभी इसे पंजाब के धनी किसानों का आंदोलन बताता है। भाजपा और संघ परिवार ने जेएनयू, जामिया मिलिया समेत दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र आंदोलनों या नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन के समय भी लगभग यही तरीके अपनाए थे। मीडिया ने उस समय भी भाजपा के प्रचार विभाग के रूप में किया था।

किसान आंदोलन के खिलाफ तो सरकार को पूरी ताकत लगानी होगी क्योंकि यह सिर्फ विचारधारा का मामला नहीं है। अडानी और अंबानी इन कृषि कानूनों के लाने के पहले ही खेती तथा इससे जुड़े व्यापार पर नियंत्रण के लिए काफी पैसा खर्च कर चुके हैं। अडानी ने अनाज रखने के बड़े-बड़े गोडाउन बना रखे हैं। उसने खेती की पैदावार को देश के भीतर और देश से बाहर ले जाने के लिए सारा इंतजाम कर रखा है। इसी तरह रिलायंस ठेके पर जमीन लेने और कारपोरेट खेती से लेकर फूड प्रोसेसिंग की कंपनियां चला रहा है। उसने तथा अनाज, फल, सब्जी खरीदने तथा बेचने की दस से ज्यादा कंपनियां खोल रखी हैं। रिलायंस फ्रेश के स्टोर तो देश के कोने-कोने में फैले हैं।

धीरे-धीरे इन्होंने इस व्यापार पर अपना कब्जा जमा लिया है। जियो के जरिए उसे आनलाइन कारोबार पर कब्जा करना है। लेकिन इस सारे कारोबार को चलाने के लिए खेती को अपने कब्जे में करना ज़रूरी है। वे किसानों पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहते हैं। सरकारी मंडी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य के रहते यह संभव नहीं है। खेती में क्या उपजाना है और अनाज की कीमत क्या हो, इसका फैसला हाथ में आए बगैर इस कारोबार को मनमर्जी से चलाना संभव नहीं है। सरकार ने अपने तीन कानूनों के जरिए उन्हें इन इरादों को पूरा करने की छूट दे दी है और साथ ही इसकी छूट भी दे दी है कि वे जितना चाहे अनाज जमा कर सकते हैं। जमाखोरी की इस छूट के बाद वे बाजार भाव को तय कर सकेंगे। लोगों के उनके तय किए भाव पर ही ये चीजें खरीदनी होंगी।

सवाल उठता है कि क्या सरकार अडानी तथा अंबानी के हितों को पूरा करने से रोक सकती है और इन तीन कानूनों को वापस लेगी? इसका जवाब नहीं में है। इसके आंकड़े भले ही उपलब्ध नहीं हों, यह तय है कि भाजपा को जिस चुनावी मशीनरी में बदल दिया गया है, उसके पीछे कारपोरेट कंपनियों का पैसा है। सरकार उसके लिए खुले आम काम कर रही है।  

इस कारपोरेट संचालित अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा बाधक लोकतंत्र है। यह संयोग नहीं है कि किसानों के दिल्ली की सीमा पर डट जाने के बाद नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा कि देश में ज्यादा लोकतंत्र है यानि सीमित लोकतंत्र होना चाहिए। कृषि कानूनों को पास कराने के लिए जिस तरह का तरीका अपनाया गया उसी से पता चलता है कि सरकार लोकतांत्रिक परंपरा में कितना यकीन करती है। इतने महत्वपूर्ण कानून पर ठीक से चर्चा नहीं की गई और उसे ध्वनिमत से पास करा दिया गया। किसान दिल्ली आ गए तो उसने शीतकालीन सत्र को आयोजित करने का विचार ही त्याग दिया। यह देश के संवैधानिक इतिहास में पहली बार हुआ है। प्रधानमंत्री नेहरू ने दो सदस्यों वाले भारतीय जनसंघ के सांसद अटल बिहारी वाजपेयी की मांग पर 1962 के युद्ध पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुला लिया था।

राष्ट्रीय संपदा जल, जमीन और जंगल तथा जनता के पैसे से खड़ी की गई सरकारी कंपनियों-रेल से लेकर हवाई अड्डों, विमान कंपनियों को कारपोरेट के हाथों में बेचने के लिए जरूरी है कि लोकतांत्रिक अधिकारों को कम किया जाए। इसके बगैर नौकरी में ठेकेदारी प्रथा तथा मनमानी शर्तों पर कर्मचारियों से काम कराने या अपनी शर्तों पर खेती को चलाने का काम नहीं हो सकता है। मजदूर-किसानों के संगठन तो काफी पहले से सरकार से टकरा रहे हैं, लेकिन ये संघर्ष अभी तक उतने असरदार नहीं साबित हो रहे थे। लेकिन किसानों के दिल्ली मार्च से इस लड़ाई को नई ताकत मिल गई है।

क्या किसानों को इस सरकारी दबाव में आना चाहिए कि आंदोलन का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए? उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी लड़ाई सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी पाने की लड़ाई नहीं है। यह अर्थव्यवस्था को कारपोरेट शिकंजे से मुक्त करने की लड़ाई है। यह तभी हो सकता है जब लोकतंत्र बचेगा। विपक्ष भी बचाव की मुद्रा और निकम्मेपन  से बाहर निकले। उसे किसान संगठनों के समर्थन में व्यापक आंदोलन चलाना चाहिए। वामपंथी पार्टियां तो भरसक कोशिश कर रही हैं, लेकिन इतने से काम नहीं चलेगा। किसानों ने कारपोरेट से मुक्ति का जो रास्ता खोला है उसके जरिए धनतंत्र और सांप्रदायिक तंत्र से लोकतंत्र को मुक्त करने की लड़ाई खड़ी होनी चाहिए।

मध्य वर्ग तथा गरीब तबके को कारपोरेट मीडिया तथा सांप्रदायिक जहर के असर से निकाल कर किसानों के पीछे खड़ा करने की जरूरत है। जब देश के बेरोजगार और नोट बंदी से बर्बाद हुए असंगठित मजदूर किसानों के साथ खड़े हो जाएंगे तो आंदोलन का स्वरूप भी बदल जाएगा। राजनीति नहीं, विपक्ष नहीं और विचारधारा नहीं की मोदी सरकार की शर्तों को मानने का कोई कारण नहीं है। यह आंदोलन किसानों का है और उन्हें ही इसकी शर्तें तय करनी चाहिए।  प्रज्ञा ठाकुर जैसे गोडसे समर्थक को सांसद बनाने तथा घोर सांप्रदायिक योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने वाली भाजपा किस मुंह से किसानों पर आरोप लगा रही है कि किसान आंदोलन टुकड़े-टुकडे़ गैंग के कब्जे में जा रहा है? किसानों ने सरकार की ओर से की जा रही जबर्दस्ती तथा कुप्रचार का जवाब जिस धैर्य से दिया है वह लोकतंत्र में हमारी आस्था को मजबूत करने वाला है। 

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)  

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