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पांचवीं और आखिरी किश्त: हरिवंश बन गए हैं मोदी के चारण-भाट

दो दिनों तक कोरी बकवास करने के बाद हरिवंश अंततः खुल कर नरेंद्र मोदी की तारीफ करने लगे और उस समूह में बेशर्मी से शामिल हो गए जिन्होंने गांधी वध किया। दरअसल हरिवंश, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, अमिश देवगन, रजत शर्मा, रुबिका लियाकत और अंजना ओम कश्यप जैसे गोदी मीडिया वाली श्रृंखला के ही पत्रकार हैं। 

अगर उनके लेखों की पूरी श्रृंखला को आप ध्यान से पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि वे अर्थव्यवस्था के लक्षणों की बात कर रहे हैं, इमरजेंसी के दौरान सत्ता के मनमाने फैसलों और अर्थव्यवस्था में गैरवाजिब हस्तक्षेपों की बात कर रहे हैं, 1991 के आर्थिक संकट और उसके दिवालिया हो जाने के आसन्न खतरों की बात कर रहे हैं, कहानियां लिख रहे हैं, नरेंद्र मोदी का संसद में दिया गया भाषण उद्धृत करते हैं और आत्मनिर्भरता जैसे गंभीर मसले को नारे की शक्ल में इस्तेमाल कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार के पिछले छह सालों का कोई हिसाब किताब नहीं देते मानो कोयला खानों के व्यवसायीकरण और उससे होने वाले 225 मीट्रिक टन कोयला का उत्पादन देश की आत्मनिर्भरता का सोपान बनने वाला है।

भोजपुरी देश की एक ऐसी भाषा है जिसमें हर बात मुहावरों में कही जा सकती है। एक मुहावरा है, लिखब त ना, मिटकैब त दुनो हाथे। यह मुहावरा नरेंद्र मोदी की सरकार के छह साल के कार्यकलाप को बताने के लिए काफी है जिसने अर्थव्यवस्था को छः सालों में ही दिवालिया होने के कगार पर ला खड़ा किया और देश लोकतांत्रिक संस्थाओं का समूल नाश किया है। यही वजह है कि हरिवंश की कहानी इतिहास के कुछ प्रसंगों, कटाक्ष और भाषणों से आगे बढ़ती पर आपको कहीं ले कर नहीं जाती है क्योंकि ले जाने के लिए पिछले छह सालों का राजकीय कार्यकलाप और भविष्य की योजना बतानी पड़ेगी जो न नरेंद्र मोदी की सरकार के पास है न हरिवंश के पास।

जरा उनकी कहानी लिखने की भाषा शैली और सामग्री पर गौर फरमाएं।

पहले ली कुआन की कहानी सुनाते हैं जिन्होंने सिंगापुर को बदला। ली कुआन की किताब से भारत के बारे में लिखी गई कुछ टिप्पणियां उद्धृत करते हैं। पाठकों को यह जानकारी देते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने ली कुआन को बुलाया था। पर यह नहीं बताते हैं कि ली कुआन ने क्या कहा भारत के बारे में क्योंकि फिर यह बताना पड़ता कि कैसे उनकी किसी सलाह पर भारत में अमल हो सकता था। अब ये ली कुआन साहब कौन हैं? ये सिंगापुर को बदलने वाले व्यक्ति हैं।

ये 1959 से 1990 तक सिंगापुर के प्रधानमंत्री रहे। ली के शासन की आलोचना नागरिक स्वतंत्रता (मीडिया नियंत्रण और सार्वजनिक विरोध पर सीमाएं) को रोकने और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा चलाने के लिए की गई थी। उन्होंने तर्क दिया कि राजनीतिक स्थिरता के लिए ऐसे अनुशासनात्मक उपाय आवश्यक थे, जो कानून के शासन के साथ मिलकर आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक थे।

ये ली साहब भारत के बारे में क्या सोचते थे ? मैं केवल जवाहर लाल नेहरू और इमरजेंसी के बारे में उनके विचार साझा करना चाहूंगा। नेहरू के बारे में उन्होंने कहा कि नेहरू एक जनोत्तेजक नेता थे जो तानाशाह बनते बनते रह गये! पत्रकार सुनंदा के दत्ता-रे, जिन्होंने ‘लुकिंग ईस्ट टू लुक वेस्ट: ली कुआन येव्स मिशन इंडिया’ नामक पुस्तक लिखी, उन्होंने बताया कि उनके साथ साक्षात्कार के आधार पर मिस्टर ली ने उन्हें बताया कि उन्हें कैसे लगा कि 1975 में लगाया गया आपातकाल सही था। उन्होंने आगे कहा कि श्रीमती इंदिरा  गांधी ने भारत में “अनुशासन” लाने कि लिए इमरजेंसी लगाई।

ली कुआन।

पत्रकार सुनंदा के  दत्ता रे कहती हैं कि ली और इंदिरा गांधी सत्ता के लिए एक क्रूर प्रतिबद्धता, लगभग एक क्रूर व्यावहारिकता और भविष्य की रहस्यवादी भविष्यवाणियों के प्रति एक जैसा आकर्षण साझा करते थे। दोनों अपने समय में अपनी परिस्थितियों पर हावी थे। इतना ही नहीं आपातकाल के दौरान निष्ठावान मंत्र के अनुनाद का अभाव होने के बावजूद, इंदिरा भारत है, भारत इंदिरा है का नारा ठीक वैसा ही था जैसा कुआन यू सिंगापुर है और सिंगापुर कुआन यू है। ये हरिवंश, नरेंद्र मोदी को क्या भारत का नया तानाशाह मानते हैं? या भारत में आपातकाल लगने वाला है? अगर भारत में संघियों ने आपातकाल लगाने की कोशिश की तो यही कहा जायेगा कि जब एक पत्रकार बिकता है तो वह हरिवंश बनता है!

वे इमरजेंसी के दौरान स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के लब्ध प्रतिष्ठित चेयरमैन आर के तलवार को संजय गाँधी द्वारा गैरवाजिब तरीके से हटाने की कहानी सुनाते हैं जो वेबसाइट पर है फिर वे बताते हैं राजनैतिक उद्देश्यों से बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया और बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट ऋणों को माफ़ किया गया। वे कहते हैं कि उसके बाद देश में विदेशों से ऋण लेने की प्रवृति बढ़ी। वे पूछते हैं कि 1990-91 के मुद्रा संकट के समय भारत के कदम आर्थिक विकास की दिशा में किधर थे?

चंद्रशेखर के सोना गिरवी रखने के फैसले को देश को दिवालिया होने से बचने के लिए सही ठहराते हैं। फिर वे नरेंद्र मोदी का संसद में दिए गए फर्जी भाषण का उल्लेख करते हैं जिसमें मोदी ने कहा था कि 60 सालों में 18 लाख करोड़ ऋण दिए गए थे, 2008 से 2014 के बीच वही ऋण 52 लाख करोड़ हो गए! मोदी ने यूपीए पर यह भी आरोप लगाया था कि जब तक आप सत्ता में थे तब तक आपने झूठ बोला था और कहा था कि एनपीए 36% थे, लेकिन 2014 में (जिस साल भाजपा सत्ता में आई थी) हमने सच्चाई की तलाश शुरू की और दस्तावेजों को देखा। हमें एहसास हुआ कि आपने गलत आंकड़े दिए हैं। एनपीए 82% पर था।

पर सच्चाई क्या थी? एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक ने कहा है कि वर्ष 2013-14 में सकल एनपीए (कुल ऋण राशियों का प्रतिशत) 3.8% मोदी के 82% दावे से बहुत दूर है। इसके अलावा, मोदी ने जो 52 लाख करोड़ रुपये का उल्लेख किया है, वह आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा कुल अग्रिमों को संदर्भित करता है, न कि एनपीए को।

आरबीआई के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार के तहत सकल एनपीए वास्तव में बढ़े हैं, गिरे नहीं हैं। एनडीटीवी के अनुसार, “2015-16 में, वर्तमान मोदी सरकार का दूसरा वर्ष और अंतिम वर्ष जिसके लिए डेटा उपलब्ध है, सकल एनपीए लगभग दोगुना होकर 7.5% हो गया है।” एनडीटीवी के अनुसार मोदी ने भाजपा के ऑफिसियल हैंडल में किये गए एक गलत ट्वीट के आधार पर संसद में बयान दे दिया था पर हरिवंश का ढीठपन देखिये कि जिस आंकड़ें से सरकार पल्ला झाड़ चुकी है उसी आंकड़ें को वे अपने आलेख में इस्तेमाल कर रहे हैं लोगों को गुमराह करने के लिए।

जबकि मोदी आम तौर पर सही हैं कि केंद्र के सामने आने वाले वर्तमान एनपीए संकट में से एक यह है कि यह अपने पूर्ववर्ती से विरासत में मिला है पर यह दावा करना भ्रामक है कि 2014 के बाद एक भी ऋण एनपीए में नहीं बदला है या कि एक ऋण ऐसा नहीं है 2014 के बाद जो खराब ऋण में नहीं बदलेगा। यह बहुत जल्द पता चल जाएगा कि पिछले चार वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र का कोई बैंक ऋण एनपीए हो जाएगा या नहीं। पर यह निर्विवादित तथ्य है कि एनपीए नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में बढ़े और नरेंद्र मोदी ने बहुत से डिफाल्टरों के मसले एनसीएलटी में नहीं जाने दिये जबकि एनसीएलटी और एनसीएलएटी के सारे सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री कार्यालय के द्वारा की गयी है।

दूसरी ओर, 2014 से पहले दिए गए ऋण हैं जो पिछले चार वर्षों में खराब हो गए हैं। उदाहरण के लिए, अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशंस 2017 में ऋण भुगतान में डिफ़ॉल्ट किया और डॉलर बॉन्ड पर भी डिफ़ॉल्ट किया। टेलिकॉम इंडस्ट्री में तनाव पिछले कुछ सालों में बढ़ा है। जैसा कि हाल ही में जारी आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, “बुनियादी ढांचे के क्षेत्र के कुल एनपीए में दूरसंचार क्षेत्र के एनपीए की हिस्सेदारी 2016-17 में बढ़कर 8.7 प्रतिशत हो गई, जो 2015-16 में 5 प्रतिशत थी।”

मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो के प्रवेश और इसकी मुफ्त डेटा रणनीति के कारण दूरसंचार उद्योग में ऋण की स्थिति खराब हो गई है। जैसा कि द वायर ने इंगित किया है, मोदी सरकार के अटॉर्नी जनरल द्वारा विनियामक निर्णयों द्वारा इसकी मुफ्त डेटा योजनाएं संभव बनाई गई थीं।

हरिवंश फिर सवाल उठाते हैं कि भारत में आयुध निर्माण की 41 फैक्ट्री हैं , 9 ट्रेनिंग सेंटर हैं और 80,000 कर्मचारी हैं फिर भी भारत आयुध निर्माण में आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो सका? यह तो परले दर्जे की बेशर्मी है! राफेल की कहानी तो जग जाहिर है फिर भी हरिवंश की धृष्टता देखिये कि सरेआम झूठ बोल रहे हैं। राफेल की कहानी संक्षेप में यह है,

31 जनवरी 2012 को, भारतीय रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि डसॉल्ट राफेल को भारतीय वायु सेना को 126 विमानों की आपूर्ति करने के लिए चुना गया। पहले 18 विमानों की आपूर्ति पूरी तरह से निर्मित डसॉल्ट एविएशन द्वारा की जानी थी और शेष108 विमानों को डसॉल्ट से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के साथ हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा लाइसेंस के तहत निर्मित किया जाना था। राफेल को जीवन-चक्र लागत के आधार पर सबसे कम बोली लगाने वाले के रूप में चुना गया, जो अधिग्रहण की लागत, 40 वर्षों की अवधि में परिचालन लागत और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की लागत का एक संयोजन है।

एचएएल द्वारा निर्मित विमानों के लिए वारंटी पर असहमति के कारण डसॉल्ट के साथ बातचीत को खींचा गया। भारत चाहता था कि डसॉल्ट, एचएएल द्वारा उत्पादित विमान की गुणवत्ता सुनिश्चित करे, लेकिन डसॉल्ट ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। 2-3 जनवरी, 2014 में, यह बताया गया कि सौदे की लागत $30 बिलियन (1,86,000 करोड़) तक बढ़ गई थी, प्रत्येक विमान की लागत $ 120 मिलियन (746 करोड़) थी। ।4  फरवरी, 2014 को, रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने कहा कि जीवन-चक्र लागत की गणना की प्रक्रिया की फिर से जांच की जा रही है और बजटीय बाधाओं के कारण वित्तीय वर्ष 2013-14 में अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं किए जा सके।

अप्रैल 2015 में फ्रांस की आधिकारिक यात्रा के दौरान, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि भारत “महत्वपूर्ण परिचालन आवश्यकता” का हवाला देते हुए 36 पूर्ण रूप से निर्मित राफेल का अधिग्रहण करेगा। 13 जुलाई 2015 में, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने राज्य सभा को सूचित किया कि 126 विमानों के लिए निविदा वापस ले ली गई थी और 36 विमानों के लिए बातचीत शुरू हो गई थी। 14 जनवरी, 2016 को, भारत और फ्रांस ने अधिग्रहण की वित्तीय शर्तों को अंतिम रूप दिए बिना 36 विमानों के अधिग्रहण के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए।

3 अक्टूबर, 2016 को, रिलायंस ग्रुप और डसॉल्ट एविएशन ने एक संयुक्त बयान जारी कर डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (DRAL) के 51:49 संयुक्त उद्यम के निर्माण की घोषणा की, जो एयरो संरचनाओं, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजन घटकों के साथ-साथ अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करता है। “स्वदेशी रूप से डिजाइन विकसित और निर्मित” (IDDM) पहल के तहत परियोजनाएं। डसॉल्ट ने अपने ऑफसेट दायित्वों के हिस्से के रूप में संयुक्त उद्यम में $100 मिलियन से अधिक का निवेश करने का इरादा किया है।

संयुक्त उद्यम जनवरी 2018 से शुरू होने वाली नागपुर में DRAL सुविधा में जेट्स, कॉकपिट और दरवाजों जैसे लिगेसी फाल्कन 2000 श्रृंखला के लिए घटकों का निर्माण करना था। विमान के भाग उत्पादन में शून्य अनुभव होने के बावजूद, जब रिलायंस समूह को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बजाय एक भागीदार के रूप में चुना गया था, तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अंबानी परिवार की निकटता के आधार पर संदेह पैदा हो गया था।

सितम्बर, 2016 में फ्रांस और भारत के बीच आईजीए पर हस्ताक्षर करने के अगले दिन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने समझौते के विवरण को सार्वजनिक करने के लिए कहा और सवाल किया कि क्या प्रति विमान लागत 715 करोड़ से बढ़कर 1,600 करोड़ थी?

2018 में कांग्रेस नेताओं गुलाम नबी आजाद और पूर्व रक्षा राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने डसॉल्ट की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि मिस्र और कतर ने भारत के लिए ₹1670 करोड़ की तुलना में प्रति विमान ₹1319 करोड़ का भुगतान किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि 126 सुरक्षा के बजाय 36 विमान प्राप्त करना राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

तो क्या नरेन्द्र मोदी एचएएल का काम अनिल अंबानी को सौंपकर भारत को आत्मनिर्भर बना रहे थे? हरिवंश यहीं नहीं रुकते हैं बल्कि बेशर्मी की हद तक पहुंच जाते हैं जब वे नरेंद्र मोदी के हवाले से कहते हैं कि भारत को आत्मनिर्भर बना कर शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे! यानी मोदी सरकार चीन के समक्ष पूरी बेशर्मी से आत्मसमर्पण कर चुकी है जबकि मीडिया रपट की मुताबिक सैनिकों की शहादत के साथ गलवान घाटी में चीन का स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर बन कर खड़ा हो चुका है।

हरिवंश मोदी सरकार के दर्जनों कारनामों पर कुछ नहीं लिखते हैं। आत्मनिर्भर बनाने वाली सरकार ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी कर अर्थव्यवस्था में 3 लाख करोड़ रुपये की चपत लगा दी। 100 से ज्यादा लोग बैंक की लाइनों में खड़े खड़े मारे गए। हरिवंश यह नहीं बताते हैं कि इसकी भरपाई कौन करेगा? 6 सालों में 12 करोड़ युवाओं को रोजगार का वादा था इतने सालों में इतने ही लोग बेरोजगार हो गए।

हरिवंश इस पर कुछ नहीं लिखते हैं। महामारी अधिनियम, 1897 की धारा 2ए के अनुसार मोदी सरकार को विदेशों से आने वाले हवाई जहाजों को जनवरी महीने में ही रोक देना था पर जो संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी थी वह नहीं निभाई उलटे 104 हवाई जहाजों में अमेरिका से भर कर नमस्ते ट्रम्प के नाम पर कोरोना महामारी ले आये जिसमें अब तक सरकारी आंकड़े के अनुसार 30 हजार और गैरसरकारी आंकड़े के अनुसार 60 हजार लोग काल के ग्रास हो चुके हैं। हरिवंश की कलम काम नहीं करती मोदी सरकार के इन सारे अपराधों पर।

दिल्ली की दंगे में मोदी सरकार की संलिप्तता के सीधे आरोप लगे पर हरिवंश के लिए ये मुद्दा नहीं है! दो करोड़ मजदूर 21 दिन बंदी में रहने के बाद देश के विभिन्न शहरों से सड़क पर निकल पैदल चल पड़े दूसरे राज्यों में सैकड़ों मील दूर अपने घर की ओर। दर्जनों मजदूर सड़क दुर्घटना में मारे गए, दो दर्जन मजदूरों की ट्रेन से कट कर मौत हो गयी, दर्जनों सड़क पर भूख और पानी की बगैर मर गए। कुछ गर्मी की वजह से मरे। 300 से अधिक मजदूर श्रमिक ट्रेनों से लौटते हुए मारे गए इन्हीं सारे कारणों से। पूरी केंद्र सरकार गायब हो गयी उन दिनों। हरिवंश ने ये सब देखा ही नहीं या ये सब उनकी याददाश्त में शायद अब बचा नहीं। हज़ारों लोगों को पुलिस ने बंदी के दौरान बेरहमी से पीटा। न्याय व्यवस्था भी इस दौरान सोती रही और हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। हरिवंश ने ये सब मानो देखा ही नहीं। वे भी बाकी मंत्रियों और सांसदों की तरह शायद महाभारत और रामायण देखते रहे।

केन्द्र सरकार ने रिजर्व बैंक के 176000 लाख के रिजर्व फंड पर सरेआम डाका डाला। अब यह बात सार्वजनिक हो गयी है कि केन्द्र सरकार के पास राज्यों के हिस्से का जीएसटी का पैसा देने के लिए पैसे नहीं है। केन्द्र सरकार ने छः सालों तक लगातार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाकर आम जनता को लूटती रही है। पीएम केयर फण्ड में करोड़ों रुपये जमा हुए पर सरकार ने उसकी कोई जानकारी देने से इंकार किया। मतलब केन्द्र सरकार की फिजूलखर्ची की वजह से देश दिवालिया होने के कगार पर खड़ा है। कोविड की दौरान सैकड़ों युवाओं को गिरफ्तार किया गया जो CAA, NRC और NPR की मुखालाफत कर रहे थे। डॉक्टर कफील, सुधा भारद्वाज, वरवर राव, गौतम नवलखा आदि जेल में रहे। न्याय व्यवस्था ने उन्हें जमानत नहीं दी। इन सारी घटनाओं ने हरिवंश की चेतना पर कोई प्रभाव नहीं डाला।

पर उनकी अंतिम बात तो हैरान करने वाली है। वे कहते हैं कि भारत ने 1948,1977 और 1991 में मौके खोये। अगर भारत ने ग्लोबलाइजेशन की जगह गांधी जी के विकास के मॉडल को अपनाया होता तो भारत एक मिसाल बन गया होता। तो क्या नरेंद्र मोदी कोयले के भंडार को निजी हाथों में सौंप कर गाँधी का विकास मॉडल लागू कर रहे हैं? क्या हरिवंश ने गांधी के 500 रुपये वाली घर की कहानी पढ़ी है?

(अखिलेश श्रीवास्तव कलकत्ता हाईकोर्ट में एडवोकेट हैं।)

This post was last modified on July 30, 2020 9:57 pm

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