Tuesday, October 26, 2021

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“जान दे देंगे लेकिन जगह नहीं छोड़ेंगे”

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नई दिल्ली/बस्तर। बस्तर इलाके के दंतेवाड़ा जिले में स्थित इंद्रावती नदी के किनारे बसे इस एरपोंड गांव का अब तक कोई नामोनिशान नहीं रहता अगर सरकार द्वारा 1986 में प्रस्तावित बोधघाट परियोजना सफल हो गयी होती। 80 घरों वाले इस गांव की आबादी तकरीबन 3000 है। एरपोंड के ही रहने वाले 65 वर्षीय जगदेव राणा के पास 22 एकड़ जमीन है। वह पत्नी और दो बच्चों के साथ उसी के सहारे अपना जीवन बसर कर रहे हैं। इसके अलावा उनके पास 10-12 महुआ का पेड़ है। कल-कल करती नदी की सुरम्य आवाजों के बीच चल रही गांव वासियों की इस जिदंगी का क्या कोई दूसरा विकल्प है? परियोजना के बारे में पूछने पर जगदेव राणा कहते हैं कि “जान दे देंगे लेकिन जगह नहीं छोड़ेंगे। सरकार हम लोगों के साथ बहुत अन्याय कर रही है।”

70 वर्षीय राम मिलन की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। उनके पास भी 21 एकड़ जमीन है। वह भी अपने तीन बेटों के साथ खुशी से जीवन गुजार रहे थे। लेकिन बांध की इस मार और उसके चलते उजड़ने के खतरे ने मानो उनकी जिंदगी का चैन छीन लिया है। बाप-दादाओं की जमीन के हाथ से निकलने और एक अनिश्चित भविष्य के खोह में समा जाने की कल्पना भर से वह सिहर उठते हैं। उन्होंने कहा कि “परियोजना के फिर से शुरू होने की खबर ने अंदर से बेचैन कर दिया है। और इसके खिलाफ मैं अपने अंतिम दम तक लड़ूंगा।” इस तरह से परियोजना पूरी होने पर गांव के लोगों की न केवल 2000 एकड़ जमीन बांध के पानी में विलीन हो जाएगी बल्कि उन पर उगे कीमती साल और देवदार के वृक्ष भी विकास की खोह में समा जाएंगे। और हमेशा-हमेशा के लिए उनका वजूद खत्म हो जाएगा। इसके अलावा कुंआ सोलर, पैनल से लेकर तमाम धरोहर संपत्तियां बांध की भेंट चढ़ जाएंगी। और 15 हजार एकड़ में फैले जंगल के खत्म होने से जीव जंतु से लेकर पर्यावरण का जो नुकसान होगा उसका कोई आकलन कर पाना भी किसी के लिए मुश्किल है।

राम मिलन

जगदेव राणा और राम मिलन अकेले नहीं हैं जो इस परियोजना से प्रभावित होने जा रहे हैं। तकरीबन 15000 एकड़ में फैली इस परियोजना की चपेट में चार जिले बस्तर, जगदलपुर, बीजापुर और नारायणपुर आ रहे हैं। जिसमें बताया जा रहा है कि तकरीबन 15 ग्राम पंचायतें हैं और उसमें 56 गांव आते हैं। इसके पहले जब 1986 में यह परियोजना शुरू हुई थी उस समय इन गांवों की संख्या 42 थी जो बढ़कर अब 56 हो गयी है। यह परियोजना पहले 80 के दशक में शुरू हुई थी तब केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस की सरकार थी और तब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का ही हिस्सा था। उस वक्त इस परियोजना को पनविद्युत उत्पादन के लिए लगाया जाना था जिसका मुख्य उद्देश्य बिजली उत्पादन था।

80 के दशक में इस परियोजना से 300 मेगावाट बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य रखा गया था। अब छत्तीसगढ़ की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को फिर से बनाने का निर्णय लिया है जिसका जिम्मा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट कंपनी व्योपेकेस को सौंपा है और इस परियोजना को पनविद्युत के साथ सिचाई करने के लिए वर्तमान केन्द्र सरकार के पास प्रस्ताव भेजा गया है जिसकी अनुमानित लागत 22 हज़ार करोड़ रुपए बतायी जा रही है। इस काम को व्योपकेस कम्पनी ने अपने हाथ में लिया है।

परियोजना का ग्रामीण अपनी पूरी ताकत से विरोध कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि पूरा इलाका पेसा कानून के तहत आता है। और इस कानून में प्रावधान है कि गांवों में किसी भी तरह की बुनियादी तब्दीली के लिए सबसे पहले उसकी ग्राम पंचायत से इजाजत लेनी होगी। लेकिन सरकार ने इस परियोजना को फिर से शुरू करने के लिए न तो किसी पंचायत की बैठक बुलवाई और न ही ऐसा कोई प्रयास किया। अलबत्ता ये जरूर हुआ कि डूब से प्रभावित होने वाली पंचायतों ने खुद ही बैठक कर परियोजना के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया। और उसके बाद पंचायतों का एक प्रतिनिधिमंडल सूबे के मुख्यमंत्री भूपेश सिंह बघेल से जब मिला तो उन्होंने यह कहकर इससे इलाके के लोगों का भी विकास होगा। अपना पल्ला झाड़ लिया। उसके बाद इस प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की और उन्हें बांध परियोजना के लागू होने से इलाके के लोगों पर होने वाले वज्रपात के बारे में बताया। हालांकि राज्यपाल के पास कोई कार्यकारी अधिकार तो होता नहीं बावजूद इसके उन्होंने मसले पर सरकार से बातचीत करने और उसे केंद्र से अवगत कराने का भरोसा जरूर दिया।

ऐसा नहीं है कि इलाके के प्रभावित नागरिक केवल घरों में बैठे हैं या फिर राज्यपाल से मिलकर ही संतुष्ट हो गए हैं। वो लगातार सड़कों पर आंदोलित हैं और तरह-तरह से इर परियोजना के खिलाफ लामबंदी में लगे हुए हैं। इसी तरह से परियोजना के विरोध में आयोजित एक सभा में आदिवासियों का कहना था कि हम आदिवासी पूर्ण रूप से जल, जंगल, ज़मीन पर आश्रित हैं और जंगलों पर निर्भर रहते हैं। हम अपने पेन पुरखा और गाँव के देव गुढ़ी को छोड़ना नहीं चाहते और ना ही दूसरी जगह जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हम पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आते हैं और पांचवी अनुसूची क्षेत्र होने के कारण यहां छत्तीसगढ़ में आदिवासी इलाकों में पेसा कानून, वन अधिकार अधिनियम, ग्राम सभा जैसे संवैधानिक प्रावधानों के होते हुए भी सरकार हम से बिना पूछे बोधघाट परियोजना के नाम से हमें जल,जंगल और ज़मीन से बेदखल करना चाहती है।

अभी इसी साल की शुरुआत में बोधघाट परियोजना के खिलाफ 7 फरवरी से लेकर 9 फ़रवरी तक तीन दिवसीय परिचर्चा रखा गया था जिसमें बस्तर संभाग के 5 जिलों के ग्रामीण हजारों की संख्या में एकत्रित हुए थे। कई आदिवासी नेता और जनप्रतिनिधियों ने भी उसमें हिस्सा लिया था। इस परिचर्चा में सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी, पूर्व विधायक मनीष कुंजाम, लछुराम कश्यप, राजाराम तोडेंम, भोजराम नाग जैसे बड़े आदिवासी नेता और जनप्रतिनिधि शामिल हुए। इन सभी ने सरकार को खुली चेतावनी दी कि अगर सरकार अपने फैसले को रद्द नहीं करती है तो उसके लिए इलाके के लोग बड़ी मुसीबत साबित होंगे।

साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे आदिवासियों को अपनी तीर-कमान के साथ परंपरागत वेशभूषा धारण करने के लिए बाध्य होना पड़े। इस मौके पर भाषण करते हुए एक नागरिक ने बताया कि मुख्यमंत्री से मिलने जब प्रतिनिधमंडल गया था तो उन्होंने कहा कि वो इलाके के लोगों को जमीन के बदले जमीन देंगे। साथ ही उनका कहना था कि लोगों को समझना चाहिए इस परियोजना से विकास होगा। मुख्यमंत्री के इस बयान पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए वक्ता ने कहा कि “आखिर 45 से 50 हजार लोगों को उनके घर और जमीन से उखाड़ कर मुख्यमंत्री जी कैसा विकास करना चाहते हैं? ये आम लोगों का विकास नहीं करना चाहते हैं। ये अंबानी और अडानी का विकास चाहते हैं। और यह सब कुछ उसी के लिए किया जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि बोधघाट परियोजना के आगे बढ़ने से बस्तर का वजूद और उसकी पहचान तो खत्म हो ही जाएगी लोगों को भी नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उनका कहना था कि बोधघाट परियोजना के खिलाफ ठीक उसी तरह से लड़ा जाएगा जिस तरह से दिल्ली बॉर्डर पर बैठे किसान तीन कानूनों के खिलाफ लड़ रहे हैं। इस लड़ाई से पीछे हटने या फिर उसे वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि यह लोगों के जीवन-मरण से जुड़ा हुआ सवाल है। लिहाजा खत्म हो जाएंगे लेकिन पीछे नहीं हटेंगे। और उन्होंने ऐलानिया तौर पर कहा कि बस्तर की धरती पर वह लड़ाई लड़ी जाएगी जिसको कभी बस्तर तो क्या दुनिया ने भी नहीं देखा होगा।  

(महेंद्र मिश्र की रिपोर्ट।)

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