Mon. Nov 18th, 2019

गहरे हैं व्यवस्था और न्याय के पहियों के तकरार के संकेत

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दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करते पुलिसकर्मी।

पिछले 70 सालों में जो न हुआ वह कल हो गया। यह पूरा दृश्य ही अभूतपूर्व था। जब खाकीवर्दीधारी ड्यूटी छोड़कर दिल्ली स्थित पुलिस हेडक्वार्टर के सामने प्रदर्शन कर रहे थे। यह एक किस्म का विद्रोह था। पुलिस विद्रोह। ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ है। इसके पहले 1972 में यूपी में पीएएसी ने किया था। जब वहां हेमवती नंदन बहुगुणा मुख्यमंत्री हुआ करते थे। हालांकि बाद में उन्हें उसके चलते इस्तीफा देना पड़ा था। या फिर 1984 में आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान सेना की एक टुकड़ी ने किया था। लेकिन वह भी कभी आधिकारिक रूप से दर्ज नहीं हो सका। ये दोनों घटनाएं क्षेत्रीय या फिर कहिए एक खास परिस्थिति में हुई थीं। लेकिन कल की घटना इसलिए बिल्कुल अलग हो जाती है क्योंकि यह न केवल राजधानी में हुई है बल्कि एक बिल्कुल शांति काल में केंद्रीय सत्ता प्रतिष्ठान के बिल्कुल नाक के नीचे घटित हुई है। और इन सबसे ज्यादा इसमें केंद्रीय पुलिस बल के लोग शामिल थे जो सीधे केंद्र के अधीन आते हैं।

देश में जारी संकट की यह सर्वोच्च अभिव्यक्ति है जब कानून और व्यवस्था को बनाए रखने वाली ताकतें ही बिल्कुल आमने-सामने खड़ी हो गयी हैं। कहा जाता है कि देश या लोकतंत्र के लिए कानून और व्यवस्था रेल के दो पहिए हैं। लेकिन दिल्ली में यही दोनों आपस में टकरा गए हैं। ऐसे में लोकतंत्र का इंजन कैसे आगे बढ़ेगा यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

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यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ है। पिछले छह सालों से जिस तरह की राजनीति और विचारधारा समाज में आगे बढ़ रही है यह उसकी केंद्रीय अभिव्यक्ति है। भीड़ के जिस शासन की व्यवस्था शुरू हुई थी। जिसके कभी पटियाला हाउस कोर्ट में जेएनयू के कन्हैया कुमार शिकार हुए। या फिर जिसके चलते कभी बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार को अपनी जान गवानी पड़ी। और इससे आगे बढ़कर हर पखवाड़े देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली मॉब लिंचिंग की घटनाएं उसकी जिंदा नजीर हैं। देखने में किसी को लग सकता है कि इससे भला क्या फर्क पड़ता है। लेकिन सच यह है कि इस तरह की किसी एक घटना के होने का मतलब है कानून और व्यवस्था की नींव से एक ईंट का हट जाना। और लगातार व्यवस्था की नींव से एक-एक कर हटती इन ईंटों का ही नतीजा है कि आज संविधान और उसके पूरे ढांचे पर खड़ा लोकतंत्र का पूरा महल ही संकटग्रस्त हो गया है।

दूसरों को न्याय दिलाने का काम करने वाले किसी वकील को अगर व्यवस्था पर भरोसा नहीं है और वह कानून को अपने हाथ में लेने के लिए मजबूर हो जा रहा है। अगर व्यवस्था देने का काम करने वाले खाकीवर्दीधारी का अपनी व्यवस्था से ही भरोसा उठ जा रहा है। तो भला शहर से लेकर गांव और समाज से लेकर संस्थाओं तक में रहने वाले लोगों को इसका भरोसा कैसे दिलाया जा सकता है। यह पूरा परिदृश्य बताता है कि समाज में एक किस्म का अविश्वास घर करता जा रहा है। जिसमें किसी भी शख्स को किसी भी मामले में न्याय पाने की उम्मीद नहीं है। लिहाजा लोग तुरंत ‘आन दि स्पॉट’ फैसला कर देना चाहते हैं। मॉब लिंचिंग देश में उसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। पिछले छह सालों के भीतर भीड़ के जिस शासन को वैधता मिली थी उसने अब गांवों और चट्टी-चौराहों से निकलकर सभ्य और शहरी समाज तथा देश की शीर्ष आधुनिक संस्थाओं तक में पांव पसार लिया है।

यह लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं के लिए मौत की घंटी है। ऐसा नहीं है कि यह सब कुछ अपने-आप हो रहा है। दरअसल बीजेपी और संघ इस देश के भीतर न तो लोकतंत्र चाहते हैं और न ही उसकी कोई संस्था। संविधान पहले से ही उनके निशाने पर है। गांव और दूर-दराज के हिस्सों में होने वाली मॉब लिंचिंग की घटनाएं अपने आप नहीं हो रही हैं। उनके पीछे कोई प्रेरक शक्ति होती है या फिर उसकी अगुआई करने वाले लोग होते हैं। अनायास नहीं ज्यादातर मामलों में दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोग शामिल पाए गए। और केंद्रीय मंत्री तक उन आरोपियों को जगह-जगह माला पहनाते दिखे।

दरअसल मोदी सरकार खुद ही चाहती है कि देश में अराजकता की स्थिति बने। ऐसी स्थितियां किसी शासक के लिए अपनी तानाशाही को स्थापित करने और लोगों का उत्पीड़न करने के लिहाज से बेहद अनुकूल होती हैं। बहुसंख्यकों की सत्ता के स्थापित होने की पहली शर्त ही यही है कि संविधान, लोकतंत्र और संस्थाओं को कब्र का रास्ता दिखा दिया जाए। और उसके बाद लोकतंत्र के नाम पर जिन बहुसंख्यकों का शासन होगा उसमें उत्पीड़न के शिकार न केवल अल्पसंख्यक होंगे बल्कि दलित, गरीब और हर वह वंचित तबका होगा जिसके पास ताकत नहीं होगी। सत्ता और समाज में उसी का वर्चस्व होगा जिसके पास ताकत, पैसा और हर तरह का साधन होगा। और फिर आखिर में वह एक ऐसी व्यवस्था साबित होगी जिसमें न्याय हासिल करने का किसी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं मौजूद होगा। क्योंकि तब तक सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं जमींदोज हो चुकी होंगी। यह स्थिति बीजेपी-संघ के अपने आदर्श राज्य के लिए सबसे मुफीद होगी जिसमें वे वर्णव्यस्था के अपने पुराने तंत्र को फिर से वापस ला सकेंगे।

इस पूरे प्रकरण में गृह मंत्रालय का रवैया भी सवालों के घेरे में है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि चूंकि बाबरी मस्जिद मामले में फैसला आना है इसलिए सरकार उससे ध्यान भटकाने के लिए खुद ही चाहती है कि कुछ ऐसे बड़े मसले खड़े हो जाएं। इस मसले पर गृहमंत्रालय की चुप्पी को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। वरना तीस हजारी की घटना के बाद तुरंत हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों को शांत कराया जा सकता था। लेकिन उसकी कोई कोशिश ही नहीं की गयी। यहां तक कि अभी गृहमंत्रालय का कोई बयान तक नहीं आया है। और सरकार का क्या रुख है पूरे मामले को लेकर वह भी साफ नहीं हो पाया है।

जेएनयू में अचानक 300 गुना फीस वृद्धि को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। जिससे छात्र बवाल काटें और फिर पूरे देश में उसकी चर्चा हो। अनायास नहीं ये दोनों मामले दिल्ली से जुड़े हुए हैं। क्योंकि सरकार को भी पता है कि दिल्ली के किसी भी मुद्दे को पूरे देश का मुद्दा बनाना आसान है। बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मामले को लेकर कोई बड़ा बवाल न हो इसके लिए कल ही केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के नेतृत्व में दोनों पक्षों के लोगों की बैठक हुई है जिसमें आरएसएस के लोग भी शामिल हुए हैं। यह पहली बार है जब संघ मंदिर मुद्दे पर लोगों से शांत रहने की अपील कर रहा है। या तो उसे अपने पक्ष में फैसला आने का भरोसा हो गया है या फिर केंद्र में अपनी सरकार होने की स्थिति में किसी हिंसा में जाने पर हानि की आशंका है। जो भी हो उसने इस मुद्दे पर बेहद नरम रुख अपना रखा है।

बहरहाल इस घटना के बाद एक बात साफ हो गयी कि खाकीवर्दीधारियों के लिए भी मानवाधिकार मायने रखता है और वह भी कैंडल मार्च की जरूरत को समझते हैं। अभी तक मानवाधिकार का मजाक सबसे ज्यादा खाकीवर्दीधारी लोग ही उड़ाते रहे हैं। फेक एनकाउंटर से लेकर सड़क पर सरेआम लोगों की पिटाई उनकी दिनचर्या के अभिन्न हिस्से रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी का यह कहना कि पुलिसकर्मियों को पिटते देखकर उसके बेटे के चहरे पर उभरी पीड़ा ने उसे परेशान कर दिया। इस पुलिसकर्मी को अपने बच्चे की पीड़ा का अहसास है।

लेकिन उन बच्चों और महिलाओं की पीड़ा का उसे एहसास क्यों नहीं हो पाता जिनके पिताओं और पतियों का वह सत्ता के इशारे पर फर्जी एनकाउंटर करते हैं। कल पुलिसकर्मियों को यह भी अहसास हुआ होगा कि कैंडल मार्च का क्या मतलब होता है। और यह कोई फैशन में किया जाने वाला आयोजन नहीं होता है। यह हर उस कमजोर, पीड़ित और जरूरतमंद का सहारा होता है जिसके पास न्याय के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है। और देश के सबसे तातकतवर समझे जाने तबके को जब अपनी उस कमजोरी का अहसास हुआ तब आखिर में उसे भी उसी का सहारा लेना पड़ा।

(लेखक महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

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