Monday, October 25, 2021

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बिहार में निर्णायक लड़ाई अभी बाकी है!

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किसी भी चुनाव के नतीजे को किसी एक फार्मूले से न तो समझा जा सकता है और न ही देखा जा सकता है। इसमें न तो अंकगणित काम करती है और न ही बीजगणित। चुनाव और उसके समीकरणों का अपना गणित होता है। और वह हर क्षेत्र, सूबे और देश के लिए अलग-अलग होता है। बिहार में आया चुनाव का नतीजा कुछ ऐसा है जो न तो किसी को हंसने दे रहा है और न ही रोने। अगर किसी ने एक जगह कुछ हासिल किया है तो दूसरी जगह उसने गंवाया भी है। लेकिन कुछ चीजें बिल्कुल साफ हैं। मसलन तेजस्वी एक बड़े चेहरे के तौर पर उभरे हैं और नीतीश का पराभव हुआ है।

बीजेपी अगर आगे बढ़ी है तो उसके खिलाफ सड़क पर लोहा लेने वाली वाम पार्टियों की बढ़त भी बेहद उल्लेखनीय है। ओवैसी बिहार की राजनीति में नया विमर्श बनकर उभरे हैं। उनकी मौजूदगी अल्पसंख्यकों के अस्तित्व और भविष्य की बीजेपी की राजनीति से जुड़ी हुई है। बीजेपी के हाथ का खिलौना बनने के बाद चिराग पासवान की राजनीति उसके ही रहमोकरम पर निर्भर हो गयी है। इस चुनाव के वे सबसे बड़े लूजर साबित हुए हैं। और यह तब हुआ जब उन्हें अपने पिता के मौत की सहानुभूति मिलने की सबसे ज्यादा उम्मीद थी।

निश्चित तौर पर यह पहला चुनाव था जो मंडल और कमंडल की छाया से मुक्त था। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उनकी सामाजिक शक्तियां खत्म हो गयी थीं या फिर उन्होंने कोई भूमिका नहीं निभायी। रोजगार का मुद्दा बनना और बीजेपी को उस मुद्दे पर बोलने के लिए मजबूर होना बताता है कि एजेंडा बनाने के मामले में तेजस्वी आगे रहे। लेकिन उस एजेंडे के साथ ही चुनाव संबंधी तमाम जो मशीनरी और व्यवस्था है उसको दुरुस्त करने के पैमाने पर एक कच्चापन दिखा। मसलन जब भी कोई पार्टी या फिर नेता इस तरह के किसी युद्ध में जाता है तो सबसे पहले उसकी कोशिश होती है कि वह कैसे अधिक से अधिक ताकत हासिल करे। दुश्मनों की संख्या कम करना और दोस्तों की तादाद में इजाफा उसकी पहली शर्त बन जाती है।

यहां ताकत की मजबूती का मतलब है मजबूत सामाजिक आधारों वाले दलों को लेकर गठबंधन का निर्माण। जिसमें आधार के साथ ही घटक दलों की नेटवर्किंग का आकलन और उसके मुताबिक उनके बीच सीटों का बंटवारा। इस मोर्चे पर तेजस्वी उतनी परिपक्वता से काम नहीं लिए। इस बात में कोई शक नहीं कि आरजेडी के सामाजिक आधार के तौर पर यादव उसकी धुरी होते हैं और अल्पसंख्यकों के साथ मिलकर यह संचालित होता है। लेकिन उन्हें जरूर अपने इस आधार को विस्तारित करते हुए समाज के दूसरे हिस्सों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए थे और इस कड़ी में वह ओवैसी हों या कि उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी रालोसपा तथा माझी और वीआईपी तक को अपने साथ लाने का प्रयास करना चाहिए था।

लेकिन इन दलों की ओर से महागठबंधन के प्रति सकारात्मक रवैये के बावजूद तेजस्वी की बेरुखी ने उन्हें इतर जाने के लिए मजबूर कर दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि इन सामाजिक आधारों के महागठबंधन के साथ जुड़ने की कड़ी टूट गयी। इतना ही नहीं आरजेडी ने अल्पसंख्यकों को टेकेन फॉर ग्रांटेड ले लिया था। जिसका नतीजा ओवैसी के इमरजेंस के तौर पर देखा जा सकता है। रिपोर्ट तो यहां तक है कि कुछ इलाकों में जहां सत्तारूढ़ प्रत्याशी अपनी जाति से ताल्लुक रखता था वहां भी यादवों ने आरजेडी का दामन छोड़ दिया। और ऊपर से सीट बंटवारे में कांग्रेस की ऐतिहासिक कमजोरी को दरकिनार करते हुए 70 सीटों का आवंटन आरजेडी के लिए आत्मघाती साबित हुआ।

इस बात में कोई शक नहीं कि जहां जमीनी स्तर पर काम था और कैडरों की नेटवर्किंग थी वहां एनडीए को पछाड़ने में महागठबंधन को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। मसलन पहले फेज के चुनाव में पड़ने वाली माले की सीटें हैं जहां माले न केवल खुद कामयाब हुआ बल्कि उसने आरजेडी को भी हर तरीके से चाहे वह वोटों के ट्रांसफर कराने का मसला हो या फिर उसके पक्ष में हवा बनाने की बात, मदद पहुंचायी। लेकिन चुनाव अभियान के आगे बढ़ने के साथ महागठबंधन इस टेंपो को बरकरार नहीं रख सका। और लगातार फेज वाइज उसकी सीटों में गिरावट दर्ज की गयी। पहले फेज में जो 80% बनाम 20% का था दूसरे में तकरीबन 50-50 का हो गया और तीसरे में यह घटकर 30 % बनाम 70% हो गया।

इस मामले में एनडीए महागठबंधन से ज्यादा चतुर निकला। पहले फेज में उसने नीतीश कुमार के चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ा था। लेकिन उस दौरान होने वाली सभाओं और माहौल से यह बात सामने आ चुकी थी कि नीतीश का चेहरा नहीं चल रहा है। लिहाजा रणनीति को बदलते हुए उसने नीतीश को पीछे कर मोदी के चेहरे को आगे कर दिया। हालांकि मोदी के पास भी बिहार की जनता को देने के लिए कुछ नहीं था और उपलब्धियों के नाम पर महज अयोध्या मंदिर और धारा-370 थे। बावजूद इसके अपने बनाए समीकरण और अपने सामाजिक आधार के साथ वह बढ़त लेता गया। कुछ रिपोर्टों को मानें तो जिस चुनाव में कभी पाकिस्तान से नीचे नहीं उतरने वाले गिरिराज तक को उल्टे-सीधे रोजगार के आंकड़े गिनाने पड़ रहे थे उसमें आखिरी चरण में बीजेपी कुछ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में भी कामयाब रही।

इस मामले में सबसे कारगर रही बीजेपी की रणनीति जिसके तहत वह इस चुनाव में किसी भी कीमत पर नीतीश से बड़ी पार्टी बन कर सत्ता की अगुआई करना चाहती थी। इसके लिए उसने एलजेपी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। जिसके जरिये उसने नीतीश को हर सीट पर डैमेज किया। दूसरी तरफ दूसरी अन्य सीटों पर एलजेपी के साथ अंडरस्टैंडिंग कर उसका लाभ भी हासिल किया। और तीसरी तरफ उसने एनडीए में रहते नीतीश के सामाजिक आधार कुर्मी और अति पिछड़ा का वोट भी हासिल किया लेकिन अपने वोटों के ट्रांसफर के मामले में उन्हें ठेंगा दिखा दिया।

और सबसे बड़ी बात सत्ता पक्ष का हिस्सा होने के बावजूद नीतीश के खिलाफ उमड़े गुस्से और उससे उपजी एंटी इंकबेंसी का लाभ भी खुद ही हासिल कर लिया। यानी सत्ता में रहते विपक्ष के दायरे को भी अपने भीतर समेट लिया। जिसके बारे में पापुलर तरीके से कहा जा रहा है कि सभी लोग बदवाल चाहते थे लेकिन अगड़े तबके से जुड़े समाज के बड़े हिस्से ने उसे नीतीश की जगह बीजेपी को लाने के तौर पर पेश कर दिया। और इस तरह से एंटी इंकबेंसी का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के खाते में चला गया। बताया तो यहां तक जा रहा है कि महिलाओं के एक बड़े हिस्से ने फिर से एनडीए को ही अपनी पहली पसंद माना है।

इस बात में कोई शक नहीं कि बदलाव के पक्ष में हवा थी। और तेजस्वी और बीजेपी उसके केंद्र बने। और यह मूलत: नीतीश के खिलाफ केंद्रित थी। यही वजह है कि नीतीश बिल्कुल रिड्यूस हो गए। जबकि तेजस्वी और बीजेपी को उसका सबसे ज्यादा फायदा मिला। लेकिन तेजस्वी और बीजेपी में एक अंतर रहा। बीजेपी न केवल अपने गठबंधन से फायदा हासिल की और वह अपने अलग-अलग घटकों को अपने तरीके से इस्तेमाल करने में सफल रही बल्कि सामाजिक स्तर पर भी उसने विस्तार हासिल किया। जिसमें सवर्णों को कोर में रखते हुए नीतीश, चिराग, मांझी और वीआईपी के आधार को न केवल समेट लिया बल्कि अपने तरीके से उसका इस्तेमाल भी किया। लेकिन तेजस्वी इस काम को नहीं कर सके। माले के इलाके और उसके आधार को छोड़ दिया जाए तो उन्हें कोई नया सामाजिक आधार नहीं मिला। और गठबंधन के तौर पर कांग्रेस बड़ा गड्ढा साबित हुई। जिसका आखिरी खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

इस पूरी प्रक्रिया में एक बात पूरी तरह से सही निकली। नीतीश ने चुनाव के आखिरी चरण में अपना आखिरी चुनाव होने की जो घोषणा की थी वह बिल्कुल सही साबित होने जा रही है। बीजेपी ने एलजेपी और जेडीयू को दीमक की तरह चाट कर उन्हें खत्म कर दिया है। और वे अब पूरी तरह से बीजेपी के रहमोकरम पर हैं। अपने वादे के मुताबिक बीजेपी अगर नीतीश को मुख्यमंत्री बनाती भी है तो उनके शासन में कितनी हनक होगी कह पाना मुश्किल है। और कुछ दिनों बाद ही अगर बीजेपी मुख्यमंत्री की कुर्सी की दावेदारी शुरू कर दे तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। जो पार्टी महाराष्ट्र में शिवसेना की नहीं हुई वह बिहार में नीतीश की क्या होगी ?  ऐसे में नीतीश अगर अपनी पार्टी का कोई भविष्य देखना चाहते हैं तो वह बीजेपी के साथ नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की ताकतों के साथ है। और उसमें ही अपने लिए कोई समीकरण और नई जगह उन्हें बना सकते हैं।

जहां तक ईवीएम की बात है तो उसकी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। वह कहां और किस स्तर पर है इसको लेकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। लेकिन बिहार के चुनाव में एक बात बिल्कुल तय है कि बेहद कम मार्जिन वाली सीटों पर जरूर कुछ हेर-फेर हुआ है। और उसके इस स्तर पर होने की आशंका है जिससे सत्ता का पूरा गणित प्रभावित हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि आखिर सबसे कम मार्जिन वाली सीटें आखिरी रात के हिस्से और आखिर में ही क्यों आयीं।

और इस मामले में पूरे चुनाव के दौरान बिहार से अलग रहने वाले गृहमंत्री अमित शाह का शाम को नीतीश के पास गए फोन का आखिर क्या मतलब था? उसी के बाद नीतीश हरकत में आए और उन्होंने अपने मुख्य सचिव को जिलों के डीएम जो आम तौर पर चुनाव अधिकारी का काम करते हैं, से अपने पक्ष में सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिलवाया। और आखिरी 10-15 सीटों का इसी तरह से निपटारा करवाया गया। जिनके विपक्ष के पक्ष में जाने से पूरी गणित बदल जाती।

इसके लिए एक-दो उदाहरण ही काफी होगा। यूपी के देवरिया से सटी भोरे सीट है जहां से माले के जितेंद्र पासवान महागठबंधन के प्रत्याशी थे। वह मतगणना में 2500 वोटों से जीत चुके थे। और अभी उनको सर्टिफिकेट जारी होता उससे पहले ही बीजेपी के प्रत्याशी ने प्रशासन से मिलकर रिकाउंटिंग करवाई और उसमें उन्हें तकरीबन 1000 वोटों से हरवा दिया गया। इसी तरह से आरा सीट पर कयामुद्दीन अंसारी के भी साथ हुआ। ये कुछ बानगी भर हैं। और इस तरह की दर्जन भर से ज्यादा सीटें हैं जहां ऐसा खेल खेला गया है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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