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इतनी घृणा कहां से लाते हो बाभन-ठाकुर जी?

‘हाथरस की निर्भया’ की तकरीबन 15 दिनों तक जीवन और मौत के बीच संघर्ष के बाद आखिरकार मौत हो गयी। गांव की इस दलित बच्ची की जिस क्रूरता, बर्बरता और वहशीपन से हत्या की गयी है उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी। सवर्ण दरिंदों ने पहले उसकी जीभ काटी, फिर उसके साथ बलात्कार किया और अंत में चलते-चलते उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ डाली। इसके बाद बच्ची को किन असह्य वेदनाओं और पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ा होगा उसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। यह किसी सभ्य समाज की घटना तो कतई नहीं कही जा सकती है। इस देश में 2000 सालों से जो एक बर्बर व्यवस्था चल रही थी यह सब उसका नतीजा है। 70 सालों में उसे ठीक कर दिया जाएगा ऐसा कोई मुगालता पालने वाला ही सोच सकता है।

बर्बर व्यवस्था की पोषक सैकड़ों किताबों का जिन्हें देवताओं के संदेश के तौर पर देखा और माना जाता है, संविधान की एक छोटी सी किताब भला क्या कर सकती है। कुछ शहरों और समाज के इलीट हिस्से में भले ही लोकतंत्र और उसकी कुछ संवेदनाएं पहुंची हों लेकिन गांव अभी भी उसी पुरानी अन्यायपूर्ण और गैर बराबरी पर आधारित वर्ण व्यवस्था के बर्बर ठीहे बने हुए हैं। जहां कोई संविधान नहीं बल्कि ठाकुर-बाभनों की जुबान चलती है। और उसी के तहत पूरा समाज काम करता है। और अगर कोई उनकी बात नहीं सुनता है और या फिर किसी तरह की अनदेखी करता है तो उसे इस बच्ची सरीखी स्थितियों से गुजरना पड़ता है। आखिर इतनी घृणा लाते कहां से हैं ये दरिंदे? जानवरों में भी इतनी घृणा नहीं पायी जाती है। तो क्या इन मामलों में इंसान जानवरों से भी बदतर हो गया है?

दरअसल समाज में मुसलमानों के खिलाफ जिस घृणा और नफरत को दिखाने की कोशिश की जा रही है वह प्रायोजित है। उसमें एक संगठन है जिसने अपनी सत्ता के बल पर उसको और बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन दलितों के खिलाफ समाज के सवर्ण तबके की घृणा बेहद कुदरती है। इसकी ऊर्जा वह गैर बराबरी पर आधारित जातीय व्यवस्था से हासिल करता है। जिसने हजारों हजार साल से उसको संचित कर रखा है। उसने देश की पूरी एक जमात को गुलाम के रूप में खड़ा कर दिया। वो उसके दास थे। और हमेशा उसके कदमों में ही बैठे रहने के लिए मजबूर थे। उनकी सेवा करते थे लेकिन बदले में कुछ पाने की हिम्मत भी नहीं कर सकते थे। वह श्रम करते थे सब कुछ पैदा करते थे लेकिन फिर भी हाशिए पर रहते थे। और समाज में सबसे अपमानित जीवन जीते थे।

अब अगर ऐसे में वह तबका या फिर उसके बीच का कोई भी व्यक्ति किसी बराबरी की बात कर दे तो समझा जा सकता है सवर्णों के पोषित अहंकार के लिए यह कितना बड़ी चुनौती है। इसीलिए पाला हुआ यह गुलाम अगर सवर्ण जमात की नजर में किसी तरह का ‘अन्याय’ करता है तो वह इसी तरह के दंड का हकदार हो जाता है। इसलिए मुसलमानों के खिलाफ वह मॉब लिंचिंग या फिर सामूहिक दंगे के तौर पर सामने आता है। लेकिन दलितों के खिलाफ वह बर्बरता एक निजी दुश्मनी सरीखा रूप ले लेता है। जो हमलावर के दिमाग में सालों-साल से पल रही होती है। लिहाजा उसके लिए किसी बाहरी प्रोत्साहन या उकसावे की जरूरत नहीं पड़ती है।

और संयोग से सूबे में एक ऐसी सरकार बन गयी है जिसका काम ही पुरानी व्यवस्था को फिर से बहाल करना है। समाज के एक हिस्से को तो योगी राज में अपना ‘रामराज्य’ दिख रहा है। लिहाजा वह समाज में उसकी फिर से स्थापना में जुट गया है। और यह सब कार्रवाइयां उसका अभिन्न हिस्सा हो जाती हैं। दरअसल किसी महिला के साथ बलात्कार एक ऐसी चीज होती है जो उसके पूरे समाज के मनोबल को तोड़ देती है। और योगी राज में यही काम बेहद संगठित तरीके से किया जा रहा है। क्योंकि पिछले 70 सालों में संविधान और लोकतंत्र से निचले स्तर पर न केवल जागरूकता बढ़ी है बल्कि लोगों को अपने अधिकारों का भी ज्ञान हुआ है। और उसमें भी यूपी जैसे सूबे में दलितों के राजनीतिकरण और सशक्तिकरण ने उसे एक दूसरे मुकाम पर पहुंचा दिया है।

लिहाजा यहां इस पूरे समय के पहिए को पीछे ले जाना किसी हिमालय से कम नहीं है। संघ के साथ मिलकर योगी सरकार इसी काम को कर रही है। सूबे में जब वह चिन्मयानंद और सेंगर को बलात्कार के मामलों में बचा रही थी तो अपने तरीके से इन जैसे संभावित बलात्कारियों को ही संदेश दिया जा रहा था कि वो ऐसा कुछ भी करेंगे तो उनका बाल बांका नहीं होने जा रहा है। योगी और संघ अपने उस संदेश रूपी बीज की अब फसल काट रहे हैं।

दरअसल यह सब कुछ इतिहास के पहिए को पीछे घुमाने की कोशिशों का नतीजा है।  जब देश की संसद को ठेंगे पर रखा जा रहा है। संविधान की कीमत दो कौड़ी कर दी गयी है। एक-एक कर सभी संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्था, जिसकी जिम्मेदारी संविधान की रक्षा करनी है वह घुटनों के बल खड़ी है। तो यह कोई सामान्य स्थिति नहीं है। दरअसल उनके साथ ऐसा करने के पीछे एक बड़ा मकसद छिपा है। और वह यह कि देश में ‘दैवीय वर्ण व्यवस्था’ की फिर से बहाली करनी है। और पूरे समाज में कथित भारतीय संस्कृति जिसका वर्ण व्यवस्था सबसे जिंदा भौतिक रूप है, को फिर से स्थापित करना है। और यह काम बगैर इन संस्थाओं को पंगु बनाए नहीं हो सकता है। और किसी को भी इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि यह केवल मुसलमानों के खिलाफ केंद्रित है। उससे पहले यह दलित, पिछड़ा और सभी वंचित तबकों के खिलाफ जाता है। और इसमें कारपोरेट की चासनी जुड़ जाने से समाज के गरीब और हाशिये के लोग इसके दमन और उत्पीड़न के अभिन्न हिस्से हो जाते हैं।

और एक आखिरी बात। यह बात सौ फीसद सच है कि निर्भया से भी ज्यादा क्रूर और बर्बर होने के बावजूद समाज में इस घटना के खिलाफ वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखी है। उसके पीछे वजह बिल्कुल साफ है। समाज की एक सामूहिक संवेदना होती है। और इस संवेदना को जगाने में अभी भी सवर्णों और वर्गीय तौर पर आगे बढ़े हिस्से की भूमिका सबसे बड़ी है। निर्भया इन दोनों मामलों में फिट बैठती थी। जबकि पीड़िता न सिर्फ दलित थी बल्कि गांव में रहती थी और गरीब भी थी। लिहाजा संवेदना हासिल करने के उस कथित हक से बहुत दूर थी।

और संवेदना जगाने वाले इस तबके में भी जाने-अनजाने उसके दलित होने और पारंपरिक तौर पर शोषण के शिकार होने के अधिकारी होने की बात जज्ब है। और जब कोई चीज मान ली जाती है तो फिर उसके खिलाफ प्रतिरोध उठने की संभावना भी खत्म हो जाती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि कोई सामूहिक संवेदना इतनी पक्षपाती कैसे हो सकती है? और अगर है तो फिर उसको क्या संवेदना का दर्जा दिया जा सकता है। बहरहाल दलित युवती की मौत ने देश के लोकतंत्र के माथे पर एक बड़ी कील ठोक दी है। और समय के साथ भले ही मामला खत्म हो जाए लेकिन उसका दाग हमेशा बना रहेगा।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on October 6, 2020 8:44 pm

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