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कांग्रेस के लिए गांधी परिवार वैसे ही ज़रूरी है जैसे भाजपा के लिए संघ

जब भी कोई राजनीतिक दल अपने बुरे दौर से गुजर रहा होता है तो उसमें कुछ न कुछ खटपट चलती रहती है। कभी नेतृत्व को लेकर सवाल उठता है तो कभी पार्टी की दशा और दिशा को लेकर। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस पार्टी अपने इतिहास के सबसे खराब दौर से गुजर रही है, इतने खराब दौर से कि पिछले एक साल से उसे अंतरिम अध्यक्ष से काम चलाना पड़ रहा है और वह नया पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं खोज पा रही है। इसलिए अगर पार्टी में कुछ वरिष्ठ नेता नया पूर्णकालिक अध्यक्ष चुनने के सवाल को लेकर पार्टी की सर्वोच्च नेता को पत्र लिखकर अपनी बेचैनी का इजहार कर रहे हैं, तो यह स्वाभाविक ही है।

पिछले दिनों कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने नया अध्यक्ष चुने जाने के सवाल को लेकर कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को जो पत्र लिखा था, उसे लेकर दिन-रात सरकार और सरकारी पार्टी के ढिंढोरची की भूमिका निभाने वाले टीवी चैनलों ने ऐसा माहौल बना दिया था कि कांग्रेस में बड़े पैमाने पर बगावत होने जा रही है और पार्टी विभाजन के कगार पर जा खड़ी हुई है। इसी माहौल में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक को लेकर भी टीवी चैनलों ने सुबह से कांग्रेस पार्टी का मर्सिया पढ़ना शुरू कर दिया था।

इस सिलसिले में सूत्रों के हवाले से झूठी खबरें भी चलाई गईं और बताया गया कि कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने नया अध्यक्ष चुनने की मांग करने वाले नेताओं पर भाजपा से साठ-गांठ करने का आरोप लगाया है। राहुल के इस कथित बयान पर कार्यसमिति की बैठक में कुछ नेताओं ने नाराजगी भी जताई लेकिन राहुल ने तत्काल ही स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। मीडिया में जहां कांग्रेस के टूटने के कयास लगाए जा रहे थे, वहीं कुछ लोग उम्मीद कर रहे थे कि शायद कार्यसमिति की बैठक में ही नए अध्यक्ष का नाम तय हो जाएगा। मगर सात घंटे तक चली कार्यसमिति की बैठक में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

यह सही है कि कार्यसमिति की 7 घंटे तक चली बैठक में आरोप-प्रत्यारोप और सुलह-सफाई के बीच पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कार्यसमिति की बैठक में अपने इस्तीफे की पेशकश की थी, लेकिन कार्यसमिति ने उसे कुबूल नहीं किया। तय किया गया कि सोनिया गांधी छह महीने तक और पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी तथा इस दौरान पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर उसमें नए अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा।

इस तरह से आम राय से अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी का कार्यकाल छह महीने और बढ़ा दिया गया। कांग्रेस अधिवेशन बुलाकर नए अध्यक्ष का चुनाव कराने की बात कही गई। सोनिया गांधी ने इस्तीफ़े की पेशकश की, लेकिन कार्यसमिति ने उनका इस्तीफ़ा मंजूर नहीं किया।

कार्यसमिति की बैठक में विभिन्न नेताओं ने नए अध्यक्ष के लिए जिस तरह फिर से अपनी पहली पसंद राहुल गांधी को बताया, उससे यह भी साबित हो गया है कि राहुल गांधी लाख कोशिश कर लें कि पार्टी उन्हें और परिवार को छोड़कर बाहर के किसी नेता को अध्यक्ष बनाए, मगर कांग्रेस के लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं है। इसलिए यह लगभग तय है कि राहुल गांधी ही पार्टी के अगले अध्यक्ष होंगे और कांग्रेस अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लगाई जाएगी।

हालांकि राहुल गांधी सवा साल से यही बताने और समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर वह पार्टी नहीं चला पा रहे हैं, पार्टी को जीत नहीं दिला पा रहे हैं तो पार्टी के दूसरे नेता जो ऐसा करने की क्षमता रखते हैं, वे सामने आएं और पार्टी चलाएं। राहुल गांधी की इस चुनौती को कांग्रेस का कोई नेता स्वीकार नहीं कर पाया।

दरअसल कांग्रेस को अगर गांधी परिवार के बाहर के ही किसी नेता को अध्यक्ष चुनना होता तो वह यह काम उसी समय कर लेती जब पिछले लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने इस्तीफा दिया था। हालांकि कुछ नेताओं ने ऐसा करने की कोशिश भी की थी, लेकिन किसी भी नाम पर सहमति नहीं बन पाई थी और सभी इस नतीजे पर पहुंचे थे कि अगर गांधी परिवार के बाहर से किसी नेता को अध्यक्ष बनाया गया तो पार्टी बिखर जाएगी।

पार्टी के वे नेता भी कोई विकल्प पेश नहीं कर सके जो कांग्रेस मुख्यालय के अपने बंद कमरों में बैठकर राहुल गांधी का ठीक वैसे ही खिल्ली उड़ाते हैं जैसे टीवी चैनलों पर भाजपा के नेता। मगर ऐसे नेताओं के पास भी कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने की कोई योजना नहीं है, पार्टी की बागडोर संभालने की हिम्मत दिखाना तो बहुत दूर की बात है।

कहा जा सकता है कि सोनिया और राहुल गांधी कांग्रेस की मजबूरी हैं या कांग्रेस के लिए ज़रूरी हैं। इसीलिए सोनिया गांधी के लगातार 19 साल पार्टी अध्यक्ष बने रहने के बाद राहुल गांधी को पार्टी की बाग़डोर सौंपी गई। करीब डेढ़ साल अध्यक्ष रहने के बाद राहुल ने इस्तीफा दिया तो फिर सोनिया गांधी को ही एक साल के लिए अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया। अब एक साल बाद छह महीने के लिए उनका कार्यकाल बढ़ाया गया है। पार्टी ने साफ़ संकेत दे दिए हैं कि उसे अध्यक्ष पद पर राहुल के अलावा कोई और मंजूर नहीं। अब यह राहुल पर निर्भर करता है कि वह वापसी के लिए कितना और समय लेते हैं।

पार्टी के तमाम नेताओं का मानना है कि अब राहुल गांधी को अपनी जिद छोड़कर पार्टी की कमान संभाल लेनी चाहिए। राहुल के करीबी पिछले काफ़ी दिनों से संकेत दे रहे हैं कि राहुल फिर से पार्टी की बागडोर संभालने को तैयार हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लग जाएगी। इस बीच, पार्टी संगठन में उनकी नई टीम भी तैयार हो जाएगी ताकि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद वह अपने मनमाफिक निर्णय कर सकें। कहा जा रहा है कि राहुल इसी शर्त पर वापसी के लिए तैयार हैं कि उन्हें पार्टी अपनी मर्जी से चलाने और सभी अहम फैसले लेने की आजादी दी जाए।

सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले नेताओं ने भी कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का विरोध नहीं किया, बल्कि राहुल से अध्यक्ष बनने का आग्रह किया है। उनका कहना सिर्फ इतना है कि पार्टी की बागडोर राहुल संभाले या कोई और, वह फुलटाइम राजनीति करे, अध्यक्ष के रूप में कार्यकर्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध हो।

इन नेताओं का कहना है कि अध्यक्ष ऐसा नेता हो जो पार्टी की दशा सुधार कर, उसे नई दिशा देकर आने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी को तैयार करे। पार्टी में तमाम नेताओं को लगता है कि यह काम सिर्फ राहुल गांधी ही कर सकते हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ भी जिस आक्रामक तेवर के साथ राहुल गांधी पेश आते हैं, वैसा कांग्रेस का कोई और नेता नहीं। आजादी के बाद कांग्रेस के इतिहास में राहुल गांधी पहले ऐसे कांग्रेस अध्यक्ष हुए हैं, जो स्पष्ट रूप से संघ का नाम लेकर भाजपा को ललकारते रहे हैं और उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या के लिए सीधे सीधे संघ को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि इसके लिए उन पर मुकदमे भी लगे हैं लेकिन वे किसी तरह खेद जताए या माफी मांगे बगैर उन मुकदमों का सामना कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने में भी किसी तरह का संकोच नहीं किया है।

कांग्रेस कार्यसमिति ने भी माना है, ”सरकार की विफलता और विभाजन कारी नीतियों के खिलाफ सबसे ताक़तवर आवाज़ सोनिया गांधी और राहुल गांधी की है। राहुल गांधी ने भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ जनता की लड़ाई का दृढ़ता से नेतृत्व किया है।’’

राजनीतिक हलकों में भले ही यह मज़ाक का विषय हो कि नेतृत्व के सवाल पर कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के बाहर का झांकने की हिम्मत नहीं है, मगर हकीकत यही है कि नेहरू -गांधी परिवार ही कांग्रेस की ताकत है और वह तत्व है जो पार्टी को जोड़े रख सकता है। यह स्थिति ठीक वैसी है जैसे भाजपा की ताकत संघ परिवार में है। अगर भाजपा से संघ को अलग कर दिया जाए तो भाजपा का भी कोई वजूद नहीं रह जाएगा।

आखिर संघ से उसके रिश्तों को लेकर ही 1979 में जनता पार्टी टूटी थी और जनसंघ के नए अवतार के तौर पर भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ था। भाजपा किस हद तक संघ पर आश्रित है या संघ का भाजपा में कितना दखल है, इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। वहां मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक भाजपा के प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति तक में संघ का सीधा दखल होता है और अंतिम फैसला भी संघ का ही होता है। 2013 में लालकृष्ण आडवाणी को निष्ठुरतापूर्वक घर बिठाकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला भी तो आखिर संघ ने किया था।

सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले कांग्रेस के जिन नेताओं को ‘असंतुष्ट’ या ‘बागी’ कहा गया है, दरअसल वे असंतुष्ट या बागी नहीं हैं, बल्कि पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। अगर ये नेता मानते हैं कि पार्टी को अपनी मूल राजनीतिक विचारधारा की तरफ़ लौटना चाहिए, तो उनके ऐसा सोचने या मानने में क्या हर्ज है?

(लेखक अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on August 25, 2020 6:46 pm

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