Saturday, December 4, 2021

Add News

स्टेन स्वामी के खून से रंग गया है सरकार और अदालतों का दामन!

ज़रूर पढ़े

मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टे्न स्वामी के निधन के समाचार ने सारी दुनिया को हिला के रख दिया है। ऐसी निर्ममता कभी मुस्लिम और अंग्रेज शासकों ने भी नहीं की। जिस तरह झूठी और क्रूरतम  भारत सरकार ने आज अपने अड़ियल रवैए और फर्जी दस्तावेज के जरिए एक बुजुर्ग सच्चे समाजसेवी को मरने मज़बूर कर दिया। बेदिली का ये आलम कांपते हाथों को स्पा भी नहीं दिया गया । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग  ने कल ही 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के संबंध में मिली एक शिकायत के मद्देनजर महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया था।

स्टेन स्वामी कई बीमारियों से पीड़ित थे, पिछले साल कोरोना से संक्रमित भी हुए थे। अफ़सोसनाक ये कि स्टेन स्वामी की जमानत याचिका पर आज ही सुनवाई भी होनी थी लेकिन अदालत को उनके निधन की सूचना दी गई।वे आज़ाद हो गए लेकिन उनके कार्यकर्ता सरकार के असंवेदनशील व्यवहार से ख़फ़ा हैं और उनके कामों को आगे बढ़ाने प्रतिबद्ध हुए हैं।

पिछले पांच दशक से झारखंड में काम कर रहे फादर स्टेन स्वामी की पहचान देश के जाने-माने सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर थी। मूल रूप से तमिलनाडु के रहने वाले स्टेन स्वामी ने शादी नहीं की ।भारत और फिलीपींस के कुछ नामी संस्थानों में समाज शास्त्र की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने बंगलुरू स्थित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट के साथ काम किया।

इस दौरान उन्हें आदिवासियों के बारे में जानने-समझने का मौका मिला। फिर वो झारखंड (तब बिहार) आ गए और यहीं रहने लगे। शुरुआती दिनों में उन्होंने यहां के सिंहभूम इलाक़े में बतौर पादरी काम किया। इसके साथ ही वो आदिवासी अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे और पादरी का काम छोड़ दिया। उन्होंने विस्थापन के ख़िलाफ़ बड़ी लड़ाई लड़ी और झारखंड की जेलों में बंद हजारों आदिवासियों का मामला कोर्ट में उठाया, जिन्हें विचाराधीन कैदियों के तौर पर बंद रखा गया है।

 स्वामी 84 साल के थे और बीते दो दिन से मुंबई के एक अस्पताल में लाइफ़ सपोर्ट पर थे।भीमा कोरगॉंव हिंसा मामले में स्टेन स्वामी को राँची से बीते वर्ष हिरासत में लिया गया था। उन पर हिंसा भड़काने का मामला चल रहा था। स्टेन स्वामी पर 2018 के भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में शामिल होने और नक्सलियों के साथ संबंध होने के आरोप भी लगाए गए थे। उन पर ग़ैर क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धाराएँ लगा कर एनआईए ने हिरासत में लिया था।

 उनकी मौत पर जो प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं उनमें सरकार को उनकी मौत का जिम्मेदार माना जा रहा है । कुछ प्रतिक्रियाओं में उनकी मौत को “त्रासदी” बताया गया। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि ये “हत्या” है और हिरासत में हुई स्टेन स्वामी की ‘मौत की जवाबदेही तय करने की मांग’ भी की है।इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने फ़ादर स्टेन स्वामी के निधन को एक ‘त्रासदी’ बताया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, “उनकी त्रासद मौत ज्यूडिशियल मर्डर का केस है जिसके लिए गृह मंत्रालय और कोर्ट संयुक्त रूप से जवाबदेह हैं। “गुहा ने स्टेन स्वामी के काम को भी याद किया है।

उन्होंने लिखा है, ” फ़ादर स्टेन स्वामी पूरी ज़िंदगी वंचितों के लिए काम करते रहे।” पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और टीएमसी नेता यशवंत सिन्हा ने उनकी मौत को “हत्या” बताते हुए लिखा कि “हम जानते हैं कि कौन ज़िम्मेदार है” स्वामी की मौत पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने संवेदना जताते हुए ट्वीट किया कि “वे न्याय और मानवता के हक़दार थे। ”मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव सीताराम येचुरी ने सोमवार को कहा कि वह फादर स्टेन स्वामी के निधन से दुखी और आक्रोशित हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया।

पिछले 20 साल से झारखण्ड में आदिवासियों की आवाज उठाने वाली संस्था आदिवासी अधिकार मंच के खूंटी जोन के प्रभारी आलोका कुजुर झारखण्ड में आदिवासियों से जुड़े तमाम आंदोलनों से लेकर फादर स्टेन स्वामी की रिहाई के लिए आवाज बुलंद करते रहे। स्वामी के निधन पर उन्होंने कहा-फादर एक निर्दोष 84 साल के बुजुर्ग जो पार्किंसन बीमारी से ग्रसित थे, ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता के साथ NIA ने जो अमानवीय व्यवहार किया, वो चिंता का विषय है। फादर पर कोरेगांव के तहत जो केस हुआ वह फर्जी था। इस उम्र के व्यक्ति को जेल में रखना और NIA द्वारा आरोप सिद्ध नहीं कर पाना साबित करता है कि फादर पर झूठे आरोप लगाए गए थे। इस लिए हम सभी सामाजिक कार्यकर्ता यही मानते हैं कि केंद्र सरकार और NIA ने फादर स्टेन स्वामी की हत्या की।

कुल मिलाकर स्वामी को जिस तरह कारागार में अकारण रख कर एक बुजुर्ग आदिवासी समाज के उत्थान में लगे कार्यकर्ता के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार हुआ वह सिद्ध करता है कि समाज में जागृति लाने वाले लोगों को फासिस्ट सरकार अपना निशाना बना रही है। इसलिए उन्हें ये कहीं नक्सली नज़र आते हैं तो कहीं आतंकवादी। राजद्रोह के आरोप भी ढूंढ ढूंढ कर सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लगाए जा रहे हैं।याद रखिए जुझारू लोग मौत से नहीं डरते ।

लेकिन वह दिन दूर नहीं जब आदिवासी और दलित शोषित समाज जागेगा ।एक नहीं अनेक स्टेन स्वामी अब जन्म ले चुके हैं उनके अंदर ऐसी घटनाएं रोष पैदा कर रही हैं जो ख़तरनाक हो सकती हैं। सरकार को यह क्रूर रवैया छोड़ना ही होगा।अपनी गलती माननी होगी । जरूरी है इस घटना से सबक लेकर जबरिया बंद लोगों को रिहा करे ।ऐसी घटनाओं से दुनिया में भारत की छवि निरंतर धूमिल हो रही है ।ज्ञातव्य हो आदिवासी समाज बहुत सभ्य है हुज़ूर उन्हें मत छेड़िए।वे इस जल,जंगल, जमीन के वास्तविक हकदार हैं।जो प्रवासी जातियों के आगमन के कारण जंगलों और पहाड़ों में चली गईं।उनके हक से आप उन्हें कब तक वंचित रखेंगे?

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

प्रदूषण के असली गुनहगारों की जगह किसान ही खलनायक क्यों और कब तक ?

इस देश में वर्तमान समय की राजनैतिक व्यवस्था में किसान और मजदूर तथा आम जनता का एक विशाल वर्ग...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -