Thursday, February 22, 2024

जम्मू-कश्मीर प्रेस क्लब पर सरकार का क़ब्जा, देश भर में उठी विरोध की आवाज

जम्मू-कश्मीर सरकार ने श्रीनगर के बीचों-बीच स्थित प्रेस क्लब की भूमि और भवन को अपने कब्ज़े में लेकर संपदा विभाग को सौंप दिया है। जम्मू कश्मीर सरकार के इस दमनात्मक कार्रवाई की चौतरफा निंदा हो रही है। देश के तमाम प्रेस संस्थानों व राजनीतिक दलों ने बयान जारी करके कार्रवाई की निंदा की है और प्रेस क्लब को बहाल करने की मांग की है।

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपने बयान में कश्मीर प्रेस क्लब की घटना को एक ‘तख्तापलट’ करार दिया है। बयान में कहा गया है कि पुलिस की मदद से केंद्र शासित प्रदेश में प्रेस की स्वतंत्रता का दमन एक अनवरत जारी रहने वाली प्रवृत्ति है जो शर्मनाक और गैरकानूनी है।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कहा है, “प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का कश्मीर प्रेस क्लब के घटनाक्रम से गहरा सरोकार है। हम मांग करते हैं कि शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव कराने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनुमति दी जाए। हम माननीय जम्मू और कश्मीर एलजी मनोज सिन्हा से मामले को देखने और चुनाव की सुविधा देने की अपील करते हैं।”

मुंबई प्रेस क्लब ने बयान जारी करके कहा है, “मुंबई प्रेस क्लब शनिवार को सुरक्षा बलों के साथ मिलकर कानूनी रूप से निर्वाचित प्रबंधन निकाय से कश्मीर प्रेस क्लब (केपीसी) के जबरन अधिग्रहण की निंदा करता है। एमपीसी जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा क्लब की चुनाव प्रक्रिया को विफल करने की भी निंदा करता है”।

कश्मीर प्रेस क्लब के निर्वाचित निकाय सहित कश्मीर के नौ पत्रकार निकायों ने कश्मीर प्रेस क्लब के अवैध और मनमाने अधिग्रहण पर एक बयान जारी करके निंदा की है।

पूर्व मुख्यमंत्रियों उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की ओर से केपीसी के अंदर सशस्त्र पुलिस बल की तस्वीरें ट्विटर समेत अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर प्रशासन की कड़ी आलोचना की गई है।

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सोमवार को आरोप लगाया कि कश्मीर प्रेस क्लब में संकट उस संस्था को बंद करने के लिए “सुनियोजित” प्रतीत होता है, जिसने पत्रकारों के लिए स्वतंत्र रूप से बहस करने और मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एक माध्यम के रूप में काम किया।

जबकि उमर अब्दुल्ला ने कहा कि “ऐसी कोई सरकार नहीं है जिसे इस “पत्रकार” ने चूसा नहीं है और ऐसी कोई सरकार नहीं है जिसकी ओर से उसने झूठ नहीं बोला हो। मुझे पता होना चाहिए, मैंने दोनों पक्षों को बहुत करीब से देखा है। अब उन्हें राज्य प्रायोजित तख्तापलट का फायदा मिला है।”

दिल्ली स्थित एक सामाजिक संगठन ‘जनहस्तक्षेप’ ने बयान जारी करके कहा कि कश्मीर के पत्रकारों ने इस अधिग्रहण की घोर निंदा करते हुए यथास्थिति बहाल करने की मांग की है। संगठन ने अपने बयान में अन्य मीडिया गिल्ड और संघों से अनुरोध किया कि वह केंद्र सरकार के तत्वावधान में कश्मीर में चल रहे दमन और देशभर में स्वतंत्र विचारधारा वाले पत्रकारों पर बढ़ते हमलों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने के लिए एकजुट हो जाएं।

कश्मीरी पत्रकार पीरजादा आशिक़ ने कहा है कि “पत्रकारों के लिए कश्मीर प्रेस क्लब को सील करते हुए देखना दुखद और दर्दनाक है। 5 अगस्त, 2019 के अभूतपूर्व प्रतिबंधों के चरम पर और यहां तक ​​कि महामारी की घातक लहरों के दौरान भी, पूरे दिन फाइल करने के लिए कई पत्रकारों के साथ यह खुला और कार्यात्मक बना रहा”।

उन्होंने आगे कहा कि “5 अगस्त 2019 केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि एक अधिनियम है जिसे कश्मीर में दैनिक आधार पर लागू और सामान्य किया जा रहा है। कश्मीर प्रेस क्लब को केवल पत्रकारों के लिए सुरक्षा और सामूहिक सोच का स्थान होने के कारण समाप्त करना दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद है, धमकी भी”।

क्या है मामला

बता दें कि 15 जनवरी शनिवार को कुछ पत्रकार पुलिस के साथ कश्मीर प्रेस क्लब परिसर में पहुंचे और इसका ‘नया प्रबंधन’ होने का दावा किया। प्रशासन की ओर से एक दिन पहले इसके रजिस्ट्रेशन को स्थगित करने के बाद इन पत्रकारों ने नए प्रबंधन का दावा किया। पत्रकारों ने मीडिया को बयान जारी किया कि ‘कुछ पत्रकार फोरम’ ने उन्हें नया पदाधिकारी चयनित किया है, लेकिन घाटी के 9 पत्रकार संगठनों ने इस दावे का विरोध किया था।

यूएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कहा है कि श्रीनगर के पोलो व्यू स्थित पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्था में पिछले हफ्ते की ‘गुटबाजी’ के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि पत्रकारों के विभिन्न समूहों के बीच असहमति और अप्रिय घटनाओं के बीच यह फैसला किया गया है कि कश्मीर प्रेस क्लब को आवंटित परिसर का आवंटन रद्द करके परिसर की भूमि और इस पर निर्मित भवन को एस्टेट विभाग को वापस कर दिया जाए।

इसके बाद परिसर में तालाबंदी करके परिसर को सरकार के संपदा विभाग को सौंप दिया गया।

हस्तक्षेप ज़रूरी हो गया था – सरकार

जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से कहा गयाा है कि- “विवाद और सोशल मीडिया रिपोर्टों के मद्देनज़र क़ानून-व्यवस्था की स्थिति की ओर संकेत करने वाले अन्य स्रोतों के आधार पर हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया। इसमें वास्तविक पत्रकारों की सुरक्षा का ख़तरा और शांति भंग होने का ख़तरा शामिल है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कहा कि वह एक स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेस के लिए प्रतिबद्ध है और मानती है कि पत्रकार पेशेवर, शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोरंजक और कल्याणकारी गतिविधियों के लिए ज़रूरी जगह हासिल करने समेत सभी तरह की सुविधाओं के हक़दार हैंं। सरकार ने उम्मीद जताई कि सभी पत्रकारों के लिए एक पंजीकृत वास्तविक सोसायटी का जल्द गठन किया जाएगा जो परिसर के पुन:आवंटन के लिए सरकार से संपर्क करने में सक्षम होगी।

पंजीकरण का पेंच

सरकार ने कहा कि केंद्रीय पंजीकरण सोसायटी अधिनियम के तहत खुद को पंजीकृत करने में अपनी विफलता तथा 14 जुलाई को कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद कमेटी का वैधानिक अस्तित्व नहीं रह गया।

वहीं प्रेस क्लब प्रबंधन द्वारा दावा किया जा रहा है कि 29 दिसंबर को कमेटी का दोबारा से पंजीकरण कर दिया गया, लेकिन इसे पुलिस सत्यापन के कारण स्थगित रखा गया। रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटी ने शनिवार को कहा था कि एसएसपी सीआईडी ने इसे स्थगित कर दिया है क्योंकि क्लब के पदाधिकारियों के चरित्र का सत्यापन किया जाना है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कहा कि वह उन “अप्रिय” घटनाओं के कारण उपजे हालात को लेकर चिंतित है, जिनमें वे दो विरोधी समूह भी शामिल हैं जो कश्मीर प्रेस क्लब के बैनर का इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकार ने कहा, “तथ्यात्मक स्थिति यह है कि पंजीकृत संस्था के रूप में केपीसी का अब वजूद नहीं रहा और इसके प्रबंधकीय निकाय का भी क़ानूनी रूप से 14 जनवरी, 2021 को अंत हो चुका है। यह वही तारीख है जिस दिन इसका कार्यकाल समाप्त हुआ। “

सरकार की ओर से आगे कहा गया है कि, ‘‘यह संस्था केंद्रीय पंजीकरण सोसायटी अधिनियम के तहत खुद का पंजीकरण कराने में विफल रही, इसके बाद यह नए प्रबंध निकाय का गठन करने के लिए चुनाव कराने में विफल रही। पूर्ववर्ती क्लब के कुछ लोग कई तरह के अवैध काम कर रहे हैं, जिनमें यह झूठा चित्रण करना शामिल है कि वह एक निकाय के मालिक-प्रबंधक हैं, जिसका कि वैधानिक वजूद ही नहीं है। ’’

सरकार ने कहा है कि कुछ अन्य सदस्यों ने अंतरिम निकाय का गठन करने के बाद उसी तरह के बैनर का इस्तेमाल करते हुए ‘अधिग्रहण’ का सुझाव दिया।लेकिन सरकार ने कहा कि मूल केपीसी का पंजीकृत निकाय के रूप में अस्तित्व समाप्त हो गया है, इसलिए किसी भी अंतरिम निकाय के गठन का सवाल निरर्थक है। इन परिस्थितियों में तत्कालीन कश्मीर प्रेस क्लब के अधिकार का उपयोग करके किसी भी समूह द्वारा नोटिस जारी करना या संपर्क करना अवैध है।

बचाव पक्ष की दलील

वहीं, कश्मीर प्रेस क्लब के अपदस्थ प्रबंधन ने दावा किया कि पत्रकारों के एक समूह को अंतरिम निकाय के रूप में स्थापित करने का असल मक़सद क्लब को बंद करना था। इसके साथ ही उसने एक बार फिर जोर दिया कि घाटी में पत्रकार इन चुनौतियों का सामना करेंगे।

अपदस्थ प्रबंधन के महासचिव इशफ़ाक तांत्रे ने कहा कि ऐसा लगता है कि असल मक़सद कश्मीर प्रेस क्लब को बंद करना था। इस मक़सद के लिए उन्होंने पत्रकारों के एक समूह को स्थापित करने की कोशिश की। इस कार्रवाई से वे कश्मीर प्रेस क्लब नामक मंच के माध्यम से पत्रकारों की गूंजने वाली आवाज को दबाना चाहते थे जो घाटी में एकमात्र लोकतांत्रिक और स्वतंत्र पत्रकार निकाय है। मैं दोहराना चाहता हूं कि कश्मीर में पत्रकारिता आगे बढ़ी है और भविष्य में भी यह सभी संकटों से बचेगी।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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