जनता के आरटीआई हथियार को सरकार ने लिया छीन; पारदर्शिता गयी कूड़ेदान में, भ्रष्टाचार की जय!

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राज्यसभा में हंगामा।

नई दिल्ली। आखिर जिस बात की आशंका थी वही हुआ। आरटीआई पर राज्यसभा में भी सरकार भारी पड़ गयी। और विधेयक पारित हो गया। विपक्ष हंगामे तक सीमित होकर रह गया। बताया जाता है कि पीएम मोदी ने विधेयक को पारित कराने के लिए ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से बात की थी और उसका नतीजा भी निकला। बीजेडी विधेयक को समर्थन देने के लिए तैयार हो गयी। यह चीज सिर्फ बीजेडी तक सीमित नहीं रही सरकार को राज्यों में सत्तारूढ़ टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस का भी समर्थन मिल गया।

बहस के दौरान विपक्ष ने विधेयक को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने का प्रस्ताव दिया। जिसे सरकार ने मानने से इंकार कर दिया। आखिर में इसको लेकर मतदान हुआ जिसमें सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने के पक्ष में महज 75 वोट पड़े जबकि उसके विरोध में 117 लोगों ने वोट दिया। वोटिंग से पहले कांग्रेस नेताओं ने कुछ हस्तक्षेप किया तो विपक्षी दलों के साथ सत्ता पक्ष के लोगों की तीखी झड़प हो गयी। जिसके बाद दल के नेता गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में पार्टी ने वाकआउट कर दिया।

टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रेयन ने कहा कि “संसद को इसकी जांच करनी है। इसकी जांच के लिए समय चाहिए। यह टी-20 का मैच नहीं है।”

सदन में विपक्ष के एक दूसरे सदस्य ने कहा कि विधेयक कोई डोसा बनाने जैसा काम नहीं है।

बताया जाता है कि बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस ने पहले ही बिल के समर्थन का सत्ता पक्ष को भरोसा दिया था जिससे सरकार का काम आसान हो गया।

वाईएसआर कांग्रेस के विजय साय रेड्डी ने बताया कि “हम आरटीआई संशोधन विधेयक का समर्थन करेंगे….यह मांग सही नहीं है कि सभी बिल स्टैंडिंग कमेटी या फिर सेलेक्ट कमेटी के पास भेजे जाने चाहिए।”

टीआरएस जिसने पहले विधेयक का विरोध करने का फैसला किया था बताया जाता है कि गृहमंत्री अमित शाह के तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव से बात करने के बाद अपना रुख बदल लिया और विधेयक का समर्थन करने के लिए तैयार हो गयी।

सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस को शायद इस बात का पहले ही आभास हो गया था कि नंबर उसके पक्ष में नहीं हैं और विधेयक को रोकना कठिन है। लिहाजा उसने वाकआउट करने में ही अपनी भलाई समझी।

पांच सदस्यों के कल रिटायर होने के बाद बहुमत में बीजेपी गठबंधन को केवल 6 की कमी रहेगी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पहले ही आरटीआई विधेयक में संशोधन का विरोध कर चुकी हैं और उन्होंने इस सिलसिले में एक खुला पत्र भी लिखा था। जिसमें उन्होंने कहा था कि केंद्र विधेयक को पारित कराने पर आमादा है।

इसके पहले कांग्रेस समेत दूसरी विपक्षी पार्टियों ने 16 पेंडिंग विधेयकों में से सात को स्टैंडिंग या फिर सेलेक्ट कमेटी के पास भेजे जाने पर सहमति बनायी थी और उसे सरकार पर दबाव डालकर लागू करने के बारे में तय किया था।

आरटीआई में इस विधेयक के द्वारा बदलाव हो जाने के बाद अब सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, सैलरी और सेवा से जुड़ी तमाम शर्तों और प्रावधानों पर सरकार फैसला ले सकती है।

विपक्ष ने उसे आरटीआई खात्मा विधेयक करार दिया था उसका कहना था कि रोजगार और सैलरी संबंधी चीजों को तय करने का अधिकार सरकार को देने से आरटीआई अथारिटी की स्वतंत्रता पर विपरीत असर पड़ेगा।

उनका कहना है कि यहां तक कि ईमानदार अधिकारी भी संवेदनशील सूचनाओं का खुलासा करने से बचने लगेंगे अगर उनकी सैलरी और रोजगार पर उसका असर पड़ेगा।

पिछले सत्तर सालों के लोकतंत्र में अगर किसी एक कानून को जिसने जनता को सबसे ज्यादा अधिकार दिए हों चिन्हित किया जाए तो आरटीआई उसमें नंबर वन पर आएगा। लेकिन मौजूदा बीजेपी सरकार ने जनता से उस अधिकार को भी छीन लिया। अनायास नहीं देश के विभिन्न हिस्सों में बाकायदा आरटीआई एक्टिविस्ट खड़े हो गये और पूरा क्षेत्र एक आंदोलन का रूप ले लिया।

व्यवस्था में इसने जो पारदर्शिता ले आने का काम किया उससे भ्रष्टाचार जैसे राक्षस पर लगाम लगाने में अच्छी खासी मदद मिली। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाली सरकार ने ही उस हथियार को खत्म कर दिया।

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