Friday, August 19, 2022

जल-जंगल-ज़मीन: धजवा पहाड़ का अवैध उत्खनन, क्या पलामू की धरती को जंगल विहीन बनाने का पहला कदम है?

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झारखंड की राजधानी, रांची से 185 कि.मी. दूर है पलामू जिला। जिला मुख्यालय से 45 कि.मी. दूर है धजवा पहाड़, जो पांडू प्रखंड के कूटमु पंचायत के बरवाही गांव के अंतर्गत आता है। विश्रामपुर विधानसभा और पलामू संसदीय क्षेत्र के धजवा पहाड़ पर आजकल पत्थर माफिया की टेढ़ी नजर है, जिसके विरोध में 18 नवंबर 2021 से क्षेत्र के लोग ‘धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति’ के बैनर तले आंदोलनरत हैं।

इस आंदोलन के तहत ग्रामीण पहाड़ की तलहटी में डेरा डालो/घेरा डालो  कार्यक्रम के तहत पहाड़ बचाने के लिए मजबूती से डटे हुए हैं। आंदोलन को एक नया स्वरूप देते हुए पिछले 19 दिसंबर से आंदोलन को क्रमिक भूख हड़ताल में तब्दील कर दिया गया है, जिसके तहत प्रतिदिन 20 ग्रामीण आंदोलनकारी क्रमशः भूख हड़ताल करते हैं।

बता दें कि धजवा पहाड़ के बिल्कुल बगल में ही शिवालया नामक कंपनी ने अपना क्रेशर प्लांट लगाया है, जिसमें पत्थर तोड़ने का काम होता है। यह धरनास्थल से मात्र 50 मीटर की दूरी पर है, या यूं कहें कि क्रेशर से 50 मीटर की ही दूरी पर आन्दोलनकारी धरना दे रहे हैं।

धरनास्थल तक आने के लिए कूटमु पंचायत के ही कूटमु मोड़ आना पड़ता है, जहां से धरनास्थल मात्र 500 मीटर दूर है, वहीं धरनास्थल से मात्र 500 मीटर की दूरी पर है बरवाही गांव, और इस गांव का जीवन-आधार है धजवा पहाड़।

प्लांट के लगते ही कंपनी के संवेदक सूरज सिंह ने अपने कर्मियों की मदद से पूरे जोशो-खरोश के साथ धजवा पहाड़ का खनन कार्य शुरू कर दिया। पहाड़ का खनन होते देख ग्रामीणों ने संवेदक से जानना चाहा कि वे किस कागजी आधार पर पहाड़ का खनन कर रहे हैं? तो उन्होंने इसके दस्तावेज दिखाने से साफ-साफ इंकार कर दिया। ग्रामीणों ने आरटीआई से जानकारी निकाली, तो पता चला कि संवेदक को धजवा पहाड़ में खनन का कोई लीज नहीं मिला है, बल्कि पहाड़ से बिल्कुल सटे बरवाही गांव के किसानों की फसल लगी हुई जमीन (खाता संख्या 174 प्लॉट संख्या 1046) का एग्रीमेंट है, जिसकी कोई भी खबर किसानों को नहीं थी और न ही उस भूमि पर किसी भी तरह का पत्थर है। बल्कि वहां पर अभी भी गेहूं और सरसों जैसी फसले लगी हुई हैं। इसके ठीक विपरीत संवेदक के द्वारा खाता संख्या 206 प्लॉट संख्या 1048 में स्थित धजवा पहाड़ का खनन कार्य किया जा रहा है, जो कि बिल्कुल अवैध है। धजवा पहाड़ के अवैध खनन को रोकने के लिए ग्रामीणों ने जब प्रखंड प्रशासन सहित जिला प्रशासन से गुहार लगाई, तो निराशा ही हाथ लगी। इस पर ग्रामीण अवैध खनन को रोकने के लिए 18 नवंबर को पहाड़ की तलहटी में ही धरने पर बैठ गए और आज तक बैठे हुए हैं।

इस आंदोलन में मुख्य भूमिका के रूप में लगभग 500 परिवार, जिसमें बरवाही गांव के लगभग 300 पिछड़े वर्ग के परिवार, 100 दलित वर्ग के परिवार एवं 100 मुस्लिम वर्ग के परिवार शामिल हैं, जो अपनी एकजुटता का परिचय देते हुए धजवा पहाड़ को बचाने की मुहिम में आंदोलनरत हैं। आंदोलन के समर्थन में पांडू, विश्रामपुर व उंटारी रोड़ के लगभग सभी गांव के ग्रामीण भी अपनी हिस्सेदारी निभा रहे हैं।

ग्रामीणों की आजीविका से जुड़ा है धजवा पहाड़

क्षेत्र का मुआयना करने पर जनचौक की टीम ने पाया कि धजवा पहाड़ सिर्फ पत्थरों का अंबार नहीं है, बल्कि कृषि के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है। पहाड़ से बिल्कुल सटा लरकोरिया आहर (जलाशय) है, जो तीन तरफ से तालाब की तरह बांध से घिरा है, जबकि एक तरफ खुला है। बरसात के दिनों में पहाड़ से आकर पानी का यहां पर जमाव होता है और इस जलाशय से ही आसपास की सभी जमीन सिंचित होती है। पहाड़ की गोद से ही सूसूआं नदी बहती है, जिसमें साल भर पानी बहता रहता है। सुसुआं नदी पर सिंचाई के उद्देश्य से दो सरकारी बांध भी बने हुए हैं। नदी के निरंतर प्रवाह से आसपास के सभी किसानों के लगभग हजारों एकड़ जमीन पर लगी फसल मोटर पंप के माध्यम से सिंचित होती है।

बरवाही गांव के निवासी युवा रौशन कुमार पाल, पिता- अखिलेश पाल  बी. टेक (सिविल इंजीनियर) पास हैं, और वर्तमान में  एन. आर. कंस्ट्रक्शन लिमिटेड में कार्यरत हैं, बताते हैं “पहाड़ के अस्तित्व विहीन हो जाने से आसपास के सभी आहर तो बेकार हो ही जाएंगे, साथ ही साथ सुसुआं नदी का अस्तित्व भी हमेशा के लिए मिट जाएगा। जिसके परिणामस्वरूप किसानों की कृषि योग्य भूमि बंजर हो जाएगी। कृषि आधारित जीविका वाले आसपास के सैकड़ों किसानों का जीवन मुश्किल में पड़ जाएगा। जल-स्रोत सैकड़ों फीट नीचे चला जाएगा, जिससे पीने योग्य पानी भी मिलना दूभर हो जायेगा।”

वे आगे कहते हैं “पहाड़ के टूटते ही मवेशियों का चरागाह भी नहीं बचेगा। मवेशियों का जीवन भी मुश्किल में पड़ जाएगा। पहाड़ पर कई तरह के पेड़- पौधे हैं, जिससे वातावरण अनुकूलित बना रहता है। पहाड़ खनन की स्थिति में अमूल्य पेड़ पौधे भी उखाड़ दिए जायेंगे, जिससे हम शुद्ध वातावरण से भी वंचित हो जाएंगे। प्लांट के चालू होने एवं पहाड़ के खनन होने की स्थिति में वातावरण में अत्यधिक मात्रा में प्रदूषण फैलेगा जिससे कई बीमारियां जन्म लेंगी।”

धार्मिक आस्था का केंद्र भी है धजवा पहाड़

ग्रामीण बताते हैं कि पहाड़ की चोटी पर भगवान बजरंगबली का देवस्थान है, जिस पर ध्वज फहराता रहता है, जिससे आसपास के गांव के हजारों ग्रामीणों की आस्था जुड़ी हुई है। लोगों का मानना है कि हमारे पुरखों के द्वारा चोटी पर स्थित धार्मिक स्थल पर लगे ध्वज की वजह से ही इस पहाड़ नाम धजवा पहाड़ पड़ा था।

पलामू की वर्तमान स्थिति

आन्दोलनकारी युगल पाल कहते हैं कि “पलामू की वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो पता चलता है कि जंगल माफिया एवं पहाड़ माफिया की नजर हमेशा से यहां के जंगलों एवं पहाड़ों पर रही है, और उन्होंने लगातार यहां के जंगलों में पहाड़ों का अवैध खनन किया है।” वे  बताते हैं कि “हरिहरगंज एवं छतरपुर इलाके के दर्जनों पहाड़ अब खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। इसकी वजह से अब वहां पर जल स्रोत हजारों फुट नीचे चला गया है, जिससे मई और जून के महीनों में लोग वहां पानी खरीदने को मजबूर हैं। लगभग 50% इलाका बंजर हो चुका है।” वे आगे कहते हैं कि “कुछ वर्ष पहले  की स्थिति पर नजर डालेंगे तो तब पलामू जंगलों एवं पहाड़ों के लिए मशहूर था। सलई और बॉस के पेड़ के लिए प्रसिद्ध पलामू का जंगल अब बंजर भूमि में तब्दील हो चुका है। जिस तरह से माफिया अभी पहाड़ों को चबाने को आतुर हैं उसी तरह कागज बनाने वाली डालमिया कंपनी ने हमारे जंगलों से सारे सलई और बांस के पेड़ को उखाड़ कर करोड़ों रुपए का कारोबार किया और पलामू की धरती को जंगल विहीन कर दिया।”

जागरूक एवं सजग रहने की है जरूरत

आन्दोलन में शामिल पलामू के माले नेता सरफराज आलम कहते हैं कि “पहाड़ एवं जंगल माफियाओं की लूट की बीती घटनाओं से सबक लेते हुए हमें सीख लेने की जरूरत है। हमें आम नागरिकों को जल, जंगल, पहाड़ एवं पर्यावरण के प्रति जागरूक करते हुए पहाड़ों और जंगलों को किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखना होगा और इसके लिए लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना होगा।”

वहीं आंदोलन में शामिल सीपीआईएमएल (रेड स्टार) के राज्य सचिव कामरेड वशिष्ठ तिवारी बताते हैं कि “धजवा पहाड़ के अलावा जिले में 8 ऐसे और भी पहाड़ हैं, जिनपर पत्थर माफियाओं की नजर है।  इसी आलोक में इन माफियाओं की मिलीभगत से खनन विभाग ने उन पहाड़ों को लीज पर देने के लिए स्थानीय आंचलिक अधिकारियों को सर्वे करने का निर्देश दिया है। मतलब जिले को पहाड़ विहीन बनाने का कुचक्र प्रशासन व माफियाओं की मिलीभगत से तैयार किया जा रहा है, जिसका विरोध भी हमें संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक तरीके से करना होगा।”

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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