Friday, August 19, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट: सिराथू और केशव के संगम में विकास की गंगा बन गयी सरस्वती

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सिराथू (कौशांबी)। मैं सिराथू विधानसभा क्षेत्र का जायजा लेने निकला। प्रयागराज से 60 किमी दूर स्थित यह क्षेत्र यूपी के मौजूदा उपमुख्यमंत्री के प्रतिनिधित्व के कारण ही चर्चित नहीं है। अपने दौर में देश के कद्दावर नेता रहे और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत हेमवती नंदन बहुगुणा एक समय में यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। बहरहाल इलाके ने तो नेता बड़े पैदा किए लेकिन उन्होंने उसको कुछ नहीं दिया। कस्बे में घुसते ही मेरा सामना चौराहे पर स्थित एक कूड़े के ढेर से हुआ।

देश भर में बीजेपी सरकार और उसके मुखिया स्वच्छता अभियान चला रहे हैं लेकिन शायद वह यहां का रास्ता भूल गया। इतना ही नहीं भले ही लोगों के लिए शहरों से लेकर कस्बों तक में दैनिक सुविधाएं मौजूद हों लेकिन इस चौराहे को एक शौचालय तक मयस्सर नहीं हुआ। लिहाजा पेशाब लगने पर दीवारों का सहारा लेने या फिर नित्य कर्म के लिए खुले में जाने के अलावा लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। यहां मेरी पहली मुलाकात सफेद हॉफ स्वीटर पहने एक शख्स से हुई जो वेशभूषा से बिल्कुल सभ्य दिख रहे थे। लेकिन अभी हमने उनका नाम और हालचाल ही पूछा था कि उनके हाथ खुद-ब-खुद अपनी आंखों पर पहुंच गए। और उन्होंने अपनी गीली आंखें पोंछनी शुरू कर दीं।

कुछ सांत्वना देने के साथ ही प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां बनाने वाले लल्लू की पीड़ा आंसुओं की धारा बनकर फूट पड़ी। उनका कहना था कि उनके पास एक अदद घर तक नहीं है। तिरपाल में पूरा परिवार रहता है। पिछले साल आंधी तूफान में वह भी गिर गया। नतीजतन उन्हें सरकारी स्कूल में शरण लेनी पड़ी।

लल्लू, मूर्तिकार।

तिरपाल के पास बहती गंदी नाली और उसकी बदबू किसी पास से गुजरने वाले को भी परेशान कर देती है। ऐसे में हमेशा रहने वालों की परेशानी आसानी से समझी जा सकती है। इससे ऊपर उससे पैदा होने वाले मच्छर और कीड़े मकोड़े तमाम संक्रामक बीमारियों के लिए खुली दावत साबित होते हैं। लल्लू के सिर पर छत ढूंढने का ही भार नहीं बल्कि एक लाख रुपये का कर्ज भी सवार है। उनका कहना है कि मूर्तियां लॉकडाउन के चलते नहीं बिकीं। नतीजतन एक कलाकार की खड़े-खड़े मौत हो गयी और उसे अपनी रोजी-रोटी और परिवार चलाने के लिए 3 हजार रुपये की स्कूल बस की कंडक्टरी करनी पड़ी।

लल्लू की पीड़ा इस बात से समझी जा सकती है कि बाजार के दिन 10 रुपये की भी सब्जी खरीदने के लिए उन्हें दस बार सोचना पड़ता है। लेकिन पेट है कि उसे पालना है। ऐसे में उधार के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। लेकिन उसकी भी सीमाएं हैं। उनके चार बच्चे हैं। उन्हें भी कोई अलग दिशा नहीं मिल सकी। लिहाजा सब घरेलू पेशे में ही लगे रहे। लेकिन छोटे वाले को अब सोलापुर जाना पड़ा है। मझला बेटा एक पंडित जी के यहां खाना बना कर अपना पेट भर लेता है। यहां उसे कुछ मासिक पगार नहीं मिलती। पर हां कभी-कभी कुछ खर्चा जरूर मिल जाता है।

लल्लू के बगल में स्थित दुकान में मौजूद राधा भी मूर्ति बनाने का ही काम करती हैं। उनकी भी कहानी लल्लू से अलग नहीं है। लॉकडाउन के चलते बंद हुए धंधे ने उन्हें भी मजदूरी के पेशे में उतरने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के चलते मूर्तियां नहीं बिकीं। 3 लाख का कर्ज़ा हो गया। उस पर ब्याज भी बढ़ता जा रहा है। लेकिन राधा को मोदी जी की बात पर पूरा भरोसा था जिसमें उन्होंने आधार कार्ड पर लोन मिलने की बात कही थी। लिहाजा वह पहुंच गयीं कार्ड लेकर बैंक के दरवाजे पर। लेकिन उन्हें लोन नहीं मिला। आखिर में उन्हें सूदखोरों की ही शरण में जाना पड़ा। लेकिन कर्ज का बोझ है कि सुरसा की तरह बढ़ता ही जा रहा है। क्योंकि उसका ब्याज उस पर भारी पड़ रहा है। और मूर्तियां नहीं बिकने के कारण उसे वह चुका भी नहीं पा रही हैं।

राधा और उनकी सास।

राधा बिजली की मार से भी आहत हैं। उन्होंने बताया कि उनका बिजली का बिल 10 हजार हो गया है। ऐसी माली हालत में बिल के भुगतान के बारे उनके लिए सोच पाना भी मुश्किल है। एक अदद राशन कार्ड जो किसी भी गरीब का बुनियादी अधिकार होता है उसे हासिल करने के लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। सप्लाई इंस्पेक्टर को कॉल करके दुखड़ा रोया तब कहीं जाकर राशन कार्ड मिला। तिरपाल में रहने को मजबूर हैं। हैंडपंप तक मयस्सर नहीं। कॉलोनी और शौचालय के लिये कई बार फॉर्म भर चुकी हैं लेकिन शायद वह सरकारी दफ्तरों की डस्टबिन का हिस्सा बन जाते हैं। आलम यह है कि उसके लिए 100 रुपये की फीस और ऊपर से ग्राम प्रधान को ‘बख्शीश’ उनके स्थायी लुटान के साधन बन गये हैं।

चौराहे पर टायर का काम करने वाले शकील अहमद पूरे संकट को तफ्शील से सामने रखते हैं, “कोरोना ने लोगों की नौकरी, रोटी रोजी रोज़गार छीन लिया”। मुन्ना के नाम से जाने जाने वाले शकील की मानें तो इस चुनाव में महंगाई मुद्दा है। कड़ुवा तेल मुद्दा है। गैस सिलेंडर मुद्दा है। पेट्रोल डीजल मुद्दा है। रोज़ागर मुद्दा है। 

सबसे बाएं शकील उर्फ मुन्ना।

रमेश पाल चौराहे पर पूड़ी सब्जी का ठेला लगाते हैं। उनके मुख्य ग्राहकों में मजदूर, दिहाड़ी पेशा और गाड़ियों से चौराहे पर चढ़ने-उतरने वाले लोग हैं। रमेश महंगाई की कहानी को अपनी पूड़ी की गणित से समझाते हैं, “एक साल पहले तक वो 10 रुपये की 7 पूड़ी और सब्जी देते थे। अब 20 रुपये की 7 पूड़ी और सब्जी देते हैं। वो कहते हैं तेल का दाम लगभग दो गुना बढ़ गया है। गैस सिलेंडर का दाम बढ़ गया। ऐसे में पूड़ी का दाम बढ़ाना मजबूरी है”। लेकिन ग्राहक को यह गणित नहीं बल्कि महंगाई की मार दिखती है। जिसका असर उनके धंधे पर पड़ा है। वह इसे छुपाते भी नहीं और ग्राहकों को भी कोई दोष नहीं देते लेकिन असलियत जरूर सामने रख देते हैं, “बस किसी तरह गुज़ारा करते हैं। मजदूर की मजदूरी नहीं बढ़ी लेकिन महंगाई दोगुना बढ़ गई। इस सरकार ने अच्छे दिन के सपने दिखाकर जनता को महंगाई दी है”।

रमेश पाल।

सिराथू के विकास की बात की जाए तो इस पर मजरा लोहटी गांव के अनिकेत दिवाकर की बात बिल्कुल फिट बैठती है। उन्होंने बताया कि सिराथू विधानसभा से पहले खुद मौर्या जी और बाद में भाजपा के ही शीतला प्रसाद पटेल विधायक हैं। लेकिन क्षेत्र में कोई विकास कार्य नहीं हुआ है। 

गांवों और किसानों की हालत तो और भी खस्ता है। इसी गांव के किसान दुखी का दुख मौजूदा डिप्टी सीएम के खिलाफ गुस्सा बनकर फूट पड़ता है, “विधायक बनने के बाद मौर्या जी कभी अपने क्षेत्र के लोगों को झांकने नहीं आये । अब चुनाव आया है तो प्रचार करने आये हैं”। विजय सिंह यादव इसको अपनी जुबान से नई धार देते हैं, “जनता और कितना सब्र करे। 10 साल कम नहीं होते साहेब। जनता ने आपको चुना तो आपने 10 सालों में कुछ नहीं। अब आप 5 साल और मांगने आये हो। यही तो हमारा वक्त है। हम सिर्फ़ वोट से नहीं विरोध से भी अपनी नाराज़गी जाहिर कर रहे हैं”।

गांव की गीता यादव न केवल इन बातों से इत्तफाक रखती हैं बल्कि सरकार का बिल्कुल पोल ही खोल देती हैं, “इस सरकार ने हमें महंगाई के अलावा और कुछ नहीं दिया। कोरोना में हमें बेसहारा छोड़ दिया। लोगों के कामकाज छूट गये। काम धंधा बंद पड़ा है। चुनाव के वक़्त ही तो हमें मौका मिलता है जवाब देने का”।

पेशे से किसान सैनी गांव के बद्री प्रसाद से मुलाकात हुई। वह एक-एक कर सारी परेशानियां गिना डालते हैं, “ज़रूरत की सारी बुनियादी चीजें महंगी हुई हैं। इससे आम इन्सान का जीना दूभर हो गया है। बिजली का मीटर इतना तेजी से भागता है कि क्या कहें। बिल भरना मुश्किल हो रहा। रसोईं की सारी चीजें चाहे तेल हो, दाल हो, सब्जी हो, गैस सिलेंडर हो सब कुछ महंगी हो गई है। घर में बीमारी हो तो इलाज से पहले कर्ज़ खोजना पड़ता है। काम धंधा कुछ है नहीं। खेती की लागत बढ़ गई है। ऊपर से फसलें आवारा जानवरों के चलते बचनी मुश्किल हो गई हैं”।   

आम तौर पर काम पूरा हो न हो नेताओं का शिलान्यास और लोकार्पण जारी रहता है। लेकिन सिराथू में वह औपचारिकता भी नहीं निभायी जा रही है। हालांकि शिलालेख लिखने वाले मुकेश का यह पुश्तैनी काम है। और उनके पास मौजूदा भाजपा विधायक शीतला प्रसाद पटेल के 3 लोकार्पण शिलापट भी हैं। लेकिन उससे कहां गुजारा हो पाएगा। ऊपर से कोरोना और नोटबंदी दोनों उनके लिए भारी पड़ गए। और मेरे सामने ही दर्द फूट पड़ा, “हमारा रोज़ का कमाना रोज का खाना है। अब सिल बट्टा बनाते हैं”।

मुकेश।

पास में सिल बट्टा कूट रही बबीता का अपना ही दर्द है। उन्हें गैस सिलेंडर नहीं मिला। खाना लकड़ी पर बनाती हैं। दो बेटियां हैं। आर्थिक अभाव के चलते आठवीं कक्षा तक पढ़ाकर छुड़ा दिया। बिजली बिल समेत हर एक चीज महंगी है। ऐसा उनका कहना है। उनका राशनकार्ड तक नहीं बन पाया। नतीजतन जिस एक चीज का तमगा सरकार अपने सीने में बांधे घूम रही है उससे भी वह महरूम हैं।

सिराथू के दादूपुर गांव की मिनता और उनके पति दोनों दिहाड़ी मजदूर हैं। परिवार का पेट कृषि और मनरेगा मजदूरी से चलता है। मिनता के पास राशन कार्ड है। लेकिन परिवार बड़ा है। 6 छोटे-छोटे बच्चे हैं। काम न मिलने पर वह भीख मांगने के लिए मजबूर हो जाती हैं। बैंक खाता खुला है, आधाकार्ड बना है। बावजूद इसके उन्हें न तो उज्ज्वला योजना का लाभ मिला, न स्वच्छ भारत योजना का, न आवास योजना का।

मिनता।

क्षेत्र में घूमने के दौरान एक शख्स से मुलाकात हो गयी जो न केवल डिप्टी सीएम को नजदीक से जानता है बल्कि उनके गुरबत के दिनों का साथी भी था। चौराहे पर मूंगफली, गजक और गुटखा बेचने वाले 65 वर्षीय हरिश्चंद गौतम कभी पौरुख होने पर रिक्शा चलाया करते थे। डिप्टी सीएम के बारे में पूछने पर वो सालों पुरानी अपनी यादों में खो जाते हैं, “मंझनपुर में जब केशव मौर्या चाय की दुकान चलाते थे तो मैं रिक्शा खींचता था। चौराहे पर सुबह उनकी दुकान पर चाय पीकर ही रिक्शा खींचता था”। लेकिन तुरंत उन्हें होश आता है उनका सामना सच्चाई की पथरीली जमीन से होता है, “लेकिन अब वो इतने बड़े पद पर पहुंच गये हैं कि हमें भूल गये हैं। अभी 22 जनवरी को आये थे। हजारों लोगों का लाव लश्कर लेकर। पुलिस ने ठेला हटा दिया। दिन भर की रोजी-रोटी मारी गई”। 

शरीर से तकरीबन अशक्त हरिश्चंद के जीवन में परेशानियों की कमी नहीं। नई-नई परेशानियां भी उनका ठिकाना ढूंढ लेती हैं, “राशन कार्ड तो है मेरे पास पर राशन नहीं मिलता। क्योंकि अँगूठा ही नहीं लगता मेरा। रोज दो पैसा कमाकर राशन ख़रीदना पड़ता है। खेती बारी बहुत थोड़ी है। प्रधानमंत्री कहे थे 2 हजार देंगे किसानों को। बहुत दौड़ा लेकिन कुछ नहीं हुआ। कहते हैं तुम्हारा कागज ही नहीं बना है। वृद्धा पेंशन मिलता है, पर 500 रुपये के पेंशन में बूढ़े का पेट पलता है क्या”।

हरिश्चंद गौतम।

जीवन का हाल पूछने पर हरिश्चंद कवि हो जाते हैं। और कविता सरीखा गद्य बांच देते हैं, “योगी के राज में हमारी रसोईं ऐसी चल रही है कि न तो तेल अंट रहा है न गैस। इतनी महंगाई है। खाता खुलवा दिया। दिया ढेला नहीं। जब चुनाव आ गया तो पब्लिक को लुभाने के लिये राशन के साथ तेल नून देने लगे। टुकड़ा डाल दिया। गरीब आदमी दो महीने में पल जायेगा क्या? गरीब आदमी की कहीं सुनवाई नहीं है। जब डिप्टी सीएम के घर में होगा ऐसा तो दुनिया में क्या हाल होगा”।

आलम यह है कि मौर्या के गुरबत के दिनों के इस साथी के तीन बच्चों के अलग-अलग काम करने से भी घर का खर्चा पूरा नहीं हो पाता है। नतीजा यह है कि चौथे बच्चे को भीख मांगनी पड़ती है, “चार बच्चे हैं नमक रोटी खाते हैं। एक पैडल रिक्शा चलाता है, दूसरा मजदूरी करता है। एक ईंट भट्ठे पर काम करता है। भट्ठा भी छः महीने चलता है। एक बेटा अंधा है। चौराहे पर बस स्टॉप पर भीख मांगता है। उसके सिर पर छत नहीं है। वो देख नहीं सकता। मैं मर गया तो उसके सिर पर छत कौन रखेगा”। दुनिया जहान देख चुके हरिश्चंद अब नये नतीजे पर पहुंच चुके हैं, “अबकि अखिलेश की सरकार बनायेंगे”।

शायद यही गुस्सा है जो केशव समेत बीजेपी नेताओं के सामने सड़कों पर फूट पड़ा है। और जगह-जगह उनका विरोध हो रहा है। 22 जनवरी शनिवार को खुद केशव प्रसाद मौर्या पहली बार अपने विधानसभा क्षेत्र में जनसंपर्क व प्रचार करने पहुंचे थे। जहां भारी संख्या में महिलाओं ने उनका विरोध करते हुये ‘केशव मौर्या चोर है’ के नारे लगाये थे।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए सिर्फ पांच दिन पहले 31 जनवरी को विधायक सुरेंद्र चौधरी सिराथू विधानसभा में केशव मौर्या का प्रचार करने पहुंचे थे जहां उन्हें भी विरोध का सामना करना पड़ा। अफ़जलपुर वारी का मजरा लोहटी गाँव में ग्रामीणों ने उनका रास्ता रोक लिया और केशव मौर्या मुर्दाबाद, अखिलेश यादव ज़िंदाबाद के नारे लगाये। जनता को विपक्षी दल का समर्थक बताते हुये भाजपा ने न केवल उसे खारिज़ कर दिया। बल्कि भाजपा के इस दलित विधायक ने मोहब्बतपुर पइंसा थाने में इसके खिलाफ तहरीर भी दे दी है। जिसमें उन्होंने गांव के कुछ यादव युवकों पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने और गांव से बाहर जाने के लिये दबाव बनाने का मुक़दमा दर्ज़ करा दिया है।  

एमएलसी सुरेंद्र चौधरी का विरोध करते लोग।

ऐसा नहीं है कि क्षेत्र में सभी एक ही तरह से सोचने वाले लोग हैं। चलते हुए रास्ते में ही क्षेत्रीय पत्रकार श्रवण पटेल से मुलाकात हो गयी। उन्होंने विरोध का एक दूसरा पक्ष भी पेश किया, “उस दिन भाजपा विधायक सुरेंद्र चौधरी केशव जी के प्रचार के लिये लोहटी पहुंचे थे। वहां उनका विरोध किया गया। विरोध करने वाले यादव समुदाय के युवक थे। जिन्हें अमूमन सपा समर्थक माना जाता है। उनके ख़िलाफ़ जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने, समेत कुछ अन्य धाराओं में मुक़दमा दर्ज़ कराया गया है”।

सैनी गांव के स्थानीय पत्रकार श्रवण अपने पक्ष को आगे बढ़ाते हैं, “केशव मौर्या के नाम की घोषणा होने के बाद से ही जनता सपा उम्मीदवार के नाम का इंतज़ार कर रही थी। अब नाम घोषित होने के बाद वो देखेगी कि दोनों में कौन बेहतर है”।

और अंत में वह पत्रकार से पक्षकार बनते दिखते हैं, “केशव मौर्या बड़े नेता हैं। सिराथू की जनता बड़े नेता के साथ जायेगी। वो चाहेगी कि उसके क्षेत्र का प्रतिनिधित्व बड़ा नेता करे”। 

केशव मौर्या को लेकर प्रकाश और मुन्ना का अपना ही आकलन है और वो पत्रकार श्रवण का अपने तरीके से जवाब देते हैं, “क्षेत्र में केशव मौर्या की छवि जीरो है। क्षेत्र के बाहर भले ही वो उपमुख्यमंत्री हों लेकिन क्षेत्र में कुछ नहीं हैं। जनता विकास चाहती है। रोज़गार के अवसर और बेहतर शिक्षा व मुफ्त इलाज चाहती है। लेकिन पहले यहां से विधायक और अब उपमुख्यमंत्री होने के बावजूद उन्होंने अपने क्षेत्र को कुछ नहीं दिया है”।

सिराथू विधानसभा सीट में बहुत विकास न होने का एक सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां आबादी की बहुतायत संख्या या कहें उसका तकरीबन दो तिहाई हिस्सा दलित, पिछड़ी जातियों व पसमांदा मुस्लिमों का है। दलित व पसमांदा मुसलमान जहां दिहाड़ी मजदूर होते हैं और उनके परिवार की मासिक आय बेहद कम होती है वहीं दूसरी ओर पिछड़ी जातियों में खेतिहर समाज के कुर्मी, कोइरी, कुशवाहा, केवट निषाद जैसी जातियां है। जिनकी आय बेहद साधारण है। यहां अधिकांश लोगों के पास या तो राशन कॉर्ड नहीं है या फिर कोरोना काल में आधारकॉर्ड लिंक न होने के चलते कैंसिल हो गया। जिनका नहीं हुआ उनका अंगूठा ही नहीं लगता। वहीं दूसरी ओर लगातार काम न मिल पाने और शैक्षणिक रूप से बेहद पिछड़ा होने के चलते लोग कम मेहनताने पर काम करने के लिए मजबूर हैं। नतीजतन व्यक्तिगत और पारिवारिक आय बहुत कम हो जाती है जिसके चलते तमाम संसाधनों के उपभोग से उन्हें वंचित रहना पड़ता है।

केशव प्रसाद मौर्या।

विकास के पैमाने पर यह इलाका कहीं नहीं खड़ा होता है। न तो सिराथू विधानसभा, न ही कौशांबी जिले का औद्योगिक विकास हो पाया है। रोज़गार का साधन न होने पर जिले के लोगों को नौकरी के लिए प्रयागराज समेत आस पास के अन्य जिलों में जाना पड़ता है।

अब बात सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की। सिराथू सीट 2012 के पहले अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित सीट थी। 1993 से 2007 तक लगातार यह बसपा का गढ़ हुआ करती थी। 2012 के परिसीमन में इसे सामान्य सीट कर दिया गया।

3,80,839 मतदाताओं वाले इस विधानसभा सीट पर 1,25000 (33%) दलित मतदाता, 50,000 मुस्लिम (13%) और 1,29000 (34%) पिछड़े वर्ग के मतदाता हैं। जिसमें पटेल, मौर्या, यादव मुख्य हैं। लगभग 20,000 ब्राह्मण,  मतदाता हैं। दलित और पिछड़ी जातियों के मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। पिछड़ी जातियों में मुख्यतः खेती-बाड़ी का काम करने वाले कुर्मी, सैनी, मौर्या कुशवाहा प्रमुख हैं।          

भाजपा ने केशव मौर्या, सपा ने पल्लवी पटेल और बसपा ने संतोष त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया है। सपा गठबंधन की ओर से पिछड़े समाज से ही आने वाली पल्लवी पटेल को उम्मीदवार बनाया गया है। पल्लवी पटेल मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री और अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल की छोटी बहन हैं। पल्लवी की मां कृष्णा पटेल अपना दल कमेरावादी पार्टी की अध्यक्ष हैं। उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया है।

पल्लवी पटेल।

पइंसा निवासी स्थानीय पत्रकार राज कुमार की मानें तो “सपा ने पल्लवी पटेल को केशव प्रसाद मौर्या के ख़िलाफ़ उतारकर पिछड़ा कार्ड चल दिया है। सिराथू में पटेल कुर्मी वोटर बड़ी संख्या में हैं। जातीय समीकरणों को साधते हुए विपक्षी दलों ने मजबूत घेराबंदी की है। सपा की कोशिश है कि यादव, मुस्लिम और पटेल कुर्मी वोटों को साथ लाकर जीत दर्ज़ की जाये। इस तरह सपा ने उन्हें घर में ही घेरने की तैयारी कर ली है ताकि वह पूरे सूबे में ज्यादा समय न दे सकें। कौशांबी जिले की सिराथू सीट से केशव प्रसाद मौर्या की जीत को आसान माना जा रहा था। लेकिन सपा के दांव के बाद अब जातीय समीकरणों के हिसाब से देखें तो केशव प्रसाद मौर्या के लिए ये सीट आसान नहीं होगी”।

पत्रकार राजुमार आगे कहते हैं कि सिराथू से शीतला प्रसाद पटेल वर्तमान में भाजपा से विधायक हैं। शीतला प्रसाद पटेल का टिकट डिप्टी सीएम केशव के चुनाव लड़ने के चलते काट दिया गया है। इस वजह से पटेल बिरादरी में रोष व्याप्त है, जिसके बाद डैमेज कंट्रोल करने के लिए चायल की सीट भाजपा ने सहयोगी गठबंधन दल अपना दल के खाते में दी है। लेकिन अभी तक अपना दल ने चायल से प्रत्याशी घोषित नहीं किया है।

सिराथू विधानसभा क्षेत्र की नाराज़ जनता समाजवादी पार्टी से आनंद मोहन पटेल को बतौर उम्मीदवार उतारने की मांग कर रही थी। और आनंद मोहन पटेल लगातार सिराथू में जनसंपर्क में लगे हुये थे।

बता दें कि आनंद मोहन पटेल 2012 विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी के तौर पर लड़ चुके हैं। उन्हें क्षेत्र में जनता का नेता माना जाता है। आनंद मोहन सिराथू की जनता के सुख दुख में खड़े होते हैं। कहीं किसी की क्षेत्र में मौत हो गई, या कोई दुर्घटना हो गई तो वह सबसे पहले खड़े होने वालों में होते हैं। मुन्ना उर्फ शकील अहमद तो यहां तक दावा करते हैं कि आनंद मोहन पटेल बिना कन्वेसिंग के भी चुनाव जीत जाते।

लोगों का कहना है कि अगर किसी कारण से सपा आनंद मोहन को प्रत्याशी नहीं बना पाती तो दूसरी पसंद दिलीप पटेल थे। जनता उन्हें भी पसंद करती है।

गौरतलब है कि 2012 के चुनाव में केशव मौर्या ने बसपा प्रत्याशी के तौर पर आनंद मोहन पटेल को 9863 मतों से हराया था। 2014 लोकसभा चुनाव में पूलपुर से संसाद निर्वाचित होने के बाद केशव मौर्या ने यह सीट छोड़ दी थी । उपचुनाव में सपा प्रत्याशी वाचस्पति ने भाजपा प्रत्याशी शीतला प्रसाद पटेल को हराकर अपनी जीत दर्ज की थी। 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के तौर पर शीतला प्रसाद पटेल ने सपा प्रत्याशी को हरा कर उसका बदला ले लिया। 

(सिराथू विधानसभा क्षेत्र से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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