Wednesday, February 8, 2023

गुजरात चुनाव: मोदी के सहारे BJP, कांग्रेस और आप से जनता को उम्मीद

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27 वर्षों के शासन की विफलता का क्या सिला मिलने जा रहा है, इसको लेकर देश में करोड़ों लोग गुजरात चुनावों के बारे में बड़ी दिलचस्पी ले रहे हैं। मोदी विरोधियों ने अपनी उम्मीदें कांग्रेस और आप दोनों पर लगा रखी हैं। सबकी अपनी-अपनी समझ इसके लिए तथ्य ढूंढती है, और कुल मिलाकर भारतीय चुनावी लोकतंत्र को ही एक बार फिर से मजबूत करती है।

जबकि गुजरात के पत्रकारों जिन्होंने गुजरात में अपने तीन-चार दशक बिताएं हैं, को इन चुनावों से कुछ भी खास बदलाव की उम्मीद नहीं है। उनका मानना है कि जो नैरेटिव 2002 में सेट किया गया था, वह अभी तक नहीं बदला जा सका है। इसके उलट गुजरात की जो मानसिकता 2002 में निर्मित हुई, उसे 2014 के बाद से देश में विस्तार दिया गया है। उदाहरण के लिए, 2002 के बाद से गुजरात में बिल्डरों के द्वारा जो भी मकान बनाये गये, उसमें साफ़ शब्दों में बाहर लिखा होता था कि यह भवन सिर्फ हिंदुओं के लिए है। घेटोआइजेशन की यह प्रक्रिया अब हिन्दू-मुस्लिम के बीच ही नहीं, बल्कि अब गुजरात में विभिन्न हिंदुओं के बीच भी बना दी गई है।

गुजरात चुनावों को कवर करने गये जनचौक के संपादक महेंद्र मिश्र ने फोन पर आज ही इस बात को अचंभे के साथ स्वीकार किया “गुजरात में अजीब परिघटना देखने को मिली, जो अभी तक देश के किसी भी हिस्से में नहीं मिली थी। वह यह है कि लोगों से घरों पर मिलने पर कोई भी चाय पानी की छोड़िये, पीने के लिए भी नहीं पूछता है।” है न अजीब।

आज सभी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि 2017 में भाजपा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में कांग्रेस के पास सत्ता में वापसी का मौका बना था, जिसे उसने गंवा दिया। तब उसके पास पाटीदार आंदोलन से उपजा विक्षोभ था, ऊना में दलितों के साथ हुए दुर्व्यवहार से उपजे आंदोलन को फलीभूत करने का सुनहरा मौका था और साथ ही अन्य पिछड़े समुदाय की सहनुभूति भी हासिल थी। संभवतः कांग्रेस के पास उस समय कोई चेहरा नहीं था, जो मुख्यमंत्री के रूप में आक्रामक रूप से खुद को पेश कर पाता, क्योंकि तब भी प्रधानमंत्री पद संभालते हुए भी नरेंद्र मोदी ने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में पेश किया था। 2017 चुनावों के ठीक पहले भूतपूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला के कांग्रेस पार्टी से इस्तीफे और सूरत की सभी सीटों में मिली हार के कारण यह संभव हो सका।

हाल के दिनों में अपने इंटरव्यू में शंकर सिंह वाघेला ने इस बात को स्वीकार किया है कि यदि वे कांग्रेस में बने रहते तो जो काम 2012 में नहीं हो पाया था, वह 2017 में अवश्य पूरा हो जाता। इसके पीछे की जो वजह वे बताते हैं, उसे दबी जुबान में गुजरात के कई बुद्धिजीवियों ने पहले भी प्रकट किया है। गुजरात में 2002 के दंगों के बावजूद सब कुछ मिलजुलकर किया जा रहा था, और कांग्रेस के गुजरात प्रभारियों के द्वारा ही मोदी राज को निष्कंटक बनाये जाने को सुनिश्चित किया गया।

यहाँ तक कि 2017 के दौरान भी कई बार देखने को मिला कि राहुल गाँधी के भाषणों में कांग्रेसी नेताओं की जोरशोर से उपस्थिति और जाते ही सबकुछ सफाचट की स्थिति कहीं न कहीं गुजरात के आम लोगों में वह विश्वास पैदा करा पाने में असफल रही कि इन्हें सत्ता सौंप दी तो ये कुछ मजबूती से टिकने की स्थिति में रहने वाले हैं।

इस बार के चुनावों में भाजपा की राजनीतिक स्थिति तो और भी खराब थी। इसे भांपते हुए ही चुनाव से काफी पहले ही इसके लिए दिल्ली दरबार ने नया गेम प्लान बना लिया था। इसके लिए निवर्तमान मुख्यमंत्री विजय रूपाणी सहित समूचे मन्त्रिमंडल की छुट्टी कर दी गई, और उनकी जगह पर अभी तक मंत्री पद से भी मरहूम व्यक्ति को मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित कर दिया गया। इसका प्रधान कारक उनका पाटीदार होना, और वह भी कद्दावर पाटीदार नेता न होना रहा। आज के दिन स्थिति यह है कि भूपेन्द्र भाई पटेल का एक भी सार्वजनिक इंटरव्यू आपको देखने को नहीं मिला होगा। यहाँ तक कि उनके नाम को याद रख पाना शायद ही किसी के लिए संभव है। लेकिन उनके न नाम को आगे रखकर, दिल्ली में राजकाज तो सुरक्षित रखा ही जा सकता है और निष्कंटक होकर गुजरात से बेफिक्र रहा जा सकता है।

राहुल गाँधी अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकले हुए हैं, और इसका सकारात्मक असर देश पर पड़ रहा है। लेकिन इसके राजनैतिक निहितार्थ क्या हो सकते हैं, और गुजरात चुनावों पर इसका कोई असर पड़ रहा है, उस बारे में कोई सूचना नहीं है। उल्टा गुजरात कांग्रेस ने अपने प्रचार के टेम्पो को इतना ओझल बनाये रखा है कि गुजरात में दृश्यता के लिहाज से शहरी क्षेत्रों में भाजपा के जवाब में आप पार्टी नजर आती है। शायद कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं ने इस बार के गुजरात चुनावों को मिस करने का मन पहले से बना लिया था, और अपने राज्य के नेताओं को आधार क्षेत्रों (आदिवासी एवं ग्रामीण) को बरकारर रखने पर जोर दिए जाने की रणनीति पर चलने के निर्देश दिए हों। कुछ नए कस्बों और छोटे शहरों में जहाँ कांग्रेस ने बढ़त बनाने की कोशिश की है, वहीँ देखने में आ रहा है कि इस बार आप और भाजपा की ओर से आदिवासी क्षेत्रों में घुसपैठ की कोशिश की जा रही है।

वहीं आम आदमी पार्टी (आप) ने जहाँ पहले हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों में कुछ बड़ा कर दिखाने का उत्साह दिखाया था, उसे जल्द ही उसने हिमाचल को ड्राप कर गुजरात में केंद्रित करने का फैसला लिया। भाजपा के लिए 27 वर्षों में पहली बार नैरेटिव विपक्षी दल के पास होने से बदहवासी की स्थिति दिखी। जिस ‘गुजरात मॉडल’ की सवारी कर केंद्र की सत्ता पर कब्जा किया गया था, आप पार्टी ने सबसे पहले उसी पर धावा बोला, और क्या शनदार तरीके से बोला। चुनावों की घोषणा से ठीक एक महीने पहले से ही गुजरात में ऐसा समां बंधा कि गुजरात के निम्न मध्य वर्ग ने जगह-जगह पर अपनी तकलीफें बयां करनी शुरू कर दी थीं। ठेके पर काम करने वाले पुलिस कर्मियों, अध्यापकों की पूरी फ़ौज आज गुजरात में मौजूद है, जिससे आत्मसाक्षात्कार अब सारे देश को करना पड़ रहा है। यह बदरंग तस्वीर, भारत को नहीं पता थी 2014 में। आज पता चल रही है तो वह भी इतने धीमे स्वर में, कि उसका असर नहीं पड़ रहा।

इसके लिए भाजपा ने दिल्ली में आप पार्टी के नेताओं को घेरने और ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। साथ ही दिल्ली नगर निगम के चुनावों की घोषणा ने भी आप पार्टी को असमंजस की स्थिति में डाल दिया। उपर से सामाजिक समीकरण भी इस बार 2017 की तरह भाजपा के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि पाटीदार और ठाकोर समुदाय के दोनों नेताओं को भाजपा ने नाथ लिया है। आप पार्टी के चुनावी उम्मीदवारों से ही बीच चुनाव में नाम वापस लेने और अपनी पार्टी पर आरोप लगवाकर उसके टेम्पो की हवा निकाल दी है।

इसका कुल नतीजा भाजपा के लिए 2012 के स्कोर 99 से अच्छा ही होता दिख रहा है। तमाम चुनावी सर्वेक्षणों में जो भी नतीजे दिखाए जाते हैं, वे अक्सर प्रायोजित होते हैं। लेकिन यदि भाजपा से मुकाबले के लिए किसी दल ने 27 साल से मन ही न बनाया हो तो फिर चुनावी राजनीति की बिसात को ही ओढ़ने-बिछाने वालों के सामने वे कैसी चुनौती पेश कर सकते हैं? इस बार सिर्फ एक उम्मीद थी कि आप पार्टी शहरी मतदाताओं के बीच में जिस प्रकार से अपने दिल्ली मॉडल ने नैरेटिव को पेश कर रही थी, उसे वह निष्कंटक आगे बढ़ा पाती तो भले ही कांग्रेस के वोटों में सेंधमारी करती लेकिन भाजपा को भी बड़ा नुकसान पहुंचाकर अपने लिए कम से कम 20 सीटों पर जीत सुरक्षित करा लेती। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए कई जगहों पर शहरी क्षेत्रों में जीत और अपने ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में पकड़ उसे इस बार 80-85 की रेंज में ला सकती थी। और यह बड़ा काम होता। भाजपा 80 सीटों पर होती, लेकिन आज 120 के आसपास पहुँचती दिखती है।

राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा आँखों के लिए ठंडक का काम कर रही है, लेकिन जमीन पर इसे उतारने के लिए एक सन्गठन की जरूरत है। भाजपा के पास यह संगठन है। उसके पास हर मोहल्ले में व्हाट्सअप ग्रुप हैं, जिसके इंचार्ज बनकर मोहल्ले के युवा/बुजुर्ग खुद के सशक्तिकरण से देखते हैं, कार्यकर्ताओं, नेताओं के बीच में एक कड़ी जुड़ती है। यह उनके लिए कोई बड़ा फायदा पहुंचाती हो, जरुरी नहीं, लेकिन भाजपा और ब्रांड मोदी को लेकर यदि कोई खोट नजर आने लगे तो उसे तत्काल बुझाने का काम तो करती ही है। क्या राजनीति में सक्रिय विपक्षी राजनीतिक पार्टियों के लिए इसे समझने में और भी कई वर्ष लगने वाले हैं कि लक्ष्य साधने के लिए, नैरेटिव सेट करने के लिए ट्विटर, प्रेस कांफ्रेंस इत्यादि से भी महत्वपूर्ण है हर जिले, कस्बे, मुहल्ले और गाँव गाँव में अपने लिए एक सक्षम नेटवर्क को तैयार करने की?

(रविंद्र पटवाल अनुवादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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