नफ़रत और घृणा के ख़िलाफ़ लड़ाई का भी गुजरात बन रहा है मॉडल

नफ़रत का ज़हर फैलाने वालों से लड़ने के लिए गुजरात में मुसलमानों ने कानूनी लड़ाई का सहारा लिया है। इसके तहत राज्य भर में सोशल मीडिया हैंडल और टीवी चैनलों, प्रिंट मीडिया के खिलाफ समुदाय को बदनाम करने और नफरत फैलाने वालों के खिलाफ 25 अप्रैल तक कुल 421 एफआईआर दर्ज करायी गई हैं। यह संख्या अब 28 अप्रैल तक 525 तक पहुँच गई है। इस सिलसिले में अब तक 1075 गिरफ्तारियाँ हुई हैं।

‘अल्पसंख्यक पालन मंच’ के एडवोकेट शमशाद पठान ने इस दिशा में बेहद कारगर पहल की है। उन्होंने न केवल नफ़रत फैलाने के दोषियों को उचित कानूनी प्रक्रिया का सामना करने के लिए मजबूर किया है बल्कि मुस्लिम समुदाय में इसका मुकाबला करने के लिए उठ खड़े होने का जज़्बा भी पैदा किया है। नतीजतन, मुस्लिम समुदाय अब सीख रहा है कि नफ़रत और घृणा के इन अपराधियों के खिलाफ पुलिस तक कैसे कदम बढ़ाये जाएँ। और इस सिलसिले में क़ानून का कैसे इस्तेमाल किया जाए इसके बारे में भी मुस्लिम समुदाय को जागरूक किया जा रहा है। 

खबर है कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वालों पर नकेल कसने के एक कदम के रूप में पहले ही 400 से अधिक पुलिस शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं। एफआईआर अहमदाबाद, आनंद, पोरबंदर, इदर, पाटन, सूरत, वडोदरा और राजकोट जिलों और राज्य के अन्य स्थानों पर दर्ज की गई हैं।

शनिवार शाम तक पुलिस ने 700 से अधिक लोगों के खिलाफ COVID-19 के बारे में नफरत फैलाने और अफवाहें फैलाने के लिए 421 एफआईआर दर्ज की थी। पठान ने बताया कि उनमें से 80 प्रतिशत से अधिक मुख्यधारा और सोशल मीडिया में घृणा अभियान से संबंधित हैं।

एडवोकेट शमशाद पठान।

इस सिलसिले में अहमदाबाद स्थित अल्पसंख्यक अधिकार मंच के संयोजक और एडवोकेट शमशाद पठान की उस पोस्ट से और बेहतर जानकारी हासिल की जा सकती है जिसे उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर 28 अप्रैल को लिखा था:

नफरत फैलाने वाले वायरसों के खिलाफ यह मुहिम अब गुजरात के गांव-गांव और जिले-जिले तक पहुंच चुकी है।

राजपीपला जिला जो कि गुजरात के पिछड़े जिलों में आता है वहां पर भी लोग जाग्रत हो कर नफरत फैलाने वाले वायरसों की खबर पुलिस को दे रहे हैं जिसे गुजरात पुलिस के आला अधिकारी संज्ञान में ले कर FIR दर्ज कर रहे हैं। नफरत फैलाने वाले ऐसे ही वायरस चिराग पटेल के विरुद्ध नर्मदा LCB पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज हुई है।

उसी तरह दूसरे एक मामले में गांधीधाम में कच्छ के सामाजिक कार्यकर्ता हाजी जुमा रायमा की कोशिश से नफ़रत फैलाने वाले वायरस अश्विन कटारमल के खिलाफ IPC 153 (A),505 और डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट की कलम 54 के तहत गांधीधाम डिवीज़न पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज हो गई।

आज (उस दिन की तारीख) 28/4/2020 शाम तक का कुल स्कोर FIR 525 और गिरफ्तारी 1075। यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है इसमें गुजरात के बहुत सारे युवा साथी लगे हैं जो लगातार ऐसे नफरत फैलाने वाले वायरसों के खिलाफ FIR करवा रहे हैं। इसलिए कहा जाता है कि सामूहिक रूप से एक गोल तय कर के काम करने से उसके नतीजे मिलते हैं।

तमाम युवा साथियों को सलाम और गुजरात पुलिस का शुक्रिया

एक बार फिर कहेंगे कि नफरत फैलाने वाले वायरसों का एक ही इलाज है कि इनके खिलाफ ज्यादा से ज्यादा FIR दर्ज करवाई जाए

………………..एडवोकेट शमशाद पठान संयोजक, अल्पसंख्यक अधिकार मंच

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इस मामले का अभी राष्ट्रीय समाचार पत्रों या मीडिया ने संज्ञान नहीं लिया है, लेकिन नेशनल हेराल्ड ने इस बाबत एक लेख हाल ही में प्रकाशित किया था। उनके संवाददाता ने नज़ीर पटेल से बात की। आपको बता दें कि पटेल अहमदाबाद टास्क फ़ोर्स से जुड़े हैं और इसमें सभी समुदायों के लोगों की भागीदारी है। उन्होंने बताया कि “ तबलीगी जमात को लेकर चलाए गए मीडिया ट्रायल से ख़ास कर तबलीगियों और आम तौर पर पूरे समुदाय में रोष था। देश में जब न्यायालय है तो मीडिया कोई फैसला कैसे सुना सकती है? मेरे कुछ बेहद नजदीकी गैर-मुस्लिम दोस्त तक सोशल मीडिया में चलाए गए इस घृणा अभियान के शिकार हो गए और पूरी बिरादरी को ही कोरोना वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार बताने लगे हैं और अपने यहाँ से मुस्लिम समाज से लोगों को नौकरी पर न रखने की अपील जारी करने लगे थे।”

गुजरात में मुस्लिम समुदाय द्वारा सोशल मीडिया में आ रही ऐसी घृणास्पद पोस्टों के खिलाफ शिकायत करने का अभियान छेड़ दिया गया है। ऑनलाइन पेटिशन डालने के लिए शमशाद फेसबुक के जरिये लोगों को ऑनलाइन प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। 

और इससे होने वाले फायदे भी दिखने शुरू हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि कई जगहों पर लिखित शिकायत दी जाने पर भी FIR नहीं लिखी जा रही है। उसके लिए भी क़ानूनी मदद ली जायेगी, और ऐसे अधिकारियों के खिलाफ मामला अदालत में ले जाया जायेगा। और अदालत के ज़रिये प्रशासन के आला अधिकारियों से पूछा जाएगा कि संज्ञेय अपराध के बावजूद उस थाने ने इस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की?

अकेले नज़ीर ने अब तक पुलिस में 13 शिकायतें दर्ज की थीं, और उसके कुछ अच्छे नतीजे भी देखने को मिले हैं। आज हालत यह है की सोशल मीडिया में घृणा फैलाने वाले ये लोग न सिर्फ अपनी पोस्ट सोशल मीडिया से डिलीट कर रहे हैं, बल्कि कुछ ने तो अपने अकाउंट तक को बंद कर दिया। 

इस सिलसिले में जब अहमदाबाद से पत्रकार कलीम सिद्दीकी से बात की, जो गुजरात में सीएए विरोधी आन्दोलन के केंद्र में थे और इस मुहिम में भी मुख्य भूमिका में हैं तो उनका कहना था, “जी, यह एक सच्चाई है। गुजरात पुलिस हेट स्पीच के बारे में अब काफी सख्त हो गई है, और चूँकि लगातार कई हलकों से शिकायतें आ रही हैं, इसलिए उनके लिए यह कदम उठाना एक बड़ी मजबूरी बनता जा रहा है।”

वह आगे बताते हैं कि उल्टा उनके द्वारा मुस्लिमों को समझाने और उनकी जाहिलियत पर जब कुछ असंसदीय भाषा में फेसबुक पर लिख दिया था, तो उसकी तक शिकायत और थाने में पेशी तक देनी पड़ी है। 

ऐसा लगता है कि नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी गई, उसमें पहली बार मुस्लिम समुदाय की ओर से इतने बड़े पैमाने पर युवाओं और महिलाओं की जीवंत भागीदारी हुई है। अब वे परम्परागत ढाँचे में बाँध दिए गए अपने मुस्लिम नेताओं के बंधन में नहीं रहना चाहते। ये लोग समुदाय की बेहतरी के लिए और बिना किसी राजनैतिक खांचे में बंधे चैन से जीना चाहते हैं। उनके लिए धार्मिक पहचान की अहमियत तो है लेकिन अन्धविश्वास या फिर कठमुल्लाओं के नेतृत्व को ख़ारिज कर रहे हैं।

एक प्रकार से यह अभिनव प्रयोग है जिसमें मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ तमाम सेक्युलर सोच के वकील, पत्रकार लीड रोल में हैं। जबकि वे लगातार इस अभियान में आम लोगों को जोड़ रहे हैं और कोविड-19 से लड़ाई के साथ-साथ मीडिया में फैलाए जा रहे नफ़रत के वायरस के खिलाफ भी मैदान में आ खड़े हुए हैं। और अब मीडिया चैनलों समेत ट्विटर के जरिये इसे जन जन तक फैलाने का काम किया जा रहा है। यह लड़ाई अगर गुजरात में एक सफल अभियान साबित होती है, तो इसके दिल्ली समेत यूपी, हरियाणा, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे प्रदेशों में सख्त जरूरत है। यहाँ पर परम्परागत तरीकों से कुछ नामचीन हस्तियों की छतरी तले ही ये लड़ाई चल रही है, जबकि इसको लड़ने के लिए लोगों के सक्रिय योगदान की जरूरत है, जो अभी उस दिशा में नहीं बढ़ पायी है। लेकिन अगर एक बार इसे सही ढंग से लड़ने का सलीका यहाँ भी आ जाता है तो लाखों योद्धा मौजूद हैं समाज में, जो भारत में दंगाई जहर बोने के काम को रोकने के लिए अपना सब कुछ त्यागने के लिए तैयार हो सकते हैं।

क्या देश गुजरात के नौजवानों की इस पहल से कुछ सीखेगा?

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र लेखक हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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