राजनीति न करने को कहकर खुद राजनीतिक हो गया गुजरात हाई कोर्ट!

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सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार की ओर से पेश हुए वकील तुषार मेहता ने कहा था कि ऐसा लगता है कि कुछ राज्यों में हाई कोर्ट समानांतर सरकार चला रहे हैं। जुडिशरी और लॉ फील्ड में उनके इस बयान की चीरफाड़ अभी शुरू ही हुई थी कि गुजरात हाईकोर्ट ने एक ऐसा बयान दे डाला है जो समानांतर सरकार का तो नहीं, लेकिन सरकार के साथ समानांतर होकर चलने की प्रेरणा जरूर दे रहा है। शुक्रवार 29 मई को बदली हुई बेंच के साथ उसी मामले की सुनवाई करते हुए, जिस मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने छापा मारने की बात कही थी, कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना करने भर से COVID-19 ठीक नहीं होने जा रहा है और न ही मरे हुए लोग जिंदा होने वाले हैं। चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी पर्दीवाला की बेंच ने कहा कि COVID-19 संकट का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।

इससे पहले कि गुजरात हाई कोर्ट का सरकार के साथ नतमस्तक होता बयान सुनें, आपको याद दिला दें कि इससे पहले इस मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोरा की बेंच कर रही थी। जब इन लोगों ने अहमदाबाद सिविल अस्पताल में फैली बेतरतीबी और लगातार होने वाली मौतों को ऑन रिकॉर्ड करके मौके पर छापा मारने की बात कही, उसके दो दिन के अंदर खंडपीठ खंड-खंड कर दी गई और नई खंडपीठ चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी पर्दीवाला की बना दी गई, जिसमें जस्टिस जेबी पर्दीवाला चीफ जस्टिस विक्रम नाथ से जूनियर हैं। हमें नहीं पता कि इस बेंच में पर्दीवाला साहब जूनियर की ही तरह व्यवहार कर रहे हैं, या इस बेंच के आदेशों और निर्देशों में वे वाकई बराबर के हिस्सेदार हैं।

बहरहाल, अब आगे की बात। चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी पर्दीवाला की बेंच ने COVID-19 के मुद्दे को पॉलिटिसाइज न करने की ताकीद करते हुए कहा कि संकट के समय में हमें एक होने की जरूरत है, न कि आपस में झगड़ने की। हाई कोर्ट ने कहा कि कोविड 19 संकट एक मानवीय संकट है, न कि वह राजनीतिक संकट है। इसलिए, यह जरूरी है कि कोई भी इस मुद्दे को पॉलिटिसाइज न करे। चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी पर्दीवाला की बेंच ने कहा कि कोविड-19 के बारे में अनिश्चितता और हमारी इकॉनमी पर इसके असर की वजह से यह और भी इम्पॉर्टेंट हो जाता है कि सरकार सही पॉलिसीज के बारे में सही काम करे। बेंच ने विपक्ष के रोल पर भी कमेंट करते हुए कहा कि इस अभूतपूर्व परिस्थिति में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। इस बात से कोई इनकार नहीं करता है कि विपक्ष का रोल सरकार को उत्तरदायी बनाना है, हालांकि ऐसे समय में आलोचना करने के बजाय विपक्ष के लिए मदद करना ज्यादा फायदेमंद होगा।

आपको एक बार फिर से बता दें कि इससे पहले इस मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस इलेश जे वोरा की बेंच कर रही थी। अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में गुजरात की बीजेपी सरकार ने जिस तरह की कुव्यवस्थाएं कर रखी हैं, उन पर इस बेंच ने कहा था कि वह कभी किसी सुबह आकर छापा मारेगी और व्यवस्थाएं देखेगी। इसके बाद से यह बेंच बदल दी गई और नई बेंच गुजरात हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी पर्दीवाला की बनाई गई। नई बेंच के रूल 29 मई से लागू हुए और यह 29 मई की ही सुनवाई का मामला है। इस सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि एक व्यक्ति कोविड-19 के मुद्दे को पॉलिटिसाइज करके इससे पैदा हुए पेन को कमतर कर रहा है। वह लोगों की मदद करने और जीवन बचाने के बजाय राजन‌ीति और राजनीतिक आकांक्षाओं को आगे रख रहा है।

अदालत ने कहा कि रचनात्मक आलोचना ठीक है, लेकिन विरोधात्‍मक आलोचना उचित नहीं है। बेंच ने ये टिप्पणी अहमदाबाद सिविल अस्पताल के बारे में दिए गए अपने पिछले आदेश के रेफरेंस में की है, जिसके बाद गुजरात सरकार आलोचनाओं से घ‌िर गई थी। पिछली सुनवाई में जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोरा ने कहा था कि अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में हालात यह हैं कि हर चौथे मरीज की मौत हो जा रही है। डॉक्टरों से लेकर नर्सों तक के लिए पर्याप्त सुरक्षा किट्स वहां पर नहीं हैं। जजों की यह बेंच हालात से इतनी खिन्न हुई कि उसने कहा कि आप लोग तैयार रहिए, हम कभी भी किसी सुबह आकर मौके पर औचक निरीक्षण कर सकते हैं। इसके बाद ऐसा लगता है कि इस मामले में अप्रत्यक्ष रूप से शायद गुजरात हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस विक्रम नाथ ने हस्तक्षेप किया और जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोरा की बेंच को भंग करके नई बेंच बना दी, जिसने 29 मई से अपनी सुनवाई शुरू की।

इसी 29 मई को हुई सुनवाई में गुजरात हाई कोर्ट की नई बेंच ने जिस तरह के राजनीतिक बयान दिए, उसकी भूमिका 22 मई की रात को ही बन गई थी, जब 22 मई को जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोरा की अलग-अलग बेंचों ने अहमदाबाद सिविल अस्पताल की स्थितियों पर हेल्थ डिपार्टमेंट को कड़ी फटकार लगाई‌ थी। जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोरा की बेंच ने अस्पताल की हालत को दयनीय और कालकोठरी जैसा कहा था। कोविड-19 के मरीजों की डेथ रेट पर चिंता जताते हुए बेंच ने पूछा था कि क्या राज्य सरकार को पता है कि वेंटिलेटर की कमी के कारण यह सब हो रहा था?

आपको याद दिला दें कि यह वही अस्पताल है, जहां नरेंद्र मोदी को 15 लाख का सूट गिफ्ट करने वाले उद्योगपति ने वेंटिलेटर की जगह अंबू बैग जैसे गुब्बारे सप्लाई कर दिए और जिसके बारे में बताया जाता है कि वह बीजेपी के गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी का भी बड़ा खास है और रात में उनको फोन करता है। बहरहाल, जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोरा की बेंच ने अहमदाबाद के सिविल अस्पताल के हालात की जांच के लिए एक कमेटी भी बना दी थी और सरकार को निर्देश दिया ‌था कि उस गुमनाम चिट्ठी में उन सारी समस्याओं की हर तरह से इंडिपेंडेंट इन्क्वायरी कराए, जो अहमदाबाद के ‌सिविल अस्पताल की एक रेजिडेंट डॉक्टर ने भेजा था और उसमें उसने सिविल अस्पताल में चल रही सरकारी कुव्यवस्थाओं की जांच कराए जाने की मांग की थी।

रेजीडेंट डॉक्टर की इस गुमनाम चिट्ठी पर गुजरात की बीजेपी सरकार इस कदर तिलमिलाई थी कि बाद में विजय रूपानी ने अपना वकील अहमदाबाद सिविल अस्पताल पर किए गए कोर्ट के कमेंट्स को खारिज करने पर लगा दिया। विजय रूपानी ने गुजरात हाई कोर्ट में एक दरख्वास्त दायर कराई और कहा कि अदालत के ऐसे कमेंट्स से अस्पताल में आम आदमी का विश्वास कम होगा और हेल्थ वर्कर्स का मॉरल डाउन होगा। गुजरात मॉडल की विजय रूपानी सरकार ने यह दावा करते हुए कि अस्पताल के हालात को सुधारने के लिए कदम उठाए गए हैं, कोर्ट से अपील किया था कि कोर्ट ऐसे कमेंट्स ना करे ताकि आम आदमी के मन में भरोसा पैदा हो सके।

यह एक अनोखे में अनोखा मामला है जिसमें सरकार अदालत में एप्लीकेशन देकर कह रही है कि कोर्ट क्या कहे और क्या न कहे और ऐसा कहने वाली गुजरात की बीजेपी सरकार है, जो, आई रिपीट, कोर्ट को कह रही है कि वह क्या कहे और क्या न कहे। ठीक वैसे ही, जैसे ही मोदी सरकार के वकील तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट में खड़ा होकर मीडिया को यह सलाह देते फिरते हैं कि मीडिया क्या करे और क्या न करे बजाय इसके कि मरते लोगों को बचाने की जिम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा सरकार के पास था, मगर उसने नहीं बचाया।

25 मई को जेबी पर्दीवाला की बेंच ने इस मामले पर विचार किया ‌था और सरकार ने कोविड 19 पर जो कुछ भी कदम उठाए थे, उन पर ध्यान देते हुए कहा था कि अहमदाबाद के सिविल अस्पताल के संबंध में कोई सर्टिफिकेट देना जल्द बाजी होगी। 29 मई को रोस्टर बदलने के बाद मामले को चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी परदीवाला की एक अलग बेंच में लिस्ट किया गया। नई बेंच ने शुक्रवार को साफ किया कि वह सरकार को केवल उसके संवैधानिक कर्तव्यों को याद दिलाने की कोशिश कर रही थी और साथ ही साथ यह भी कहा कि राज्य सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया है। राज्य सरकार ने मामले को कितनी गंभीरता से लिया है, यह हम सभी बेंच के आनन फानन में चेंज होने में देख सकते हैं। बहरहाल, कोर्ट ने निर्देश दिया कि सिविल अस्पताल के संबंध में आवश्यक मेडिकल प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन होना चाहिए।

नई बेंच ने कहा कि अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में एक्सपर्ट डॉक्टर, डॉक्टर, नर्स, हेल्थ वर्कर्स, तकनीशियन, फिजियोथेरेपिस्ट समेत किसी भी कैटेगरी में मैनपॉवर की कमी नहीं होनी चाहिए। नई बेंच ने यह नया डायरेक्शन दिया कि अस्पतालों में भर्ती कोविड- 19 के मरीज मेडिकल प्रोटोकाल के हिसाब से उचित उपचार और देखभाल की मांग कर रहे हैं। अलग-अलग कैटेगरीज के रोगियों के लिए अलग-अलग तरह के मेडिकल प्रोटोकॉल हैं। बेंच ने अपने निर्देशों में दर्ज किया कि यह आरोप है कि सभी कैटेगरीज के पेशेंटस के लिए जरूरी मेडिकल प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन नहीं किया जा रहा है। बेंच ने कहा कि कोविड-19 के पेशेंट्स के बारे में एक और सिचुएशन है कि किसी भी अटेंडेंट को मरीजों की मदद और देखभाल करने की परमिशन नहीं है। आम तौर पर भर्ती किए गए गैर कोविड-19 के मरीजों को एक अटेंडेंट दिया जाता है, जो उनके खाने पीने सहित रोजमर्रा की जरूरतों का ख्याल रखता है।

हालांकि, कोविड-19 के मरीजों के मामलों में ऐसी देखभाल नर्सों, अटेंडेंट्स और अस्पतालों के दूसरे कर्मचारियों को करनी है। नई बेंच ने निर्देश दिया कि हालांकि इसकी पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन प्रिंट और डिजिटल मीडिया दोनों में ऐसी खबरें हैं कि अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में कोविड-19 के मरीजों की न तो ठीक से देखभाल की जा रही है और न ही उन पर ठीक से ध्यान दिया जा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसकी जानकारी में यह भी आया है कि कई कोविड-19 के मरीजों की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि वे डिहाइड्रेट हो गए और उन्हें पानी तक नहीं दिया गया। इसके अलावा और भी लापरवाहियों से इन मरीजों को बेमौत मरना पड़ा।

नई बेंच ने यह भी कहा कि ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि डॉक्टरों और कर्मचारियों को कंपलसरी सेफ्टी गीयर, कंज्यूमबल थिंग्स, पीपीई किटों वगैरह को देने में जरूरी सावधानी नहीं बरती जा रही है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें किसी भी हालात में जोखिम में नहीं डाला जा सकता है। अदालत ने कहा कि वह अभी भी सिविल अस्पताल के कामकाज पर कड़ी नजर रखना चाहेगा और यह भी कहा कि अगर हम संतुष्ट नहीं हुए तो कानून के अनुसार कुछ और कदम उठाने पड़ सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि जो लोग भी कोविड 19 की समस्या लेकर आ रहे हैं, भले ही वे संदिग्ध क्यों न हों, उनका टेस्ट तुरंत होना चाहिए, न कि तब तक इसके लिए वेट करना चाहिए कि कोई सरकारी अधिकारी उसे करने के लिए कहेगा।

(राइजिंग राहुल की रिपोर्ट।)

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