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हाथरस गैंगरेप: अलीगढ़ अस्पताल की एमएलसी रिपोर्ट फेर देती है यूपी पुलिस के दावों पर पानी

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश पुलिस के इस दावे के विपरीत कि हाथरस की दलित बच्ची के साथ बलात्कार नहीं हुआ था, अलीगढ़ स्थित जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कालेज अस्पताल (जेएनएमसीएच) की मेडिको-लीगल परीक्षण रिपोर्ट (एमएलसी) इस बात का खुलासा करती है कि डाक्टरों ने योनि में पूरे पेनिट्रेशन का पीड़िता द्वारा मुहैया कराए गए विवरण को रिकार्ड किया था। प्राथमिक जांच में बल के प्रयोग की तरफ भी इशारा किया गया था।

पीड़िता के ऊपर हमले के मेडिकल परीक्षण के लिए लागू होने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रोटोकॉल में यह शर्त शामिल है कि परीक्षण करने वाले डॉक्टरों को यौन हमले की घटना घटी है कि नहीं इस बात की न तो पुष्टि करनी चाहिए और न ही उसे खारिज। पीड़िता पर हमले में बलात्कार शामिल है या नहीं अस्पताल अपने इस मत को सुरक्षित रखता है और मामले को आगे परीक्षण के लिए राज्य सरकार द्वारा आगरा में संचालित फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी को भेज देता है।

जेएनएमसीएच में असिस्टेंट प्रोफेसर और मेडिकल परीक्षक डॉ. फैज अहमद ने बताया कि “स्थानीय परीक्षण के आधार पर मेरा मानना है कि उसमें फोर्स के इस्तेमाल का लक्षण है। लेकिन फिर भी जहां तक पेनिट्रेशन और इंटरकोर्स की बात है तो वह एफएसएल रिपोर्ट के दायरे में आती है जिसकी उपलब्धता अभी पेंडिंग है।”

54 पेज की जेएनएमसीएच की रिपोर्ट वायर के पास मौजूद है। इसमें 19 साल की किशोरी के साथ घटित विभिन्न अपराधों का जिक्र है। और जिन चोटों के चलते अगले दो सप्ताह के भीतर उसकी मौत हो गयी। इसमें लिंग के जरिये पेनिट्रेशन और यह कि दुपट्टे से उसका गला घोटा गया आदि शामिल हैं। इसमें क्वैड्रीपैरेसिस का जिक्र है- ऐसी स्थिति जिसमें चारों अंग (दोनों हाथ और दोनों पैर) कमजोर पड़ जाते हैं- और पैराप्लेजिया का जिक्र है- जिसमें महिला के शरीर का निचला हिस्सा कमर तक सुन्न हो जाता है।

रिपोर्ट इस बात का दावा करती है कि पीड़िता जो 14 सितंबर को अस्पताल में भर्ती हुई थी, ने डाक्टरों को अपने ऊपर यौन हमले के बारे में 22 सितंबर को बताया था। उसी दिन जेएनएमसीएच ने मामले को एफएसएल, आगरा को रेफर कर दिया था।

एमएलसी कहती है कि “सूचना देने वाले के आरोप के मुताबिक सर्वाइवर पर चार ज्ञात लोगों द्वारा यौन हमला किया गया था जब वह बुलगढ़ी गांव के खेत में 14/09/2020 को सुबह 9.00 बजे कुछ काम कर रही थी। रिपोर्ट में घटना के दौरान उसके होश के गायब हो जाने का इतिहास है।”

बाद में आने वाली एफएसएल रिपोर्ट के लिए सैंपल जेएनएमसीएच अस्पताल से 25 सितंबर को लिया गया- यह जेएनएमसीएच द्वारा एफएसएल को मामले को रेफर किए जाने के तीन दिन बाद और घटना के 11 दिन बाद संभव हुआ, जब उसका पहली बार परीक्षण किया गया था। और इस बात को अब यूपी के पुलिस अधिकारियों द्वारा उसके साथ रेप न होने का आधार बनाया जा रहा है। बृहस्पतिवार को एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) प्रशांत कुमार ने एफएसएल द्वारा एकत्र किए गए सैंपल में वीर्य की गैर मौजूदगी को इस बात के उदाहरण के तौर पर पेश किया कि उसके साथ रेप नहीं हुआ था और मामले को जातीय तनाव की तरफ ट्विस्ट कर दिया गया।

हालांकि ‘दि वायर’ से बात करते हुए प्रशांत ने इस बात का इशारा किया कि जब वह इस दावे को कर रहे थे तो उन्हें जेएनएमसीएच रिपोर्ट की मौजूदगी के बारे में पता था।

यौन हमले की फोरेंसिक जांच में अस्पष्ट देरी

दिलचस्प बात यह है कि एमएलसी रिपोर्ट के तौर पर सामने आयी 14 सितंबर की 4.10 बजे शाम को अस्पताल द्वारा की गयी महिला की पहली जांच बताती है कि महिला की मौजूदा बीमारी केवल गला घोंटने के चलते है। और इस दावे को रिकॉर्ड करती है कि हमलावर अज्ञात थे।

इस सच्चाई को देखते हुए कि वह पहले ही वीडियो में बता चुकी थी कि उसके साथ बलात्कार हुआ था जिसमें उसने हमलावरों के नाम भी बताए थे। शुरुआती एमएलसी में इस घटना का गायब हो जाना पुलिसकर्मियों मंशा पर संदेह पैदा करता है जो उसे वहां लाए थे। इसके साथ ही अस्पताल के वे अधिकारी भी सवालों के घेरे में हैं जिन्होंने एक गंभीर रूप से घायल महिला की जांच किया था।

विडंबना यह है कि उन वीडियो को खुद बीजेपी नेताओं द्वारा अपने ट्विटर पर यह बताने के लिए सर्कुलेट किया जा रहा था कि महिला के साथ बलात्कार नहीं हुआ है जिसमें वह साफ-साफ जबर्दस्ती, या बल के प्रयोग के साथ ही- बलात्कार के लिए आम तौर पर प्रयोग किया जाने वाला शब्द- कुछ हमलावरों के नाम भी बताती है। इन वीडियो को अलीगढ़ अस्पताल में ले जाने से पहले कुछ अज्ञात लोगों ने चंदपा पुलिस स्टेशन में शूट किया था।

एमएलसी रिपोर्ट में 22 सितंबर को न्यूरो सर्जरी विभाग के चेयरमैन प्रोफेसर एमएफ हुदा का एक नोट भी शामिल है जिसमें वह कहते हैं कि “मरीज बेहद गंभीर है इसलिए कृपया मृत्यु पूर्व घोषणा के लिए मजिस्ट्रेट की व्यवस्था की जाए।” मजिस्ट्रेट ने उसकी घोषणा को उसी दिन रिकार्ड किया जिसमें वह बलात्कार के बारे में बताती है और फिर संयोग से अस्पताल की ओर से यौन हमले संबंधी फोरेंसिक जांच के लिए आदेश भी उसी दिन यानी 22 सितंबर को दिया जाता है। जिसमें यह दावा किया गया है कि “अस्पताल में भर्ती होने के समय मरीज ने यौन हमले के किसी इतिहास के बारे में नहीं बताया है। उसने घटना के बारे में पहली बार 22 सितंबर को बताया।”

एमएलसी का विवरण

जेएनएमसीएच द्वारा संपन्न किए गए एमएलसी के सेक्शन 16 में डॉक्टर इस बात को रिकार्ड करता है कि घटना के दौरान पीड़िता की योनि में लिंग द्वारा पेनिट्रेशन किया गया था। उसके अगले पैरा में डाक्टर बताते हैं कि पेनिट्रेशन पूरा था।

दूसरे सब सेक्शन में जिसमें इस बात को जाना जाता है कि क्या ‘वीर्य निकला था’, ‘हमलावर ने कंडोम का इस्तेमाल किया’, और ‘कंडोम की स्थिति’ के खाने को ‘डीएनके’ यानी ‘नहीं पता’ के साथ मार्क किया गया था।

एक दूसरा सब सेक्शन जो इस बात को रिकार्ड करना चाहता है कि हमले के दौरान क्या किसी हथियार का इस्तेमाल किया गया था, इसके बारे में डॉक्टर लिखते हैं कि ‘नहीं’ लेकिन साथ ही जोड़ते हैं कि ‘सर्वाइवर का गला घोंटा गया था’। दस्तावेज में इस बात का भी जिक्र है कि घटना के दौरान पीड़िता को हत्या की धमकी दी गयी थी।

जेएनएमसीएच ने इस शुरुआती मेडिकल जांच को मेडिको लीगल केस रिपोर्ट (एमएलसी) फाइल करने की दिशा में संपन्न किया था। यह एमएलसी रिपोर्ट चार आरोपी लोगों का जिक्र करती है, सभी ठाकुर समुदाय से आते हैं, जिनके नामों का खुलासा अस्पताल के सामने पीड़िता के परिवार द्वारा किया जाता है।

यूपी पुलिस से जुड़ा विवाद

अलीगढ़ अस्पताल का रिकार्ड पत्रकारों, एक्टिविस्टों और विपक्षी दलों के इस दावे को पुष्ट करता है कि आदित्यनाथ सरकार अपराध की गंभीरता को कम करने की कोशिश कर रही है।

बगैर परिजनों की सहमति के पुलिस द्वारा महिला के अंतिम संस्कार की रिपोर्ट दिखाती है कि प्रशासन ने पीड़िता के परिवार को धमकाने का प्रयास किया और मीडिया तथा राजनीतिक नेताओं को बूलगढ़ी स्थित उसके गांव में घुसने से रोका।

एडीजी कुमार ने दो आधारों पर रेप को खारिज किया। पहला एफएसएल रिपोर्ट कहती है कि योनि स्वैब से एकत्र किए गए सैंपल में किसी भी तरह का शुक्राणु या फिर अंडा नहीं पाया गया। और दूसरा पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि बीमार की मौत की वजह गले पर लगी चोट से पैदा हुआ सदमा है।

कुमार ने कहा कि “पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि पीड़िता अपने गले पर लगी चोट की वजह से मरी। एफएसएल रिपोर्ट ने सैंपल में शुक्राणु नहीं पाया। यह बात इस बात को साफ कर देती है कि कुछ लोग मामले को ट्विस्ट कर रहे हैं जिससे जाति आधारित तनाव पैदा हो सके। इस तरह के लोगों को चिन्हित किया जाएगा और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”

जेएनएमसीएच रिपोर्ट बलात्कार की आशंकाओं की तरफ इशारा करती है ऐसे में यह बात साफ नहीं हो रही है कि यूपी पुलिस क्यों रेप नहीं होने पर जोर दे रही है।

वायर से बात करते हुए जेएनएमसीएच के अधिकारी ने बताया कि “पीड़िता की जांच के बाद तैयार की गयी यह फाइनल रिपोर्ट (एमएलसी) है। यही वह दस्तावेज है जिसे कोर्ट में पेश किया जाएगा।”

एमएलसी को अस्पताल के सीएमओ डॉ. ओबैद इम्तियाज हक द्वारा अटेस्ट किया गया है।

रिपोर्ट बिल्कुल साफ-साफ दिखाती है कि हाथरस के एसपी विक्रांत वीर सत्य को लेकर बेहद संकुचित नजरिया अपनाते हैं जब एएनआई को दिए अपने पहले के बयान में कहते हैं कि अलीगढ़ अस्पताल की रिपोर्ट रेप की पुष्टि नहीं करती है। उन्होंने कहा था कि “अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मेडिकल कालेज (जेएनएमसीएच) की मेडिकल रिपोर्ट इस बात का जिक्र करती है कि चोट थी लेकिन यह जबरन यौन इंटरकोर्स की पुष्टि नहीं करती है। वो फोरेंसिक की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। अभी डॉक्टरों का कहना है कि वो रेप की पुष्टि नहीं कर रहे हैं।”

वास्तव में सर्वाइवर या फिर पीड़िता के ऊपर यौन हिंसा संबंधी मेडिको लीगल केयर के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा निर्देश और प्रोटोकॉल के मुताबिक “जांच करने वाले चिकित्सक को कोर्ट में यह स्पष्ट करना चाहिए कि सामान्य जांच में यौन हमला हुआ है या नहीं इसकी न तो पुष्टि करनी चाहिए और न ही इससे इंकार। उन्हें इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि मेडिकल ओपिनियन इस मामले में नहीं दी जा सकती है कि रेप हुआ था या नहीं क्योंकि ‘रेप’ एक कानूनी शब्द है।”

अपराध के 11 दिन बाद एकत्रित किए गए वीर्य पर एफएसएल ने विचार किया

रिपोर्टों के मुताबिक फोरेंसिक रिपोर्ट ने वीर्य के किसी भी तरह के लक्षण को नहीं पाया है। जेएनएमसीएच के डाक्टरों ने वायर को बताया है कि एफएसएल की जांच के लिए सैंपल को घटना के 11 दिन बाद यानी 25 सितंबर को हासिल किया गया था। इसलिए यह विश्वसनीय नहीं है।

जेएनएमसीएच अस्पताल के जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर महजा मलिक ने बताया कि “वीर्य पाए जाने का कोई चांस नहीं है क्योंकि इसका जीवन चक्र किसी भी रूप में 2-3 दिन से ज्यादा नहीं होता है। अगर 72 घंटे के भीतर कोई सैंपल इकट्ठा किया जाता है और इस शर्त के साथ कि लड़की ने पेशाब करने के लिए बाथरूम का इस्तेमाल नहीं किया है या फिर स्नान नहीं किया है……उसके बाद ही यह वैध होगा।“

इसके आगे उन्होंने कहा कि रेप के अपराध को मानने के लिए इजैकुलेशन का होना जरूरी नहीं है।

एएमयू अस्पताल के फोरेंसिंक विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. असरार उल हक ने भी वायर से इसी बात की पुष्टि की।  उन्होंने कहा कि इस बात की सच्चाई को देखते हुए कि शुक्राणु का जीवन चक्र तीन दिन से ज्यादा नहीं होता है, उसके एफएसएल की रिपोर्ट में पाया जाना बेहद असंभव है।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि रेप को साबित करने के लिए सभी स्वैब लेने चाहिए।

जबकि जेएनएमसीएच अधिकारियों ने योनि का स्वैब 22 सितंबर को लिया। वह तारीख जिसके बारे में डाक्टरों का कहना है कि उसी दिन पीड़िता ने अपने ऊपर यौन हमले के बारे में बताया था। डॉक्टर उस सैंपल पर गुणात्मक नजरिये से चिंता जाहिर करते हैं।

स्वैब को एकत्रित करने में देरी के अलावा एमएलसी इस बात का जिक्र करती है कि अस्पताल को रिपोर्ट करने से पहले महिला ने खुद को साफ कर लिया था और उसने कपड़े भी बदल लिए थे और बिल्कुल साफ और धुले कपड़े पहन लिए थे। और भर्ती के समय अपने अंडरवियर को भी उसने बदल लिया था।

वकीलों का कहना है कि किसी भी स्थिति में रेप को साबित करने के लिए वीर्य की मौजूदगी की जरूरत से जुड़ा पुलिस का बयान बिल्कुल गलत है और स्थापित कानून के भी विरुद्ध है जो बगैर सहमति के थोड़े से भी पेनिट्रेशन को रेप की कार्रवाई करार देता है।

पीड़िता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट जिसका कि एडीजी जिक्र करते हैं वह नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में बनायी गयी है जहां वह 28 सितंबर को घटना के 14 दिन बाद शिफ्ट की गयी थी।

रिपोर्ट इस बात को चिन्हित नहीं करती है कि उसके साथ रेप हुआ था। हालांकि यह कहती है कि पीड़िता के हाइमेन में ढेर सारी पुरानी और फटी और फिर भरी चोटे थीं। यूट्रस में खून के धब्बे थे। और गुदा का द्वार पुराना और फटकर फिर से भरा दिख रहा था। इसमें इस बात का भी जिक्र था कि योनि में खून मौजूद था। जिसे माहवारी का खून बताया गया। पीड़िता की मां ने शुरुआत में आरोप लगाया था कि रेप के चलते खून बहा था। रिपोर्ट इस बात की भी पुष्टि करती है कि रीढ़ की हड्डी में लगी चोट के चलते वह लकवाग्रस्त हुई और फिर उसकी मौत हो गयी।

इस सिलसिले में जब वायर एडीजी प्रशांत कुमार से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल एफएसएल की रिपोर्ट के तथ्यों को रखा है और वह आरोपियों को दोषमुक्त नहीं कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि “मैंने एफएसएल रिपोर्ट के एक तथ्य को रखा है। वह यह कि वीर्य नहीं पाया गया। मेरा इस बात पर जोर है कि जांच अभी जारी है हम कौन होते हैं किसी को क्लीन चिट देने वाले।” इसके साथ ही उन्होंने आगे कहा कि एक गलत नैरेटिव तैयार करने के लिए मीडिया रिपोर्ट्स अपने चुने हुए बयानों को पेश करती हैं।

कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं

यौन हिंसा मामलों के जानकार वकीलों का कहना है कि पीड़िता का अपने ऊपर यौन हमले का दावा लेबोरेटरी के टेस्ट पर भारी पड़ेगा। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि लेबोरेटरी का टेस्ट शायद संक्रमित सैंपल से किया गया था।

वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन ने बताया कि कानूनी तौर पर रेप को बनाने के लिए किसी एफएसएल की रिपोर्ट का होना जरूरी नहीं है और इसलिए वह अप्रासंगिक हो जाती है। वह कहती हैं कि “इस केस के तथ्यों और परिस्थितियों में एफएसएल रिपोर्ट एक हद तक अप्रासंगिक है। योनि का स्वैब 8 दिन बाद एकत्रित करना- जबकि वह पेशाब कर चुकी है, अपनी योनि को साफ कर चुकी है, ऐसे में किसी वीर्य के पाये जाने का सवाल ही कहां उठता है? यह बिल्कुल एक अप्रासंगिक कार्यवाही थी जिसे संपन्न किया गया था।”

वह इस बात में भी विश्वास करती हैं कि “दी गयी परिस्थितियों में एफएसएल की रिपोर्ट को पुष्टि के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है न कि तथ्य के तौर पर।”

उन्होंने बताया कि यूपी पुलिस के दावे के विपरीत एफएसएल रिपोर्ट को रेप को खारिज करने की संभावनाओं के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि “आप एफएसएल रिपोर्ट के जरिये रेप को खारिज नहीं कर सकते हैं। बल्कि अगर एफएसएल कुछ पाता है तो उसके जरिये आप रेप की पुष्टि जरूर कर सकते हैं। अस्थाई ओपिनियन रेप को खारिज नहीं करती है।”

वह आगे जोड़ती हैं कि एमएलसी अपने निष्कर्ष में साफ-साफ बल के इस्तेमाल का जिक्र करती है जो यौन हमले के संदर्भ में है।

उन्होंने कहा कि “पुलिस के पक्ष से पूरा जोर इस बात को स्थापित करने पर था कि रेप नहीं हुआ है। जबकि यह प्रयास बिल्कुल इसके उलट चीज को स्थापित करने पर होना चाहिए था।”

वरिष्ठ एडवोकेट ने कहा कि “सुप्रीम कोर्ट इस तथ्य पर लगातार बरकरार रहा है कि पीड़िता का बयान बिल्कुल खरा होता है। और यही परीक्षण होता है जिसे आपको पास करना होता है।”

दिल्ली की वकील वृंदा ग्रोवर ने भी एफएसएल रिपोर्ट के लिए स्वैब को दो हफ्ते बाद इकट्ठा किए जाने के मसले को उठाया है। उन्होंने कहा कि “योनि का स्वैब क्यों 22 सितंबर को लिया गया? वहां एक नौजवान महिला जो बगैर कपड़ों के बदहवास स्थितियों में लेटी पायी गयी थी। पहली प्रतिक्रिया उसके सभी सैंपल को इकट्ठा करने के तौर पर होनी चाहिए थी। यह सभी स्तरों पर कर्तव्यों से च्युत होने की बात को प्रमाणित करता है।”

(द वायर की रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद।)

This post was last modified on October 4, 2020 1:34 pm

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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