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जब सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि गरिमा और प्रतिष्ठा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता

अयोध्या में 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिराये जाने की घटना के बाद तत्कालीन पीवी नरसिंह राव सरकार ने राष्ट्रपति के माध्यम से सात जनवरी, 1993 को उच्चतम न्यायालय से इस सवाल पर राय मांगी थी कि क्या विवादित ढांचे के निर्माण से पहले इस स्थान पर कोई हिन्दू धार्मिक ढांचा या मंदिर था? तत्कालीन चीफ जस्टिस एमएन वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 24 अक्तूबर, 1994 को इस सवाल पर कोई राय देने से इंकार कर दिया था। संविधान पीठ का कहना था कि अयोध्या विवाद एक धार्मिक उन्माद है जो गुजर जायेगा, परंतु इसके लिये उच्चतम न्यायालय की गरिमा और प्रतिष्ठा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है। इसी मामले में संविधान पीठ ने बहुमत की राय में केन्द्र द्वारा अयोध्या में चुनिंदा क्षेत्र के अधिग्रहण संबंधी 1993 के कानून को सही ठहराया था।

देश के दशकों पुराने राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के अयोध्या जमीन विवाद पर उच्चतम न्यायालय के संविधान पीठ  में बुधवार को ऐतिहासिक बहस पूरी हो गई। 40 दिनों तक चली इस सुनवाई के बाद संविधान पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और सभी पक्षों से कहा कि वे मोल्डिंग ऑफ़ रिलीफ पर 3 दिनों में कोर्ट को लिखित जवाब दें। उच्चतम न्यायालय ने बार-बार दोहराया था कि इस प्रकरण को दीवानी अपील के अलावा कोई अन्य शक्ल देने की इजाजत नहीं दी जायेगी और यहां भी वही प्रक्रिया अपनाई जायेगी जो उच्च न्यायालय ने अपनाई थी। लेकिन जिस तरह सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष विवादित जमीन पर अपने-अपने मालिकाना हक का कोई ठोस सबूत नहीं दे सके उससे पूरे देश की निगाहें उच्चतम न्यायालय की ओर हैं कि इसमें मालिकाना हक पर फैसला आता है या आस्था पर।

मई 2011 में उच्चतम न्यायालय ने इसके खिलाफ दायर अपीलें विचारार्थ स्वीकार करते हुये इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक लगा दिया था । अपील विचारार्थ स्वीकार करने वाली पीठ ने उच्च न्यायालय के निर्णय पर अचरज व्यक्त करते हुये टिप्पणी की थी कि यह ऐसी राहत है, जिसका अनुरोध किसी भी पक्ष ने नहीं किया था। न्यायालय ने मई 2011 में एक बार फिर सरकार द्वारा जनवरी, 1993 में अधिग्रहीत 67.703 एकड़ भूमि के बारे में संविधान पीठ के अक्टूबर 1994 और 2002 के आदेश के अनुरूप यथास्थिति बनाये रखने का निर्देश दिया था।

पहली बार इससे संबंधित मामला जनवरी, 1885 में अदालत में पहुंचा था, जिस पर 24 दिसंबर, 1885 को फैसला भी आ गया था। इसके खिलाफ दायर अपील पर फैजाबाद की अदालत ने 18 मार्च 1886 को अपना फैसला सुनाया था। हालांकि अदालत ने इस फैसले में संबंधित पक्षों को यथास्थिति रखने का आदेश दिया था, लेकिन इसमें यह भी लिखा था कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दुओं द्वारा विशेषरूप से पवित्र मानी जाने वाली इस भूमि पर मस्जिद का निर्माण किया गया परंतु यह घटना 356 साल पहले हुई थी। अदालत के इस फैसले के बाद तनातनी के बावजूद 22 दिसंबर, 1949 तक वहां यथास्थिति बनी रही थी। इसके बाद की घटना के बाद सारा विवाद फिर से शुरू हो गया था।

40 दिन की बहस में मालिकाना हक पर हिंदू पक्ष ने ही कोर्ट से विवादित 2.77 एकड़ की जमीन का मालिकाना हक उन्हें दिए जाने की मांग की है। निर्मोही अखाड़ा ने दलील दी कि विवादित जमीन हमारे पास 100 साल से भी ज्यादा समय से है। भले ही अखाड़ा 19 मार्च 1949 से रजिस्टर्ड है, लेकिन इसका इतिहास पुराना है। मुस्लिम लॉ के तहत कोई भी व्यक्ति जमीन पर कब्जे की वैध अनुमति के बिना दूसरे की जमीन पर मस्जिद का निर्माण नहीं कर सकता। इस तरह जमीन पर जबरन कब्जा करके बनाई गई मस्जिद गैर-इस्लामिक है और वहां पर अदा की गई नमाज कबूल नहीं होती है। रामलला विराजमान की तरफ से दलील दी गई कि कानून की तय स्थिति में भगवान हमेशा नाबालिग होते हैं और नाबालिग की संपत्ति न तो छीनी जा सकती है, न ही उस पर विरोधी कब्‍जे का दावा किया जा सकता है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दलील दी कि हिंदू पक्ष सिर्फ अपने विश्वास के आधार पर विवादित जगह के मालिकाना हक की बात कर रहे हैं। दलील एक उपन्यास पर आधारित है। राम पूजनीय हैं, लेकिन उनके नाम पर किसी स्थान पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया जा सकता। हिंदू सूर्य की भी पूजा करते हैं, लेकिन उस पर मालिकाना हक नहीं जता सकते। अखाड़े का दावा बनता ही नहीं। 22-23 दिसंबर 1949 को विवादित जमीन पर रामलला की मूर्ति रखे जाने के करीब दस साल बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने सिविल सूट दायर किया था, जबकि सिविल सूट दायर करने की समय सीमा 6 साल थी। निर्मोही अखाड़ा सिर्फ सेवादार है, जमीन का मालिक नहीं।

पूजा/ इबादत पर हिंदू पक्ष ने दलील दी कि विवादित जगह पर मुस्लिमों ने 1934 से पांचों वक्त की नमाज पढ़ना बंद कर दिया था। 16 दिसंबर 1949 के बाद वहां जुमे की नमाज पढ़ना भी बंद हो गई। इसके बाद 22-23 दिसंबर 1949 को विवादित ढांचे के अंदर मूर्तियां रखी गईं। हिंदू धर्म में किसी जगह की पूजा के लिए वहां मूर्ति होना जरूरी नहीं। हिंदू तो नदियों और सूर्य की भी पूजा करते हैं।

मुस्लिम पक्ष ने हिंदू पक्षकारों की उस दलील का खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि 1934 के बाद विवादित स्थल पर नमाज नहीं पढ़ी गई। यह भी कहा कि हिंदू पक्षकारों ने अयोध्या में लोगों द्वारा परिक्रमा करने की दलील दी है। परिक्रमा पूजा का एक रूप है, लेकिन यह सबूत नहीं कि वह स्थान राम जन्मभूमि ही है। परिक्रमा भी बाद में शुरू हुई। इसका कोई सबूत नहीं है कि पहले वहां लोग रेलिंग के पास जाते थे और गुंबद की पूजा करते थे। पहले गर्भगृह में मूर्ति की पूजा का भी कोई सबूत नहीं है।

ढांचे पर उच्चतम न्यायालय ने जब पूछा कि अयोध्या में राम मंदिर बाबर ने तुड़वाया था या औरंगजेब ने? हिंदू पक्ष ने कहा कि इस बारे में लिखित तथ्यों में भ्रम है। इसमें कोई भ्रम नहीं कि राम अयोध्या के राजा थे और वहीं जन्मे थे। कोर्ट ने पूछा- क्या सबूत है कि मंदिर तुड़वाने के बाद बाबर ने ही मस्जिद बनाने का आदेश दिया था? हिंदू पक्ष ने जवाब दिया कि इसका सबूत इतिहास में दर्ज शिलालेख है। विवादित जगह पर ईसा पूर्व बना विशाल मंदिर था। इसके खंडहर को बदनीयती से मस्जिद में बदल दिया गया था। राम जन्मस्थान पर नमाज इसलिए पढ़ी जाती रही, ताकि जमीन का कब्जा मिल जाए।

मुस्लिम पक्ष ने दलील दी कि मस्जिद के केंद्रीय गुंबद को भगवान राम का जन्मस्थान बताने की कहानी 1980 के बाद गढ़ी गई। अगर वहां मंदिर था तो वह किस तरह का मंदिर था। गवाहों द्वारा मंदिर को लेकर दिए गए बयान अविश्वसनीय हैं। गर्भगृह में 1939 में मूर्ति नहीं थी। वहां पर बस एक फोटो थी। बाहरी राम लला के चबूतरे पर हमेशा मूर्तियों को पूजा जाता था और 1949 में मूर्तियों को भीतर आंगन में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद ये पूरी जमीन पर अपने कब्जे की बात करने लगे।

अयोध्या विवाद : 1526 से अब तक

1526 : इतिहासकारों के मुताबिक, बाबर इब्राहिम लोदी से जंग लड़ने 1526 में भारत आया था। उसका एक जनरल अयोध्या पहुंचा और उसने वहां मस्जिद बनाई। बाबर के सम्मान में इसे बाबरी मस्जिद नाम दिया गया।

1853 : अवध के नवाब वाजिद अली शाह के समय पहली बार अयोध्या में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की। हिंदू समुदाय ने कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई।

1885 : फैजाबाद की जिला अदालत ने राम चबूतरे पर छतरी लगाने की महंत रघुबीर दास की अर्जी ठुकराई।

1949 : विवादित स्थल पर सेंट्रल डोम के नीचे रामलला की मूर्ति स्थापित की गई।

1950 : हिंदू महासभा के वकील गोपाल विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में अर्जी दाखिल कर रामलला की मूर्ति की पूजा का अधिकार देने की मांग की।

1959 : निर्मोही अखाड़े ने विवादित स्थल पर मालिकाना हक जताया।

1961 : सुन्नी वक्फ बोर्ड (सेंट्रल) ने मूर्ति स्थापित किए जाने के खिलाफ कोर्ट में अर्जी लगाई और मस्जिद व आसपास की जमीन पर अपना हक जताया।

1981 : उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने जमीन के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

1989 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रखने को कहा।

1992 : अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी।

2002 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाबरी मस्जिद वाली जमीन के मालिकाना हक को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की।

2010 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2:1 से फैसला दिया और विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बराबर बांट दिया।

2011 : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई।

2016 : सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की इजाजत मांगी।

2018 : सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद को लेकर दाखिल विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की।

6 अगस्त 2019 : सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर हिंदू और मुस्लिम पक्ष की अपीलों पर सुनवाई शुरू की।

16 अक्टूबर 2019 : सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई पूरी हुई।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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This post was last modified on October 17, 2019 11:27 am

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