Tuesday, November 29, 2022

हिजाब विवाद पर कुरान की आयतों, खिमार, नमाज, रोजा, जकात, हज से लेकर जबरन धर्मांतरण तक का जिक्र

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कर्नाटक के स्कूल, कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध के खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर लगातार सुनवाई चल रही है। नथुनी, मंगलसूत्र का हवाला देकर धर्म विशेष के अनिवार्य हिस्से को बताने की दलीलें रखी जा रही हैं। इसी दौरान तांडव नृत्य पर बैन का भी जिक्र हुआ है। मामला 20 या कहिए 40 साल से भी पुराना है। हिजाब मामले पर सुनवाई के दौरान कल सुप्रीम कोर्ट में कुरान की आयतों, खिमार, नमाज, रोजा, जकात, हज से लेकर जबरन धर्मांतरण तक का जिक्र हुआ।

जस्टिस हेमंत गुप्ता ने अपने तर्कों से वकीलों की कई दलीलों का जवाब देने की कोशिश की। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि सिख धर्म में जो भी धार्मिक प्रेक्टिस है, वो भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। इसकी तुलना हिजाब से नहीं हो सकती। दरअसल, कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब बैन को सही ठहराते हुए कहा था कि हिजाब इस्लाम की धार्मिक प्रेक्टिस नहीं है। उसी बात के हवाले से याचिकाकर्ताओं के वकील निजाम पाशा ने गुरुवार को सुप्रीम  कोर्ट में कहा कि अगर हिजाब को सांस्कृतिक प्रेक्टिस भी मान लिया जाए तो यह उसी तरह संरक्षित है, जैसे सिख धर्म में पगड़ी को पहना जाना। लेकिन जस्टिस हेमंत गुप्ता ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। इस पर निजाम पाशा ने कहा कि इस्लाम भी 1400 वर्षों से है और हिजाब वहां हमेशा रहा है।

इससे पहले जस्टिस गुप्ता ने पगड़ी और हिजाब की तुलना किए जाने पर भी कहा था कि पगड़ी एक अलग चीज है। उसे राजा लोग पहनते थे। पगड़ी धार्मिक नहीं है। मेरे दादा जी भी पगड़ी पहनते थे। इसी तरह जस्टिस हेमंत गुप्ता ने हिजाब और चुन्नी (दुपट्टा) की तुलना को भी गलत बताया था। यहां तक कि जस्टिस हेमंत गुप्ता ने यह तक मानने से इनकार कर दिया कि पंजाब में चुन्नी वहां के कल्चर का हिस्सा है।

कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पहनने पर रोक के खिलाफ याचिकाकर्ताओं के वकील निजाम पाशा ने बाबरी मस्जिद के फैसले का हवाला भी दिया। मुख्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील देवदत्त कामत ने तर्क रखा कि हिजाब पहनने से किसके मूल अधिकार का हनन हो रहा है? एक पर एक दलीलें पेश करते हुए कामत ने आनंद मार्गी केस का भी जिक्र किया, जब तांडव नृत्य पर रोक लगा दिया गया था। ऐसे में 18 साल बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने आनंद मार्गियों को जुलूस निकालने और तांडव नृत्य की इजाजत क्यों नहीं थी?

जैसे इस समय हिजाब को इस्लाम का अंग बताया जा रहा है, उसी तरह तांडव को आनंद मार्गियों ने धार्मिक अनुष्ठान का अनिवार्य हिस्सा बताया था। दरअसल, आनंद मार्ग संप्रदाय की स्थापना 1955 में हुई थी। शैव संप्रदाय से जुड़े आनंद मार्गियों को 2004 में बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि उन्हें सार्वजनिक रूप से खोपड़ी और त्रिशूलों के साथ तांडव नृत्य करने की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि यह उसके पंथ का अनिवार्य अंग नहीं है।

आनंद मार्ग के उस दावे को भी सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया था कि उसके संस्थापक पीआर सरकार ने 1966 में विशेष मौकों पर सार्वजनिक जुलूस में नृत्य करने का निर्देश दिया था। तब तीन जजों की बेंच ने 2-1 से यह फैसला दिया था। इससे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने पब्लिक में तांडव करने पर पाबंदी लगा दी थी।

2004 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक रूप से तांडव नृत्य करना आनंद मार्गी पंथ का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने 1990 के कोलकाता हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि पब्लिक में खोपड़ी और त्रिशूल लेकर तांडव नृत्य करना आनंद मार्गियों के पंथ का अनिवार्य हिस्सा है और पुलिस कमिश्नर इस पर शर्तें नहीं थोप सकते।

दरअसल, संस्थापक की ओर से 1966 में तांडव नृत्य का निर्देश देने के बाद कोलकाता पुलिस ने सीपीसी की धारा 144 के तहत इसके सार्वजनिक प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी थी। फैसले को 1983 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और फैसला आया कि यह आनंद मार्गी आस्था का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। पांच साल के बाद 1988 में आनंदमूर्ति जी के उपदेशों का संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ और उसमें तांडव नृत्य के सार्वजनिक प्रदर्शन की बात कही गई। जब पुलिस ने दोबारा परमिशन देने से मना कर दिया तो पंथ के लोग सुप्रीम कोर्ट चले गए।

जब आर्टिकल 25 और 26 का हवाला देते हुए मौलिक अधिकारों की दलील दी गई तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि धर्म के अनिवार्य अंग का मतलब होता है जिस पर धर्म की स्थापना की गई हो, यानी उसका मूल आधार। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि तांडव नृत्य मूल रूप से आनंद मार्गियों के लिए अनिवार्य नहीं था, इसे आनंद मार्ग के संस्थापक ने 1966 में धार्मिक अनुष्ठान का जरूरी हिस्सा बनाया।

पीठ ने कहा कि हिजाब की तुलना सिखों के लिए अनिवार्य केश, कड़ा, कृपाण जैसी चीजों से नहीं की जा सकती। 5 ककार सिखों के लिए अनिवार्य हैं। उन्हें भारत में संवैधानिक और कानूनी मान्यता है। कर्नाटक हिजाब मामले की सुनवाई के तीसरे दिन सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की, जब हिजाब समर्थक पक्ष के वकील बार-बार सिखों की वेशभूषा का हवाला दे रहे थे।

जस्टिस हेमंत गुप्ता और सुधांशु धूलिया की पीठ 15 मार्च को आए कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल 23 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। उस फैसले में हाईकोर्ट ने स्कूल-कॉलेजों में यूनिफॉर्म के पूरी तरह पालन को सही ठहराया था। इस आधार पर मुस्लिम लड़कियों के स्कूल-कॉलेज हिजाब पहनने पर रोक को सही पाया गया था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

कल सुनवाई के तीसरे दिन हिजाब समर्थक पक्ष के 2 वकीलों देवदत कामत और निज़ाम पाशा ने अपनी जिरह पूरी की। कोर्ट ने सोमवार, 12 सितंबर को दोपहर 2 बजे सुनवाई जारी रखने की बात कही है। आज जिरह करने वाले दोनों वकीलों का जोर इस बात पर रहा कि हाईकोर्ट ने इस्लामिक धार्मिक किताबों में लिखी बातों का सही अर्थ नहीं समझा। इस पर जजों ने वकील निज़ाम पाशा से कहा कि वह जिन पुस्तकों और उनमें लिखी बातों को प्रामाणिक मानते हैं, उन पर संक्षिप्त में लिखित नोट कोर्ट में जमा करवा दें।

वकील निजाम पाशा ने यह दलील भी दी कि अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ही यह कहा था कि वह धार्मिक किताबों का विश्लेषण नहीं करेगा। श्रद्धालुओं की आस्था अपने आप में पर्याप्त है। इस पर जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा, “वह आस्था इस बात से जुड़ी थी कि जहां पूजा की जा रही है, वही राम लला का जन्मस्थान है। यह मामला उससे थोड़ा अलग है”।

हिजाब की अनिवार्यता पर दलील देते हुए वकील निजाम पाशा ने कुरान के सूरा अन निसा में महिलाओं को लेकर कही गई बातों का हवाला दिया। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने हिजाब न पहनने के लिए दंड न होने की बात कही। इस आधार पर उसे अनिवार्य नहीं माना लेकिन, इस्लाम में नमाज या रोजे का पालन न करने के लिए भी कोई सजा नहीं लिखी गई है। इन बातों का फैसला भगवान पर छोड़ा गया है। इस्लाम के मानने वालों का विश्वास है कि कुरान में लिखी बात हर युग में सही है। उनकी इस भावना को संविधान का अनुच्छेद 25 मौलिक अधिकार का दर्जा देता है। इसलिए, हिजाब पर भी रोक नहीं लगनी चाहिए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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