हरेन पांड्या को कैसे चुप कराया गया

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गुजरात 2002 नरसंहार के बारे में बहुत सारी चीजें तब से लेकर आज तक न केवल मामले में प्रतिक्रिया संबंधी गहराई के चलते विशिष्ट हैं बल्कि हिंसा में राज्य की भूमिका को लेकर बड़े पैमाने पर सामने आए दस्तावेजों के जरिये हुए खुलासों ने इसको और विशिष्ट बना दिया है।

इस नरेटिव के साथ हिंसा फैलने के एक साल बाद 26 मार्च 2003 को दिनदहाड़े हुई राज्य के पूर्व मंत्री हरेन पांड्या की हत्या इस घृणित कहानी को एक और मोड़ दे देती है।

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हरेन पांड्या की यात्रा: छुटकारे की तलाश

हरेन पांड्या की जिंदगी और मौत एक रोचक कहानी है। आरएसएस के प्रति प्रतिबद्ध एक परिवार में पैदा होने के चलते वह और खुद उनके पिता विट्ठलभाई पांड्या उस वैश्विक सोच का प्रतिनिधित्व करते थे जो हिंदूवाद (निजी विश्वास) के हिंदुत्व (एक राजनीतिक और बिल्कुल विशिष्ट सोच) में संक्रमण के प्रति प्रतिबद्ध था और है।

एक सक्रिय शख्स और अहमदाबाद के एलिसब्रिज से लगातार तीन बार चुनाव जीतने वाले पांड्या केशुभाई कैबिनेट में गृहमंत्री और 2002 में जब दंगा शुरू हुआ उस दौरान गुजरात के रेवेन्यू मंत्री थे। पाल्दी जो उनके ही विधानसभा क्षेत्र में आता है उसमें बड़े स्तर पर अल्पसंख्यकों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। और इस मामले में कुछ गवाह थे जिन्होंने दावा किया था कि उन्होंने पांड्या को भीड़ के बीच देखा था।

इस पृष्ठभूमि के साथ उन्होंने मुझसे संपर्क किया। मैं कंसर्न्ड सिटीजन ट्रिब्यूनल- क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी गुजरात 2002 की कन्वेनर थी और पांड्या मई 2002 में हम लोगों के सामने उस समय पेश हुए। जब ट्रिब्यूनल की बैठकें पूरे सूबे में खत्म हो रही थीं। मेरे अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सावंत, बांबे हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज हासबेट सुरेश और देश में मानवाधिकार आंदोलन के अगुवा केजी कन्नाबीरन उस समय मौजूद थे।

1 मई 2002 से 17 दिनों तक ट्रिब्यूनल ने सूबे के ध्वस्त हो चुके जिलों को छान मारा और इस दौरान उसके सदस्यों ने हजारों पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और फिर उनके जरिये बर्बर हिंसक गवाहियां दर्ज कीं। पुलिस अधिकारी, कमिश्नर और जिलों के कलेक्टरों से ट्रिब्यूनल ने पूछताछ की। हम लोगों के सामने जो तस्वीर आयी वह बेहद भयावह थी। मीडिया कवरेज के दौरान षड्यंत्रों की एक विस्तृत रूपरेखा ने पहले ही इस तरफ इशारा कर दिया था जिसमें खुलकर यह बात सामने आयी कि बेहद ऊंचे स्तर पर एक योजना तैयार की गयी थी जिसके तहत पुलिस फोर्स और दूसरी कानून की रक्षा करने और उन्हें लागू करने वाली एजेंसियों को उदासीन और नपुंसक बना दिया गया था।

यह अंदर की बात है पुलिस हमारे साथ है

साहसपूर्ण और वैज्ञानिक तरीके से मीडिया द्वारा की गयी रिपोर्टिंग खासकर टाइम्स आफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस तथा कम्यूनलिज्म कंबैट के नरसंहार 2002 के संस्करण ने गोपनीय बैठकों और अवैध निर्देशों का दस्तावेजीकरण कर इस ज्वलंत तस्वीर को खींचने में मदद की थी।

15 फरवरी 2002 के पहले और बाद में गुजरात से अयोध्या जाने वाले कारसेवकों का “यह अंदर की बात है पुलिस हमारे साथ है” सबसे प्रिय नारा था। कम्यूनल कंबैट के पास 2002 के पहले के पांच सालों का घृणा युक्त साहित्य के वितरण का पूरा ब्योरा मौजूद है। जिन्हें गैर सरकारी संगठनों द्वारा वितरित किया गया था। इसके साथ ही राज्य से जुड़े लोगों के उसमें सहयोग को भी चिन्हित किया गया है। इस दस्तावेज में यह भी दिखाया गया है कि बर्बर हिंसा में शामिल संगठन और उनके नेता किस तरह से पुलिस, प्रशासन और सरकार के दूसरे महकमों में बेहद अंदर तक घुसे हुए हैं।

ट्रिब्यूनल के लिए इस नींव पर अपनी प्रस्थापनाओं को खड़ा करने के लिए और 2002 में हुई हिंसा के विश्लेषण को निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए साथ ही इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि स्टेट एक्जीक्यूटिव का यह सहअपराध एक अवैध बैठक का सीधा नतीजा था जिसमें मुख्यमंत्री ने विशेष तौर पर अवैध निर्देश जारी किया था, किसी आधिकारिक शख्स द्वारा इस बात की पुष्टि करना बेहद जरूरी हो गया था कि 27 फऱवरी 2002 को इस तरह की कोई बैठक हुई थी। किसी आधिकारिक व्यक्ति को इस काम के लिए तैयार करने के लिहाज से एक कन्वेंनर के तौर पर मेरा काम और कठिन हो गया था। इस दिशा में दर्जनों प्रयास किए गए। लेकिन उनमें कुछ ही सफल हुए। आखिरी तौर पर किसी और नहीं बल्कि मोदी कैबिनेट के एक तत्कालीन सदस्य की तरफ से उसकी पुष्टि आयी। इस गवाही ने ट्रिब्यूलन के तीन वाल्यूम में दर्ज विस्तृत और साहसिक जांच रिपोर्ट को सचमुच में एक ऐतिहासिक दस्तावेज में तब्दील कर दिया।

ट्रिब्यूनल के सामने हरेन पांड्या ने क्या बताया?

हरेन पांड्या ने जब हमारे प्रयासों पर प्रतिक्रिया देना शुरू किया और फिर हमसे मुलाकात की उसी दौरान उन्होंने उन कीमती गवाहियों को मुहैया कराया। हम लोगों की उनसे अहमदाबाद में बेहद गोपनीय तरीके से मुलाकात हुई। उन्हें जो कहना था उसको उन्होंने रिकार्ड करवाया। पैनल द्वारा तैयार किए गए सवालों को मैंने उनके सामने रखा। अपने खुद के विधानसभा क्षेत्र एलिसब्रिज के पाल्दी इलाके में होने वाली हिंसा को उन्होंने क्यों नहीं रोका? हम लोगों ने उनको यह बात याद दिलाते हुए पूछा कि किसी ने उनको उस भीड़ में देखा था। उन्होंने उसका उत्तर देते हुए बताया कि भीड़ बेहद नाराज थी मैंने उसे किसी की जान लेने से डाइवर्ट कर दिया था लिहाजा वह केवल संपत्ति को ही क्षति पहुंचा सकी। इस बात को समझने के लिए भीड़ के गुस्से को महसूस किया जाना चाहिए था। क्योंकि एक सांप्रदायिक तौर पर गर्म माहौल में यह बदले की कोई सामान्य प्रतिक्रिया नहीं थी। पूरी पुलिस स्वेच्छा से निष्क्रिय थी। उन्होंने जोर देते हुए बताया कि ऐसा इसलिए था क्योंकि उन्हें ऊपर से निर्देश दिया गया था। उन्होंने एक बैठक के बारे में बताया था जिसमें उन्होंने गुजरात कैबिनेट के कुछ मंत्रियों, डीजीपी के चक्रवर्ती, अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर पीसी पांडेय और सीएमओ के कुछ दूसरे महत्वपूर्ण अफसरों के मौजूद होने की पुष्टि की थी।

इस बैठक में मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर पुलिस को बिल्कुल साफ-साफ निर्देश दिया था। 27 फरवरी, 2002 की गोधरा की घटना के बाद वहां सड़कों पर हिंदुओं का एक स्पष्ट गुस्सा दिखेगा। पुलिस को इस गुस्से को बाहर आने की इजाजत देनी चाहिए। संक्षेप में उसको नियंत्रित करने के लिए कुछ मत करो। पांड्या ने ट्रिब्यूनल के सामने इस बात की आधिकारिक पुष्टि की कि जब स्वतःस्फूर्त तरीके से सड़कों पर सांप्रदायिक हिंसा फूटी तो राज्य की स्पष्ट रूप से विध्वंसक और गैरसंवैधानिक कार्रवाइयां सामान्य रूप से राज्य के न काम कर पाने या फिर उसके विकलांग होने के चलते नहीं थीं बल्कि बलात्कार और हत्याओं को विभिन्न स्तरों पर बिल्कुल सोचे समझे तरीके से अंजाम दिया गया था।

मेरी बाद की जांच और खास कर 8 जून 2006 को जाकिया एहसान जाफरी की शिकायत के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच के आदेश के बाद उन नौकरशाहों और पुलिसकर्मियों के नामों का खुलासा हुआ जिन्होंने उस बैठक में हिस्सा लिया था।

पांड्या ने ऐसा क्यों किया?

ट्रिब्यूनल को दी गयी प्रतिक्रिया में उनका कहना था कि उन्होंने हिंसा को एक कुत्सित और कुटिल मानसिकता से प्रेरित पाया और वह कभी भी इस तरह के बलात्कार, हत्या और बदले की कार्रवाई के हिस्से नहीं बन सकते थे। उन्होंने एक उदाहरण भी दिया कि कैसे उन्होंने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल सरसपुर में रहने वाले दाऊर्दी बोधरा धर्म के चीफ जिन्हें छोटा मुल्ला के तौर पर जाना जाता था को मुंबई जाने के मकसद से एयरपोर्ट तक जाने में मदद पहुंचायी थी।

हिंसा से प्रभावित इलाकों में प्रभावित पीड़ितों और यहां तक कि आपराधिक तौर पर दोषी और भटकने वाले पुलिसकर्मियों की गवाहियों ने पुलिस के तीन दिनों तक अपनी इच्छा से निष्क्रिय रहने की पुष्टि की। और उन्हें कोई भी कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया गया था। अहमदाबाद के भीतर नरोदा में भीड़ द्वारा पीछा करने पर नंगे भागने वाली औरतों से नरोदा पुलिस स्टेशन के पुलिस इंस्पेक्टर केके मैसूरवाला ने बताया था कि हम तीन दिन की छुट्टी पर हैं, अब तुम्हारे मरने की बारी है। गौरतलब है कि इस दौरान नरोदा में ढेर सारे लोगों की हत्या कर दी गयी थी। शहर से बाहर स्थित इस इलाके में अकल्पनीय अपमान और हिंसा का सामना करते हुए तकरीबन 120 लोगों की मौत हो गयी थी। यह इलाका बुरी तरीके से हिंसा से प्रभावित एक और इलाके चमनपुरा स्थित गुलबर्गा सोसाइटी से महज पांच से आठ किमी की दूरी पर होगा।

हमने इसी तरह से पंचमहाल और दाहोद जिलों के गांवों में अल्पसंख्यकों पर हमले की फेहरिस्त तैयार करने के क्रम में  गोधरा और लूनावाला में होने वाली गुप्त बैठकों के प्रमाण रिकार्ड किए। जीवन की क्षति के मामले में अहमदाबाद के बाद पंचमहाल दूसरा सबसे ज्यादा हिंसा से प्रभावित जिला था। यहां बिलकीस बानो के सामूहिक बलात्कार के बाद उनके परिजनों की हत्या के अलावा किडियाड और पंधरवाड़ा में नृशंष हत्याएं देखने को मिली थीं।        

ट्रिब्यूनल के सामने गवाही देने के बाद पांड्या की कठिनाई के दौर

पांड्या के विश्वासघात की खबर निश्चित तौर पर राज्य सरकार के कानों और आंखों तक पहुंची और ट्रिब्यूनल के साथ उनकी बैठक के एक महीने बाद ही जून 2002 में मीडिया तक पहुंच गयी। राजनीतिक बहिष्कार और विषैला निषेध वो कीमत थी जिसे पांड्या को अदा करना पड़ा। मोदी को न ही असहमति और न ही स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बर्दास्त है। पांड्या ने अपने जीवन में दोनों का प्रतिनिधित्व किया था। आउटलुक की स्टोरी A Plot from the Devil’s Lair  में इस बात को देखा जा सकता है।

यह कोई अचरज की बात नहीं थी कि उसके बाद पांड्या पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा दिया गया और फिर जुलाई 2002 में उन्हें मंत्रालय से बाहर कर दिया गया। नरसंहार के बाद के चुनावी लहर पर सवार मोदी ने आडवाणी और जेटली के दबाव को भी खारिज कर दिया और यहां तक कि दिसंबर 2002 के चुनाव में पांड्या को टिकट तक नहीं दिया।

जब मोदी फिर से सत्ता में लौटे तो पांड्या पूरी तरह से सीमित कर दिए गए थे। उनकी दिनचर्या मार्निंग वाक और गोल्फ खेलने तक सीमित हो गयी थी। तीन महीने बाद ठीक एक मार्निंग वाक की सुबह उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। हत्या के बाद उनका शव तकरीबन एक घंटे तक बगैर किसी रिपोर्ट के पड़ा रहा।

लॉ गार्डेन जहां पांड्या को एक सफेद मारूती कार के भीतर मृत पाया गया था आमतौर पर अहमदाबाद का व्यस्त इलाका है। लेकिन उस दिन उस घटना का कोई असुविधाजनक गवाह नहीं था। बंजारा ड्रेस और चोली बेचने का काम करने वाले ठेला वालों को जो गार्डेन के किनारे गंदगी फैलाने का काम करते थे, पांड्या की हत्या से कुछ दिनों पहले ही हटा दिया गया था।

एलिस ब्रिज पुलिस स्टेशन लॉ गार्डेन के सबसे करीब है लेकिन यह नवरंगपुरा की पुलिस थी जो रहस्यमय तरीके से सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंची। एलिसब्रिज स्टेशन के अफसरों को गलत निर्देश दे दिए गए और सबसे पहले उन्हें ला गार्डेन नहीं बल्कि पीरामल गार्डेन जाने के लिए कह दिया गया। अभी वे आधे दूर गये होंगे तभी किसी ने उन्हें सही स्थान पर पहुंचने के लिए गाइड किया।

पांड्या को खुफिया निगरानी में क्यों रखा गया?

गुजरात के 2002 के नरसंहार को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज जितना मायने रखता था उसके हिसाब से उसे तवज्जो नहीं दी गयी। और वह दस्तावेज कोई और नहीं बल्कि तब के एडिशनल डायरेक्टर आफ पुलिस आरबी श्रीकुमार द्वारा 16 अप्रैल से 19 सितंबर 2002 के बीच मेंटेन किया गया उनका निजी रजिस्टर है। यह दस्तावेज 207 पेजों का है और बाद के हमारे विवरणों में बिल्कुल अलग किस्म का महत्व हासिल किया है। लेकिन इसकी यहां एक विशिष्ट प्रासंगिकता है। श्रीकुमार के रजिस्टर में सभी तथ्य मैक्यावेलियाई और दुष्टता के उस स्तर को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं जिस तरह से मोदी और उनके संरक्षक तथा तब के देश के गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री आडवाणी दोनों ने मिलकर नरसंहार के बाद के प्रमाणों को खत्म करने और अपराधों के दर्ज न होने देने और उनकी जांच को ढंकने के लिए सुविधाएं मुहैया करायी थीं। कुछ प्रविष्टियां उस दिशा में संकेत करती हैं जिनमें पांड्या के ट्रिब्यूनल में गवाही देने के बाद राज्य सरकार की मशीनरी का बेजा इस्तेमाल करते हुए ऊंचे स्तर पर उनकी खुफिया निगरानी के निर्देश दिए गए थे।

7 जून, 2002 को श्रीकुमार द्वारा रजिस्टर में की गयी एक प्रवृष्टि बताती है कि मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा मोदी की तरफ से बेहद बेकरार थे क्योंकि उनके बॉस यह जानना चाहते थे कि जिसने ट्रिब्यूनल से मुलाकात की थी क्या वह सच में पांड्या थे। मिश्रा ने उसी दिन श्रीकुमार से यह पता लगाने के लिए कहा था कि मोदी कैबिनेट का कौन मंत्री सिटीजन्स इंक्यारी ट्रिब्यूनल से मुलाकात की थी। जिसके पैनल में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज वीआर कृष्ण अय्यर शामिल थे। मिश्रा ने श्रीकुमार को बताया कि ऐसा संदेह जताया जा रहा है कि वह रेवेन्यू मंत्री हरेन पांड्या थे।

उन्होंने श्रीकुमार को एक मोबाइल नंबर (9824030629) भी दिया और उनसे पांड्या की बैठक का विवरण उनके काल डिटेल से निकालने के लिए कहा। जब श्रीकुमार तुरंत आदेश का पालन नहीं किए तो मिश्रा ने फिर से 12 जून 2002 को निर्देशों को यह कहते हुए दोहराया कि ऐसा माना जा रहा है कि संबंधित मंत्री हरेन पांड्या हैं जिसने ट्रिब्यूनल से मुलाकात की थी। अपने रजिस्टर में श्रीकुमार कहते हैं कि हालांकि उन्होंने मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव से इस बात पर जोर दिया था कि मामला बेहद संवेदनशील है और एसआईबी (स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो) की ड्यूटी चार्टर से बाहर का है फिर भी दिए गए मोबाइल नंबर की काल डिटेल उन्होंने निकलवा दी। और उसे आईजीपी ओपी माथुर के जरिये जल्द ही मिश्रा को सौंप दिया।

इस घटना के एक महीने पहले जब श्रीकुमार मुख्यमंत्री मोदी द्वारा दिए गए सभी अवैध निर्देशों को रिकार्ड करने में व्यस्त थे। उसी दौरान की 7 मई, 2002 को उनके द्वारा की गयी एक और प्रवृष्टि बेहद महत्वपूर्ण थी। इस तारीख के 13 दिन पहले एडीजीपी श्रीकुमार अहमदाबाद (24 अप्रैल, 2002) की सांप्रदायिक स्थिति का विस्तार से मूल्यांकन किया था। जिसमें उन्होंने मानवाधिकार समूहों और ट्रिब्यूनल द्वारा किए गए स्वतंत्र मूल्यांकनों की पुष्टि की थी। स्टेट आईबी चीफ की यह रिपोर्ट बिल्कुल स्पष्ट तौर पर मोदी को नहीं भायी। जो शासन की संवैधानिक मान्यताओं और कानून के वैधानिक पालन तक सीमित थी। और राज्य द्वारा लिए गए पक्षपातपूर्ण रवैये के बिल्कुल खिलाफ जाता था। यह कोई अचरज की बात नहीं थी कि मोदी सरकार इस रिपोर्ट पर बुरी तरीके से नाराज हो गयी।

उसी दोपहर को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद श्रीकुमार को एक बैठक के लिए बुलाया। उन्होंने सबसे पहले एडीजीपी से अहमदाबाद में जारी हिंसा के उनके मूल्यांकन के बारे में पूछा। इस पर श्रीकुमार ने तुरंत प्रभावी सांप्रदायिक स्थिति के मामले में अपने नाराज करने वाले उसी नोट का हवाला दे दिया। उसके बाद मोदी ने कहा कि उन्होंने वह नोट पढ़ रखा है लेकिन उनका मानना है कि श्रीकुमार गलत नतीजे पर पहुंच गए हैं। मुख्यमंत्री का कहना था कि गुजरात में हिंसा के लिए इतना व्यापक और प्रोफेशनल विश्लेषण की जरूरत नहीं है। यह गोधरा की घटना में स्वाभाविक और अनियंत्रित प्रतिक्रिया थी। बस केवल इतना ही। उसके बाद उन्होंने श्रीकुमार से मुस्लिम आतंकियों पर फोकस करने के लिए कहा।

इस पर श्रीकुमार ने इस बात को चिन्हित किया कि वो मुस्लिम नहीं थे जिन्होंने गुजरात में हमलावर रुख अपनाया हुआ था। उन्होंने मुख्यमंत्री से निवेदन किया कि वह पस्त और बिखरे हुए अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसा दिलाने के लिए उनके बीच जाएं। रजिस्टर में रिकॉर्ड किया गया है कि श्रीकुमार के यह कहने पर मोदी बिल्कुल नाराज हो गए।

रजिस्टर में एक और महत्वपूर्ण प्रवृष्टि है जिसे मैं पांड्या की हत्या से जोड़कर देखती हूं। 28 जून, 2002 को तब के गुजरात के मुख्य सचिव सुब्बा राव ने उस साल 7 जुलाई 2002 को जमालपुर अहमदाबाद से निकलने वाली वार्षिक रथयात्रा की तैयारी के सिलसिले में बड़े अधिकारियों की एक बैठक बुलायी। मुख्यमंत्री की कोटरी के चहेते अफसर भी बैठक में मौजूद थे। स्थितियों की भयावहता को देखते हुए एडीजीपी इंटेलिजेंस ने यात्रा को रद्द करने का सुझाव दिया और अहमदाबाद के नवनियुक्त कमिश्नर केआर कौशिक ने भी एडीजीपी के विचारों का समर्थन किया। श्रीकुमार ने इस बात को चिन्हित किया था कि नाराज मुस्लिम युवाओं का गुस्सा तनाव को बढ़ा सकता है। उन्होंने इस सिलसिले में केंद्र की खुफिया सूचनाओं को भी साझा किया जिसमें रथयात्रा और हिंदुओं को नुकसान पहुंचाने के लिहाज से इस्लामिक कट्टरपंथियों और मुस्लिम आतंकियों के हमले की आशंका जतायी गयी थी। बैठक में मौजूद दूसरे अभी यात्रा को रद्द करने या फिर उसके मार्ग को बदलने के मसले पर बहस कर रहे थे तभी मुख्य सचिव सुब्बा राव ने समूह को सूचना दी कि जुलूस को रद्द करने का कोई सवाल ही नहीं है जैसा कि मुख्यमंत्री ने पहले ही उसे परंपरागत रास्ते से निकालने की अनुमति देने का एक कड़ा फैसला ले रखा है।

औपचारिक बैठक के बाद सुब्बाराव ने श्रीकुमार से व्यक्तिगत रूप से बात की और उन्हें सुझाव दिया कि अगर कोई भी रथयात्रा में बाधा डालता हुआ या उसे विध्वंस करता हुआ दिखा तो उस शख्स को खत्म कर दिया जाना चाहिए। यह एक सामान्य उपाय था जिसे राजनीतिक मंजूरी मिली हुई थी। और यह मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा सोचा-समझा फैसला था। उसके बाद श्रीकुमार ने यह कहते हुए कि इस तरह की कोई कार्रवाई बिल्कुल अवैध और अनैतिक है उनके हाथों में खेलने से इंकार कर दिया। हालांकि मुख्य सचिव उन पर मुख्यमंत्री के निर्देशों का पालन करने का दबाव डालते रहे लेकिन श्रीकुमार अपने स्टैंड पर अडिग रहे।

श्रीकुमार का रजिस्टर उत्तर गुजरात के मेहसाना जिले में स्थित मंदिर वाले बेचराजी शहर में मोदी के भड़काऊ भाषण की ईमानदार रिपोर्टिंग के बाद अचानक 19 सितंबर, 2002 को चुप हो गया। लेकिन मई 2002 से महीनों बाद तक दो चीजें बिल्कुल साफ हैं। ट्रिब्यूनल के सामने पेश होकर पांड्या ने मोदी को नाराज कर दिया था। मोदी और प्रशासन में उनके आदमी खासकर मुख्य सचिव सुब्बा राव और एसीएस (गृह) अशोक नारायन खुले तौर पर इस बात का प्रचार कर रहे थे कि जो भी गुजरात सरकार की नीतियों के विरोध और पागल हिंदू समूहों या फिर उनके जुलूसों के खिलाफ किसी गतिविधि में शामिल होगा उसे खत्म कर दिया जाएगा।

(यह पूरा लेख मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की एक अप्रकाश्य किताब का हिस्सा है। मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित सबरंग के इस लेख का यहां हिंदी अनुवाद दिया गया है।)

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1 thought on “हरेन पांड्या को कैसे चुप कराया गया

  1. 2002 से भारत में हिन्सात्मक राजनीति अपना एक स्पष्ट स्वरूप लेने मे सफल हो गई ,जिसकी बुनियाद 1925 मे पडगई थी।

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