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Thursday, August 5, 2021

भारत-चीन संघर्ष: राजनाथ सिंह की बात कितनी सच?

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भारत और चीन की सेना एलएसी को ध्यान में रखकर पेंगॉंग झील के उत्तर-दक्षिण में अपने-अपने सैनिकों को पीछे हटाने को तैयार हुई है और यह काम चल रहा है। देश की संसद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इस आशय के बयान सुनकर देश को संतोष जरूर हुआ है। “इस बातचीत में हमने कुछ नहीं खोया है।”-इस भरोसे से प्रसन्नता अधिक है। मगर, चिंता यह है कि कहीं यह भरोसा उतना ही वास्तविक न हो जितना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान में था, “न कोई हमारी सीमा में घुसा हुआ है और न हमारी कोई पोस्ट किसी के कब्जे में है।”

क्या यह सच है कि चीन के साथ नियंत्रण रेखा पर हमने कुछ भी नहीं खोया है? अगर लाइन ऑफ कंट्रोल पर 5 जून से पहले वाली स्थिति बहाल हो गयी है तो निश्चित रूप से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की बात सही है। और, अगर ऐसा नहीं है तो यह दावा कतई सही नहीं हो सकता।

14000 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित पैंगांग झील की लंबाई 135 किमी है। 45 किमी तक का हिस्सा भारत के नियंत्रण में रहा है जबकि शेष हिस्सा चीन के नियंत्रण में। भारत का मानना है कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा फिंगर 8 से होकर गुजरती है। इसके विपरीत चीन का मानना है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा फिंगर 2 से होकर गुजरती है। फिंगर 4 तक भारत का नियंत्रण रहा है। 2014-15 में चीन ने यहां कुछ निर्माण कर लिया था लेकिन बातचीत के बाद उसे यहां से वे सारे निर्माण हटाने पड़े थे।

5 जून तक भारतीय सेना फिंगर 3 पर पोजिशन कर रही थी और फिंगर 8 तक उसकी पेट्रोलिंग जारी थी। मगर, गलवान घाटी में खूनी संघर्ष के बाद से यह स्थिति बदल गयी। अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सदन में की गयी घोषणा के मुताबिक तय हुआ है कि फिंगर 3 और फिंगर 8 के बीच दोनों पक्ष में कोई भी पेट्रोलिंग नहीं करेगा जब तक कि इस बारे में आगे कोई सहमति नहीं बन जाती। इसका मतलब यह है कि भारत को अपनी पेट्रोलिंग फिंगर 4 और उससे आगे फिंगर 8 तक छोड़नी पड़ी है। मतलब ये कि 5 जून से पहले तक हम जिन इलाकों में पेट्रोलिंग कर पा रहे थे, वहां अब भी नहीं कर पा रहे हैं और आगे भी बातचीत के बाद ही यह संभव है। क्या इसे ‘कुछ भी नहीं खोना’ कहा जाएगा?

रक्षा मत्री राजनाथ सिंह की यह घोषणा जरूर महत्वपूर्ण है कि दोनों पक्षों में यह भी सहमति बनी है कि विवाद के दौरान बनाए गये निर्माणों को हटाया जाएगा। क्या इसे ही राजनाथ सिंह 5 जून के पहले वाली स्थिति का बहाल होना बता रहे हैं? 5 जून के पहले वाली स्थिति बहाल होना तब मानी जाएगी जब उन सभी क्षेत्रों से चीन पीछे हटेगा जहां उसने नये कब्जे बना लिए। इन इलाकों में शामिल हैं गोगरा पोस्ट, हॉट स्प्रिंग, गलवान घाटी और देप्सांग घाटी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह देप्सांग घाटी में चीनी सेना की मौजूदगी पर बिल्कुल खामोश हैं। यहां चीन ने बॉटिल नेक या वाई जंक्शन पर रणनीतिक पोजिशन मजबूत कर भारतीय सेना की आवाजाही रोक रखी है। भारतीय सेना की आवाजाही पीपी 10, पीपी 11, पीपी 12 और पीपी 13 पर रुकी हुई है। जब तक यह दोबारा शुरू नहीं हो जाती यह कैसे कहा जा सकता है कि 5 जून से पहले वाली स्थिति बरकरार हो गयी?

देप्सांग घाटी की अहमियत इस बात से समझिए कि यह ऐसा इलाका है जहां से दौलत बेग ओल्डी पर भी नज़र रखी जा सकती है। वास्तविक नियंत्रण रेखा से यह 18 किमी दूर है।

चीन ने देप्सांग और गलवान घाटी के अलावा जिन स्थानों पर अपनी पकड़ मजबूत किया और एलएसी को नये सिरे से परिभाषित करने की जरूरत समझी, उनमें गोगरा पोस्ट यानी पीपी 17ए और हॉट स्प्रिंग यानी पीपी 15 शामिल हैं। इन स्थानों से भी चीनी सेना के पीछे हटने के बारे में कोई बात स्पष्ट रूप से नहीं कही गयी है। यह तथ्य चिंताजनक है।

बीते 8 महीनों में भारत ने भी कुछ ऐसी चोटियों पर कब्जा जमाया था जहां इससे पहले तक दोनों में से कोई पक्ष मौजूद नहीं था और रणनीतिक नजरिए से यह महत्वपूर्ण कब्जा है। इनमें मगार हिल, मुखपरी, गुरुंग हिल, रेजांग ला, रेचिन ला शामिल हैं। इन चोटियों पर कब्जे के बाद भारत इस स्थिति में आ गया कि वह चीन के प्रभुत्व वाले स्पांगर गैप घाटी और मॉल्डो गैरिसन को निशाने पर रख सके। सवाल यह है कि समझौतों के तहत क्या इन चोटियों से भी भारत अपना दखल हटाएगा?

राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा है कि जब तक यथास्थिति बहाल नहीं हो जाती है तब तक सीमा पर शांति नहीं हो सकती। वे भारत सरकार पर शहीदों की कुर्बानी का अपमान करने और अपने इलाके हाथ से निकल जाने देने का आरोप लगा रहे हैं। यह तय है कि राहुल गांधी को जवाब सत्ता पक्ष की ओर से नेहरू के शासनकाल में और बाद में भी चीनी घुसपैठ के उदाहरणों से दिया जाएगा। मगर, प्रश्न यह नहीं है कि पहले क्या हुआ? आज जो हो रहा है उस बारे में सच्चाई देश को बतायी जाए, यह जरूरी है। अगर चीन ने भारतीय प्रभाव वाले हिस्सों पर कब्जा जमाया है तो उसे स्वीकार किए बगैर चीन को खदेड़ा नहीं जा सकता।

आखिर में यह सवाल जरूर उठता है कि जब प्रधानमंत्री अपनी सीमा में किसी के नहीं घुसे होने या फिर किसी पोस्ट पर किसी का कब्जा नहीं होने की बात कह रहे थे, तब वे वास्तव में कहना क्या चाह रहे थे? आज अगर दोनों सेनाएं पीछे हटेंगी तो इसलिए कि वे कभी आगे बढ़ी थीं? गलवान घाटी में 20 जवानों की शहादत और 43 चीनी सैनिकों को मार गिराने की घटना (हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है) क्या बेवजह हुई थी? क्या आज भी चीन ने देप्सांग घाटी समेत कई जगहों पर कब्जा नहीं जमाया हुआ है? जाहिर है इन सवालों के जवाब दिए जाने चाहिए। अगर चीनी वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदलने में कामयाब रहते हैं तो राहुल गांधी बिल्कुल सही कह रहे हैं कि यह शहीद सैनिकों की कुर्बानी का अपमान है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों पर उन्हें बहसों में देखा जा सकता है।)

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