कैसे नरेंद्र मोदी के 9 सालों के कार्यकाल में आम आदमी से दूर होती गई रेलवे 

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कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक और वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को हरी झंडी देकर नई दिल्ली-देहरादून सेवा की शुरुआत की। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने केंद्र की सत्ता में रह चुकी पूर्ववर्ती सरकारों के बारे में एक ऐसी टिप्पणी कर उनके अब तक के कामों पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है, जो अपने आप में बेहद विवादास्पद मुद्दा है।

पीएम मोदी ने अपने बयान में कहा है कि पहले की सरकारें “भ्रष्टाचार और वंशवादी राजनीति” में पूरी तरह से डूबी हुई थीं और उन्होंने इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने दावा किया कि रेलवे का सर्वांगीण कायाकल्प करने का काम 2014 के बाद से शुरू हुआ है। वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के जरिये वन्दे भारत ट्रेन का उद्घाटन करते हुए मोदी ने कहा, “पिछली सरकारों ने देश में हाई स्पीड ट्रेन शुरू करने के बड़े-बड़े वादे किये, लेकिन वे रेलवे नेटवर्क में आने वाले मानव रहित फाटक तक बना पाने में विफल साबित हुए।” उन्होंने आगे कहा, 21वीं सदी का भारत अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण कर खुद को खुशहाल कर सकता है, जिसे पूर्व में सत्ता में बैठी पार्टी ने संज्ञान नहीं लिया। उनका ध्यान तो घोटालों और भ्रष्टाचार पर ही केंद्रित था। वे वंशवादी राजनीति के बंधन से ही बाहर नहीं निकल सके। उन्होंने भी हाई स्पीड ट्रेन को लेकर बड़े बड़े वादे किये थे, वर्षों गुजर गये और कुछ नहीं किया।

मोदी जी का अगला दावा तो और भी झंकृत करने वाला है। उन्होंने दावा किया कि 2014 तक भारतीय रेलवे का सिर्फ एक तिहाई नेटवर्क का ही विद्युतीकरण हो सका था, जिसके बिना फ़ास्ट-रनिंग ट्रेन के बारे में विचार ही नहीं किया जा सकता है, जो 2014 के बाद ही देश में पहली बार संभव हो सका है। उन्होंने आगे कहा, 2014 से पहले सालाना मात्र 600 किमी ट्रैक का ही विद्युतीकरण संभव था, जिसे अब बढ़ाकर सालाना करीब 6,000 किमी किया जा चुका है। उन्होंने दावा किया, “आज देश के रेलवे नेटवर्क का 90% से अधिक विद्युतीकरण किया जा चुका है। उत्तराखंड में तो 100% रेलवे नेटवर्क का विद्युतीकरण हो चुका है।”

जबकि इंडियन रेलवे की वेबसाइट पर जाने पर जानकारी मिलती है कि जुलाई 2021 तक भारतीय रेलवे ने 16,001 किमी रेलवे लाइन का विद्युतीकरण पूरा कर लिया था, जबकि कुल रेलवे मार्ग की लंबाई 63,028 किमी है। अब यदि 9 साल के हिसाब से देखें तो 54,000 किमी रेलवे लाइन का विद्युतीकरण तो हो जाना चाहिए था। इसमें हम पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा किये गये विद्युतीकरण को भी जोड़ देते हैं, फिर भी यह तथ्य एक जुमलेबाजी से अधिक नहीं लगता। 

रेलवे को 15 अगस्त 2023 तक 75 वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को पटरी पर लाने का लक्ष्य दिया गया था। लेकिन अभी तक 18 ट्रेन ही पटरी पर उतारी जा सकी है, और यह लक्ष्य अब दूर की कौड़ी नजर आ रहा है। इतना ही नहीं बल्कि 16 कोच की ट्रेन चलाने के बजाय अब 8 कोच की ट्रेन चलाकर एक के स्थान पर दो-दो ट्रेन का उद्घाटन कर, तालियां बटोरी जा रही हैं। जहां तक हाई स्पीड ट्रेन चलाने का दावा है, तो 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पर चलने के बजाय वन्दे भारत ट्रेन बेहद सुस्त रफ्तार से दौड़ाई जा रही है। कल दिल्ली-देहरादून वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन जिसे 302 किमी को 4 घंटे 45 मिनट में यात्रा पूरी करनी है, की औसत रफ्तार 64 किमी प्रति-घंटे से कम है। फरवरी 2019 में पहली वन्दे भारत एक्सप्रेस ट्रेन का उद्घाटन हुआ था, लेकिन कुछ तकनीकी खामियों को दुरुस्त करने के लिए इसमें गतिरोध बना हुआ था। हालांकि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपने हालिया बयान में कहा है कि जल्द ही हर तीन दिन में एक ट्रेन ट्रैक पर दौड़ने लगेगी।

यहां पर सवाल उठता है कि भारतीय रेलवे के बारे में केंद्र सरकार क्या सोच-समझ रखती है, क्या यह भारतीय आम जनमानस की आकांक्षाओं से मेल खाती है? निश्चित रूप से भारतीय रेलवे के बारे में 2014 से पहले और बाद की सरकार में बिल्कुल भिन्न सोच दिखाई देती है। 

अक्टूबर 2020 में रेलवे के सेमी हाई स्पीड ट्रेन चलाने के फैसले ने इसे निर्णायक रुख प्रदान करने का काम किया था। यह फैसला लिया गया था कि 130 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार वाली ट्रेनों से स्लीपर एवं अनारक्षित जनरल बोगी को हटाया जायेगा। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि स्लीपर और जनरल बोगी हाई स्पीड के लिए उपयुक्त नहीं हैं। 

इसके साथ ही सवाल उठने लगा कि क्या रेलवे के घाटे को पाटने के लिए बहुसंख्यक निम्न आय वर्ग के लोगों को रेलवे अब अपनी प्राथमिकता में नहीं रखने जा रहा है? रेलवे और भारत सरकार की प्राथमिकता में अब संपन्न भारतीय ही रेल का सफर करने के लिए उपयुक्त होंगे? क्या देश को एक सिरे में जोड़ने वाली रेल अब अमीर और गरीब के बीच का फासला बढ़ा रही है। 

देश में साल भर में औसतन 370 करोड़ लोग ट्रेन की यात्रा करते हैं। इसमें 198 करोड़ जनरल कोच का टिकट लेते हैं, जबकि 150 करोड़ लोग स्लीपर और मात्र 18 करोड़ लोग ही वातानुकूलित कोच से यात्रा करते हैं। ऐसे में तेज रफ्तार से चलने वाली ट्रेनों में स्लीपर और जनरल बोगी को हटाना, 90% आम भारतीय को प्रगति और विकास के लायक नहीं मानना है। 

मोदी जी ने केंद्र की सत्ता संभालने के बाद अपने शुरुआती भाषण में कहा था कि उनका इरादा हवाई चप्पल वाले को हवाई जहाज में बिठाने का है। लेकिन आज जब ट्रेन का किराया ही हवाई जहाज के बराबर कर दिया है, तो क्या उन्होंने ट्रेन से चलने वाले बहुसंख्य भारतीयों को पैदल नहीं कर दिया है? देश में अभी तक जनरल, स्लीपर, थर्ड एसी, सेकंड एसी और फर्स्ट क्लास श्रेणी के कोच एक ही ट्रेन में सभी श्रेणी के भारतीय की यात्रा का प्रबंध करती थी। लेकिन अब देश के संपन्न और गरीब के लिए अलग-अलग ट्रेन चलाकर एक बड़ी विभाजक रेखा खींची जा रही है, जिसे देखकर भी धूर्तता के साथ आंखें चुराई जा रही हैं। जाहिर है आगे से अधिकांश नई रेलगाड़ियां सेमी या हाई स्पीड की उतारी जाने वाली हैं, ऐसे में बहुसंख्यक गरीब व्यक्ति के लिए आवंटित ट्रेन में सुविधाओं में और ज्यादा कटौती और देरी से यात्रा से इंकार नहीं किया जा सकता। 

एक भ्रम यह भी बनाया गया है कि नॉन एसी कोच से रेलवे को आमदनी कम होती है, जबकि एसी कोच से ज्यादा मुनाफा होता है। जबकि हकीकत यह है कि रेलवे को सबसे अधिक नुकसान प्रथम श्रेणी के वातानुकूलित कोच (71% सब्सिडी) से होता है। सेकंड एसी के लिए रेलवे को सब्सिडी के तौर पर 26% और स्लीपर क्लास के लिए 37% सब्सिडी देनी पड़ती है। एसी थर्ड कोच से रेलवे को मुनाफा होता है। कुल मिलाकर रेलवे को यात्री भाड़े पर औसतन 43% की सब्सिडी देनी पड़ती है। लेकिन कोई यह तर्क देता है कि रेलवे को ऐसा जनरल बोगी या स्लीपर क्लास के लिए करना पड़ता है, तो यह गलत तथ्यों पर आधारित है, भारत के मध्य वर्ग को ऐसे ही झूठे तथ्यों से चराया जाता आ रहा है।

हां, यह सही है कि रेलवे को कुल मिलाकर यात्री भाड़े में नुकसान होता है, जबकि माल भाड़े से इसकी भरपाई की जाती है। भारतीय रेलवे को 100 रूपये कमाने के लिए  97.27 रूपये की परिचालन लागत आती है। इसमें यात्री ट्रेन चलाने के लिए प्रति 100 रूपये हासिल करने के लिए 197.49 रूपये खर्च वहन करना पड़ता है। वहीं माल ढुलाई पर 100 रुपया कमाने के लये मात्र 58.72 रूपये का खर्च आता है।

लेकिन सवाल यह है कि रेलवे को क्या सिर्फ लाभ के लिए कमाऊ पूत मानती है सरकार? अभी तक रेल को देश की लाइफलाइन समझा जाता था। दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क, जिसके लिए अलग से रेल बजट पारित होता था, करोड़ों लोगों को देश के एक छोर से दूसरे छोर पर जाने के लिए सर्व-सुलभ साधन है। यही वह माध्यम है जिसके जरिये असंगठित मजदूर औद्योगिक क्षेत्रों एवं महानगरों में पिछले 150 वर्षों में जाकर भारत की तस्वीर को बदलने में सबसे महती भूमिका निभाते आ रहे हैं। याद कीजिये, कोरोना महामारी में जब रेल नेटवर्क को पूरी तरह से ठप कर दिया गया था, और देश ही नहीं दुनियाभर में मोदी जी की थू-थू होने लगी थी तो मजबूरी में 200 ट्रेन चलाने की मंजूरी दी गई, वो भी नॉन-एसी। किस प्रकार भूखे प्यासे लाखों लोग मुंबई, सूरत के अपने दड़बों से निकलकर प्लेटफार्म पर अपने-अपने गांव की एक झलक पाने के लिए जूझ रहे थे।

2014 के बाद से बहुत कुछ ऐसा घट चुका है, जिसके बारे में अभी कोई ठोस आकलन नहीं किया गया है। भारत सरकार रेलवे किराए, प्लेटफार्म टिकट, डायनामिक फेयर, तत्काल के नाम पर वसूली इत्यादि वे सभी साधन अपना रही है, जिससे उपभाक्ताओं से ज्यादा से ज्यादा पैसा ऐंठा जा सके। यहां तक कि कोरोना के दौरान वरिष्ठ नागरिकों को किराये में दी जाने वाली छूट को भी खत्म कर दिया गया, जो पूर्ववर्ती सरकारों के द्वारा 60 वर्ष या अधिक उम्र के नागरिकों को सामाजिक दायित्व के तौर पर प्रदान किया जाता था। आजकल गर्व से बताया जाता है कि इस वर्ष सीनियर सिटीजन के टिकट में रिबेट हटाकर इतने हजार करोड़ रूपये बचा लिए गये। हालांकि आज भी यात्री किराए से रेलवे की आय 26% माल भाड़े की ढुलाई से 74% होती है।

यात्री किराये में अनाप-शनाप वृद्धि या सिर्फ एसी कोच ट्रेन चलाने से रेलवे का घाटा खत्म नहीं किया जा सकता। ना ही ऐसा करना सरकार की मजबूरी है। सरकार हर साल हजारों करोड़ के विज्ञापन समाचार पत्रों और टीवी विज्ञापनों पर खर्च कर संसाधनों का दुरूपयोग करने से परहेज नहीं करती। देश के सरकारी बैंकों से ऋण लेकर खुद को दिवालिया साबित कर सैकड़ों उद्योगपति मित्र आज दुनिया के ‘सुरक्षित सेफ हेवेन’ में मौज कर रहे हैं। उन लाखों करोड़ के घाटे से संकट में फंसे बैंकों को सरकार बजट से फंड मुहैया कराती है, और खुद कर्ज लेकर करदाताओं के पैसे से ब्याज का पैसा भर रही है। लेकिन रेल यात्रा में घाटे से उसकी ओर से हाय-तौबा मचाना और इसके नाम पर एसी कोच गाड़ियों को आगे कर 90% भारतीय को प्लेटफार्म पर छोड़ देना कहां की ईमानदारी है? ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ के जरिये रेलवे के पास अपनी आय को बढ़ाने के लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं। 

एक तर्क यह भी दिया जाता है कि जीडीपी में रेलवे का योगदान काफी कम है, जिसे बढ़ाना जरुरी है। अभी रेलवे का जीडीपी में योगदान 0.7% है, जबकि सड़क का 2%, हवाई यात्रा का 2% और शिपिंग क्षेत्र का 1% है। 

यहां भी प्रश्न यही उठता है कि कमाने के लिए सरकार के पास अनेकों साधन हैं, और वह जहां तहां से टैक्स, सेस लगाकर कमाती ही रहती है। जीडीपी में वृद्धि के लिये उद्योग और विनिर्माण सहित उन उपायों पर फोकस करे जिसमें करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सके। सरकार वहां से जीएसटी एवं अन्य माध्यमों से अपनी आय बढ़ाए। 

एक्सपर्ट्स की राय में स्लीपर और जनरल कोच वाली ट्रेन की अधिकतम रफ्तार सीमा 110 किमी प्रति घंटे है। लेकिन इससे अधिक रफ्तार की ट्रेन शायद ही इक्का-दुक्का चल रही हैं। वैसे भी एसी कोच की तुलना में नॉन-एसी कोच वजन में हल्के होते हैं। कहां तो यह भी जाता है कि एपी एक्सप्रेस 130 किमी की स्पीड से दौड़ती है, और इसमें नॉन एसी कोच भी हैं। आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन के पदाधिकारी, शिव गोपाल मिश्रा के अनुसार 130 किमी प्रतिघंटे की स्पीड में नॉन एसी और जनरल कोच में कोई समस्या नहीं है। ये एसी कोच की तुलना में अपेक्षाकृत हल्के होते हैं। सिर्फ 150-160 किमी प्रतिघंटे से उपर चलने पर इन्हें शामिल करना कारगर नहीं होगा। जब ट्रेन में सभी एसी कोच होंगे तो यात्रियों की संख्या स्वतः कम हो जाती है। 

हमारे देश में कुलमिलाकर रोज 2.5 करोड़ लोग ट्रेन से यात्रा करते हैं। आबादी के लिहाज से एक पूरा का पूरा ऑस्ट्रेलिया सिर्फ ट्रेन से सफर कर रहा होता है। 80% लोगों के लिए दूसरे साधनों से यात्रा करना संभव नहीं है, वे इसे वहन करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं। रेलवे का मकसद लाभ कमाने के बजाय सामाजिक दायित्वों का निर्वहन है। जनता के लिए जितनी अधिक ट्रेनें चलाई जा सकती है, उसे चलाया जाना चाहिए। मात्र 5% लोगों के लिए रेल चलाने का कोई तुक नहीं है।

तो क्या मोदी जी कुछ सौ की संख्या में नई ट्रेनों का उद्घाटन कर देश को गुमराह कर रहे हैं? दिल्ली से देहरादून के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग मार्च 2024 में बनकर तैयार होने जा रही है। सड़क के जरिये अब दिल्ली से देहरादून 5 घंटे के बजाय 2.5 घंटे में संपन्न मध्य-वर्ग कर लेगा। ऐसे में वन्दे भारत से 4 घंटे 45 मिनट का सफर किस काम का है, इसे उच्च-मध्य वर्ग तो आसानी से समझ सकता है, लेकिन खोखले राष्ट्रवाद से ऊभ-चूभ रहने वालों के लिए तो यह गाय से टक्कर खा क्षतिग्रस्त होने वाली ट्रेन एक महा मोमेंट है। जबकि इसी रूट पर दसियों हजार आम लोगों को रोज बसों टैक्सी और जीपों के जरिये ज्यादा खर्च कर धक्के खाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इस प्रकार बहुसंख्यक भारत को नेपथ्य में धकेला जा रहा है।

भारतीय रेलवे रोजाना तकरीबन 11,000 ट्रेनों का संचालन करती है, इसमें 7,000 यात्री ट्रेन हैं। हाई स्पीड ट्रेन चलाने के लिए ट्रैक और ओएचई में बड़े बदलाव की जरूरत है। इसके बिना देश में तेज रफ्तार ट्रेन चलाना सिर्फ एक ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं है। हाल में वन्दे भारत एक्सप्रेस ट्रेन, दुरंतो, तेजस एक्सप्रेस इत्यादि के साथ इसकी शुरुआत की गई है जिन्हें स्पीड के मामले में अन्य ट्रेनों से बेहतर कहा जा रहा है। लेकिन यह भी तथ्य है कि इन वीआईपी ट्रेनों के लिए बाकी ट्रेनों को जगह-जगह रोक दिया जाता है। अभी तक वन्दे भारत सीरीज की कुल 18 ट्रेनों का उद्घाटन किया जा चुका है, जिनमें से एक को छोड़ सभी का उद्घाटन पीएम मोदी के कर-कमलों द्वारा ही किया गया है। 16 कोच की जगह कई ट्रेन 8 कोच के साथ चलाई जा रही है। यह परिचालन के घाटे को कैसे पूरा कर पा रही है, यह तो रेलवे प्रशासन ही जाने। इसी प्रकार 24 दुरंतो ट्रेन चलाई गई हैं। 38 हमसफर सहित अन्तोदय, उदय, तेजस, महामना, गतिमान, राजधानी, शताब्दी, जन शताब्दी, संपर्क क्रांति, गरीब रथ, राज्य रानी, कविगुरु, विवेक एक्सप्रेस, युवा एक्सप्रेस सहित 67 अन्य एसी ट्रेन देश के विभिन्न रूट पर चल रही हैं। स्पीड के लिहाज से ये 50 किमी प्रति घंटे से लेकर अधिकतम 67 किमी प्रति घंटा स्पीड पर दौड़ रही हैं, जो किसी भी लिहाज से नॉन एसी और जनरल डिब्बों को क्यों नहीं ले जा सकतीं, इसका जवाब सिर्फ भारतीय रेल ही दे सकता है। 

आखिर में इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि जुलाई 2020 में भारतीय रेलवे ने दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, प्रयागराज, पटना, हावड़ा, सिकन्दराबाद, जयपुर और बेंगलुरु रूट के निजीकरण के लिए 30,000 करोड़ रूपये की निविदा सार्वजनिक की थी, लेकिन बोली प्रकिया में सिर्फ दो संस्थाओं ने ही हिस्सा लेने में रूचि दिखाई। रेलवे ने टेंडर ओपनिंग में एक को अगंभीर और दूसरे को कई बार आमंत्रित करने पर भी इच्छा न दिखाने पर मजबूर होकर अक्टूबर 2021 में इस निजीकरण की प्रक्रिया को ही रद्दी की टोकरी में डाल दिया था। इसके तहत 2023 तक कम से कम 12 निजी ट्रेनों का संचालन शुरू हो जाना था, और 2027 तक आधुनिक रैक्स के साथ 151 ट्रेन निजी क्षेत्र में चलाए जाने की योजना थी। ऐसा अनुमान था कि इससे रेलवे को एक अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता, निजी क्षेत्र के लिए नए व्यवसाय के अवसर खुलते और यात्रियों को विश्व स्तरीय यात्रा का सुखद अनुभव हो रहा होता। लेकिन निजी क्षेत्र के पास जब लाभ कमाने के लिए पहले से ही देश में अनेकों अवसर हों, तो वह भला क्यों ऐसे क्षेत्र में हाथ डाले जहां पर पहले भी यूरोप में निवेश कर बाहर जा चुका है। 

2014 के बाद निश्चित ही सरकार की सोच में बड़ा बदलाव आया है। लेकिन यह जन-सरोकारों से दूर भारतीय रेल के आधुनिकीकरण के बहाने इसे निजी क्षेत्र में झोंक अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए आतुर दिखती है। इसका उद्येश्य इसे विश्व स्तरीय और 130 करोड़ लोगों के लिए सर्व-सुलभ एवं किफायती बनाने के बजाय एक मुनाफाखोर संस्था बनाना है, जो आम भारतीय को लगातार भारत की लाइफ-लाइन से दूर करता जा रहा है।  

( रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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