Monday, December 6, 2021

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सरकारी डेटा: सिर्फ मई माह में मध्य प्रदेश में हुई थी 170000 लोगों की मौत

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मध्य प्रदेश के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के सरकारी डेटा से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस सिस्टम के मुताबिक पूरे प्रदेश में सिर्फ़ मई महीने में 1.7 लाख मौतें हुई हैं। यह पहली बार है जब सरकारी डेटा में दर्ज़ इतनी सारी मौतों के बारे में आंकड़े सामने आए हैं। मध्य प्रदेश में मई 2019 में 31 हजार लोगों की मौत हुयी थी जबकि मई 2020 में 34 हजार लोग मरे थे।

उपरोक्त तुलनात्मक आंकड़ों से जाहिर है कि मध्य प्रदेश में कोविड की दूसरी लहर के पीक के दौरान सबसे ज़्यादा मौतें हुयी हैं। कोविड के अलावा और कोई कारण नज़र नहीं आता मई 2021 में हुयी 1.7 लाख मौतों के पीछे।

गौरतलब है कि सीआरएस के तहत ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल इंडिया, देशभर में जन्म और मृत्यु का हिसाब रखता है। सभी राज्यों को सीआरएस पर मौत और जन्म का आंकड़ा दर्ज़ करना होता है। सीआरएस हर मौत का रिकॉर्ड रखता है, चाहे कहीं भी, किसी भी कारण से हुई हों, भले मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाया गया हो या नहीं।

सीआरएस (CRS) के ही सरकारी डेटा के मुताबिक इस बार मई के महीने में हुई मौतें हर बार होने वाली मौतों से 4 गुना ज्यादा है। इस साल जनवरी से मई के बीच पिछले साल के मुकाबले 1.9 लाख लोग ज्यादा मरे हैं। राज्य में मई 2019 में 31 हजार और 2020 में 34 हजार लोग मरे थे।

सीआरएस के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में इस साल 3.5 लाख मौतें हुई हैं। तुलनात्मक तौर पर देखें तो साल 1999 के जनवरी से मई की तुलना में साल 2021 के जनवरी-मई के दरम्यान 1.9 लाख ज्यादा मौतें हुई हैं। जबकि सरकार ने जनवरी से मई 2021 के बीच सिर्फ 4,461 कोरोना से मौतों की जानकारी दी है। राज्य में अप्रैल-मई 2021 में सरकारी आंकड़ों में दर्ज कोविड मौतों से 40 फीसदी ज्यादा मौतें हुई हैं।

सीआरएस के आंकड़ों के मुताबिक़ मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में सबसे ज्यादा लोगों की जान गई है। इंदौर में अप्रैल-मई 2021 में 19 हजार लोगों की जान गई है। जो पिछले 2 साल की तुलना में 2 गुना ज्यादा है। वहीं भोपाल में अप्रैल-मई 2019 में 528 लोगों की मौत हुई थी। 2020 में 1204 और 2021 में 11045 लोगों की जानें गईं। आंकड़ों के मुताबिक इंदौर में सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। इसके बाद भोपाल, जबलपुर, उज्जैन और छिंदवाड़ा जिलों में सबसे ज्यादा मौतें हुईं हैं।

सीआरएस के तहत ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल इंडिया, देशभर में जन्म और मृत्यु का हिसाब रखता है। सभी राज्यों को सीआरएस पर मौत और जन्म का आंकड़ा दर्ज करना होता है। देश में हुईं 86% और मध्य प्रदेश में हुई 80%  मौतें यहां हर हाल में दर्ज होती हैं। सीआरएस हर मौत का रिकॉर्ड रखता है, चाहे कहीं भी, किसी भी कारण से हुई हों, भले मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाया गया हो या नहीं।

विपक्षी दलों ने यूपी, गुजरात, मध्यप्रदेश में मौत छुपाने का आरोप लगाया

सीआरएस के आंकड़े सामने आने के बाद कांग्रेस ने शिवराज को शवराज बताते हुये उनके इस्तीफे की मांग की है। कांग्रेस का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पहले ही सरकार की पोल खोल दी थी। अब सरकारी आंकड़ों ने खुद ही सारी सच्चाई बयान कर दी है। https://twitter.com/rssurjewala/status/1403555273361420292?s=19

कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश में कोविड से मौत के आंकड़े छिपाए जाने का आरोप लगाते हुये शनिवार को कहा है कि इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों योगी आदित्यनाथ, विजय रुपानी और शिवराज सिंह चौहान को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना चाहिए। मुख्य विपक्षी पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यह आग्रह भी किया कि देश में कोविड से हुई मौतों का सही आंकड़ा पता करने और आंकड़े छिपाने वालों की जवाबदेही तय करने के लिए न्यायिक जांच कराया जाये।

कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मध्य प्रदेश में कोविड से मौत के आंकड़ों से संबंधित एक खबर का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘170000 मौत- अकेले मई माह में- सिर्फ़ मप्र में! जो न सोचा, न सुना, वो सत्य सामने है। मध्य प्रदेश में अकेले मई माह में छह महीने के बराबर मौतें हो गईं। इंसान की जान सबसे सस्ती कैसे हो गई? क्यों आत्मा मर गई? कैसे शासन पर बैठे हैं ‘शिवराज’? प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री सामने आएं, बताएं कि कौन जिम्मेदार ?’’

वहीं कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘एनडीए का मतलब ही ‘नो डेटा अवेलेबल’ (कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं) है। अर्थव्यवस्था और नौकरियों के आंकड़े छिपाये जा रहे हैं। अब लोगों की जान जाने के आंकड़े छिपाये जा रहे हैं, जो बहुत ही दुखद है। नए भारत में अब मरने वालों का सही आंकड़ा भी नहीं दिया जा रहा है।’’

पवन खेड़ा ने आगे कहा- ‘‘मई महीने में मध्य प्रदेश में 1.7 लाख लोगों की मौत हुई, जबकि सरकारी आंकड़े में सिर्फ 2451 लोगों की मौत कोविड से होने की बात की गई है। सच्चाई यह है आंकड़ा छिपाया गया है। गुजरात और उत्तर प्रदेश में भी आंकड़े छिपाए गए हैं। इन दोनों राज्यों के बारे में भी ऐसी खबरें आ चुकी हैं।’’ खेड़ा ने दावा किया, ‘‘ऐसा लगता है कि भाजपा शासित राज्यों में कोविड से मरने वालों का आंकड़ा छिपाने की होड़ लगी हुई है।’’

पवन खेड़ा ने सीआरएस का आंकड़ा आने के बाद गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की नैतिकता पर सवाल उठाते हुये कहा है कि -‘‘क्या आंकड़े छिपाने वाले इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को कुर्सी पर बने रहने का नैतिक अधिकार है? मुख्यमंत्रियों की जिम्मेदारी बनती है। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना चाहिए।’’ कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘हम प्रधानमंत्री से मांग करते हैं कि पूरे देश में कोविड से मरने वालों की संख्या का पता करने के लिए न्यायिक जांच कराई जाए। सही आंकड़े सामने आना चाहिए और आंकड़े छिपाने वालों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।’’

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

बिहार में भी छुपाये गये कोरोना से मौत के आंकड़े

 7 जून 2021 तक बिहार में कोरोना से मौत का आंकड़ा 5,424 था और ठीक अगले ही दिन 8 जून को ये आंकड़ा अचानक 9,429 हो गया। यानी एक ही दिन में मौत का आंकड़ा 3,951 बढ़ गया। एक दिन में ये कैसे हो गया, कैसे अचानक इतनी मौतें बढ़ गयीं। जब ये सवाल उठे तो पता चला कि ये पुरानी मौतें हैं, जिन्हें अब जोड़ा गया है। लेकिन फिर ये पूछा गया, कि जिन मौतों को अब गिना, उन्हें पहले क्यों नहीं बताया गया था?

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने बचाव करते हुये कहा सफाई पेश किया कि बहुत बड़ी महामारी थी प्रशासन सबको बचाने में लगा, लेकिन किसी भी स्तर पर लापरवाही होगी तो कार्रवाई होगी।

दरअसल 17 मई को पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार को ऑर्डर दिया था कि वो कोरोना की दूसरी लहर में हुई मौतों को अपने हर सोर्स से री-वेरिफाई करे, रिवाइस करे। ये ऑर्डर इसलिए दिया गया था कि क्योंकि कोरोना से हुई मौतों पर अलग अलग आंकड़ें दिए जा रहे थे। जैसे कि बक्सर में कोरोना से मौत पर दो अलग अलग रिपोर्ट थी।

मुख्य सचिव की रिपोर्ट में ये कहा गया कि बक्सर में एक से 13 मई के बीच 6 लोगों की मौत हुई। जबकि पटना से जो रिपोर्ट भेजी गई थी उसमें बताया गया कि इस दौरान बक्सर के श्मशान में 789 लाशें जलायी गयी। अब अगर मौत के आंकड़े में इतना बड़ा अंतर होगा तो इसकी जांच, इसका ऑडिट तो होना ही चाहिए था। सवाल उठ रहे थे कि क्या मौत का आंकड़ा जानबूझ कर छुपाया जा रहा है।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद 20 दिन में सरकार ने कोरोना से हुई मौतों का ऑडिट किया, जिसमें ये पाया गया कि करीब 73 प्रतिशत मौतें रिपोर्ट ही नहीं की गईं। जिन्हें अब मौत के कुल आंकड़े में जोड़ा गया। वेरीफाई करने के बाद पटना में 1070 मौतें, बेगूसराय में 316, मुज़फ्फरपुर में 314 और नालंदा में 222 मौतें जोड़ी गयीं।

पटना हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद बिहार सरकार ने दो टीमें बनाई थीं, जिसमें एक टीम ने अस्पतालों में मौत का रिकॉर्ड देखा और दूसरी टीम ने उन लोगों की रिपोर्ट तैयर की, जिनमें कई की मौत घर में आइसोलेशन के दौरान हुई थी। कई लोगों की आइसोलेशन सेंटर, कोविड केयर सेंटर में जान गई थी। कई लोगों की मौत अस्पताल ले जाते वक्त हो गई थी और कई लोग की मौत कोरोना से ठीक होने के बाद भी हुई थी. इसके बाद जो रिपोर्ट तैयार हुई, उससे बिहार में कोरोना से मौत के आंकड़े में करीब 4000 मौतें जुड़ गयी। बिहार में विपक्ष का आरोप है कि ये आंकड़ा भी सही नहीं है. बिहार में आंकड़ों से 20 गुना ज्यादा मौतें हुयी हैं।

मध्य प्रदेश और बिहार में कोविड पीक के दौरान सरकारी आंकडों और सीआरएस के आंकड़ो में जबर्दस्त अंतर के बाद अब देश के सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेते हुये देश के तमाम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के अप्रैल मई 2021 के आंकडों को उजागर करने का आदेश जारी करना चाहिये।

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