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महामारी के बीच स्वतंत्रता दिवस और राष्ट्र के स्वास्थ्य पर प्रधानमंत्री के नये ऐलान का मतलब

भारत के स्वतंत्र देश बनने के बाद पहली बार हमने अपना स्वतंत्रता दिवस एक भयावह महामारी के बीच मनाया। ऐसी महामारी बीते 73 वर्षों में कभी नहीं आई। अनेक देशवासियों को लग रहा था कि प्रधानमंत्री इस महामारी से निपटने के राष्ट्रीय संकल्प को पुख्ता करते हुए कुछ ठोस और बड़े ऐलान कर सकते हैं। हमारे एक शिक्षक-मित्र ने तो यहां तक सोच लिया था कि प्रधानमंत्री कोविड-19 से संक्रमित गंभीर मरीजों का इलाज पूरी तरह सरकारी खर्च पर कराने का ऐलान कर देशवासियों का दिल जीत लेंगे। लाल किले की प्राचीर से होने वाले प्रधानमंत्री के 15 अगस्त के संबोधन को लेकर लोगों में तरह-तरह के अंदाज लगाये जा रहे थे।

लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसे तमाम लोगों को निराश किया। उन्होंने भारतीय राष्ट्र के इस अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट को बहुत हल्के में लिया। किसी बड़े और ठोस रणनीतिक ऐलान के बजाय उन्होंने एक ऐसे नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन की घोषणा की, जिसके तहत प्रत्येक देशवासी के पाकेट में एक और आई-कार्ड आयेगा। उसके तहत क्या वह उम्दा किस्म की चिकित्सा सुविधा मुफ्त या सस्ती दर पर पायेगा? प्रधानमंत्री के ऐलान में ऐसा कुछ भी नहीं बताया गया। बस एक नये कार्ड की बात सामने आई। इसके पहले ‘आयुष्मान भारत’ के नाम से एक अति-महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना की शुरुआत की गई थी। महामारी में संपूर्ण देश ने लोगों के साथ उस योजना को भी दम तोड़ते देखा है।

फिर यह नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन क्या करेगा? क्या लोगों के पाकेट में एक और कार्ड आ जाने से उनकी सेहत की रक्षा या रख-रखाव का कोई नया मंत्र मिल जायेगा? देश के समझदार-नासमझ, शिक्षित-अशिक्षित, गरीब-मध्यवर्गीय (सिर्फ वीआईपी अमीरों को छोड़कर) हर क़िस्म के लोगों ने इस महामारी के खौफ़नाक दौर में अस्पतालों, चिकित्सकों और स्वास्थ्य सुविधाओं की बेतहाशा कमी का सच देख लिया और देख रहे हैं। पर सरकार का एजेंडा इस हालत को दुरुस्त करने के बजाय कुछ और ही नजर आ रहा है। अब वह स्वास्थ्य क्षेत्र का डिजिटाइजेशन करेगी। आधार से ऐसा क्या बच गया था, जिसके लिए यह नया डिजिटाइजेशन होगा?

इस तरह के डिजिटाइजेशन से दुनिया की कुछ बड़ी कंपनियों और कारपोरेशन्स का काम बहुत आसान हो गया है। भारत सहित दुनिया के अनेक विकासशील और पिछड़े मुल्कों के लोगों से सम्बन्धित तमाम तरह की व्यक्तिगत सूचनाएं (डेटा) अब उन्हें आसानी से और ज्यादा खर्च किये बगैर मिलने लगी हैं। डेटा-लीक के अनेक मामले हाल के कुछ वर्षों में सामने भी आ चुके हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है-हेल्थ मिशन के तहत जो नये कार्ड जारी होंगे, उनके लिए क्या-क्या तथ्य या सूचनाएं मांगी जायेंगी या उनके जरिये अस्पतालों, सम्बद्ध शासकीय संस्थानों या बीमा कंपनियों में दर्ज होंगी! उन सूचनाओं की गोपनीयता को कौन सुनिश्चित करेगा?

इस तकनीकी लेकिन जरूरी सवाल से भी ज्यादा बड़ा सवाल है-इस तरह के डिजिटल व्यवस्था और नये आई-कार्ड से लोगों की स्वास्थ्य सुविधाओं में कैसे इजाफा हो जायेगा? देश के मरियल लोक स्वास्थ्य तंत्र में कैसे सुधार हो जायेगा? उन अस्पतालों की तस्वीर कैसे बदलेगी, जहां कोविड-19 के मरीजों से भरे वार्ड में खुलेआम गाय-भैंसें, बकरियां और बंदर तक घूमते पाये गये या वार्ड में बारिश के पानी से बाढ़ का दृश्य देखा गया। क्या देश के निजी पंच सितारा और सुविधा संपन्न अस्पतालों में, जहां कोविड-19 से संक्रमित होने पर बड़े-बड़े नेता, उद्योगपति, अभिनेता, मंत्री, राज्यपाल या अमीर लोग भर्ती होते हैं, आम आदमी को भी इस प्रस्तावित कार्ड से इलाज मिल सकेगा? आखिर ये कार्ड क्या करेगा?

प्रधानमंत्री ने तो इसे लाल किले की प्राचीर से अपने संदेश में साफ किया और न ही उनके भाषण के 24 घंटे बाद भी सरकार की तरफ से इस बाबत को कोई व्याख्या या विस्तृत सूचना आई। अगर यह कार्ड इलाज के मामले में लोगों की मदद के लिए लाया जा रहा है तो उसकी क्या प्रक्रिया और पद्धति होगी, कुछ तो साफ होना चाहिए। फिर इस ऐलान का क्या मतलब? महामारी से बेहाल और आक्रांत लोगों के लिए क्या यह भी एक जुमला भर था?

उस 21 दिन वाले जुमले की तरह , जिसमें एक बार कहा गया कि महाभारत में 18 दिन बाद विजय मिली थी, इस महामारी से हमारी जंग 21 दिन चलेगी और हम जीतेंगे! यह महामारी एक बेहद खतरनाक और अदृश्य वायरस का हमला ज़रूर है पर ऐसा कोई युद्ध नहीं है, जिसे हम कैलेंडर की तारीख के हिसाब से लड़ें और जीतें! इस हमले को कम घातक और क्रमशः निष्प्रभावी बनाने के लिए हमारे पास बेहतर सुविधासंपन्न लोक स्वास्थ्य सेवाओं का होना जरूरी है यानी अच्छे अस्पताल, जरूरी उपकरण, पर्याप्त दवाएं, डॉक्टर और नर्सें होनी चाहिए।

देश और दुनिया के तमाम स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही नहीं, बड़े समाजशास्त्री भी भारत की हर आई-गई सरकार को चेताया करते थे कि इस विशाल राष्ट्र के अपने लोक स्वास्थ्य तंत्र पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जो बहुत ही लचर है। नोबेल विजेता प्रो. अमर्त्य सेन, ज्यां द्रेज और थामस पिकेटी जैसे लोग तो हमेशा यह बात कहते रहते हैं कि भारत के लिए सबसे जरूरी हैं दो सेक्टर-लोक स्वास्थ्य और शिक्षा। सबने कहा कि भारत को अपने स्वास्थ्य बजट में भारी इजाफा करने की जरूरत है। अपने यहां रक्षा बजट और स्थापना खर्च तो लगातार बढ़ता रहा पर लोक स्वास्थ्य बजट या तो यथास्थिति का शिकार रहा या और सिकुड़ता रहा।   

135 करोड़ की आबादी वाले देश में संपूर्ण आबादी के स्वास्थ्य की रक्षा और संपूर्ण चिकित्सा सुविधा पर सरकार अपने सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) का महज 1.28 फीसदी खर्च करती है। इसे 2.5 फीसदी तक बढ़ाने के दावे किय़े जा रहे हैं। दुनिया के अन्य विकसित और कई विकासशील देश अपने स्वास्थ्य क्षेत्र पर 17 से 4 फीसदी के बीच खर्च करते हैं। भारत की तरह 2 फीसदी से भी कम खर्च करने वाले मुल्कों की सूची में समुन्नत श्रेणी में दाखिल हो चुके विकासशील या उल्लेखनीय लोकतांत्रिक देश नहीं हैं। स्वास्थ्य पर इतना या इससे भी कम खर्च करने वालों की सूची में सिर्फ वे देश शामिल हैं, जहां बेहद गरीबी, बेहाली या निरंकुश किस्म की अलोकतांत्रिक शासन पद्धति है।

कोविड-19 जैसी भयावह महामारी में वियतनाम, स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे, पुर्तगाल, रूस, जापान, चीन, क्यूबा और जर्मनी जैसे देश अपनी बेहतरीन चिकित्सा सुविधा और लोक स्वास्थ्य (हेल्थकेयर) पर ज्यादा बजट होने के चलते ही आज भारत और ब्राजील आदि की तरह बेहाल नहीं हैं। अमेरिका की बेहाली का बड़ा कारण उसकी बीमा-आधारित और बुनियादी तौर पर निजीकृत स्वास्थ्य सेवा संरचना है, जिसमें आम नागरिक की सेहत से ज्यादा महत्व बीमा कंपनियों या निजीकृत अस्पतालों को मिलता है। यह महज संयोग नहीं कि अमेरिका में कोरोना से मरने वालों में भारत की तरह ही ज्यादातर लोग गरीब, निम्न मध्यवर्गीय या जातीय-सामुदायिक स्तर पर उत्पीड़ित माने जाते रहे हैं। इनमें अफ्रो-अमेरिकन सबसे ज्यादा बताये जाते हैं। अमीरों का इलाज बड़े पंच सितारा अस्पतालों में हो जाता है जो आम आदमी के बीमा दायरे या आम पहुंच से बाहर हैं।

अफसोस, हमारे नीति निर्धारक और सरकारें यह सब जानते हुए और महामारी के खौफ़नाक दौर में इतना बड़ा सबक मिलने के बावजूद ‘लोक स्वास्थ्य सेवा संरचना’ के विस्तार और सुदृढ़ीकरण पर जोर देने की बजाय बीमा और निजीकरण आधारित हेल्थ मिशन के रास्ते पर देश को हांक रहे हैं! यह व्यवस्था देश को किधर ले जायेगी, इसे कोई भी समझ सकता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मई, 2020 तक देश में प्रत्येक दस हजार लोगों पर 8.5 अस्पताल-बेड रहे हैं। इसी तरह प्रत्येक दस हजार पर सिर्फ 8 डाक्टर रहे हैं।

बीते दो महीने में इस आंकड़े में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है। अस्सी फीसदी आबादी किसी मेडिकल बीमा के दायरे से बाहर है। ऐसे में नये हेल्थ मिशन के तहत एक नया आई-कार्ड मिल जाने से आम भारतीय को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं कहां और कैसे मिल जायेंगी? भारत जैसे विकासशील देश, जहां बहुत बड़ी आबादी गरीब है, के लिए बीमा-आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था कत्तई कारगर नहीं। इसके लिए लोक स्वास्थ्य सेवाओं का विशाल नेटवर्क ही एक मात्र विकल्प है। पर हर क्षेत्र में निजीकरण और कॉरपोरेटीकरण की तरफ भागती हमारी सरकारें इस विकल्प को लगातार नजरंदाज करती रही हैं। भारत के मरियल स्वास्थ्य-तंत्र की सबसे बड़ी मुसीबत यही है।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार हैं। आप राज्यसभा टीवी के संस्थापक संपादक रह चुके हैं।)

This post was last modified on August 16, 2020 11:46 am

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