Sunday, May 29, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट: फैक्ट्रियां लील गयीं गजरौला की ऐतिहासिक विरासत

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गजरौला। पश्चिम यूपी में गजरौला औद्योगिक नगरी के नाम से विख्यात है। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के घनिष्ठ सहयोगी रहे स्वर्गीय रमाशंकर कौशिक प्रदेश स्तर की राजनीति में काफी समय तक एक प्रभावशाली भूमिका में रहे। इनके प्रयासों से यहां औद्योगिक इकाइयां लगती गईं। इसका नतीजा यह हुआ कि 1980 के दशक में गजरौला को औद्योगिक नगरी का दर्जा मिल गया। वहीं स्वर्गीय रमाशंकर कौशिक के बेटे राहुल कौशिक ने गजरौला को नगर पालिका का दर्जा दिलाया। रमाशंकर कौशिक 1950 के समय सक्रिय राजनीति का हिस्सा बने और 1977 में पहली बार विधायक बने तो क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयां स्थापित होती गईं। लेकिन पिछले तीन दशकों में इन फैक्ट्रियों के मालिकों की लालच ने जो तबाही पैदा की है वह भयावह है। रोज़गार निर्माण के उद्देश्य से दशकों पहले लगी फैक्ट्रियों ने आसपास के इलाकों को अपने जहरीले केमिकल युक्त पानी से बंजर में तब्दील कर दिया है।

औद्योगिक नगरी गजरौला में लगभग 39 छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां स्थापित हैं जिनसे निकलने वाला प्रदूषित पानी आस-पास की नदियों को विषैला बना रहा है और चिमनियों से निकलता जहरीला धुआं लोगों की आंखों में जलन पैदा कर रहा है।

गजरौला की औद्योगिक फैक्ट्रियों में नामी जुबिलेंट लाइफ साइंसेज के साथ-साथ तेवा एपीआई, एसएसपी, कौशांबी, उमंग डेयरी, इंसिल्को, कोरल, मीनाक्षी पेपर मिल इत्यादि शामिल हैं। जिनमें जुबिलेंट लाइफ़ साइंसेज एशिया की सबसे बड़ी औद्योगिक फैक्ट्रियों में से एक है। औद्योगिक नगरी होने के अलावा दिल्ली-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होने की वजह से यहां से रोजाना हजारों वाहन गुजरते हैं। यहां की जहरीली हवा वाहन से गुजरने वाले राहगीरों को गजरौला पहुंचने की दस्तक दे देती है।

  चिमनियों से काले धुएं का रिसाव करती यूएस फैक्ट्री

शांति नगर(सैफी नगर) में करीब 22 साल से रह रहे सतपाल सिंह जनचौक से बात करते हुए कहते हैं कि, “जाड़े के दिनों में स्थानीय लोगों के लिए प्रदूषण से लड़ने की जंग और कठिन हो जाती है। कोहरे की आड़ में फैक्ट्रियों के लिए गैस चैंबर से गैस छोड़ना और आसान हो जाता है। कोहरे के साथ मिलकर ज़हरीली गैस आस-पास के 15-20 किलोमीटर क्षेत्र को कवर कर लेती है, यदि रिसाव की गई गैस की मात्रा अधिक हो तो अमरोहा जिले के आस-पास वाले इलाकों में भी इसकी दुर्गंध छा जाती है।”

गजरौला क्षेत्र में हाइवे के किनारे जमीनों की कीमत करोड़ों की है। यहां पिछले कुछ सालों में औद्योगिक इकाइयां लगने के कारण जमीन के दामों में भारी वृद्धि हुई है लेकिन एक तथ्य ये भी है कि प्रदूषण के चलते फैक्ट्रियों के आस-पास की जमीनों में भारी गिरावट दर्ज की गई। प्रकाश शर्मा अमरोहा से 10 साल पहले गजरौला के चौपला क्षेत्र में आकर बसे थे। प्रकाश ने जी-जान से 1 करोड़ रुपए लगाकर पांच मंजिला खूबसूरत बिल्डिंग खड़ी की थी लेकिन वायु प्रदूषण के चलते प्रकाश अब इस मकान को बेचने की बात कर रहे हैं। चूंकि मकान जुबिलेंट से सटा है इसलिए कोई 65-70 लाख से ऊपर रकम देने को तैयार नहीं है।

 ऐतिहासिक नदी बगद का अस्तित्व संकट में

पिछले कुछ सालों में गजरौला के प्रदूषण ने आस-पास की ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर पर गहरा आघात किया है। कभी अमरोहा, संभल और बदायूं जिले के गांवों के लिए जीवन रेखा बनने वाली बगद नदी का पानी अब जहरीला हो चुका है। बरसात के मौसम में गदगद होकर गंगा में समाहित होनी वाली बगद एक जहर के प्याले में तब्दील हो चुकी है।

गजरौला क्षेत्र की बगद नदी में छोड़ा जा रहा प्रदूषित पानी

जो नदी क्षेत्र के लोगों के लिए प्राणदायनी थी, आज उसका अस्तित्व ख़तरे में पड़ चुका है। कभी फसलों की सिंचाई के लिए सहायक मानी जाने वाली बगद नदी अब गन्दगी भरे नाले में तब्दील हो चुकी है। बगद नदी में दिन-रात फैक्ट्रियां प्रदूषित पानी छोड़ती रहती हैं। गजरौला में पले-बढ़े पूर्व विधायक पंकज पुष्कर ने गजरौला को एक गांव से नगरपालिका और फिर औद्योगिक नगरी में तब्दील होते देखा है। एक इंटरव्यू में पंकज बताते हैं कि, गंगा मेरे घर से आठ या दस किलोमीटर दूर है। बगद उसकी एक सहायक नदी है जो गंगा में जाकर मिल जाती थी। वह बगद नदी जिसके पास मेरे बहुत सारे पुरखे दफन हुए हैं। कोई वयस्क मरता था तो गंगा के करीब ले जा कर उसका अंतिम संस्कार किया जाता था उसे जलाया जाता था और कोई बच्चा मरता था तो पास की बगद नदी में जाकर दफना दिया जाता था। मेरे गांव के बहुत से छोटे बच्चे जो अकाल मृत्यु के शिकार हुए। वे उसी बगद नदी के पास जाकर दफनाए गए। वह बगद नदी धीरे-धीरे एक नाले के रूप में बदल गयी।

गंदे नाले में तब्दील हो गई क्षेत्र की पोषक बगद नदी

केमिकल वेस्ट को ले जाने वाला एक नाला है उसने हमसे हमारी वह नदी छीन ली जिसमें हमारे पुरखे दफन थे। और यही नदी नाले का रूप लेकर गंगा में मिल गयी है। बहुत गहराई में अगर उतर कर देखते हैं तो ना केवल गांव छिन गया है बल्कि एक खास तरह के आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में बहुत कुछ बह गया है। कहने वाले यह भी कहेंगे कि हमने कुछ पाया भी है। कोई उदार तरीके से कह सकता है कि जो मिला है वह बहुत चमकीला है, प्यारा है। जो गया है वह कुछ अमूल्य चला गया है।

 प्रदूषित पानी छोड़ने से पनप रही बीमारियां

नदी की साफ-सफाई के नाम पर मार्च 2021 में 12 लाख रूपयों की रकम सरकारी फाइलों तक ही सीमित रह गई। अवैध कब्जों से बगद की रही सही निशानी भी समाप्ति की ओर है। बगद नदी के आस-पास के करीब 40 गांवों के लोग जहरीला पानी पीने के लिए मजबूर हैं। इतना ही नहीं बदायूं के कछला घाट के पास पहुंचकर बगद नदी गंगा में मिल रही है जिससे जहरीला केमिकलयुक्त पानी गंगा नदी में मिलकर उसे भी प्रदूषित कर रहा है और गंगा नदी प्रदेश में जहां-जहां से गुजर रही है वहां अपना ज़हरीला विष छोड़ने के लिए मजबूर है।

बगद नदी और उसके आसपास के भूजल स्तर को जहरीला हुए एक अरसा हो गया है। इस सम्बंध में गजरौला के नाईपुरा के निवासी मोहित कुमार और क्षेत्र के रितेश जनचौक से बात करते हुए कहते हैं कि, “गजरौला की फैक्ट्रियों ने बगद नदी को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचाया है। प्रदूषित पानी के चलते खेती-बाड़ी पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है और तमाम तरह के कीट-पतंगें पैदा हो रहे हैं।”

ज़हरीले रसायनों से युक्त बगद नदी

हालात ये है कि बगद से सटे गांव के हैंडपंप और खेतों पर लगे ट्यूबवेल भी जहरीला पीला और लाल पानी उगलते हैं। फैक्ट्रियों से निकलने वाले केमिकल युक्त जहरीले पानी ने बगद नदी को इतना जहरीला बना दिया है कि जहां-जहां से ये नदी गुजरती है वहां की फसल जलकर खाक हो जाती है। ज़हरीले प्रदूषण से लोगों को कैंसर, दमा, टीवी, चर्म रोग, गम्भीर खांसी, बदन-दर्द, आंखों में जलन, त्वचा इन्फेक्शन, नपुंसकता का सामना करना पड़ रहा है‌।

फैक्ट्री प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे समाजसेवी तेजवीर सिंह ‘अलूना’ कई बार फैक्ट्रियों के प्रदूषण को लेकर एनजीटी, पर्यावरण संरक्षण बोर्ड से शिकायत कर चुके हैं लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका। गजरौला वासियों को प्रदूषण का तोहफा देने के सम्बन्ध में तेजवीर सिंह ‘अलूना’ कहते हैं,“ फैक्ट्रियां लोकल लोगों को रोजगार नहीं देतीं उन्हें केवल प्रदूषण देती हैं।”

एनजीटी और प्रदूषण बोर्ड के प्रयासों के बावजूद नहीं लग सकी प्रदूषण पर लगाम

10 वर्ष पहले 100-200 टीडीएस वाले पानी का स्तर आज 700 तक पहुंच गया है। आज हालत ये हैं कि हसनपुर-गजरौला क्षेत्र के 40 गांवों में हर चौथा आदमी किसी न किसी बीमारी से जूझ रहा है। अभी हाल ही में गजरौला निवासी अधिवक्ता मानसी चाहल के प्रयास से प्रदूषित पानी जमीन के अंदर डालने के जुर्म में उमंग डेयरीज लिमिटेड पर चार करोड़ 85 लाख रुपये का जुर्माना लगा है। गजरौला निवासी अधिवक्ता मानसी चाहल का कहना है कि फैक्ट्री के आस-पास खेत स्वामियों की शिकायत पर मामले को एनजीटी तक पहुंचाया था। जिसके चलते पानी प्रदूषित हो रहा है। इसके अलावा उमंग फैक्ट्री के आस-पास खेतों में भी प्रदूषित पानी छोड़ा जा रहा था। जिससे किसानों की फसलें बर्बाद हो रही थीं। मानसी चाहल का कहना है कि, एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता में करीब डेढ़ वर्ष तक चले मुकदमे में उमंग फैक्ट्री को प्रदूषण फैलाने का दोषी पाया गया।

प्रदूषण फैलाने वाली सबसे बड़ी इकाइयों में दिल्ली नेशनल हाईवे पर स्थित जुबिलेंट लाइफ साइंसेज का नाम प्रमुखता से सामने आता है। इसके बूढ़े हो चुके प्लांट स्थानीय लोगों के लिए कब मुसीबत बनकर टूट पड़ें पता नहीं। हजारों बीघे में फैली हुई इस फैक्ट्री ने लोकल युवाओं को रोजगार के नाम पर प्रदूषण ही परोसा है। जुबिलेंट भारतीया समूह की एक भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी है जो अपने सबसे बड़े उर्वरक और सिंथेटिक का संचालन करती है। समूह की कंपनी मेसर्स में जुबिलेंट लाइफ साइंसेज लिमिटेड (जेएलएल) की कैप्टिव के रूप में 4 इकाइयां हैं – कोयला आधारित पावर प्लांट, शीरा आधारित डिस्टिलरी, एडवांस इंटरमीडिएट और फाइन। जुबिलेंट एग्रो कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड (JACPL) की विनिर्माण की दो इकाइयाँ हैं। रासायनिक उर्वरक और पॉलिमर … पिछले तीन दशकों में, जुबिलेंट लाइफ साइंसेज लिमिटेड एक एकीकृत फार्मास्युटिकल और लाइफ साइंसेज के रूप में उभरी है जो दुनिया भर में अपने ग्राहकों को उत्पाद और सेवाएं प्रदान करती है।

जुबिलेंट से हो रहे प्रदूषण को लेकर साल 2019 में शाह आलम बनाम उत्तर प्रदेश सरकार केस में एक संयुक्त समिति का गठन किया गया था। जिसमें सीपीसीबी, यूपीपीसीबी, स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन, उ.प्र. जल निगम के प्रतिनिधि, बागवानी विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र, शामिल थे। कमेटी ने फैक्ट्री द्वारा किए जा रहे अनियंत्रित प्रदूषण का निरीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट एनजीटी को 13.09.2019 को प्रस्तुत की। 544 पेज की इस रिपोर्ट में समिति ने काफी गहराई से अध्ययन किया। शोध में कुछ बातें शामिल थीं जैसे;

1.कमेटी ने अपने पहले सवाल में पूछा, क्या फैक्ट्री के पास भूजल निकालने के लिए एनओसी थी?

2.कैप्टिव पावर प्लांट NO2 के संबंध में उत्सर्जन मानदंडों को पूरा करने में विफल रहा।

3.एमईई की क्षमता 1740 केएलडी थी जबकि रॉ स्पेंट वॉश उत्पादन 1956.27 केएलडी थी।

4.कमेटी ने बताया कि,बायो कम्पोस्ट यार्ड क्षतिग्रस्त हो गया और कीचड़/तालाब क्षेत्र का अस्थायी स्तर क्षतिग्रस्त पाया गया। तालाब क्षेत्र में वॉश जमा पाया गया था जो भूजल की गुणवत्ता को खतरे में डाल रहा था।

5.लैगून लगभग मर चुके हैं और प्रदूषित पानी में भस्मक(incinerator)अपनी क्षमता के केवल 30% पर ही संचालित हो रहे थे।

एनजीटी की रिपोर्ट

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी)और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) की संयुक्त समिति ने विस्तृत तकनीकी निरीक्षण किया और दिनांक 13.09.2019 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें विभिन्न उल्लंघनों का विस्तार से उल्लेख किया गया था। एनजीटी के आदेश दिनांक 05.02.2020 को मेसर्स जुबिलेंट ग्रुप ऑफ के अधिकारी उद्योगों ने उल्लेख किया कि, उन्होंने संयुक्त कमेटी द्वारा उठाए गए सभी 52 बिन्दुओं का अनुपालन किया है। और उसने इकाई पर लगने वाले जुर्माने की भरपाई भी की लेकिन क्षेत्र के सुल्तानठेर, नाईपुरा, सब्दलपुर, चकनवाला के निवासियों का कहना है कि अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। सरकारें चाहे जो भी रहीं हो केवल नुमाइंदे ही बदले हैं हालात नहीं। सरकारें निजी हित के लिए फैक्ट्रियों पर पाबंदी लगाने से कतराती रहती हैं। आज ग्राम पंचायत से लेकर औद्योगिक नगरी गजरौला बनने तक का सफर प्रदूषण पर आकर रुक गया है।

(गजरौला से प्रत्यक्ष मिश्रा की रिपोर्ट।)

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