Sunday, October 17, 2021

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अमित शाह जी! सिर्फ बंद कमरे की नहीं बाहर की भी टूटी है मर्यादा

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बीजेपी अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दो बातों पर सफाई दी है जो महाराष्ट्र की सियासत के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। एक है महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री को लेकर। इस बारे में शाह ने कहा है कि महाराष्ट्र के भावी सीएम के तौर पर रैलियों में खुलकर देवेंद्र फडनवीस का नाम लिया गया था खुद उनकी ओर से सैकड़ों बार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी, जिस पर कभी शिवसेना ने एतराज नहीं जताया। दूसरी बात उन्होंने कही है कि राज्यपाल ने सरकार बनाने को लेकर जो कदम उठाया वह सर्वथा उचित है और कांग्रेस बेवजह समय नहीं मिलने की बात कह रही है। ये दोनों ही बातें या कहें कि सफाई वास्तव में बीजेपी को ज्यादा उलझाती हैं।

‘मुख्यमंत्री’ पर झूठ कौन बोल रहा है?

महाराष्ट्र में सियासी उलझन की पेंच ही ‘मुख्यमंत्री’ पर फंसी है। अमित शाह के कहने के मायने ये हैं कि देवेंद्र फडनवीस को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किए जाने को लेकर कोई संशय एनडीए में नहीं था। अगर ऐसा था तो क्या अमित शाह बता पाएंगे कि कभी शिवसेना के किसी नेता ने किसी अवसर पर देवेंद्र फडनवीस को अपना मुख्यमंत्री माना था? जिस तरह से अमित शाह कह रहे हैं कि कभी देवेंद्र के नाम को सामने रखने पर कोई आपत्ति सामने नहीं आयी, क्या उसी तरह ये बात सच नहीं है कि देवेंद्र के नाम को लेने से बचने को लेकर बीजेपी ने कभी खामोशी नहीं तोड़ी? मतलब ये कि एक सवाल अगर शिवसेना की ओर अमित शाह फेंक रहे हैं तो वह बाउंस होकर दोबारा उनकी ओर ही वापस भी आ रहा है।

किसने तोड़ी ‘बंद कमरे की मर्यादा’?

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यह भी कहा है कि वे बंद कमरे में हुई बातचीत को सार्वजनिक नहीं करने की मर्यादा को बचाए रखना चाहते हैं। मगर, खुद अमित शाह से बातचीत और उस बातचीत के हवाले से देवेंद्र फडनवीस इस मर्यादा को क्या तोड़ नहीं चुके हैं? यह बात अलग है कि देवेंद्र फडनवीस और उद्धव ठाकरे के मुंह से बंद कमरे की बातचीत के निहितार्थ परस्पर विरोधी रूपों में सामने आए। इसलिए बंद कमरे में बातचीत की मर्यादा बनाए रखने की बात कहना हास्पास्पद लगता है।

लोकसभा से विधानसभा चुनाव तक क्यों रही चुप्पी?

बंद कमरे में 50-50 फॉर्मूले पर बात हुई थी, इस बात से तो कोई पक्ष इनकार नहीं करता। मगर, इस 50-50 में मुख्यमंत्री पद था या नहीं, इसे लेकर ही अलग-अलग सुर दिखे हैं। इसमें गलती किसकी है? क्या बीजेपी और शिवसेना ने जानबूझकर इस मुद्दे को अनसुलझा नहीं रखा? लोकसभा चुनाव बीत गये। बीजेपी-शिवसेना ने एक-दूसरे से गठबंधन का फायदा उठा लिया। विधानसभा चुनाव में भी इसी फायदे के लोभ ने उन्हें एकजुट किए रखा। यहां तक कि चुनाव प्रचार के दौरान देवेंद्र फडनवीस को मुख्यमंत्री बताने और नहीं बताने पर भी एक-दूसरे पर शक करने से परहेज किया। क्यों? क्या इसलिए कि जनता से वोट लेना था? क्या अमित शाह इस बात का जवाब देंगे कि देवेंद्र फडनवीस को एनडीए का मुख्यमंत्री बताकर क्यों नहीं पेश किया गया? क्या शिवसेना की सहमति दिखाती ऐसी कोई तस्वीर, पोस्टर, नारे, भाषण दिखाए जा सकते हैं?

बिहार में ‘त्याग’, महाराष्ट्र में क्यों नहीं?

अगर लोकसभा चुनाव के समय अमित शाह मातोश्री जाते हैं, उद्धव से मिलते हैं, विधानसभा चुनाव के लिए 50-50 की बात करते हैं। विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन होता है और नतीजों के बाद सरकार बनाते समय तय हुई बातों को लेकर कलह शुरू हो जाती है। एक बात साफ है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बिहार में जेडीयू के लिए अपनी जीती हुई 5 सीटें भी छोड़ दी थीं, तो शिवसेना के लिए विधानसभा चुनाव में ‘त्याग’ का भरोसा दिया गया था। कम से कम उद्धव ठाकरे की बातों से तो ऐसा ही लगता है। उद्धव ठाकरे ने देवेंद्र फडनवीस के इस्तीफे के बाद 8 नवंबर को जो प्रेस कॉन्फ्रेन्स की, उसमें यह साफ किया कि यह ‘त्याग’ मुख्यमंत्री का पद ही था।

“अमित शाह का फोन आया था मेरे पास। मैंने कहा कि मैंने पिताजी को वचन दिया है..मैंने यह भी बोला कि अगर मेरी सीटें ज्यादा आईं तब भी हम बीजेपी को ढाई साल देंगे…उन्होंने (अमित शाह) कहा कि अभी तक जो हुआ सो हुआ लेकिन मेरे कार्यकाल में न्याय होगा। मैंने यह बात देवेंद्र जी को बताई तो उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान हम इसका (ढाई-ढाई साल सीएम) जिक्र नहीं करेंगे। पद और जिम्मेदारियों के समान निर्वहन की बात करेंगे। जब हम पद की बात करेंगे तो आप मान लेना कि इसमें सीएम पद की भी बात हो रही है।”- उद्धव ठाकरे, प्रमुख, शिवसेना

झूठ की वजह से टूटा गठबंधन

अमित शाह और उद्धव ठाकरे की बातों से साफ है कि महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन झूठ की वजह से टूटा है। यह किसी सच के लिए नहीं टूटा है। बीजेपी को अधिक सीटें जीतने के बाद ‘बराबरी’ कबूल नहीं। वहीं, शिवसेना ‘वचन’ पर जोर दे रही है। लोकसभा चुनाव में शिवसेना का इस्तेमाल हुआ तो विधानसभा चुनाव में शिवसेना ‘बराबरी’ वाले ‘वचन’ को कैसे भूल जाए। ‘बराबरी’ का मतलब मुख्यमंत्री पद से लेकर सबकुछ में बराबरी है।

राज्यपाल 17 दिन में फैसला लें, शिवसेना 1 दिन में?

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के औचित्य पर बात करें तो एक बार फिर लगता है कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने लिखी हुई स्क्रिप्ट पर अमल किया। 24 अक्टूबर से 9 नवंबर तक राज्यपाल के सामने 17 दिन थे। इस दौरान राज्यपाल बीजेपी और शिवसेना में सहमति का इंतज़ार करते रहे। उन्होंने 9 नवंबर को बीजेपी को तब सरकार बनाने के लिए बुलाया। 10 नवंबर को बीजेपी ने इनकार कर दिया। तभी शिवसेना को 24 घंटे का समय दिया। शिवसेना ने 11 नवंबर को सरकार बनाने की इच्छा भर दिखायी और समर्थन देने के लिए 48 घंटे का वक्त मांगा, मगर राज्यपाल ने समय नहीं दिया। अगला नम्बर एनसीपी का आया। 12 नवंबर को एनसीपी ने भी तीन दिन का वक्त मांगा। आगे राज्यपाल ने कांग्रेस को मौका देना जरूरी नहीं समझा और राष्ट्रपति की सिफारिश कर दी।

चुनाव पूर्व गठबंधन को न्योता क्यों नहीं?

अमित शाह कह रहे हैं कि राज्यपाल ने संवैधानिक मर्यादा का पालन किया। चुनी हुई सरकार देने के लिए सभी संवैधानिक विकल्पों का इस्तेमाल करने से अलग भी कोई संवैधानिक मर्यादा एक राज्यपाल के लिए होती है क्या? राज्यपाल ने चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने के लिए क्यों नहीं बुलाया? सबसे बड़ा दल या सबसे बड़ा गठबंधन में विकल्प राज्यपाल जरूर चुन सकते हैं लेकिन जब सबसे बड़ा दल ही सबसे बड़े गठबंधन में हो, तो पहला विकल्प तो गठबंधन को बुलाना होता है। एनडीए में बीजेपी, शिवसेना, आरपीआई, शिवसंग्राम व अन्य दल थे। राज्यपाल को दूसरा अवसर निश्चित रूप से दूसरे गठबंधन यूपीए को देना चाहिए था जिसमें कांग्रेस, एनसीपी और दूसरे दल थे। मगर, ऐसा न कर तीन बड़ी पार्टियों को बगैर समय की मोहलत देते हुए बुलाया गया।

‘चुनी हुई सरकार’ के लिए वक्त क्यों नहीं?

राज्यपाल से सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनी हुई सरकार बनने में अगर 48 घंटे और लगते हैं तो उन्हें क्या दिक्कत थी? जब खुद राज्यपाल को यह निर्णय लेने में 17 दिन लग गये कि किसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए तो क्या वे सरकार बनाने की इच्छा रखने वाली पार्टी को दो या तीन दिन का समय नहीं दे सकते थे? सवाल उठता है कि अमित शाह राज्यपाल के बचाव में जो कह रहे हैं वह क्यों कह रहे हैं? निश्चित रूप से राज्यपाल के फैसले से महाराष्ट्र में बीजेपी की केयर टेकर सरकार चली गयी, मगर इस कदम से बीजेपी के लिए सरकार बनाने की सम्भावना दोबारा पैदा हो गयी। बीजेपी एक मात्र पार्टी है जिसने महाराष्ट्र में सरकार बनाने से मना किया है। शिवसेना और एनसीपी ने सरकार बनाने से मना नहीं किया, बल्कि समय मांगा। ऐसे में अमित शाह का यह कहना सही है कि विपक्ष को सरकार बनाने के लिए उन्होंने (?) छह महीने का समय दे दिया है लेकिन इससे भी बड़ी सच्चाई ये है कि इतना ही समय बीजेपी ने भी अपने लिए हासिल कर लिया है जिसकी वो हकदार नहीं थी। वह सरकार बनाने से मना कर चुकी थी।

मर्यादा सिर्फ बंद कमरे की नहीं टूटी है, मर्यादा कमरे के बाहर भी टूटी है। राजभवन में भी टूटी है, राजभवन से बाहर भी टूट रही है। आगे भी मर्यादाओं के टूटने का यह किस्सा चलने वाला है। कारण ये है कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने की कोशिशों का अपहरण सत्ता की ताकत से ही होने वाला है। इसके लिए चाहे विधायकों की खरीद-फरोख्त हो या फिर नये सिरे से ‘बंद कमरे की मर्यादा’ का जन्म हो। हर हाल में बीजेपी सरकार या फिर कोई सरकार नहीं की कोशिश जारी रहे, यही इस सियासत की पटकथा का स्क्रिप्ट समझ में आता है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों की बहसों के पैनल में उन्हें देखा जा सकता है।)

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