Monday, October 25, 2021

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भारत न हुआ ‘बनाना रिपब्लिक’ हो गया!

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पूर्व गृह और वित्तमंत्री पी चिदंबरम की गिरफ्तारी को लेकर पिछले दो दिनों से देश की राजनीति गरम है। यह एक ऐसा मसला हो गया है जिसमें केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों से लेकर अदालत तक सीधे शामिल हैं। पूरे मामले पर नजर न रखने वाले या फिर अपने भोलेपन में किसी को लग सकता है कि सब कुछ कानून और संविधान के मुताबिक हो रहा है। और कहीं किसी तरह का रत्तीभर भी खोट नहीं है। लेकिन नजदीक से नजर रखने वालों और पूरे मामले को समझने वालों के लिए देश में यह किसी संवैधानिक मौत से कम नहीं है।

इस घटना ने न केवल देश की संस्थाओं के बौने चरित्र का पर्दाफाश कर दिया है बल्कि यह भी बता दिया है कि उनके भीतर किसी तरह की लाज और शरम भी अब नहीं बची है। और देश में अब वही होगा जो ऊपर बैठे दो लोग चाहते हैं। वो चाहें तो बड़े से बड़ा अपराधी व्यक्ति सम्मानीय हो जाएगा और इज्जतदार से इज्जतदार शख्स के दामन पर वह दाग लगेगा जिसे जीवन भर उसे छुड़ाना मुश्किल हो जाएगा। दरअसल चिदंबरम का मसला ऐसा है जिससे कई चीजें एक साथ साधी जा रही हैं। मसलन इस समय मोदी और शाह की पहली जरूरत थी कि कैसे कश्मीर के मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा के प्रमुख एजेंडे से हटाया जाए। उसमें तात्कालिक लिहाज से चिदंबरम से बेहतर कोई दूसरा मामला नहीं हो सकता था। साथ ही यह एक ऐसा मामला था जिसमें गृहमंत्री व्यक्तिगत तौर पर रुचि लेते। यहां यह बताना जरूरी है कि पी चिदंबरम जब गृहमंत्री थे सोहराबुद्दीन मामले में सीबीआई ने तभी अमित शाह की गिरफ्तारी की थी।

नहीं तो इसकी क्या वजह हो सकती है कि एक जज जो फैसले को तकरीबन सात महीने से रिजर्व रखा है और रिटायर होने से महज दो दिन पहले वह अचानक नींद से जागता है और चिदंबरम की अग्रिम जमानत की याचिका को खारिज कर देता है। क्या यह महज संयोग है? दिलचस्प बात यह है कि वह फैसला शाम को तकरीबन 3 बजकर 20 मिनट पर सुनाया जाता है। और खास बात यह है कि चिदंबरम के वकील सुप्रीम कोर्ट जाने तक उसके लागू होने पर रोक लगाने की जब मांग करते हैं तो जस्टिस सुनील गौर उस पर विचार करने का उन्हें भरोसा दिलाते हैं। लेकिन जैसे ही 4 बजता है वह ऐसा करने से इंकार कर देते हैं। तब तक सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच भी उठ गयी होती है। और मामला सामने आने पर वो अगले दिन यानी आज के लिए सीनियर मोस्ट जज के सामने उसे पेश करने का निर्देश देते हैं।

अब शुरू हो जाती है सीबीआई और ईडी की खोजी कुत्तों की तरह की दौड़। उनकी टीम कभी चिदंबरम के घर जाती है तो उसके कुछ लोग कहीं दूसरी जगह छापा मार रहे होते हैं। कभी उनके ड्राइवर से पूछताछ होती है तो कभी दूसरी निशानदेहियों पर कार्रवाई होती है। इस बीच उसी दौरान उनके घर पर सीबीआई के सामने तत्काल पेश होने की नोटिस चस्पा कर दी जाती है। मामला यहीं शांत नहीं होता है। बाकायदा चिदंबरम के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी कर दी जाती है। एक ऐसा शख्स जो पिछले 4 दशकों से सार्वजनिक जीवन में रहा हो। जिसे कम से कम 7 बार संसद के भीतर देश का बजट पेश करने का गौरव हासिल हो। सुप्रीम कोर्ट का वरिष्ठ वकील हो। और अपनी पूरी हैसियत में एक अंतरराष्ट्रीय शख्सियत का दर्जा रखता हो। और हर तरीके से संपन्न हो। उसके पीछे सीबीआई और ईडी इस तरह से पड़े हैं जैसे कोई हार्डकोर अपराधी हो। और उसे अगर तत्काल नहीं पकड़ा गया तो देश में तबाही मच जाएगी।

और इन सबसे ऊपर आज जो सुप्रीम कोर्ट का रवैया रहा वह किसी अचरज से कम नहीं है। सुबह रजिस्ट्रार के सामने केस फाइल करने के बाद चिदंबरम के वकील कपिल सिब्बल जब तीन नंबर की कोर्ट जस्टिस एनवी रमना के सामने पेश हुए तो उन्होंने केस देखने के बाद लिस्टिंग का हवाला देकर उसे चीफ जस्टिस के पास भेज दिया। चीफ जस्टिस चूंकि अयोध्या मामले की सुनवाई में व्यस्त थे लिहाजा उन्होंने इस पर कोई फैसला नहीं लिया। इस बीच रजिस्ट्री विभाग ने याचिका में त्रुटि निकालकर उसे पेंडिंग में डाल दिया। लंच के बाद चिदंबरम के वकील एक बार फिर जब जस्टिस रमना के पास अर्जेंट सुनवाई की गुजारिश लेकर पहुंचे तो उन्होंने याचिका में खामी का हवाला देकर मामले को टालना चाहा। लेकिन जब सिब्बल ने कहा कि उसको ठीक कर लिया गया है।

तब जस्टिस रमना ने इसकी पुष्टि के लिए रजिस्ट्रार को कोर्ट में तलब किया। रजिस्ट्रार ने भी उसके ठीक हो जाने की पुष्टि की। फिर भी जस्टिस रमना ने याचिका की सुनवाई करने से इंकार कर दिया। और एक बार फिर याचिका को प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाने की बात कहकर उसे चीफ जस्टिस के पास भेज दिया। इस तरह से चिदंबरम की याचिका दिन भर रजिस्ट्री, कोर्ट नंबर तीन और कोर्ट नंबर एक के बीच झूलती रही। और शाम तक उस पर इस बात का फैसला नहीं हो सका कि उसकी कौन सुनवाई करेगा। पूरे मामले को देख और पढ़ कर आसानी से समझा जा सकता है कि चिदंबरम की फाइल न हुई वह कोई विस्फोटक पदार्थ हो गयी। जिसके छूने भर से उसके फटने का खतरा था। हालांकि देर शाम यह तय हुआ कि इस पर शुक्रवार को सुनवाई होगी।

इतना सब होने के बावजूद अगर किसी को इस बात का भ्रम बना हुआ है कि देश अभी बनाना रिपब्लिक नहीं बना है तो उसे सिर्फ और सिर्फ भोला ही कहा जा सकता है।

(लेखक महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)   

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