क्या सच में अमेठी ने स्मृति ईरानी से ‘अपमान‘ का बदला लिया है?

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पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को अस्वीकार करने वाली अमेठी ने इस बार स्मृति ईरानी के प्रति जो रवैया दिखाया है उससे तो यही लगता है कि अब आने वाले समय में भाजपा के लिए फिर से इस गांधी गढ़ को भेद पाना मुश्किल होगा।

राहुल गांधी जब यहां से चुनाव हारे थे तो उन्होंने इस पराजय को स्वीकार करते हुए आत्ममंथन करने की बात भी कही थी। धीरे-धीरे पांच सालों में स्मृति ईरानी के कार्य व्यवहार से जनता को यह लगने लगा कि राहुल गांधी ही उनके लिए ठीक थे।

पिछले पांच सालों में स्मृति ईरानी ने अमेठी में कई दौरे किए मगर वो लोगों का विश्वास जीतने में नाकाम रहीं। जितने अंतराल से स्मृति ने राहुल गांधी को 2019 के लोकसभा चुनाव से हराया था, उससे करीब तीन गुना अंतराल से वो खुद कांग्रेस के एक कार्यकर्ता से हार गईं। 

लोगों द्वारा स्मृति ईरानी और भाजपा के लिए यह पराजय सिर्फ हार नहीं है बल्कि इसे ‘मुंह के बल खाने’ और अपनी इज्जत गंवाने जैसी बात कही जा रही है। स्मृति का लगातार राहुल गांधी, सोनिया गांधी पर भाषणों के जरिए हमलावर होना और बार-बार अमेठी की जनता को कांग्रेस द्वारा लूटे जाने जैसी बात बोलना, उनकी हार का बड़ा कारण रहा है। अमेठी की जनता में उनके प्रति हीन भावना भी पैदा हुई। इस चुनाव में बड़े-बड़े नेताओं के भाषणों में उनके भाषाई पतन को देखा गया है। स्मृति ईरानी का भी संसद में सोनिया गांधी के ऊपर भाषाई रूप से हमलावर होना उनके भी भाषाई पतन का एक जीता जागता उदाहरण रहा है और उसका उन्हें नुकसान झेलना भी पड़ा है। 

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अमेठी की जनता को भावनात्मक तरीके से अपनी ओर खींचने में भी सफल रहे। किशोरीलाल शर्मा जैसे कार्यकर्ता को मोदी सरकार की चहेती सांसद के सामने खड़ा करना और फिर शिकस्त देना, कांग्रेस की छाती जुड़ाने जैसा ही रहा। अमेठी में चारों ओर ये बात कही जा रही है कि पीढ़ियों से गांधी परिवार ने जिस धरती को सींचा और उसे समृद्ध किया, स्मृति ने उस धरती का अपमान किया है। 

क्या सच में स्मृति ईरानी ने अमेठी का अपमान किया है। अमेठी का अपमान होने का अर्थ क्या हो सकता है? वहां की जनता का अपमान? कांग्रेस का अपमान या पीढ़ियों से गांधी परिवार का गढ़ बनी रही अमेठी में जाकर गांधी परिवार पर प्रश्न खड़ा करने का अपमान?

कारण जो भी रहे हों मगर अमेठी में स्मृति ईरानी की जो दाल पिछले चुनाव में गली थी वो इस बार खट्टी निकल गई। स्मृति ईरानी के अमेठी आगमन से लेकर आज तक नजर डालें तो अब तक उनके कार्यों और व्यवहारों से हम इस बात को साफ समझ पाएंगे कि अपमान की जो बातें वहां की जनता द्वारा कही जा रही हैं उसके भीतर छिपी सच्चाई क्या है।

2014 में स्मृति ईरानी को अमेठी में राहुल गांधी के सामने एक ऐसा चेहरा बनाकर भेजा गया जो अमेठी की जनता के बीच अपना जनाधार बना सके और गांधी गढ़ बनी अमेठी की राजनीति में नया अध्याय जोड़ सके। यह बात बिलकुल साफ है कि स्मृति ईरानी का कोई मजबूत राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है। उस समय अमेठी में ये बात खूब चली कि धारावाहिक जगत की बहू अब सियासत में अभिनय करने आ रही है। हुआ भी कुछ वैसा ही। अमेठी की जनता के दिल में जगह बनाने के लिए स्मृति ईरानी ने कई अभिनय प्रस्तुत किए। उस समय एक घटना सामने आई थी जब अमेठी के किसी गांव में आग लगने पर स्मृति ईरानी खुद बाल्टी का पानी लेकर आग बुझाती नजर आईं।

लोगों के मन में उनके अभिनेत्री की छवि तो पहले से थी ही ऐसे में इस तरह के खेल से जनता थोड़ी उनकी ओर झुकी। मगर मोदी लहर के बावजूद स्मृति ईरानी इस गढ़ को जीतने में नाकाम रहीं। 2019 के चुनाव में देश में मोदी की लहर तेज हुई और वो इस किले को भेदने में सफल हुई। मगर यह सफलता उन्हें पची नहीं। उसके बाद से तो उनके बयानों में जिस तरह का क्लेश और कुतर्क निकलकर सामने आया उससे लगा कि उनके भीतर अमेठी की जनता का विकास करना नहीं बल्कि हर बार राहुल गांधी को अपने बयानों से नीचा दिखाना था। 

ये सिलसिला इस लोकसभा चुनाव तक भी चलता रहा। अमेठी में जो कुछ भी विकास के बड़े काम दिखते हैं वो कांग्रेस शासन में ही हुए हैं। स्मृति के यहां पैर रखने के बाद अमेठी का नुकसान ही हुआ। कारण कुछ भी रहा हो मगर ट्रिपल आईटी जैसे राष्ट्रीय संस्थान का बंद होना, मेगा फूड पार्क जैसी परियोजनाओं का राजनीति का शिकार होना, संजय गांधी अस्पताल के मुद्दे पर ओछी राजनीति करना ये जनता का ही नुकसान करने वाला कारण बना।

इन पांच सालों में स्मृति ईरानी सस्ती चीनी और बाईपास रोड जैसे मुद्दों से आगे नहीं बढ़ सकीं जबकि उनके पास कपड़ा और महिला बाल विकास जैसे बड़े मंत्रालय थे। वो चाहतीं तो अमेठी के लोगों के लिए किसी बड़े रोजगार सृजन की व्यवस्था कर सकती थीं। स्मृति ईरानी के लिए अमेठी सिर्फ प्रतिस्पर्धा करने की जगह बनी, न कि यहां के विकास की। वो हर समय इसी पर समय और ऊर्जा खर्च करती रहीं कि राहुल गांधी की छवि को अमेठी की नजर में कैसे धूमिल की जाए। 

इस बार कांग्रेस की हुई जीत से ये बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि जनता ने अमेठी के विकास को ही ध्यान में रखकर वोट किया बल्कि राष्ट्रीय मुद्दों के साथ अमेठी की कांग्रेस के कारण बनी पहचान को फिर से स्थापित करने के लिए वोट किया। स्मृति ईरानी का चुनाव प्रचार भी इस बार कमजोर ही रहा। नरेंद्र मोदी ने भी उनके लिए कोई विशेष प्रचार नहीं किया। ऐसा माना जा रहा था कि राहुल गांधी द्वारा अमेठी सीट छोड़ दिए जाने के बाद से ही स्मृति के तेवर ढीले पड़ गए थे।

हमें इस बात को ज्यादा समझना होगा कि अमेठी की जनता यह अभी भी मानती है कि देश दुनिया में उनकी पहचान सिर्फ कांग्रेस के नाम से है। ऐसे में एक बड़ा जनाधार कांग्रेस के पक्ष में हमेशा से ही रहा है। स्मृति ईरानी को इस गढ़ में जगह बनाने के लिए गुस्से और बदले की भावना से नहीं बल्कि प्रेम भाव से आना होगा। राजीव गांधी की शहादत पर अपने घरों के दीपक बुझाकर गमगीन हो जाने वाली अमेठी के दिल में कांग्रेस के प्रति जो स्नेह भाव है उसे एक दिन में खतम थोड़े न किया जा सकता है।

कांग्रेस ने अमेठी जैसे छोटे से कस्बे को शहर बनाया। इस जिले को राष्ट्रीय स्तर तक के संस्थान दिए। स्थानीय रोजगार विकसित किए। अब इन सबको दरकिनार करके सिर्फ़ अनर्गल बातें करने से कैसे कोई यहां पांव जमा सकता है। स्मृति ईरानी को ये स्वीकारना होगा कि उनकी भाषा और व्यवहार में जो गिरावट आई है, ये हार उसी का फल है। अमेठी में कांग्रेस की पुनः बहाली से यहां कोई ठोस योजना परियोजना आयेगी कि नहीं, ये तो नहीं पता। क्योंकि इसके लिए कांग्रेस का केंद्र में मजबूत होना भी जरूरी है। मगर अभी फिलहाल वहां की जनता में स्मृति के प्रति जो रोष था उससे उन्हें ठंडक ज़रूर मिली है।

(विवेक रंजन सिंह वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्र हैं।)

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