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‘जादूगर’ गहलोत ने पायलट और भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरा

राजनीति के साथ ही जादू की विधा में भी दखल रखने वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की राजनीतिक जादूगरी के आगे भारतीय जनता पार्टी का ऑपरेशन लोटस भी नाकाम हो गया और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की बगावत भी बेअसर साबित हो गई। अशोक गहलोत अपनी सरकार बचाने में कामयाब हो गए। भारी तनाव और सस्पेंस के बीच उन्होंने कांग्रेस विधायक दल और समर्थक विधायकों की बैठक बुलाकर अपनी सरकार का बहुमत साबित कर दिया और बहुमत के आंकड़े से ज्यादा विधायकों की मीडिया के सामने परेड भी करा दी।

चार महीने पहले मध्य प्रदेश को ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद से ‘कांग्रेस मुक्त’ करने में कामयाब रही भाजपा को राजस्थान में निराशा हाथ लगी है। वह न तो खुद कांग्रेस के किसी विधायक को तोड़ पाने में सफल रही और न ही सिंधिया की तरह बगावत की राह पर निकल पड़े सचिन पायलट अपने साथ इतने विधायकों को जुटा सके कि वे कांग्रेस की सरकार को गिरा कर अपनी राजनीतिक हसरत पूरी कर सकें।

गौरतलब है कि 200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा में बहुमत के लिए 101 विधायकों की आवश्यकता होती है। अशोक गहलोत अब तक 125 विधायकों के समर्थन से सरकार चला रहे थे, जिसमें कांग्रेस के 107, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दो, भारतीय ट्राइबल पार्टी के दो, राष्ट्रीय लोकदल का एक और 13 निर्दलीय विधायक शामिल हैं। दूसरी ओर भाजपा के 72 विधायक हैं और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के तीन विधायक भी विपक्ष में ही हैं।

गहलोत ने अपने समर्थक विधायकों की बैठक के बाद 115 विधायकों का समर्थन अपने साथ होने का दावा किया, लेकिन विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बैठक में 107 विधायकों ने शिरकत की। यानी सचिन पायलट सहित 18 विधायक इस बैठक से दूर रहे। बैठक के बाद जिस तरह से सभी विधायकों को एक होटल में सुरक्षित रखा गया है, उससे साफ है कि गहलोत सरकार फिलहाल बच तो गई है, मगर पिक्चर अभी बाकी है।

दरअसल राजस्थान में कांग्रेस की सरकार का यह संकट नया नहीं हैं, बल्कि यूं कहें कि डेढ़ साल पहले जिस दिन यह सरकार बनी तब से ही गहलोत और पायलट के बीच राजनीतिक तनातनी चल रही थी, जिसकी परिणति आज पायलट की बगावत के रूप में हुई।a पायलट विधानसभा चुनाव के पहले से ही खुद को मुख्यमंत्री का दावेदार मानकर चल रहे थे और उन्हें उम्मीद थी कि चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलने पर उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। लेकिन चूंकि लोकसभा चुनाव भी नजदीक थे, लिहाजा पार्टी नेतृत्व ने पायलट के बजाय अनुभवी अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया और पायलट को उप मुख्यमंत्री बनाया गया। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तो पायलट पहले से थे ही और अब भी हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव निबटने के बाद उनकी मुख्यमंत्री बनने की हसरत फिर अंगड़ाई लेने लगी।

उधर भाजपा के शीर्ष नेताओं ने तो लोकसभा चुनाव के बाद ही कहना शुरू कर दिया था कि वे जिस दिन चाहेंगे, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गिरा देंगे। चार महीने पहले मध्य प्रदेश में तो उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद से कांग्रेस की सरकार को गिरा भी दिया और उसके बाद से ही उनके निशाने पर राजस्थान था। पिछले महीने राज्यसभा चुनाव के पहले भी भाजपा ने वहां कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश की थी। उस समय कांग्रेस विधायकों को तोड़ने के पीछे भाजपा का दोहरा मकसद था। एक तो ऐसा करके वह राजस्थान में राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट जीतना चाहती थी और दूसरा मकसद था गहलोत सरकार को गिराना। लेकिन तब भी वह अपनी कोशिश में नाकाम रही।

राज्यसभा चुनाव के बाद भी उसने अपनी कोशिशों पर विराम नहीं लगाया। इस सिलसिले में उसने मध्य प्रदेश में सिंधिया के साथ विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए 22 में से 14 पूर्व विधायकों को मंत्री बना दिया। ऐसा करके एक तरह से उसने राजस्थान के कांग्रेस विधायकों को यह संदेश देने की कोशिश की थी कि मंत्री बनना है तो उठाइए बगावत का झंडा आइए भाजपा के साथ, किसी को निराश नहीं किया जाएगा। यही नहीं, वहां मंत्रिपरिषद के विस्तार के बाद नए मंत्रियों के विभागों के बंटवारे का जो काम दस दिनों से अटका हुआ था, उसे भी आज ही सुबह आनन-फानन में पूरा किया गया। सिंधिया समर्थक सभी मंत्रियों को उनके मनचाहे ‘मलाईदार’ विभाग सौंप दिए गए। ऐसा करने के पीछे भी मकसद राजस्थान के कांग्रेसी विधायकों को बगावत के लिए उकसाना और ललचाना ही था।

बताया जा रहा है कि अपने समर्थक कुछ विधायकों के साथ दिल्ली पहुंचे पायलट से पिछले दो दिनों के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत पार्टी के कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी बात की, लेकिन वे झुकने को तैयार नहीं थे और अपने कदम पार्टी से बाहर निकालने की तैयारी करते दिख रहे थे। इस सिलसिले में उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा भाजपा के कुछ नेताओं से भी मुलाकात की थी। उनके बागी तेवरों से उत्साहित होकर ही भाजपा की ओर से भी एक बार फिर कांग्रेस विधायकों से संपर्क करने की कोशिशें की गईं। कांग्रेस विधायकों को डराने और उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए ही आज सुबह जयपुर में कुछ कांग्रेस नेताओं के घरों और दफ्तरों पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान तैनात करा कर आयकर विभाग के छापे भी डलवाए गए। इस सबके बावजूद मुख्यमंत्री गहलोत विधायकों का बहुमत अपने साथ रखने में कामयाब रहे।

बहरहाल, पर्याप्त संख्या में विधायक अपने साथ जुटाने में नाकाम रहने के बाद सचिन पायलट के तेवर अब ढीले पड़ते नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वे भाजपा में शामिल नहीं होंगे। कांग्रेस नेतृत्व भी नहीं चाहता कि वे पार्टी छोड़ने जैसा कदम उठाएं। यही वजह है कि पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने भी आज उनसे बात की है। समझा जा रहा है कि उनको और गहलोत को साथ बैठाकर बात की जाएगी और संकट का समाधान करने की कोशिश की जाएगी। अगर कोई समाधान होता भी है तो वह कितना टिकाऊ होगा, यह कहना अभी किसी के लिए भी आसान नहीं है।

जो भी हो, आज के पूरे नाटकीय घटनाक्रम ने भाजपा और पायलट को ही नहीं बल्कि मीडिया खासकर टीवी चैनलों को बेहद निराश किया। पिछले दो दिनों से तमाम टीवी चैनलों के एंकर, रिपोर्टर और भाजपा की भक्ति में लीन रहने वाले राजनीतिक विश्लेषक सचिन पायलट को राजस्थान के लोकप्रिय और जनाधार वाले नेता के रूप में पेश कर रहे थे, ठीक उसी तरह जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभी तक पेश करते आ रहे हैं।

जबकि हकीकत यह है कि चार महीने पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में गए थे तो कांग्रेस के 114 में से महज 19 विधायकों ने उनका साथ दिया। सिंधिया खुद भी लोकसभा का चुनाव अपने ही एक पूर्व कार्यकर्ता और भाजपा उम्मीदवार के मुकाबले हार चुके हैं। ठीक उन्हीं की तरह राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के आशिक सचिन पायलट के साथ भी महज 18 विधायक हैं। हालांकि दावा वे अपने साथ तीस विधायक होने का कर रहे थे। यानी कांग्रेस विधायक दल में न तो सिंधिया का बहुमत था और न ही पायलट का बहुमत है। दोनों में एक समानता यह भी है कि दोनों की आज जो भी राजनीतिक हैसियत है, उसमें उनका अपना ज्यादा कुछ नहीं है बल्कि वह उनके पिता की विरासत की वजह से है। यह सवाल तो बेमतलब ही है कि कांग्रेस की वैचारिकी या नीतियों से इन दोनों नेताओं का कितना ताल्लुक है, क्योंकि एक इनमें से भाजपा में जा चुका है और दूसरा जाते-जाते रह गया, मगर पता नहीं कब चला जाए।

इसके बावजूद पिछले दो दिनों से तमाम टीवी चैनलों और ज्यादातर अखबारों में दोनों नेताओं को बेहद लोकप्रिय और जनाधार वाला नेता बताते रहे। दोनों को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बताते हुए कहा गया कि कांग्रेस नेतृत्व ने दोनों के साथ अन्याय किया।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on July 13, 2020 7:39 pm

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