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सत्ता के शीर्ष से जुड़े हैं जामिया की घटना के तार!

गृहमंत्री अमित शाह ने लज्जा और शर्म की सभी चादरें उतार फेंकी हैं। जिस शख्स को कल की जामिया की घटना की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे देना चाहिए था उसने मामले पर एक ट्वीट कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री समझ ली। और शाम को वह फिर एक चुनावी सभा में शाहीन बाग को करंट लगवाता दिख रहा था! कोई गृहमंत्री से पूछेगा कि अगर बापू की पुण्यतिथि पर लोगों को उनकी समाधिस्थल पर इकट्ठा होकर दो मिनट का मौन रखने की इजाजत नहीं है तो वह खुद कैसे इतनी बड़ी सभा को संबोधित कर सकते हैं। जामिया गोलीकांड का पूरा घटनाक्रम, परिस्थितियां और मौके की रिपोर्टें किसी बड़ी साजिश की तरफ इशारा करती हैं।

एक शख्स आता है और वह देसी कट्टे को लहराते हुए न केवल चारों तरफ चक्कर काटता है बल्कि भीड़ को गालियां देते हुए उकसाने की कोशिश करता है। यह सब कुछ काफी देर तक चलता है। और इस दौरान पास खड़े सैकड़ों की तादाद में पुलिस के जवान जड़वत बने रहते हैं। वे अपनी जगह से टस से मस तक नहीं होते। उनकी मुद्रा कुछ ऐसी होती है मानों आस-पास कहीं कुछ हो ही नहीं रहा हो। क्या सामान्य स्थितियों में यह संभव है? क्या कोई घटना होने पर कहीं की भी पुलिस इस तरह से खड़ी रह सकती है? क्या उसे इसी बात की ट्रेनिंग दी गयी है कि किसी अपराधी के तांडव करने के बाद भी उसे अपनी जगह पर स्थितिप्रज्ञ बने रहना है?

पुलिसिंग का सामान्य सिद्धांत कहता है कि ऐसे मौके पर पुलिस संबंधित शख्स को न केवल काबू में करेगी बल्कि उसके लिए जरूरत पड़ने पर अपनी जान भी जोखिम में डाल देगी। लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि गोली का शिकार युवक शादाब पुलिस वालों से ज्यादा अलर्ट और साहसी दिखा। सामने आए एक वीडियो में उसको युवक के बिल्कुल करीब पहुंच कर उसे रोकने की कोशिश करते देखा जा सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि फोटो के उसी फ्रेम में पीछे चार-पांच पुलिस के जवान बिल्कुल निश्चिंत होकर जड़वत खड़े हैं जैसे इस घटना से उनका कोई वास्ता ही न हो। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिसकर्मियों के रवैये को देखकर एक बात तो पुख्ता तौर पर कही जा सकती है कि उन्हें इस युवक की हरकतों की पूर्व जानकारी थी। साथ ही उसे किसी भी तरह की क्षति न पहुंचे इसकी भी उन्हें गारंटी करनी थी। अनायास नहीं इतने बड़े कांड के बाद भी पुलिसकर्मियों का युवक के प्रति रवैया अचरज की हद तक दोस्ताना था।

और जिस तरह से गिरफ्तारी के तुरंत बाद उसे नाबालिग साबित करने और उसके एवज में उसकी मार्कशीट और सर्टिफिकेट सामने आने लगी उससे इस बात को समझना किसी के लिए कठिन नहीं था कि मामला किस स्तर पर प्रायोजित है।

युवक की पृष्ठभूमि और उसके सांगठनिक रिश्तों के खुलासे के बाद चीजें और भी ज्यादा स्पष्ट होने लगी हैं। यह युवक बजरंग दल से जुड़ा है। उसका फेसबुक प्रोफाइल उसकी सांगठनिक गतिविधियों से भरा पड़ा है। जिसमें उसने अपना नाम रामभक्त गोपाल बताया है हालांकि असली नाम गोपाल शर्मा है। और उसमें कहीं बंदूक के साथ उसकी तस्वीर है तो कहीं भगवा पहनकर तलवारें भाजते हुए उसे देखा जा सकता है। यानी यह बजरंग दल का एक पूर्ण प्रशिक्षित कार्यकर्ता है। और वह किसी बेतकल्लुफी में यहां नहीं पहुंच गया था। बल्कि इसकी उसने पूरी तैयारी कर रखी थी। और इसका सार्वजनिक तौर पर ऐलान भी कर चुका था। जो उसके अपने फेसबुक पर देखा भी जा सकता है।

लिहाजा उसे सिरफिरा कहना या फिर सनकी बताना न केवल मामले को डायलूट करना है बल्कि यह सब कुछ उसे बचाने की कोशिश का भी हिस्सा है। गोडसे के मामले में यही किया गया था। उसे सिरफिरा घोषित कर एक अलग-थलग कार्रवाई के तौर पर पेश करने की कोशिश की गयी थी। जबकि सच्चाई यह थी कि वह एक संगठन और खास विचारधारा द्वारा प्रशिक्षित व्यक्ति था। जिसे एक खास मिशन पर लगाया गया था। और वह उसमें अकेले नहीं बल्कि पूरी जमात के साथ शामिल था।

यहां भी कमोवेश वही मामला है। वह अपने आप जेवर से जामिया नहीं पहुंचा था। और मौके पर मौजूद पुलिसवालों की भूमिका भी उन्हें पूर्व जानकारी होने की तरफ इशारा करती है। और जिस तरह से उसे नाबालिग बता कर बचाए जाने की कवायद शुरू हो गयी है उससे पूरे घटनाक्रम के पीछे गहरी साजिश की बात और पुख्ता हो जाती है।

तात्कालिक तौर पर इस युवक का इस्तेमाल न केवल जामिया में न्यूसेंस क्रिएट करने के लिए हुआ है। बल्कि इसका एक दूसर मकसद बापू की पुण्यतिथि पर राजघाट पर बनने वाली मानव श्रृंखला में शामिल होने से जामिया और शाहीन बाग के लोगों को रोकना भी था। क्योंकि अमित शाह चाहते हैं कि शाहीन बाग अलग-थलग भी रहे और खबरों में भी बना रहे। वह जैसे ही महात्मा गांधी या फिर समाज के दूसरे धर्मों और तबकों से जुड़ता है तो शाह का मकसद फेल होने लगता है।

लिहाजा जामिया के लोगों के शांतिपूर्ण जुलूस को रोक कर उसे एक हिंसक जगह के तौर पर तब्दील करने की कोशिश में गोपाल शर्मा का इस्तेमाल किया गया है। और अभी जो कुछ और तस्वीरें सामने आयी हैं उससे यह बात साबित हो रही है कि बल्कुल सीधे न सही लेकिन वाया उसके तार सत्ता के शीर्ष से जुड़े हुए हैं। अपनी फेसबुक पर चस्पा प्रोफाइल तस्वीर में वह एक ऐसे शख्स के साथ दिखता है जिसका संघी धारा के एक दूसरे बड़े नेता से रिश्ता है। और वह बड़ा नेता प्रधानमंत्री मोदी के साथ देखा जा सकता है। इस लिहाज से यह कहा जा सकता है कि गोपाल किसी बदहवासी में नहीं बल्कि संगठन के एक मिशन को लेकर वहां पहुंचा था। और जिस बेखौफ अंदाज में देसी कट्टा लहरा रहा था उसको देखकर कोई भी उसकी बेफिक्री और निश्चिंतता का अंदाजा लगा सकता है।

दरअसल दिल्ली चुनाव बीजेपी किसी भी तरीके से जीतना चाहती है। उसे पता है कि जनता के बुनियादी सवालों के एजेंडे पर ऐसा नहीं हो सकता है। लिहाजा शाहीन बाग उसे सबसे बेहतर विकल्प दिख रहा है। इस पर बीजेपी जूझ जाना चाहती है। लिहाजा उसने उसी पर केंद्रित कर दिया है। हालांकि देविंदर सिंह की घटना बताती है कि चुनाव के लिहाज से राजधानी के लिए कुछ और ही पूर्वनियोजित था। लेकिन उसकी गिरफ्तारी ने साजिशकर्ताओं के मंसूबों पर पानी फेर दिया। अब जबकि और कुछ नहीं बचा है तो पूरी हैमरिंग शाहीन बाग पर की जा रही है।

लोगों का तो यहां तक कहना है कि जीत की स्थिति नहीं बन पाने पर चुनाव को स्थगित भी किया जा सकता है। और इसका इशारा चुनाव की घोषणा के दिन खुद चुनाव आयोग ने भी कर दिया था। जब उसने कहा था कि किसी असामान्य परिस्थिति में चुनाव स्थगित भी किए जा सकते हैं। उस समय जब यह बयान आया तो लोगों को अचरज भी हुआ था। लेकिन अब जब लोग आज की परिस्थितियों से जोड़कर देख रहे हैं तो उसका मतलब समझ में आ रहा है।

कल की घटना को भी उसी के एक हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही एक और प्रबल आशंका जतायी जा रही है कि आने वाली छह फरवरी के भीतर राजधानी में कोई बड़ी ‘घटना’ घट सकती है। कुछ ऐसी घटना जो पूरे चुनाव का पाशा पलटने की क्षमता रखती हो। अब ये क्या हो सकता है और उसका क्या रूप होगा यह सब कुछ उससे लाभ हासिल करने वाले ही बता सकते हैं।

This post was last modified on January 31, 2020 9:42 am

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