स्मृति दिवस: जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस के अन्दर और बाहर के संकीर्णतावादियों से लड़ाई लड़ी  

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पं. जवाहरलाल नेहरू की यादों के साथ इधर एक बडी विडम्बना जुड़ गई है। जब भी उनकी बात चलती है, उनके बडे योगदानों, बड़ी उपलब्धियों और बड़ी विफलताओं के हवाले हो जाती है और वे छोटे प्रसंग अचर्चित रह जाते हैं, जो छोटे होने के बावजूद उनके व्यक्तित्व के बड़े प्रसंगों से कहीं ज्यादा पता देते हैं। आइये, उनके जीवन की सान्ध्यबेला के एक ऐसे ही बेहद छोटे प्रसंग से बात शुरू करें।

बीती शताब्दी के सातवें दशक में फिल्मकार रिचर्ड एटनबरो के मन में महात्मा गांधी पर फिल्म बनाने का विचार आया तो वे इस बाबत सलाह मशवरे के लिए पं. नेहरू से मिले। इस मुलाकात में नेहरू ने उन्हें बस एक ही हिदायत दी। यह कि ‘जब भी यह फिल्म बनाना, बापू को देवता की तरह नहीं, मनुष्य की तरह ही चित्रित करना।’ कहते हैं कि बाद में एटनबरो ने ‘गांधी’ नाम से उक्त फिल्म बनाई तो उसके एक भी दृश्य में नेहरू की इस हिदायत को नहीं भुलाया। यही कारण है कि 1982 में वह प्रदर्शित हुई तो दर्शकों को ज्यादातर बापू के मनुष्य रूप का ही साक्षात्कार कराती दिखी।

बहरहाल, नेहरू की इस हिदायत के आईने में उनके खुद के जीवन को देखें तो उनके व्यक्तित्व के कई अछूते व अनूठे मानवीय आयाम सामने आते हैं। कह सकते हैं कि अगर कोई मनुष्य ‘देवता’ नहीं है और होना भी नहीं चाहता, तो उसके संदर्भ में यह बहुत स्वाभाविक है। खासकर जब वह ऐसा मनुष्य हो कि उसके जैसा होना भी आसान न हो। इतना ही नहीं, उसकी जड़ें न सिर्फ आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य यानी सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में ‘भारत के वास्तुकार’ अथवा निर्माता से लेकर ‘बच्चों के चाचा’ तक फैली हुई हों। उनमें कोई झोल, दुविधा या द्वंद्व ढूंढ़े न मिलते हों और व्यक्तिगत व सार्वजनिक नैतिकताओं में भी कोई फांक न हो।

दरअसल, नेहरू की सबसे बड़ी खासियत यही है कि वे अपने किसी भी रूप में किसी को ऐसी कोई छूट देते नजर नहीं आते, जिससे उन्हें किसी भी स्तर पर पोंगापंथ, प्रतिगामिता, परम्परावाद, सम्प्रदायवाद और पोच-सोच का रंचमात्र भी पैरोकार साबित किया जा सके। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वे जिन मूल्यों के साथ रहे और प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने जैसे आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी भारत का निर्माण करना चाहा, उससे जुड़े उनके विचारों व कदमों की यह कहकर तो आलोचना की जा सकती है कि कई मामलों वे कुछ ज्यादा ही ‘स्ट्रेट फारवर्ड’ हो गये, लेकिन यह कहकर नहीं की जा सकती कि उन्होंने अपनी आधुनिकता या प्रगतिशीलता में कोई लोचा रह जाने दिया। भले ही नवस्वतंत्र देश में उन्हें इसके लिए कांग्रेस के अन्दर व बाहर दोनों के संकीर्णतावादियों से और कई बार दोनों के गठजोड़ से भी लोहा लेना पड़ा।

वे प्रधानमंत्री बने तो न कांग्रेस के अन्दर उनके विरोधी संकीर्णतावादियों की कमी थी, न बाहर। इन दोनों ही तरह के संकीर्णतावादियों को एक दूजे से बहुत उम्मीदें थीं और वे मिलकर उनके विरुद्ध जाल बिछाया करते थे।

नेहरू के ही शब्दों में कहें तो उन दिनों संकीर्णता व साम्प्रदायिकता ने उन लोगों के दिलो-दिमाग में भी प्रवेश कर लिया था, जो पहले कांग्रेस के स्तम्भ हुआ करते थे। इसीलिए उनके विरुद्ध पूरी शक्ति से अभियान शुरू करने के निश्चय के साथ नेहरू ने दो मई, 1950 को देश के सारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखा था, ‘हम सम्प्रदायों के बीच एकता का उद्देश्य भूल गये हैं। धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं… पर उसे बहुत कम समझ पाये हैं।’ 

फिर भी बात नहीं बनी और संकीर्णतावादियों की ओर से पुरुषोत्तमदास टंडन, नेहरू की मनाही के बावजूद, अगस्त, 1950 में हुए कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़े और जीत गये। स्वाभाविक ही इसके अगले महीने नासिक में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ तो संकीर्णतावादियों का मनोबल बहुत ऊंचा था। आखिरकार उन्होंने नेहरू को हराकर उन्हें विकट चुनौतियों के हवाले कर दिया था।

लेकिन नेहरू तो नेहरू। उन्होंने नरम होने के बजाय सम्मेलन के मंच से आर या पार की शैली में कई कड़ी, खरी व दो टूक बातें कहीं। यह भी कि ‘पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहे हैं तो क्या हम भी यहां वही करें? यदि इसे ही जनतंत्र कहते हैं तो भाड़ में जाये ऐसा जनतंत्र। हमारे जीवन में ऐसे कुतर्कों की जगह तभी बनती है, जब हम अपने आदर्शों, उद्देश्यों और सिद्धांतों को भूल जाते हैं। महान कार्य और छोटे लोग एक साथ नहीं चल सकते।

जानकारों की मानें तो नेहरू की इस खरी-खरी के पीछे उनके द्वारा आजादी के विकट संघर्ष में निभाई गई उस भूमिका का दर्प भी मुखर था, जिसके तहत उन्होंने अपने जीवन के नौ साल गोरों की जेलों में बिताये थे। {गौरतलब है कि उसी दौर में उन्होंने हमें ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ जैसी बहुमूल्य पुस्तक भी दी थी।} इसलिए संकीर्णतावादी बेबसी में तिलमिलाकर और हाथ मलकर रह गये। करते भी क्या देश की जनता भी नेहरू के साथ थी।

इस जनता ने 1952 के लोकसभा चुनाव में नेहरू की नीतियों पर मुहर लगा दी तो वे अनेक विडम्बनाओं से गुजरते हुए ‘आधुनिक भारत के निर्माण’ में लग गये। उनके सामने न सिर्फ संकीर्णतावादियों बल्कि विन्स्टन चर्चिल जैसे ब्रिटिश नेताओं को भी गलत सिद्ध करने की चुनौती थी, जिन्होंने भारतवासियों को स्वशासन के लिहाज से पूरी तरह अयोग्य करार देते हुए भविष्यवाणी कर दी थी कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भारत में निर्मित न्यायपालिका, स्वास्थ्य सेवा, रेलवे व लोकनिर्माण आदि संस्थाओं का पूरा तंत्र खत्म हो जायेगा और वह मध्ययुगीन बर्बरता व लूट-खसोट के, साथ ही अपने सांपों व संपेरों वाले दौर में वापस चला जायेगा।

कहने की जरूरत नहीं कि भारत सांपों व संपेरों के देश की छवि से बाहर निकलकर नियति से ऐतिहासिक साक्षात्कार करते हुए भाखंडा व नांगल जैसे ‘आधुनिक भारत के नये तीर्थों’ के रास्ते भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की गर्वीली उपलब्धियों तक पहुंचा, तो इसका सर्वाधिक श्रेय नेहरू को ही जाता है।

आज हम उनकी अनुपस्थिति में धर्म व सम्प्रदाय की जिन चुनौतियों से दो-चार होने को अभिशप्त हैं और उन्हें लगातार जटिल होती देख रहे हैं, आजादी के तुरंत बाद के वर्षों में देश के त्रासद बंटवारे के बावजूद वे सिर नहीं उठा सकीं तो सिर्फ इसलिए कि नेहरू ने उनसे निपटने में कतई यह नहीं देखा कि किसी संकीर्णतावादी का धर्म कौन-सा है और वह कांग्रेस के अन्दर का है अथवा उसके बाहर का।

इससे पहले देश के बंटवारे के वक्त भी नेहरू ने दोनों तरफ की पगलाई हुई हिंसक जमातों को यह साफ संदेश देने में कोई कोताही नहीं की कि हमारे पास सह-अस्तित्व का बस एक ही विकल्प है सह-विनाश। गौरतलब है कि शांतिपूर्ण सहअस्तित्व उनके द्वारा पड़ोसी चीन से किये गये उस बहुचर्चित पंचशील समझौते का भी हिस्सा था। 1962 के भारत चीन युद्ध ने उसे इतनी क्षति पहुंचाई कि पंडित नेहरू टूटकर रह गये, बीमार रहने लगे और अंततः 1964 में बुधवार, 27 मई की झुकती दोपहरी में उनका निधन हो गया।

तब अवध के एक भावुक लोककवि ने विह्वल होकर लिखा- हिला हिमालय पिघला पत्थर मच गया हाहाकार।

(कृष्ण प्रताप सिंह जनमोर्चा के संपादक हैं और फैजाबाद में रहते हैं।)

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