कर्नाटक में कितनी कामयाब होगी “डैमेज कंट्रोल” की रणनीति

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नई दिल्ली / बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार एक बार फिर गंभीर संकट में है। पूर्व जेडीएस अध्यक्ष एच विश्वनाथ के विधायकों को लेकर असेंबली स्पीकर रमेश कुमार के चैंबर पहुंचने से ये सब शुरू हुआ। विधायक अपना इस्तीफा लेकर गए थे। स्पीकर की अनुपस्थिति में विधायकों ने अपना इस्तीफा विधानसभा सचिव को दे दिया। मुख्य़मंत्री एचडी कुमारस्वामी अमेरिका के यात्रा पर थे। राजनीतिक उथल-पुथल के बीच वे अमेरिका से वापस आए और डैमेज कंट्रोल में जुट गए। कांग्रेस नेता भी मामले को सुलझाने में अपने को झोंक दिया। लेकिन अभी तक कर्नाटक सरकार पर से खतरा नहीं टला है। इस डैमेज कंट्रोल की रणनीति के तहत कांग्रेस और जेडीएस के सभी मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है। मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने दावा किया है कि गठबंधन सरकार को कोई खतरा नहीं है। उनका कहना है कि राज्य में फिर से कैबिनेट का पुनर्गठन किया जाएगा। कुमारस्वामी ने सरकार बचाने की कोशिश के तहत यह आखिरी दांव खेला है।

कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा पर राज्य की गठबंधन सरकार को गिराने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। राज्यों में विपक्षी पार्टियों की गठबंधन वाली सरकारों को गिरा कर भाजपा अपनी सरकार तो बनाती ही रही है। लेकिन यहां यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि कर्नाटक में राज्य विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार नहीं बना पायी थी। येदियुरप्पा को जरूरी समर्थन नहीं मिल पाया था। ऐसे में क्या हुआ कि भाजपा को किसी भी सूरत में सत्ता से बाहर रखने की कसम खाने वाले विधायक और नेता भाजपा की सरकार बनाने के लिए अपनी पार्टी से इस्तीफा देने पर अडिग हैं। जेडीएस नेता एच विश्वनाथ इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं कि विधायकों ने स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दिया है और वो किसी “ऑपरेशन कमल” से प्रभावित नहीं हैं। उनका कहना है कि कर्नाटक की गठबंधन सरकार जनता की उम्मीदों को पूरा करने में नाकाम रही है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि कर्नाटक की राजनीति में इस उठापटक के क्या कारण हैं? सरसरी तौर पर ही देखने से राज्य की राजनीति अस्थिरता का कारण समझ में आ जाता है।

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पहली बात तो यह है कि संख्याबल में ज्यादा होने के कारण कांग्रेस विधायकों के मन में मंत्री बनने और सरकार के कामकाज में दखल रखने की स्वभाविक अपेक्षा है। दूसरी बात कांग्रेस और जेडीएस नेता मुख्यमंत्री के पद को लेकर भी एकमत नहीं है। कांग्रेस की अपेक्षा आधे संख्या वाली जेडीएस के खाते में मुख्यमंत्री और ज्यादा संख्या रखने वाले कांग्रेस विधायकों को इंतजार करना पड़ रहा है। कांग्रेस के नेताओं की महत्वाकांक्षा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वहीं कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों में एक आम धारणा घर कर गई है कि कर्नाटक की सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही है। ये बात भी सच है कि कांग्रेस के भीतर बहुत से लोग, ख़ासकर सिद्धारमैया एचडी कुमारास्वामी के मुख्यमंत्री बनने से बिलकुल ख़ुश नहीं हैं।

ऐसे में कांग्रेस-जेडीएस के बीच मतभेद औऱ मनभेद को हल करके कर्नाटक सरकार की डूबती नैया पार लग सकती है। कर्नाटक में विधायकों में एक डर काम कर रहा है कि अगर सरकार गिर गई तो नए चुनाव होंगे।कोई भी विधायक नया चुनाव नहीं करवाना चाहता है। भले ही वो भाजपा का विधायक हो या कांग्रेस का विधायक। ये चीज़ कांग्रेस और जेडीएस सरकार के पक्ष में जाती है।अगर विधानसभा स्पीकर रमेश कुमार कांग्रेस और जेडीएस के 12 विधायकों के इस्तीफ़े स्वीकार कर लेते हैं तो सदन की कुल संख्या घटकर 212 रह जाएगी। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा 106 हो जाएगा। भाजपा के पास पहले ही 105 विधायक हैं और अब निर्दलीय नागेश ने भी इस्तीफ़ा दे दिया है।

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