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कश्मीर हमारा है, कश्मीरी नहीं!

आरएसएस के लोग हमेशा नारा लगाते हैं कि कश्मीर हमारा है! मेरा सवाल बस इतना सा है कि कश्मीर ही हमारा है या कश्मीरी भी हमारे हैं? कश्मीर की जिस दो तिहाई आबादी को 90 साल से विलेन घोषित करने के लिए जो मेहनत आप लोग कर रहे थे, यह उनकी है और एक तिहाई आबादी जाट,गुर्जर,डोगरा,जट्ट सिक्खों की है! 2लाख के करीब दलित समुदाय के लोग हैं जो शरणार्थियों की तरह अपना जीवनयापन कर रहे हैं! सफाई का काम तो करके पेट भर सकते हैं मगर स्थायी नौकरी, स्थायी वाशिंदे नहीं बन सकते!

राष्ट्रपति शासन के तहत जम्मू एंड कश्मीर सरकार ने एक एडवाइजरी जारी की है कि अमरनाथ यात्री व घूमने आए सैलानी तुरंत कश्मीर वैली छोड़ दें! ये लोग तो मेहमान थे मगर कोई बड़ा खतरा था तो कश्मीर के बाशिंदों के लिए भी कोई एडवाइजरी जारी करते! क्या सिविलियन/नेटिव लोगों के जान-माल की कोई कीमत नहीं है?

कश्मीर हमारा है मगर कश्मीरी नहीं!

नागालैंड हमारा है मगर नागा नहीं!

मिजोरम हमारा है मगर मिजो नहीं!

मणिपुर हमारा है मगर मणिपुरी नहीं!

गोरखालैंड हमारा मगर गोरखा नहीं!

जमीन हमारी है मगर जमीन पर सदियों से रहने वाले लोग,भारत की सीमाओं में रहने वाले लोग अगर भारत के नहीं हैं तो कहां के हैं व किस तरह इस समस्या का समाधान निकालेंगे वो भी तो देश के सामने आना चाहिए!

माना कि एनआरसी की आड़ में राज्यों को डिटेंशन सेन्टर तैयार करने की सलाह दे दी मगर यह कोई हिटलर का जमाना नहीं है! उस समय इंटरनेट नहीं था! फेसबुक नहीं था! व्हाट्सएप नहीं था! यूट्यूब नहीं था! हर खबर पूरी दुनिया में पहुंच रही है! इतने हवा में मत उड़िये मामला जटिल है!

पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि कश्मीर का मुद्दा इंसानियत, अक्लियत व जम्हूरियत से हल करेंगे और उनकी अर्थियों को लोटों में भर-भरकर आपने देश के हर गांव में भेजने का कष्ट उठाया था! थोड़ा पंडितजी के विचारों पर भी चलने का कष्ट उठा लीजिये!

1947 में हरिसिंह, शेख अब्दुला व पंडित नेहरू ने जो बेहतर समझा वो किया! भारतीय संस्कृति रही है कि अपने वचन पर कायम रहना! आप भी सदा कहते हो कि ..

रघुकुल रीत सदा चली आयी!

प्राण जाई पर वचन न जाई!!

अपने पुरखों अर्थात पंडित नेहरू व पंडित अटल बिहारी के पदचिन्हों पर चलना सीखो!

माना कि एयर सेक्टर डूब गया!

माना कि कृषि क्षेत्र डूब गया!

माना कि विदेशी निवेश नहीं आ रहा!

माना कि क्रय क्षमता खत्म हो गई!

माना कि रियल एस्टेट धराशायी हो गया!

माना कि एक्सपोर्ट धड़ाम हो गया!

माना कि ऑटोमोबाइल सेक्टर गिर रहा है!

माना कि जीडीपी की ओपनिंग सेरेमनी 7वें आसमान पर पहुंच गई!

माना कि बेरोजगारी आजाद भारत के सबसे बुरे दौर में पहुंच रही है!

मगर नोटबन्दी व जीएसटी से बर्बाद अर्थव्यवस्था, जय श्रीराम के नारों  के बीच पैदा हुए ख़ौफ़ के माहौल से दूर हो चुके विदेशी निवेशकों, NRC से पैदा हुए कंफ्यूज़न से दूरियां बनाने वाले इस्लामिक देशों के खोए विश्वास को कैसे हासिल करोगे?

पुरखों के किये कार्यों में समय के मुताबिक सुधार जरूर किया जा सकता है मगर उनके कार्यों को गालियां देकर तानाशाही द्वारा सब कुछ तय करने लगोगे तो देश कतई स्वीकार नहीं करेगा!

मुझे इस देश की आजादी के लिए कुर्बान हुए लोगों की समाधि-कब्र से प्रेरणा लेने वाले आजाद,इंसानियत पसंद लोगों की ताकत पर पूर्ण भरोसा है कि ये लोग इतनी सस्ती अपने पुरखों की शहादत को नहीं बेचेंगे!

मैँ हमेशा कहता हूं कि कश्मीर कोई मुद्दा नहीं है, हिमाचल कोई मुद्दा नहीं है, नार्थ ईस्ट कोई मुद्दा नहीं है मगर इस देश की सत्ता पर काबिज लोगों के लिए यह सदा प्राथमिक मुद्दा रहा है! कुर्सी पर कब्जे के लिए किसानों के बच्चों को दोनों तरफ के रहनुमा मरवाते है और अपने-अपने देशों में सत्ता की नाकामी को छुपाने के लिए हर माह, हर साल बखेड़ा खड़ा कर देते है!

दोनों मुल्क में गरीबी, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था गहरे खड्डे में गिर रही है! हमारा मुद्दा कश्मीर नहीं हर चार घंटे में एक किसान मरता है, हर 14मिनट में एक महिला पर अत्याचार होता है, स्कूलें बंद हो रहे हैं,सरकारी अस्पताल श्मशान बन रहे हैं, सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर यहां है,सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे यहां हैं!

क्यूबा सरकार ने अपने देश के हवाई अड्डों,हाईवे के आसपास एक बोर्ड लगाया है जिस पर लिखा हुआ है..

“दुनियाभर में 200 मिलियन बच्चे रोज सड़कों पर सोते हैं और उसमें एक भी क्यूबा का बच्चा नहीं है!”

बस हमारी लड़ाई यही थी,यही है व यही रहेगी।

कश्मीर की लड़ाई जमीन के टुकड़े को लेकर नहीं थी! जिन्होंने पाकिस्तान की तरफ जाने के बजाय अपने पुरखों व उनके हमसफ़र बनकर जीने मरने वाले लोगों के साथ भरोसा करके भारत को अपनाया था!

जो लोग 35A या 370 को कागज पर लिखी पंक्तियां समझ रहे हैं वो भारी गफलत में हैं! यह सिर्फ संविधान के पन्नों पर लिखा वादा नहीं है! इस देश मे हजारों साल साथ जिये व साथ मरे लोगों के आपसी भरोसे का स्तंभ है!

अगर सत्ता के दम पर ,बंदूक की नोंक पर,डरा-धमकाकर इसको दफनाया जाता है तो मानव बिरादरी, दुनिया भर में भारतीयता की हार होगी! यह सिर्फ कश्मीरियों की हार नहीं होगी बल्कि लोकतंत्र,संविधान,इंसानियत,मौलिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों की हार होगी! यह देश के रूप में भारत की हार होगी! सभ्यता के रूप में वसुधैव कुटुम्बकम समझने वाली हिन्दू संस्कृति व परंपराओं की हार होगी!

(मदन कोथुनियां सामाजिक सरोकार रखने वाले पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

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