यूएन पहुंचा कश्मीर मसला, कल होगी अनौपचारिक बैठक

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नई दिल्ली। आखिर जिस बात की आशंका थी वही हुआ। कश्मीर मामला यूनाइटेड नेशंस में पहुंच गया है। यूएन ने कश्मीर मसले पर बंद कमरे में बैठक कर विचार करने का फैसला किया है। यह बैठक कल यानी 16 अगस्त को होगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इसके लिए पत्र भेजकर पहले ही निवेदन किया था। लेकिन यूएन ने उस पर कोई पहल नहीं की। फिर बाद में चीन ने इस मामले को उठाया। गौरतलब है कि इस समय पौलैंड के जोन्ना रोनेका सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं।
बताया जाता है कि पाकिस्तान के पत्र पर उन्होंने दोनों देशों को आपस में मिल बैठकर मामले को हल करने का सुझाव दिया था। लेकिन जब चीन जो कि सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है उसने जोर डाला तो उन्हें बैठक करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसके लिए कल की तारीख मुकर्रर की गयी है। इस नई प्रगति से ऐसा लगता है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर की चीन यात्रा पूरी तरह से नाकाम रही। हालांकि विदेश मंत्री के साथ बैठक में ही चीन के विदेश मंत्री ने इसका इशारा कर दिया था।
यूएनएससी के अध्यक्ष जोन्ना रोनेका ने बुधवार को रिपोर्टरों को बताया कि “यूएनएसी जम्मू और कश्मीर की परिस्थिति पर संभावना है कि 16 अगस्त को बंद कमरे में बातचीत करेगी।”
ऐसा पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी द्वारा कौंसिल के अध्यक्ष को लिखे गए पत्र के बाद चीन के औपचारिक रूप से इस मसले पर बातचीत करने के निवेदन के बाद हुआ है।
आपको बता दें कि पाकिस्तान लगातार .यूएनएससी पर इस पर बातचीत करने के लिए दबाव डाल रहा था लेकिन वह इस काम में लगातार तीन बार नाकाम रहा। 13 अगस्त को उसने इस पर तत्काल बैठक की मांग की थी। जिससे कश्मीर में तनाव को और फैलने से रोका जा सके।
यूएनएससी के अध्यक्ष रोनेका को लिखे गए अपने पत्र में कुरैशी ने भारत-पाकिस्तान सवाल पर होने वाली बैठक में भाग लेने की अपील की थी।
मीडिया के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक चूंकि पाकिस्तान को नहीं सुना गया इसलिए चीन ने आगे बढ़कर इस जिम्मेदारी को संभाली। लिहाजा उसने बुधवार को सुरक्षा परिषद से इस मसले पर बात करने की अपील की।
इंडिया के टुडे के मुताबिक चूंकि पाकिस्तान के खुले में बात करने की अर्जी को जब कोई समर्थन नहीं मिला तब उन्होंने चीन से बंद कमरे में बैठक कर पाकिस्तान के पत्र के मुद्दे पर बात करने के लिए कहा।
एक पूर्व राजनयिक ने इंडिया टुडे को बताया कि सदस्यों में से कोई भी इस तरह की बातचीत के लिए कह सकता है। यह औपचारिक बैठक नहीं मानी जाती है। हालांकि यह महज बातचीत है लेकिन देखना होगा कि यूएनएससी उसके बाद कश्मीर पर कोई बयान जारी करने के लिए तैयार होती है या नहीं।
1971 के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर मसला यूएन में पहुंचा है। अभी तक अंतरराष्ट्रीय जगत की यही स्थिति थी कि यह मसला भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय है। लिहाजा उन्हें इसे आपस में बैठकर सुलझा लेना चाहिए। यह पहली बार होगा जब दोनों देशों के अलावा इसमें यूएन के रूप में तीसरा पक्ष भी शामिल होगा। साथ ही चूंकि उसमें दूसरे देश भी शामिल हो जाएंगे इसलिए कहा जा सकता है कि यह अपने किस्म से अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनने की तरफ अग्रसर हो गया है।

राजनयिकों का कहना है कि कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का जो भी नतीजा निकले लेकिन यह राजनयिक लैंडमार्क बनने जा रहा है। क्योंकि इस मसले पर 1971 के बाद से किसी तरह की बातचीत नहीं हुई है।
पूर्व विदेशमंत्री नटवर सिंह ने कहा कि “कश्मीर पर आखिरी प्रस्ताव 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान आया था जिसने शिमला समझौते की राह को प्रशस्त किया था। उसके बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों से दूर रहा।”
1971 के युद्ध की पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव नंबर 307 आया था जिसमें भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम की मांग शामिल थी।
एक पूर्व राजनयिक जो यूएन में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, ने इस बात को चिन्हित किया कि बंद कमरे में सबसे पहले इस मसले को लेकर बात होगी कि भारत-पाकिस्तान के मसले पर चीन के मौजूदा पत्र पर बात किया जा सकता है या नहीं। 1972 में शिमला समझौते के बाद भारत ने यूएन को मसले के द्विपक्षीय होने के बारे में सूचना दी थी।
इसलिए सदस्य सबसे पहले इस बात पर विचार करेंगे कि इस मसले पर बात करने के लिए क्या उनके पास पर्याप्त वैधानिक अधिकार है भी या नहीं। क्योंकि भारत-पाकिस्तान सवाल के तहत भारत पहले ही लिख चुका है कि जैसा कि चीन के पत्र में भी कहा गया है, कश्मीर मसला द्विपक्षीय है।
भारत की पहले से ही यह पोजीशन बनी हुई है कि कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने का 5 अगस्त का निर्णय निश्चित तौर पर द्विपक्षीय मसला है और इसका पाकिस्तान के ऊपर कोई असर नहीं पड़ने जा रहा है। हालांकि इसको अंतरराष्ट्रीय मसला बनाने के लिए पाकिस्तान कोई कोर-कसर नही छोड़ रहा है।

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