Saturday, January 22, 2022

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हरियाणा में भी खट्टर सरकार पर खतरे के बादल, उप मुख्यमंत्री चौटाला पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा

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गुड़गांव। रविवार को संसद द्वारा पारित कृषि विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के साथ ही हरियाणा में राजनीतिक हलचल बढ़ गयी है। प्रदेश में घटित विभिन्न प्रतिक्रियाओं व पड़ोसी राज्य पंजाब के बड़े राजनैतिक दल द्वारा भाजपा से गठबंधन तोड़ने के कारण हरियाणा में जननायक जनता पार्टी (जजपा) पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह भी भाजपा से किनारा कर किसानों की भावनाओं का सम्मान करें और किसान आंदोलन के साथ खड़े हों। जबकि जजपा के नेता व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला अभी भी असमंजस की स्थिति में हैं। 

एक ओर उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला कह चुके हैं कि किसानों को देश के प्रधानमंत्री व कृषि मंत्री पर भरोसा रखना चाहिए और साथ ही ये भी कह रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को अगर कोई आंच आती है तो वो अपना निर्णय करेंगे।

हरियाणा की सत्ताधारी पार्टी भाजपा के अपने कुछ विधायक व ऐसे नेता जो ग्रामीण कृषक पृष्ठभूमि से हैं। वो भी प्रदेश नेतृत्व से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं। अपने विधानसभा क्षेत्र में उठ रहे किसानों के विरोध के चलते उनके सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती दरपेश है।

इन सब परिस्थितियों के कारण मुख्यमंत्री अपनी सरकार में असंतुष्टों को साधने में लगे हैं। मुख्यमंत्री इन परिस्थितियों से उपजी आशंकाओं के चलते प्रदेश में अपनी सरकार को स्थिर रखने के लिए दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से भी लगातार संपर्क बनाए हुए हैं।

उसी के तहत मुख्यमंत्री खट्टर ने आज गृहमंत्री अमित शाह से उनके घर पर मुलाकात की है। शाह ने खट्टर को किसानों के बीच जागरूकता अभियान चलाने की सलाह दी है। और उसके जरिये किसानों के बीच फैलाए गए भ्रम को साफ करने के लिए कहा है।

उधर, कांग्रेस न केवल किसानों के आंदोलन में उतर पड़ी है बल्कि पूरी राजनीतिक परिस्थिति पर नजदीक से नजर बनाए हुए है और मौका पड़ते ही वह सत्ता के खेल में शामिल होने की फिराक में है। यह बात कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा के बयान से समझी जा सकती है। उन्होंने बीजेपी और जेजेपी के गठबंधन पर सवाल उठाया साथ ही कहा कि उसे तत्काल इस समर्थन को वापस ले लेना चाहिए।

कुमारी शैलजा ने कहा कि “मैं दुष्यंत चौटाला से अपेक्षा करती हूं कि वह अपनी आंखें खोलेंगे। इंतजार करने की जरूरत नहीं है।” उन्होंने कहा कि आप कहते हैं कि एमएसपी के बंद होने का इंतजार करेंगे और उसके बाद ही समर्थन वापस लेंगे। उन्होंने कहा कि आज जब किसानों पर लाठियां बरसाई जा रही हैं तो आप कैसे चुप बैठ सकते हैं? आप कैसे इस सरकार से सहयोग कर सकते हैं?

इस बीच, हरियाणा के किसानों ने आगामी 6 अक्तूबर को सिरसा स्थित उपमुख्यमंत्री दु्ष्यंत चौटाला के घर का घेराव करने का फैसला किया है। इस मौके पर किसान उनके इस्तीफे की मांग करेंगे। और ऐसा बताया जा रहा है कि यह प्रदर्शन अनिश्चित कालीन धरने में बदल सकता है। आपको याद होगा कि पंजाब के किसानों ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के घर का घेराव किया था। और उसी का नतीजा था कि आखिर में हरसिमरत कौर को न केवल कैबिनेट से बाहर निकलना पड़ा बल्कि अकाली दल को एनडीए तक छोड़ना पड़ गया और पूरी पार्टी किसानों के आंदोलन के साथ आकर खड़ी हो गयी है। बंद के दिन सुखबीर बादल और उनकी पत्नी हरसिमरत कौर ने टैक्टर पर सवार होकर किसानों के आंदोलन की अगुआई की।

जब इस विरोध प्रदर्शन के बारे में दुष्यंत चौटाला से इंडियन एक्सप्रेस ने बातचीत की तो उनका कहना था कि “मैं उन लोगों से मिलकर प्रसन्न होऊंगा। उनका स्वागत करूंगा और उन्हें इस बात का भरोसा दिलाऊंगा कि उनकी उपज की खरीद 1 अक्तूबर से एमएसपी रेट पर ही होगी।”

पिछले दो हफ्तों में हरियाणा के किसान दो बार पूरे सूबे में चक्का जाम कर चुके हैं। इसके अलावा 10 सितंबर को उन लोगों ने अनुमति न मिलने के बावजूद एक बड़ी रैली की थी। इस तरह से हरियाणा अब दूसरे चरण के आंदोलन के लिए तैयार हो रहा है। भारतीय किसान यूनियन के राज्य अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने रविवार को बताया कि पूरे देश के किसान नेताओं की 8 अक्तूबर को कुरुक्षेत्र में बैठक होगी और उसमें आंदोलन के अगले चरण पर फैसला लिया जाएगा।

लेकिन सिरसा और फतेहाबाद जिले के किसान 6 अक्तूबर को सिरसा में दुष्यंत चौटाला के घर का घेराव करने की घोषणा पर अड़े हुए हैं। फतेहाबाद के एक युवा किसान नेता मंदीप नथवान का कहना है कि गांव के किसान 6 अक्तूबर को सिरसा स्थित दुष्यंत चौटाला के घर की ओर प्रस्थान करेंगे और उनसे उनके इस्तीफे की मांग करेंगे। उन्होंने कहा कि डिप्टी सीएम को इसलिए इस्तीफा देना चाहिए जिससे केंद्र की बीजेपी सरकार पर दबाव पड़े और वह इन काले कानूनों को वापस लेने के लिए बाध्य हो।

नेताओं का कहना है कि अगर हरसिमरत कौर कैबिनेट से इस्तीफा दे सकती हैं कि तो किसानों के हितैषी बनने वाले दुष्यंत चौटाला क्यों नहीं? किसानों का कहना है कि कारपोरेट न केवल हमारी फसलों की ओर देख रहा है बल्कि हमारी जमीनों पर भी उसकी निगाह है।

किसानों के इस दबाव का नतीजा है कि जेजेपी के भी कुछ नेता किसानों के आंदोलन के साथ खड़े हो गए हैं। 20 सितंबर के आंदोलन में जेजेपी के दो विधायक जोगी राम सिहाग और राम करन काला शामिल थे।

उधर इस आंदोलन की आंच सरकार और उसकी पार्टी पर भी आने लगी है। बीजेपी बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री और प्रोफेसर छत्रपाल सिंह का कहना है कि जिस तरह से सरकार ने यह कानून पारित कराया है उससे उसकी मंशा पर सवाल खड़े हो गए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में अगर किसान आंदोलन कर रहे हैं तो यह उनका हक है और उन्हें इससे रोका नहीं जा सकता है।  

(जगदीप सिंह सिंधु वरिष्ठ पत्रकार हैं और हरियाणा की राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं।)

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